कतेक नम्हर छै दुखक ई अलाप


|| लॉकडाउन : किछु कविता ||

  — कुमार राहुल

कुमार राहुल सुपरिचित कवि-पत्रकार छथि आ एकटा पैघ समयावधि सँ मैथिली लेखन सँ सम्बद्ध रहल छथि। पत्रकारिता आ कविताक अतिरिक्त कथा, बालसाहित्य, टिप्पणी आदि सेहो प्रकाशित-प्रशंसित  होइत रहलनि अछि। एकर अतिरिक्त सहयात्री, संवाद, दिशा, विचार आदि पत्रिकाक सम्पादन कार्य सँ सम्बद्ध रहल छथि। 
एहि प्रविष्टि मे कुमार राहुलक प्रस्तुत काव्य-श्रृंखला एकटा अएना जकाँ फुजैत अछि आ वर्तमान मे जाहि विकट समय-परिस्थिति सँ हमरालोकनि साक्षात्कार कए रहलहुँ अछि, तकर अनेक चित्र प्रतिबिंबित करैत अछि। ओना तँ हिनक काव्य-संसार वैचारिकताक संग-संग विलक्षण चित्रात्मकता आ बिम्ब-प्रधानताक लेल जानल जाइत छनि मुदा प्रस्तुत कविता सब वैचारिकताक आवेग मे एवं एहि अकलबेरा केँ चित्रित करबाक प्रयास मे एकपेरिया पकड़ि क' सोझ-सोझ गप्प करैत अछि, जे हिनक एहि कविता सभ केँ आर उद्देश्यपरक आ विश्वसनीय बनबैत अछि। प्रस्तुत अछि हिनक काव्य-श्रृंखला 'लॉकडाउन'। पढ़ल जाए— 


लॉकडाउन-१

अपन मड़ैयाक दुआरि पर बेसुध सन पड़ल-ए यशोधरा
चैतक एहि अकलबेरा मे
कियो दुरूक्खा मे नै देखाइ छै.
धीरे-धीरे जागल सन निन्न मे जाइ लगैए यशोधरा 
अधनिन्ना मे दालि-रोटी, नोन सन किछु बड़बड़ा रहल-ए
थोड़ेक दूर सँ अवाज अबै छै- "भूख से किसी की मौत नहीं होगी"
मेंमियानाइ छोड़ने बकरी एक बेर टुअर सन मेंमियाय छै
यशोधराक दूनू पएर थोड़ेक हिलै छै आ फेर निसबद्ध भ' जाइ छै
खुद्दीक आस मे दूटा चिड़ै ओकर पैर मे लोल मारै छै  
यशोधराक चेतना मे बकरी लहालोट होइत देखाइ छै।


कुमार राहुल

लॉकडाउन-२

अपन-अपन सीमा पर 
अपन-अपन युद्ध लड़ि रहल-ए सभ
लुकझुक होइत साँझ मे
कत्तौ कुकूर जोर सँ कनै छै
ऑफिस सँ घुरल टिफनक बसियौरी नै छै एखन
पूरा सड़क छै कुकूरक लेल आरक्षित
महादेव बाबाक पीढ़ा आइ सोमवारियो पर सुखायल छै
काली-कंकाली मंदिर मे जोर सँ नै बजलै आइ घड़ी-घंटाल
मसानी बुढ़बा आइ नै देखायल कखनो
रातुक नौ बजिते निसबद्ध भयाओन लागय लगैत छैक चौबटिया तक
बीच बाट पर
अपन मुँह मे खियायल चप्पल लेने एक कुकूरक बच्चा दौड़ल
ओकर पाछू दौड़लै एक हेंज कुकुर
अपार्टमेंट सँ एकटा पोलिथिन खसलै बाट पर
अपार्टमेंट मे इजोत छलै 
आ कुकूरक मुँह मे हड्डी।

लॉकडाउन-३

एक-दोसरा सँ डेराइ-ए लोक
ई ल' लेत हमर हिस्साक राशन
कत्तौ छींक ने दिये मुँह पर
एहि कोलाहलहीन भेड़ियाधसान मे
नुकायल-ए चोर-डकैत
ओकर बदलि गेल छै भेस  
सभ ठाम तँ खाली भाषण छै
सभतरि कुशासन छै
कत्तौ दोगि-सोन्हि मे नुकायल छै दरेग
दोकान पर मारामारी छै
कियो तिरपित, तँ ककरो हकमारी छै
पंजाब-दिल्ली सँ चलल ककरो बेटा 
साबुत नै पहुँच पबै छै गाम
कियो मजूरीक पाइ सँ कीनैए साइकिल
रस्ता मे भूखल पेटे खीचै-ए रिक्शा-ठेला
पहुँचबाक छै गाम
जे गाम ओ भूखक कारणें छोड़ि देने छल
आइ निछोहे दौड़ि पहुंच' चाहै-ए
बाट मे ओकरा दिय' पड़ैत छै कएक बेर अग्निपरीक्षा
गाम सीमान पर डंटा करैत छै स्वागत
ओ सजल गामक स्कूल मे अधपेटे-अधनीने बन्हायल रहै-ए
ओ एहन दंड लेल अभिसप्त-ए
जकरा ओ ने देखने-ए, आ ने ओकर कोनो गलती छै
ओ भूखक तोड़ तकबाक लेल गेल छल शहर गढ़य
जे देश सँ घृणा करैत भागल छल विदेश
ओ आबि रहल-ए पुष्पक विमान सँ
आ जे देश गढ़बा मे लागल छल
ओ पैदल, साइकिल, ठेला, ट्रक पर चढ़ि
घुरि रहल-ए भूखक देस मे।


