मिथिलाक धिया सिया, जगत जननि भेली


|| मैथिलीपुत्र प्रदीपक किछु गीत ||

चयन एवं प्रस्तुति : विकास वत्सनाभ


मिथिलाक पुण्यभूमि पर मैथिलीक वरदपुत्र मैथिलीपुत्र  'प्रदीप'क (मूल नाम 'प्रभु नारायण झा) जन्म दरभंगा जिला अंतर्गत 'कथवार' गाम मे २ अप्रिल १९३६  केँ भेलनि। बाल्यकालहि सँ आध्यात्म मे रूचि रहनि आ जीवनक पाँचम दशक अबैत-अबैत पूर्णतः भगवतीक शरणागत भए गेलाह। अपन एहि धर्मानुराग सँ संत कविक रूप मे सेहो परिलक्षित होइत रहलाह। प्रदीप जी मैथिलीक अन्यतम गीतकार आ सजग प्रहरी रहथि। वृत्ति सँ अद्यापक रहल प्रदीप जी अपन विद्यालय मे 'मैथिली' मे प्रार्थना कराएब सेहो आरम्भ कएलनि। प्राथमिक शिक्षा मे मैथिलीक मान्यताक हेतु संस्थाक स्थापना सेहो कएलनि। मैथिलीक उपेक्षा सँ संदर्भित एकटा उल्लेखनीय प्रसंग भेटैत अछि जाहि सँ मैथिलीक प्रति प्रदीप जीक समर्पण आ निष्ठाक बानगी सोझाँ अबैत अछि। मैथिलीक उपेक्षा सँ व्यथित प्रदीपजी आकशवाणी दरभंगा मे कविता/गीत पाठक बहिष्कारक घोषणा कएलनि आ एहि घोषणाक निर्वाह ताधरि करैत रहलाह, जाधरि मैथिलीक संविधानक अष्टम अनुसूची मे स्वीकृति नहि प्राप्त भेलैक। 

मैथिली पुत्र 'प्रदीप' अपन जीवन काल मे विपुल रचना कएलनि। हिनक प्रकाशित पोथी सभक एकटा नम्हर सूचि अछि। प्रकाशित पोथी सभ मे टुन्नी दाईक सोहाग, स्वयंप्रभा, श्रीमदभागवत गीता, गीत प्रदीप ,अष्टदल, श्री नटवरलीला महाकाव्य, सीता-अवतरण आदि प्रमुख अछि। हिनक बहुतों कृति सभ एखन धरि प्रकाशित होएब शेष छनि। प्रदीप जी मुख्यतः गीतकार छलाह। गीतक सङ्ग-सङ्ग कविता, खंडकाव्य, कथा, नाटक आदि सेहो लिखलनि। अपन सम्पूर्ण जीवन काल मे मैथिलीक प्रणेता बनल प्रदीप जी साहित्यिक गोष्ठी सभ मे उपस्थित होइत रहलाह। दरभंगा मे भीमनाथ झाक संयुक्त संयोजन मे तेसर कथा-गोष्ठीक आयोजन सेहो कएलनि। मैथिली कथा पर केंद्रित आयोजन 'सगर राति दीप जरय' मे सेहो उपस्थित होइत रहलाह। हिनक गीतक लोकप्रियता एहन रहनि जे श्रोता सभक आग्रह सँ प्रदीप जी केँ गीत सँ इतर गोष्ठी मे सेहो 'जगदम्ब अहीँ अवलम्ब हमर' गीत गाबए पड़नि। मैथिली पुत्र 'प्रदीप' मधुप जीक परंपराक गीतकार छलाह। आरंभिक समय मे फिल्मी धुन पर बहुत रास 'पैरोडी' लिखलनि। ई पैरोडी सभ अतिसय लोकप्रिय भेल। 'परदेसिया के चिट्ठी लिखै छै बहुरिया' तकरे एकटा प्रमाण अछि। युवावस्था मे प्रेम आ माधुर्यक गीत सेहो लिखलनि।  भगवती,मैथिली,सीता ई तीनटा स्वरुप हिनक भगवती गीतक पृष्ठ्भूमि बनल। सीता पर केंद्रित 'श्री सीतावरण' नामक महाकाव्यक रचना सेहो कएलनि। मैथिली गीतक क्षितिज प्रदीप जीक नाम अन्यतम हस्ताक्षरक रूप मे दृष्टिगत अछि। 

