अंधयुगक ई अकादारुन रीति

किछु कविता ::
निक्की प्रियदर्शिनी 

निक्की प्रियदर्शिनी
 

1. अकादारुन


राति

                 

पिता द्वारा मूल्य द'

क' देल गेल दान

मंदिरक दनपेटी मे

पड़ल कतेको टाका

ओ रहैत छैक लावारिस

लागल छैक ताला

आ कुंजी छैक हाथ मे

धर्मक ठेकेदारक

इच्छा नहियो रहैत 

ओहि पेटीमे पड़ल टाका सँ

कीनल जाइत छैक रंग-विरंग

वस्त्र-आभूषण आ सजाओल

जाइत छैक सूंदरतम मूर्ति जकाँ 

कोबरा घर मे बैसल ओहि बेटी केँ


भ’ गेल अछि प्रात

भोग विलासक लेल तैयार

पूछल नहि गेल ओकरा

कोनो बात-विचार

पठा देल गेल

पोटरी मे बान्हल 

ओहि सनेस जकाँ

जेना चंगेरा केँ पोटरी बनाय

बान्हल अछि 

टिकरी, खाजा, बालूमशाही

अपना भीतरक सब

उन्माद आ इच्छा केँ दबौने

बिजली जकाँ छटकबैत दाँत 

ओहि नव आँगन मे

राति होयबाक डर पैसल

आँखि मे ओ नोचब ओ घीचब मोने अछि

तइयो समेटि अपना भीतरक

हाहाकार आगि केँ नितदिन

अयना लग ठाढ़ होइत

आ लगबैत माथ मे जखन सिंदूर

सोझाँ नाचय लगैत अछि

ओ अकादारुन राति 

ओहि अकादारुन रातिक घमासान।


इच्छा


झहरैत मेघ उत्तेजित अछि

कामोत्तेजनाक आगि

पसरल सभतरि

नहि क' पाबि रहल छनि शांत

ओकरा ब्लिजार्ड


गुलाबक फूल जकाँ

सब उम्र केँ 

तोड़बाक रखने छथि इच्छा

रुटलेस सन घुमैत

स्ट्रीट डॉग सँ बदत्तर 

जीवन जीबाक लेल 

बाध्य बनौने छथि अपना केँ 

कलयुगक भोक्ता लोकनि


जकरो भ' गेल छैक जियान

अपना भीतरक कस्तूरी

ओकरो गमक सँ 

झनकि जाइत छनि 

हुनक विकृत मोन

ओकर गमक लए

निकलैत अछि जखन ओ

उन्मादी शिकारी जकाँ 


राग-द्वेष, ऊंच-नीचक

रत्तीओ भरि नहि रहैत छनि

कोनो ज्ञान 

कोनो विचार

मात्र रखने छथि अपना भीतर 

ओकरा भोगि लेबाक

अकादारुन इच्छा।


दुख


कोनो सुनामी सँ पहिने

निश्चय अनुभव करैत होयत समुद्र

एकटा हमरे सन बेचैनी


रामक तीर मे आब कहाँ छै दम

ओ त' परास्त छथि स्वयं

रावणी दम्भक सोझाँ

बेचैनी सँ उठैत नव उन्माद

बना रहल छै प्रबल

विनाशक ओहि आवेग केँ

आच्छादित क' रहल छैक

वाड़वानल केँ


उठैत छै घमासान

मोन आ मस्तिष्कक बीच

होयत की फेर महाभारत!

मुदा एहि बेर नहि हेतीह द्रौपदी 

तकर कारण


आब सक्षम छथि ओ

अपना केँ नहि बनओती

कोनो युद्धक कारण

आबि जाओ बरू कतबो

अकादारुन दुख

लागि जाऊ बरू 

कतबो दुःखक अमार।


निर्वाह

            

धर्मक निर्वहन मात्र युधिष्ठिर नहि केलनि

ओ त' एखनो स्त्री क' रहल अछि

पिताक लेल

भाइक लेल

मित्र लेल

पुत्र-पुत्रीक लेल


एकयुगक उदाहरण एखन तक प्रचलित

मुदा सभ युग मे कयल गेल जे निर्वाह

छैक कहाँ ओकर कोनो चर्च!


हमरे दुआरे, हमरे चलते, हमरे सँ

केओ जरूर हेतैक

कतेक दिन चलतैक

ई ‘अली बे ते से’क एकरंगाह राग

 

चिन्हौक गृहपति केँ

प्रजापति कहौनिहार

बड़का-बड़का बुधियारिक मठाउत बन्हने 

कलयुगी पुरखाहक

अकदारुन पुरखौत।


रीति


छैक ई विडंबना!