प्रतीकात्मक छवि

लॉकडाउन-४

स्टेशन पर फोटो छपवा दानवीर 
आगू मे राखि दै छै बिस्कुटक बोरिया
भूख सँ लहछल मजूर 
टूटि पड़ै-ए ओइ बोरी पर
किछु लोक हंसि रहल-ए
किछु लगा रहल-ए आरोप
जे यैह सभ शहर मे रिक्शाक भाड़ा अधिक लैए
ई छी असभ्यक टोली
एकरे कारणें देश बदनाम-ए... 
मालिक!
एहि मे बहुते झोल छै
मजूरोक कोनो माेल छै!
मालिक! 
भूख सँ पैघ असभ्यता नै छै कोनो।


लॉकडाउन-५

ओ घूरि रहल-ए गाम
पैदल चलैत 
पएर मे फोंका आ माथ पर 
दुख-पोटरी लेने
पाछू पड़ल छै गिद्ध
ट्रेन/ट्रकक नाम पर ऐंठल जाइल छै पाइ
ओ चलि दै-ए पएरे
ओ मारल जाइए भूख सँ
ओ मारल जाइए ट्रकक गुल्ला सँ
ओ मारल जाइए ट्रेनक पटरी पर
ओ इनार मे फेकल जा सकैए
बन्हकी बनल कोनो काेल्डस्टोरज सँ
गायब कैल जा सकैए
ओकरा ट्रेन मे भूखक कारणें
रूकि सकैत छै सांस
जे बांचल-ए
ओ एखन नै गाबि सकैए
गोनो गीत
ओ निरंतर दौड़ल जा रहल-ए
अपन डिहबार दिस
ओकरा देखा रहलैए
ओलती मे लेसल ढिबरीक ललौन इजोत
कनिये दूर तँ चलबाक छै ओकरा
ओ पहुँच जायत गाम
मुदा ट्रकक आवेग मे सभटा सपना
छिना जाइ छै
कियो मारल जाइ छै
कियो भ' जाइ छै अपंग
ओ हाकरोसो नै क' पबैए 
मुदा किछु हेहर-थेथर पएर छै
जे घूरि अबै छै गाम
कोनो बड़-पीपरक छाहरि ताकय।


एकटा आर प्रतीकात्मक छवि

लॉकडाउन-६

केहन दुर्दिन छै महराज
अपन भ' जाइ छै आन
आ किओ आन भ' जाइ छै अपन
जखन ठूंसल ट्रक मे भ' गेल रहै मोन खराप
जान बचौने रहै ओ गुमटी बला छोटका डागदर
पानि पियौने रहै मुख्तार
ट्रक मे ओकरा संग रहय बला 
ओकरे टोलक कंटीर छोड़ि देने रहै
मुख्तार ओकरा असगरे नै छोड़लकै
आ ओ नै मरल
ट्रेनक पटरी पकड़ि अबैत काल 
खाली देखा रहल छलै बासि रोटीक टुकड़ा
कत्तौ-कतौ चप्पल
दूनू सिहरि गेल छल
किछु भ' गेलै दूनू केँ,
तँ घरक की हाल हेतै...!
मुख्तार ओकरा पंजिया लेने रहै
दूनू भरि पोख कानल छल
भजार !
अपन गाम आब कते दूर छै?
हमरा सभक मनआंगन मे
कहिया फुलेतै पलास-वन?

लॉकडाउन-७
  
एना कतेक दिन चलतै भजार
दुखक दिन एतेक नम्हर कोना भ' गेलै
अन्हार राति मे टापर-टोइयां दैत हेंजक-हेंज लोक
बोल रहितो बौक किए भ' गेलै
मंदिर मे कहिया बजतै घंटी
आ मस्जिदक अजान सँ कहिया फूजत निन्न
सबद कीर्तनो सुनबा लेल तरसि रहल-ए प्राण
कहिया भेटतै सभ कें एहि कारिख राति सँ त्राण
कतेक नमहर छै दुखक ई अलाप
कहिया भेटतै खुशीक ठुमरी
कहिया...कहिया...कहिया..???

लॉकडाउन-८

एना हेतै भजार जे
मोंछक पोम्भ बला छौड़ा
निधरोख चला सकत लहरिया कट दुपहिया
सजल बजार मे इजोत अनैत छौंड़ीक आंखि
देख सकत सिनुराह भोर मे सपना
गामक चौक पर ढिंग चिका ढिंग... बजतै
एना हेतै भजार, जरूरे हेतै जे
कोनो किताब मे
भेटतै पियरका लिफाफ
आ गामक सीमान पर बजतै
प्रेमक ठुमरी।


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कुमार राहुल सँ kr6468@gmail.com पर सम्पर्क सम्भव अछि।

कतेक नम्हर छै दुखक ई अलाप कतेक नम्हर छै दुखक ई अलाप Reviewed by e-Mithila on May 30, 2020 Rating: 5

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