अब्दुल तांगा वाला

उषाकिरण_खान

कथा ::

|| अब्दुल तांगा वाला : उषाकिरण खान ||


‘‘बाउ हौ?’’ - कहलकै तेतर
‘‘की कहै छें, कह ने, तखनी सॅं बपहारि कथी काटै छैं?’’ - बाप पुनहद बला बजलै। पुनहद बला गामक जमाय छलै। तेतरा के बाप। तीन टा बेटी के पीठ पर जनमल रहै। जनमलै तँ गाम मे बड़ जोर बाढ़ि आएल छलै। जमीन सब डूबि गेलै। बहुत दिन तक पानि थमकल रहलै से खेत नै उखड़लै कोनो तीमन तरकारी नै लगा सकलै। एम्हर कोसिकन्हा मे पानि जहिना एलै तहिना पड़ा गेलै। पुनहद बला सरबेटा के सुन्नत मे आएल रहै तँ अग्गह बिग्ग्ह बालु आ पांकक धरती देखि लोभा गेलै।
‘‘एह अइ जमीन मे फुइट बतिया, तरबुज्जा खरबुज्जा जॅं रोपल जाइ तॅं ओलड़ि कै फरतै।’’ - विचारलक। ओकर मोन लुसफुस करै लागलै। ओ मोनक बात अपना सार छेदू कुजरा के कहलकै।
‘‘हौ मेहमान, हम सब तँ पोदवीये लै कुजरा छी एकटा खीरा जे टाट पर उपजबै छी से हम नै तोहर सरहोजि। तोरा जौं ई जमीन ठीक लगै छह तँ उपजाबह।’’ - छेदुआ कहलकनि। गाम मे कोनो गप छपित तँ रहै नै छै। सब सुनलकै आ पुनहद बला मेहमान के स्वागत् मे तैयार भेलै। बड़की मलिकाइन सेहो सुनलखिन। ओ मेहमान के बजौलखिन। मेहमान एलाह अपना हरियरका चरखाना गमछी लै मलिकाइनक चरण पर राखि सलाम केलखिन।
‘‘मेहमान, हम अहाॅं के सलामी देबै चाहै छी। आहाॅं बड़ सेसर कुजड़ा छी से बूझल अछि। हमरा गामक जमीन सेहो पसिन्न पड़ि गेल अछि तँ हमर धारक कात बला जोतल एक बीघा जमीन पर आइये सॅं काज शुरू क' लिय। समय बीतल जाइ छै।’’ -ओ कहलखिन। पुनहद बला हाथ जोड़ि लेलकै। हुनकर सहायक पंचू जाए जमीन नापि देलकै। कहलकै -
‘‘मेहमान, अहाॅं अखियासि लियौ जे एतबे मे काज होयत कि नै? करबै तँ दू बीघा बारि देब।’’ पुनहद बला पहिला खेती एक बीघा के केलक। बीया एकरा रहै, खेत जोतल रहै। गाछ घरवाली डोमनी आ बेटी सब रोपै मे मदति केने रहै। कमैनी पटौनी सेहो सुभिस्ते सॅं भेलै। एक बेर गाम गेल छल अपना पितियौत भातिज सभ के खेती करै मे मदतिक वास्ते लाबय लै। मुदा ओ सब बंगाल चल गेल छलै। खेत पर मचान बान्हि लेलक पुनहद बला आ सारक घरक कोनटा पर कनी टा घर ठाढ़ कै लेलक। सीजन अबैत-अबैत खेत खल-खल हॅंसय लागलै। तरबुज्जा, खरबुज्जा, काॅंकड़ि-बतिया, खीरा आ फुटि सॅं खेत भरिया गेल छलै। फूंटि तँ फुटहा भै फरल छलैक। हाट चढ़ा बेचैत-बेचैत थाकि गेल छल पुनहद बला। फूटि तँ भरि खेत छहोछित्त