सुमन साहित्य सम्मान, वैदेह सम्मान, मिथिला रत्न सम्मान, भोगेंद्र झा सम्मान सहित आओर कतेको अन्य सम्मान सँ सम्मानित प्रदीप जीक जीवन आ सृजन मिथिलाक लेल स्वतः एकटा सम्मान अछि। प्रदीप जीक बहुतहुँ गीत मिथिलाक माटि-पानि मे एना क' रचल-बसल अछि जे उत्सव विशेष आ हुनक गीत एकदोसरक पर्याय बनि गेल अछि। मिथिलाक कोनो गाम मे दुर्गा पूजा हुए आ प्रदीप जीक गीत 'जगदम्ब अहीं अबलम्ब हमर' नहि अनुगुंजतीत हुए एहन बिरले होइत होएत। तहिना  मधुश्रावणी पर लिखल हिनक गीत 'चलू-चलू बहिना हकार पुरै लै, बुच्ची दाइ के बर एलनि टेमी दगै लै' लोकप्रियताक पराकाष्ठा प्राप्त कएलक। 

प्रदीप जीक गीत माने मिथिलाक माटि-पानिक गीत। आस्था आ व्यवहार मे एकमेक भेल गीत। एकदिस 'मिथिलाक धिया सिया, जगत जननि भेली, धरणि बनल सुरधाम' आ दोसर दिस 'पहिर लाल साड़ी, उपारए खेसारी'। मिथिलाक आस्था आ लोक जीवनक एहन अनुपम चित्रांकन प्रदीप जीक गीतक  पैघ वितान केँ स्थापित करैत अछि। गीत सँ मनुखक एकटा एहन तादात्म्य रहल अछि जे दुनू सदिखन एकदोसरा केँ कनहेठने चलैत अछि। प्रदीप मैथिली गीतक 'कान्ह' छथि। मिथिलाक समग्रता केँ अपन गीत मे कनहेठने छथि।  

मैथिली पुत्र 'प्रदीप' आइ (शनिदिन)  ३० मई २०२० केँ बेलवागंजक अपन निवास्थान पर देहातीत भए गेलाह। आब जे शेष अछि से हुनक स्मृति। कोटि-कोटि मैथिलक कंठहार बनल हुनक गीत। मैथिलीक प्रति हुनक अन्यतम अनुराग। भाषिक अस्मिताक लेल कएल गेल हुनक संघर्ष। मातृभाषाक प्रति हुनक समर्पण। मैथिलीक एहि अनन्य सेवक केँ विनम्र श्रद्धांजलि।




|| मैथिलीपुत्र प्रदीपक पन्द्रह गोट गीत ||


१). मैथिली स्तुति

प्रगटलहु मिथिला भू से धन्य धरती भेल ई। 
भेल शीतल सकल धरती धन्य माता मैथिली॥
बहुत तब धल जे धरा छल शस्य श्यामल भेल से। 
भूख सँ आकुल जते छल तुष्ट तखने भेल से॥ 
देल मर्यादा अहाँ एहि माटि केँ हे मैथिली। 
रहत जन युग युग ऋणी बनले अहाँ सँ मैथिली॥ 
जन जनक जे जनक तनिका देल मर्यादा अहाँ। 
छल लिलोह निठोर सबहक बनि गेल माता अहाँ॥ 
स्वयं मर्यादाक पुरूषोतम कहावथि राम जे। 
से स्वयं जेहिठाम ऐला धन्य धरती भेल से ॥
हमर वाणी छथि सुशोभित से अहीं सँ मैथिली॥ 
धन्य ई मिथिलाक धरती धन्य माता मैथिली।। 
जे अपाटक नहि बुझथि महिमा अहाँक हे मैथिली।
क्षमा हुनको क' देवनि अज्ञान छथि हे मैथिली॥ 
हम प्रदीपित भेल छी महिमा अहिक माँ मैथिली।
धृष्टता हमरो करब सब माफ माता मैथिली।।

२). धरणि बनल सुरधाम

मिथिलाक धिया सिया, जगत जननि भेली, धरणि बनल सुरधाम। 
धन्य मिथिक भूमि, धर धर रिषि मुनि, दुलहा जगतपति राम।।
कमला बहथि जतए जीवछ रहथि ततए, कोशी-गंगा-गंडक के बथान।।
हिम-गिरी केर घर गौरीक नइहर, शिवजी भेलाह मेहमान।।
यज्ञ सँ तपल एकर कण कण शुचि, 'प्रदीपक' जन्मस्थान।।

३). 