जखन भगवती पर फूल चढ़यबाक लेल

नहि छैक कोनो हाथ शुद्ध 

लगैत छैक अशौच 

जन्माशौच आकि मरणाशौच


ओ बियाहलि धियाक फूल 

कोना छैक योग्य

जे समयक घिरनी मे पिसाइत

जातक कील सँ लगक अन्न जकाँ

सटल अछि एखनो जन्मदात्री संग


खाइत ओकरे 

सोचैत ओकरे 

जोगैत ओकरे

छैक तैयो वएह शुद्ध 

मात्र पूजाक लेल


अंधयुगक ई अकादारुन रीति 

भोकैत रहैत छैक ओकरा

जेना फाटल केँ सिबैतकाल 

खच द' गड़ल होइक 

छोटकी सुइयाक नोक

बहुत काल धरि 

रहैत अछि टिहकैत

ओ रहैत अछि सोचैत

समाजक एहि अकादारुन रीति संग

भोगैत रहैत अकादारुन टीस। 


2. महिमा


अहाँक जन्महि सँ

दू कुल तरि जेबाक

लागय लगैत अछि अनुमान

खूब सुन्नर रही अहाँ

बड़का-बड़का आँखि 

दपदप गोर

भगबतिये जकाँ

झालर बला फराक पहिरि

पएर मे झुनझुन

करैत पायल पहिरने

टुनमुन चलैत रही


अदना सनक 

काजरो करबा काल

अहाँ आ अहाँक भाइ मे कयल गेल अंतर

अहाँक माथ परहक काजरक ठोप

दाहिना कात आ अहाँक भाइक बामा

अहाँक चलब देखि

नहि कोनो भगवतीक तुलना कयल गेल

आ, देखियो जे अहाँक भाइकेँ

चलैत देखि

भेल कृष्ण आ राम सँ तुलना 


महिमा!

अहाँ आब जायब स्कूल

कतेक आशा सँ भरल अछि

ए बी सी डी

क ख ग घ 

संग ‘वन वन जा’ सीखब


महिमा!

पहिल क्लास सँ सातम क्लास मे पहुँचब अहाँ

मानसिक-शारीरिक परिवर्तन होयब

भ’ गेल शुरू

उज्जर शर्ट आ ब्लू स्कर्ट मे जाइत रही स्कूल

अंग्रजीक क्लास मे

बेर-बेर अहाँक शर्टक जेबी मे

रखैत छलाह  

कहियो टॉफी, कहियो कोनो कागज

नहि जानि असहज लगैत छल

अहाँक पैर सहजहि पाछू भ’ जाइत छल

चिंता जुनि करू अहाँ

नहि होयबाक चाही आब ककरो संग

अछि पढाओल जाय लागल

गुड़ टच आ बैड टचक शिक्षा स्कूल मे


महिमा

खूब सुन्नरि युवती भ’ गेलहुँ

बाट मे चलैत काल

एकबेर सभक नजरि

अछि दौड़ जाइत अहाँक मुँह दिस

पढबा सँ बेसी अहाँक 

विवाहक फिकिर अछि

पड़ोसिया केँ

बेटीक पड़ा जयबाक खबरि सभ सँ

भीतरे-भीतर सशंकित

छथि माता-पिता

पढ़ैत-पढ़ैत भागब

विवाहक बाद मारब केर

कतेको घटना सँ


महिमा!

अहाँ केँ जखन कखनो

अछि भेटैत प्रेम

ओकरा अहाँक मन पहुँचा दैत अछि

पराकाष्ठा पर

अहाँ ओहि अनमोल क्षण केँ

रोकि लेबय चाहैत छी

अनंत काल धरिक लेल


बाँहिक बीच पतिक छाती पर

अपन माथ जखन रखैत छी

तँ ओ बँहिक घेरा

अहाँक अपन निज संसार सन लगैत अछि

महल दू महल 

लगैत अछि झुंझुआन

होइत अछि ई बाँहि सदैव अहाँकेँ

अपना भीतर समेटने रहय

अहाँ जीवन पथ पर

अपन प्रेम संग बढ़ैत रहय चाहैत छी


महिमा!