भेल फाटि कै कतेको राही टूही के भूख मेटबै। एकटा मजगूत सीक पटइ पर लादि हटिया जाए। बेसी भ’ जाइ तखन बैलगाड़ी करै पड़ै। धीरे-धीरे पुनहद बला एक सॅं दू बीघा, दू सॅं तीन बीघा खेत मे तरकारी लगबय लागल। आब पुनहद बला आ डोमनी गिरिह बासी भै गेलै। जाहि तिलयुगा बान्ह पर गाम बसल छलै ताहि पर भाइ के बगल मे भराठ भरा दू टा घर आ फराक आॅंगन घेर लेलक। दू टा बेटी के बियाह रोसकत्ती (विदा) भै गेलै तेतरा आ छोटकी बेटी के गोलट फूलपान चढ़ल छलै। आब बिन जन-मजूर के हाट नै जाइ। तरबुज्जा-खरबुज्जा के मसीम मे बैलगाड़ी करय पड़ै। तेतराक बियाह रोसकती के बाद समधि विचार देलकनि जे अइ हाट सँ सेसर हाट आसापुरक छै। ओ थोक बाजार छै; माल उतारू दाम लिय’ आ घर धूरि जाउ। जमालपुर हाट मे तँ अपने बैसल माछी मारै छी। पुनहद बला के विचार पसिन्न पड़ि गेलै। समधी के संग कै ओ पइकार ठीक केलक। पहिल बेर तांगा पर छिट्टा पथिया, बक्कू बोरा मे लादि हाट गेल। ठीके बेसी सुमीता रहै। एक टा खेत मे छोटका कदीमा बेस फड़ल रहै। मुदा टमटम बला से लादै लै तइयारे नै भेलै।
‘‘हम कदीमा नै लादब।’’
‘‘से कियैक हौ भाइ। हम बक्कू मे बान्हि कै देबह हौ।’’ - पुनहद बला कहलकै।
‘‘तै सॅं की, हम खोम मानै छी। हमर घोड़ा बेराम पड़ि जाइए। नै लादब।’’ - ओ अड़ि गेलै।
‘‘घोड़ा की जानय गेलै हौ जे कदीमा छै की कुम्हड़?’’ 
‘‘हम जानै छियै ने?’’
‘‘बैलगाड़ी पर लादि केँ कैक बेर जमालपुर हटिया पर बेच क’ आएल छी। तोहूँ हद्दे करै छह।’’ -पुनहद बला कहलकै बैलगाड़ी पर लादि एक दिनुका काज दू दिन मे सम्पन्न केलक। मोन घोर भै गेल छलै। बरदक टान से रहै। हर जोतेतै कि कटही गाड़ी? तही अवसर पर तेतरा कहलकै, पुछलकै-
‘‘बाउ हौ-- ।’’
‘‘बाज ने की कहै छैं?’’
‘‘एक टा टमटम कसवा लै ने।’’- पुनहद बला ओकरा दिस भरि आॅंखि देखलकै। बेटा जुआन भेल जाइ छै। मोछक पम्ही करिया गेल छै। हरक लागन घै नेने छै। लत्ती-फत्ती रोपे मे मोन दै छै, आलू जाहि खेत मे ई रोपत, माटि चढ़ायत ओ बेसी फर धरै छै। एकरे कहला सॅं पपीता के खेती शुरूह केलक पुनहद बला; खूब आमदनी देलकै से बेटा कहइ छै।
‘‘बाउ रौ खाली टमटम कसबेने की हेतौ? घोड़ा सेहो राखय पड़तौ।’’
‘‘गाय, महीस, बकरी बरद पोसबे करै छी, घोड़ा नै पोसल हेतै?’’ - पुनहद बला अपने टमटम घोड़ा केँ इन्तजाम केलनि आ तेतरा तरकारी आसापुर मंडी चढ़ा अबै। ककरो खोसामद के कोन काज?