अहाँ केर चरण तेजि ककरा मनाबी।
अहाँ जँ ने सुनबइ तँ ककरा सुनाबी।।

कहइये कतेक लोक ढोंगी फरेबी,
कहइये कियो अंध विश्वाश सेवी।
कियो इहो कहि दैत अछि मैया वादी। 
अहाँ जँ...

चराचर जते सब अहीँ सँ पलैये
अहिँक शक्ति सँ अम्ब जगती चलैये,
सुरभि माँ अहीँ सँ सदति काल पाबी। 
अहाँ जँ...

कत' अछि भवन अम्ब केहिठाँ बसेरा,
कियो ने जनैये अहाँक सृष्टि फेरा,
चलइ छी जतय सँ ओतहि फेर आबी। 
अहाँ जँ....

अनेरे अपन नाम राखल 'प्रदीपे'
सदति खन रहइ छी अन्हारक समीपे
अहिँक आश-विश्वाश मन मे बसाबी। 
अहाँ केर चरण तेजि ककरा मनाबी।

४). हमरा किएक तबाही (प्रभाती)

जननि हे कतेक भेलहुँ अपराधी!
अहिँक चरण हम नित दिन सुमिरल!
किए रहलहुँ अछि साधि। जननि हे...

आनक शरण कतहु नहि गेलहुँ,
अहिँक चरण रज माथ चढ़ेलहुँ,
किए रखलहुँ दृग बाँधि। जननि हे...

अहिँक कृपा बल सब जन पबइछ,
अन्नपूर्णा कहि सब गुण गबइछ,
रहलहुँ हमहुँ अराधि। जननि हे...

मा-मा-मा कहि सुमिरल अम्बे,
जननि अहाँ जनि करिअ विलम्बे,
दिअ दुर्गुण सब टारि। जननि हे...

जे जन थोड़बहु अहाँ के मनओलक,
से ओतबहि मे सब किछु पओलक,
हमरा किएक तबाही। जननि हे....

अर्थ पिपासुक लम्पट लोभी,
आइ चतुर्दिश दुर्मति क्रोधी,
खुनइछ सभतरि खाधि। जननि हे...

दुर्गे दुर्गति नाशिनि अम्बे,
काली कालजयी जगदम्बे,
हरु 'प्रदिपक' सब व्याधि। जननि हे...




५). तों नहि बिसरिहें गे माँ

तों नहि बिसरिहें गे माँ, तों जँ बिसरमे तँ दुनिया मे पड़तइ बौआ।।
तोरा बेटा केँ तोरे टा आशा तोरा बिना छइने ककरो भरोसा।
कोरा सँ ने दिहें बइला तों जँ बिसर मे तँ दुनिया मे पड़तइ बौआ। 
कतबो अनठेमे पछोर नहि छोडबउ तोरे चरण मे सिनेह अपन जोड़बउ।।
बे बुझ मे दिहे बुझा।। तों जँ बिसर मे तँ दुनिया मे पड़तइ बौआ। 
स्वारथ भरल संसारे ई सगरो, कियो ने कानब सुनइ छइ ककरो।
जाइक ने प्रदीपो मिझा। तों जँ बिसरमे तँ दुनिया मे पड़तइ बौआ।।

६).  राम हमरे थिका  

राम हमरे थिका, थिकी हमरे सिया, 
तखन चिंता कथु के कियै हम करी ?
सबसँ पावन धरा मे हमर मिथिला,
आन तीर्थक भरोसा कियै हम करी ?
जेहिठा गंगा बहथि कोशिको नित हँसथि, 
संग कमला बलानो मगन मे रहथि ?
हम लखनदेइ गंडक के बिसराय क,
आन सरिताक भनिता कियै हम करी ?
योग जप मे सदा अग्रणी नाम अछि, 
माटि हमरे छबो दर्शनक धाम अछि। 
छथि भगिनमान हनुमान लव -कुश जत,
आन शौर्यक भरोसा कियै हम करी ?
स्वच्छ स्वर्गहुँ सँ बेसी सुकोमल सुगम 
पुण्य बासक बेगरते एही ठाँ रहू ।
राम सीता 'प्रदीपित' रहइ छथि  मगन,
छोड़ि मदमोह हिनके अपन दुःख कहू ।।    