अहाँ नहि थाकैत छी

कहियो कोनो घर-बाहरक काज सँ

मुदा थाकि जाइत छी अहाँ 

मात्र कटाक्ष भरल बोली सँ

जे भेटैत रहैत अछि

सड़क पर, परिवार सँ

खास क’ पति सँ


तोड़ि दैत अछि

शक्ति केँ

छी जे बन्हने अपन डाँड़ मे

अपन कान्ह पर

खेतक बड़द जकाँ

जे मात्र चासि, समारि आ जोति क’

बना देबय चाहैए

खेत केँ अपन

जकर जजात सँ 

समाज-देश भ’ सकत सबल

क’ सकत निर्माण एकटा

सुयोग्य मनुखक

डेन पकड़ि जकर

कोनो महिमा चलि सकत पूरा जीवन

बिना कोनो उपरागक

बिना कोनो भयक

ओकरा बुझि सकय

ओकर संवेदना केँ चिन्हि सकय

ओहो मनुख अछि

एहन व्यवहार करय।


3. कम्बल


नहि पहिरने छी हम

स्लिबलेश टॉप

पैर मे सटलाहा जीन्स

डीप नेक बला ब्लाउज

टाइट फिटिंग कोनो कपड़ा

जाहि सँ देखार दैक

अंगक सभ आकार

हाइ हील पर चढ़ि

नहि बनल छी ऊँच


नहि लगौने छी

आँखि केँ घिची लेबय बला

लाल टुहटुह लिपस्टिक

खूब गढ़गर काजर

गमकौआ डियो

नहि अछि हमर रंग

गोर दपदाप


पाँच वर्षक

पन्द्रह वर्षक

पच्चीस वर्षक होइत

पहुँच गेल छी

एकटा अवस्था धरि


तइयो 

हमरा देखबा

आकि नपबाक

अछि रखने निकती

पुरुष समाज


स्कूल सँ शुरू भेल

विवाह धरि

नहि होइत अछि समाप्त

हुनक आँखिक भूख

गोर छी की पिण्डश्याम

नहि कोनो फरक

कामातुर लोकक नजरि मे

रोड़-बाट सँ ल’

कोनो गोष्ठीक

चहटगर गॉसिप मेटर 

अछि बनैत


परिणाम

मोलेशटेशन

रेप

मैरिटल रेप

नहि किछु तँ

आँखि सुख 

वाक सुख धरि 

पहुँचैत छी हम स्त्री

हमर समाज ओढ़ने 

अछि जा रहल

आधुनिकताक कम्बल।


•••


डॉ. निक्की प्रियदर्शिनी [जन्म: 02 फरवरी 1983] मैथिली साहित्य-संसारक सुपरिचित स्त्री स्वर छथि। ‘ई-मिथिला’ पर आइ एकटा अंतरालक बाद हिनक किछु कविता प्रस्तुत अछि। एहि प्रस्तुतिमे आयल हिनक दीर्घ कविता ‘अकादारुन’ विशेष रूपसँ ध्यानमे आयल। मैथिलीमे दीर्घ कविता अपेक्षाकृत कम लिखल जाइत रहल अछि। ताहूमे स्त्री विषयक कोनो दीर्घ कविताक भेटब दृश्यमे नहिये जकाँ अछि, जखन कि एकर संभावना प्रायः उपस्थित छल (अछि)। 

देखल जा सकैछ (निबन्ध-संग्रह, 2014), समय-सापेक्ष (कविता-संग्रह, 2017), मैथिली अनुवाद : सिद्धांत ओ विवेचन (आलोचना, 2021) निक्कीक प्रकाशित कृति छनि। एतय प्रस्तुत कविता सभ हिनक नवीनतम कविता-संग्रह ‘अकादारुन’मे संकलित अछि, जे शीघ्रहि पाठकवर्गक लेल उपलब्ध होयत। 

‘ई-मिथिला’ पर हिनक पूर्व-प्रकाशित कार्यक लेल एतय देखी: हम छी तँ युग अछि आओर इतिहास जगमे

अंधयुगक ई अकादारुन रीति अंधयुगक ई अकादारुन रीति Reviewed by ई–मिथिला on जनवरी 11, 2026 Rating: 5

1 टिप्पणी:

  1. वाह, अद्भुत। बहुत दिन पर एहन विचार ओ संवेदना सं परिपूर्ण मैथिली कविता सभ पढ़लहुं।कहबाक मोन करैत अछि,''वाह,खूब जीबू निक्की"। बालमुकुंद के निक्की प्रियदर्शिनी की ई कविता सभ प्रस्तुत करबाक लेल धन्यवाद।

    -अशोक

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