सांकेतिक छवि

        अइ गाम आ इलाका के कुजड़ा सब टा खेतिहर रहलै, भीत बनेनिहार रहलै। ने तीमन तरकारी के फसिल लगेलकै ने बेचलकै। पुनहद बला आबि कै सब टा कायदा बदलि देलकै। एकाध टा पासवान जरूर एकरे जकाॅं तरकारी के खेती केलक आ संगबे भै आसापुर जाय लागल। तेतरा घोड़ा के खूब सेवा करै। चमचम चमकै ओकर खाल आ रंग बिरंगक रूनकी झुनकी सॅं साजल रहै ओकर गरदनि ओकर ममियौत सब - ‘एक्काबला’ कहि हॅंसी करय लागलै कोनो दुख नै मानैत तेतरा हॅंसि कै आगू बढ़ि जाइक। टमटम केँ धी-बेटीक बिदाइ मे सेहो इस्तमाल होमय लागल रहै। जखन सवारी लादल जाइ तखन कटही गाड़ी जकाॅं ओहार लगा देल जाइ। सबटा नीक-नीक बात होइ। पुनहद बला गनि केँ पांच दिन बीमार पड़ला आ शान्त भै गेलाह। सासुरक कबुरगाह मे दफन भेलाह। भाइ-भतीजा सब आएल रहैन्ह। डोमनी आ तेतरा टा घर मे रहि गेलै। कनियाॅं केँ रोकसती भै गेल छलै मुदा ओ बेसी काल नैहरे मे रहै। आब से नै रहलै। तेतरा बाप मुइने वयस्क जकाॅं भै गेलै। डोमनी भरि दिन खेत मे रहै। तरकारी खेतक ओगरबाही से कठिन छलै। तै डोमनी खेत ओगरबे करैत रहै। तेतराबहु बड़ स्थिर आ बुधियारि रहै। घर-आॅंगन सम्हारि लेलकै। तैयार होइत-होइत कोसिका उत्फाल भै गेली। खेत पथार डुबि गेलै, कतय धान पान आ कतय तरकारी, बड़का-बड़का सेसर गिरहत बेलल्ला भै गेलै। तेतर के एहना समय मे टमटम के आस छलै। आब ओ हो बान्हक ओही पार टमटम राखै आ रोजी कमाइ। विपनल समय मे की कमाई। लोक मोरंग बंगाल सॅं लै पंजाब दिस रोजगार तकै लै चल गेलै। तेतर एक तँ असकरूआ दोसर घर मे वृद्धा माए, कनियाॅं आ बाल-बुतरू छलै। एक टा घोड़ा आ टमटम से छलै। माल-जाल मरि खपि गेल छलै। खेते ने तँ खेती के करत, बरद सॅं खुट्टा खाली छलै। बकरी-छकरी जरूरे छलै। साले-साल बाढ़ि लोक के तबाह कइये देने रहै मुदा जीवन व्यापार चलि रहल छलै। तेतरा के एक टा बेटा आ दू टा बेटी भेल रहै बान्हक ओइ पार ब्लाॅक आॅफिस लग साल मे एक बेर दू तरहक कैम्प लागैत रहै। एक टा मोतियाबिन्द केँ, आॅंखि के आॅपरेशन केँ आ दोसर नसबंदी केँ। चारि टा सॅं छ-टा बच्चा जखन भै जाइक तखन स्त्रीगण के नसबंदी करैबाक सुधि अबै। तेतर तीन टा बच्चा भेलाक बादे आॅपरेशन करय लेल कनियाॅं के लै गेल। डोमनी कहबो केलकै - रौ एतेक बाइ कियै पैसि गेलौ, एक दू टा आर फल होम’ दही।’’
‘‘तीन टा तोरा कम बुझाइ छौ माए?’’ - जिद्दी तेतरा कनियाॅं के आॅपरेशन कराय देने रहै। अपना बेटा केँ गाम बला स्कूल मे पढ़य देलकै। मुदा जहिना गामक सब गोटाक बाल बुतरूक के होइ छै एकरो भेलै। बेटा अबदुल खेती किसानीक काज मे टमटम घोड़ा के तीया पाछा मे लागि गेलै। पहिलुक घोड़ा के बाद अइ बेर एक टा घोड़ी लेलक तेतरा। अब्दुल के एक दिन विचार भेलै -