७). कहबनि अपना मैया केँ 

बाबा जँ ठोकरेथिन सबटा कहबनि अपना मैया केँ। 
मैया तो जँ ठोकरएमे तॅ ककरा कहबइ सुनइत के ?
बेटा करए मुकदमा दायर अपना माइक कोट मे, 
बाबा तोरा हरा देब हम माइक नेहक बोट मे। 
माफ न गलती कैलहुँ बाबा छोट तनय अज्ञानी के,
मैया माफ न करती बाबा अहाँक एहि मनमानी के। 
तोँ विश्वम्भर भने कहाब हम नहि देबउ मोजर हौ, 
जा धरि तोँ ने देखएबह बाबा रूप तोहर जे औढर हौ। 
विश्वम्भरी जननि हमरे छथि तोरो हुनके शक्ति हौ,  
तैयो चाहि रहल छह बाबा आइ 'प्रदीपक' भक्ति हौ ।
धन्य अहीँ छी बाबा जग मे अहिंक थीक संसार यौ, 
मैया रहती संग सदा, जँ करबइ बेरा पार यौ ॥

८).  सुनियौ हमर निवेदन ना 

बाबा बैद्यनाथ कहाबी से सुनि शरण मे एलउ ना। 
बहुत भरोस लए के एलउ चरण मे, कनडेरियो हेरब ना। 
नहि त  माँ जगदम्बा के संगहि हम बसहा घेरब  ना । 
त्रिशुल बाघम्बर झारी, तेजि कए महल अंटारी बन मे एलउ ना। 
बाबा,छोड़ल छप्पन भोग अहाँ नित भाँग चिलबेलउ ना । 
दुतियाक शोभए चन्ना सिर पर सुरसरि गंगा भक्तक कारण ना। 
बाबा कयलहुँ ताण्डव नृत्य डमरू सँ वेद उच्चारण ना। 
अहाँक चरण तेजि ककरा निहारी सहलहुँ बहुत प्रतारण ना। 
बाबा दीन 'प्रदीपक' वेदन सुनियो हमर निवेदन ना।




९). हम साँझक लघुदीप प्रिय

मधुमय प्रकृतिक स्वर्णिम आंगन, हम साँझक लघु दीप रे।     
टेमी बिना सिनेहक जडइछ कोना सुनायब गीत रे ॥ 

अछि निस्सीम गगन आगाँ मे
पाछाँ क्षितिजक कोरे।
बीचे बाट बटोही थाकए
देखए ओर न छोरे।
तृषित बेकल जल ताकय रहि रहि पाबए भोरक शीत रे। 

जीवन गति बढले जाइत अछि, 
अनुभव रहल अधूरे।
नित दिन नव नव पथिक अपरिचित 
भेटि रहल समतूरे ॥
शान्त लखए सब अपने मग मे, हमर होयत के मीत रे। 

आगां ज्योति बढल जाइत अछि,
पाछाँ रहय अन्हारे। 
टेमी आध, बाट अछि पलगर,
सरिता कथा पहाड़े ॥ 
श्रम सुविवेक सुकाज बिना नहि भेटए मोतिम सीप रे ॥ 

स्नेह सुधा हम ताकल सदिखन, 
किन्तु न पाओल पारे ।
जँ-जँ डेग थाह दिस बढइछ
भेटि रहल मंझधारे ॥ 
अम्ब अहाँक अशेष अमिय बल अनुखन बरय "प्रदीप रे" ॥

१०). जाग मुसाफिर जाग 

जागह-जागह जाग मुसाफिर जाग-जाग तों जाग।
जागह भेलौ भोर मुसाफिर सुतले जौं रहि जेब।
सोन सनक अवसर छुटि जैतो जीवन भरि पछितेब'।।
सूर्योदय सँ पहिने जाग' चमकै लगतौ भाग।। जागह...

एहि दुनिया के जानि लैह तो पैघ मुसाफिर खाना,
जहिठाँ सँ ऐलह एहि जग मे तहिठाँ छैके जाना।
जतबा दिन लए ऐलह एहिठाँ शुभ कर्में मे लाग।। जागह...,

चलबे थिक जीवन केर लक्षण, मरण थिक विश्राम।
कान खोलि क' सुनु सुकोमल पक्षी सब के गान।।
भोगक पाछाँ रोग रहै छै, योगक सिद्धिताक।। जागह...

कर्मक्षेत्र मे कर्मक पाछाँ रहिते छै समृद्धि,
शुभ कर्में सँ होइत रहै छै सबठाँ सब दिन वृद्धि
तेँ सकाल उठि नित्य कर्म मे जल्दी जल्दी लाग। जागह...