‘‘हौ अब्बा, किएक ने टमटम के बदल तांगा कसबा लै छह। आब तँ सवारी गाड़ी भै गेलह। कोनो कदीमा परोर थोड़बे लादै छह?’’ - अब्दुल नया फैसन के अनुसार बाप के अब्बा कहै लागलै। जहिना एक समय तेतरा अपना बाप के टमटमक विचार देने छलै, आइ एकर बेटा तांगा के विचार देलकै। पहिलुका कमाएल सॅं बाप दस कट्ठा जमीन खाप किनने रहै। घर बनेने रहै आ डोमनी के बेस गहना गुरिया कीनि देने रहै। रूपैया के छड़ पूरमपूर सोलह टा चानी के रूपैया, सवा सेरक हॅंसुली, कटवी पिटबी बाजू गुज्जा लटकल, जौसन, बाला आ गोप। नाक मे सोना के नकमुन्नी आ दूनू कान मे चारि-चारि टा सोना के बारी रहै। डोमनी कोनो गहना नै पहिरै। जो कखनौ पुनहद बला टोकै तँ कहै -
‘‘है हमरा ओ मोन भरि गहना लदनाइ नै नीक लगेये काजे ने ससरत। बाजू के गुज्जा हिलतै-डोलतै तँ कमठौनी कैसे होतै?’’ - दूनू जीब हंसि केँ रहि जाइ। कोठरी मे बड़का ढक मे गहना के मोटरी रखबा देने रहै। तइयो बीनो चौल करै -
‘‘गै डोमनी दाइ, रतुका अन्हार मे कियो कान मोचि लेतौ तँ की करबही?’’
‘‘रौ टटीबा, तोरे धरबौ; तोरा छोड़ि के नोचत?’’
‘‘गै डोमनी दाइ, हम नै नोचबौ, कोनो चोर उच्चका जानि के नोचै से कहलियौ।’’ - एहन उतरा चौरी तँ होइ मुदा किछु भेलै नै।
        ओही पाॅंच सेर चानी के सुदभरना राखि तेतर बेटा अबदुल लै तांगा कीन देलकै। आ माए से कहलकै -
‘‘गै दाइ (मातृक मे रहला दुआरे अम्मा के दाइ कहै तेतर) पोता कहलकौ तखन चट दै तो गहना बहार केलही बाउ के कि हमरा कहने कि दितही?’’
‘‘दिन दिनुका गप छै रौ नुनू, एक दिन तोरा सभक कमाइ सॅं अरजल गेलै। फेर हमर नेन्ना सब अरजि लेत हम की सोना चानी लै कै कब्बर मे सूतब?’’ तांगा बहुधंधी भेलै। सवारी गाड़ी जकाॅं पाली बस स्टैंड पर अप डाउन करै लागलै। नबका चकाचक छीटक ओहार, मनोरी कटोरी लागल झालरि आ गद्दी बला सीट पर नीक नील घरक सुआसिन बैसय लागली। एकर घोड़ा घुंघरू बान्हल जखन बान्ह पर सॅं चलै तँ दस गामक लोक के जनतब भै जाइक। कत्तेक बेटी आ पुतहुक बियाह रोसकती करेलक अही घोड़ा आ सइस संगे। कतेक बरक बरियात साजल गेल। अब्दुलक अपनो कनियाॅं ओही पर चढ़ि कै आएल, आ अब्दुल दुल्हा बनि अही पर गेला तखन रासि धेलकै ममियौत रसूल। रसूल सेहो एक टा तांगा कसबा नेने छल। आब बान्ह तैयार छलै। जीप, विक्रम चलै लागल छलै रिक्शा धरि कनेक टा दूरी मे चलै। मुदा अब्दुलक तांगा के मांग रहै। अइ बेरका घोड़ा अब्दुलक अपनहिं घोड़ी के बच्चा रहै। मझोले कद आ दुलकी चालि बला। साँझुक पहर केँ घोड़ा आ तांगा बान्हक कतबैबला खोपड़ी बथान पर रहै, तेतर जे वयोवृद्ध रहै तकरे रहै पड़ै। अब्दुल सब दिन गाम अबै।

        एक दिन सुनलकै जे सुनील भैया के भगिनी आएल छै। ओकरा नेना मे कैक बेर तेतर आ खुदे अब्दुल तांगा पर अनने छलै। आब ओ अपने गाड़ी सॅं आएल हेतै से गमलक। ओ भेंट करै गेलै। गाम मे ई सब होइते रहै। अब्दुल सुनील बाबू सॅं गप सप करैत रहै कि नीलू दाइ एलै। 

‘‘केना छी बुच्ची, बहुत दिन पर एलियै?’’

‘‘हॅं, बहुत दिन पर एलियै। लेकिन अइ बेर एक टा खास काज सॅं एलियै अब्दुल भैया।’’

‘‘कोन काज दाइ, आब तँ समरथ भेलियै, कहू ने।’’

‘‘हम जे नोकरी करै छी ताहि मे ड्यूटी भेटैत अछि जे जानवर, चिड़ै-चुनमुन्नी सब पर जहाॅं अन्याय होइ छै से तकरा घर पकड़ कैल जाय।’’

‘‘केहन अन्याय?’’

‘‘जेना चिड़ै के पकड़ि पिंजड़ा मे बन्न केनाइ, जेना मुॅंह मे लगाम लगा घोड़ा सॅं अतिशय बोझा ढोआना, गदहा के लादि देना।’’

‘‘आँय, हम तँ बड़ सेवा करै छियै घोड़ा के।’’

‘‘अब्दुल भाइ हम कहि देलौं। नै बुझबै तँ थाना पुलिस हैत।’’ - नीलू दाइ मुस्की छोड़ैत दृढ़ शब्द मे कहलखिन। अब्दुल माथ पर हाथ दै बैसि रहलै। आब? की फेर नब कोनो काज ताकै पड़तै? कि नबका फुलपाॅंक पर तरकारी उपजाबै पड़तै? ओकर तँ अक्किले गुम्म आ संगे सुनील बाबू के सेहो जे पिंजड़ा में सुगा पोसने रहथि आ भोरे-भोर सीताराम-सीताराम जपब सिखा देने रहथिन्ह। मौन पसरल छलै, सम्पूर्ण वातावरण बोझिल, अन्हार होइ जेना।


•••

उषाकिरण खान मैथिली-हिंदीक सुप्रतिष्ठित लेखिका छथि। मैथिली आ हिंदी दुनू मे समान रुचि आ गति। मूलतः कथा आ उपन्यास लेखन। काँचहि बाँस, जाइ सँ पहिने, अनुत्तरित प्रश्न, दूर्वाक्षत, हसीना मंजिल, भामती, सिरजनहार, फागुन, एकसरि ठाढ़, मुस्कौल बला, हीरा डोम आदि हिनक प्रमुख प्रकाशित कृति छनि। उपन्यास 'भामती' लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। भारत-भारती पुरस्कार आ साहित्यक क्षेत्र मे उत्कृष्ट योगदान लेल भारत सरकार द्वारा 'पद्मश्री' सम्मान सँ सम्मानित। उषा जी सँ ushakirankhan@yahoo.co.in पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। प्रयुक्त छवि, हिंदीक चर्चित लेखिका गीताश्रीक फ़ेसबुक वाल सँ साभार। 'ई-मिथिला' पर हिनक पूर्व प्रकाशित कार्य एतय देखी : त्याग पत्र
अब्दुल तांगा वाला अब्दुल तांगा वाला Reviewed by e-Mithila on June 04, 2020 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.