समय सलोना ससरि जेतै तँ जीवन भरि पछतेब'
रोग शोक केँ छोड़ि तखन तों आर ने किछुओ पेब'।।
सबिता तोहर द्वारि पहुँचला देखह कते समीप,
सूर्यदेव मे सविता भैया जहिना प्रखर 'प्रदीप'
एहि अवसर सँ लाभ उठाब' कर' सेज के त्याग।। जागह...


छवि : रमानन्द झा 'रमण'

११). 

चलू-चलू बहिना हकार पुरै ले
टुन्नी दाइक बर एलइ टेमी दगैले।।

लटहा चूरा छै नौ कूरा
पाकल केरा सात चंगेरा
छाल्ही बाला दही तँ करेजा कटैए।। चलू।।

सड़ल बदाम भरल पनपथिया
भरि घर ले साड़ी तिनपढ़िया
टुन्नी दाइ ले ललका पटोर एलइए।। चलू।।

माटिक साँप बनल छै करिया
मैनक पात पिठारक थरिया
बीच मे सिन्दूरक ठोप सोभैए।।चलू।।

कनिञाक माइ के घुघना लटकल
पातिलक चाउर एलइ बिनु फटकल
सासुक कोंढ़ कठोर छलैए।।चलू।।

भरि पनपथिया जाही-जूही
कथा कहथि से होइ छथि कूही
बीधमे मटकूरी बड़ छोट एलैइए।। चलू।।

उथल-पुथल मे छथि बिधकरी
दीपक टेम सटेलन्हि धरी
टुन्नी दाइ के आँखि सँ नोर झड़ैए।।
चलू-चलू बहिना बहिना हकार पुरैले।।

१२). प्रभाती गीत 

अहाँ सनक नहि आन, हे जानकी, अहँक सनक नहि आन।
जकरा अहँक सदय दृग भेटल, से बनि गेल महान। हे जानकी...

अहिँक कृपाबल सभजन पबइछ, अनुपूर्णा कहि, सभगुण गबइछ।
नहि कियो अहँक समान हे जानकी, अहँक सनक नहि आन।।

दुर्गे दुर्गति नाशिनि अम्बे! काली-काल जयी जगदम्बे!
सीताक शक्ति महान, हे जानकी अहँक सनक नहि आन। 

अहँक बिना के, अपन जगत मे, संसारक सुधि थिक सभ सपने। 
हरु प्रदीपक अज्ञान हे जानकी, अहँक सनक नहि आन।


१३). स्वयंवरक भाष मे-गीत 

छोटी सुकुमारी सिया, नामे-नामे केसिया।
केसिया मे लाखो मोतीहार हे।
सुन्दरि सीता दाइ के झबड़ल केसिया।
केसिया मे हीरा-मोती हार हे।।

रानी सुनयना के कोरा मे सिया बेटिया।
बेटिया के महिमा अपार हे।।
आयल बइसाख मास नवमी इजोरिया।
चहुंदिसि समय सुखार हे।।

राजा जनक के दुलारी सिया बेटिया,
प्रदीपक नमन हजार हे।।

१४). हे माय अहाँ बिनु आश ककर

जगदम्ब अहीँ अवलम्ब हमर, हे माय अहाँ बिनु आश ककर?

जँ माय अहाँ दुःख नै सुनबइ तँ जाय कहू ककरा कहबइ?
करू माफ जननी अपराध हमर, हे माय अहाँ बिनु आश ककर।

काली-लक्ष्मी-कल्याणी छी, तारा-अम्बे-ब्रम्हाणी छी
देखू हम पड़लहुँ बीच भंवर, हे माय अहाँ बिनु आश ककर?

हम भरि जग सँ ठुकरायल छी, माँ अहींक शरण मे आयल छी
अछि पुत्र 'प्रदीप' बनल टुअर, हे माय अहाँ बिनु आश ककर।।

१५). जननि पूर्णकामा

कतय छी हे अम्बे, श्रवण चखु मुनने,
दशा की ने देखी सुनइ छी न अपने ?

हमर दुर्दशा की अहाँ नै देखै छी,
हमर ई व्यथा की अहाँ नै बुझै छी
जगत व्यापनी की जनइ छी न अपने
दशा की ने देखी ...........

सुनल अछि कतेको कथा माँ दया के
सुनल अछि अनेको अमर कीर्ति माँ के
शरण मे एलौ तँ सम्हारु ने अपने।
दशा की ने देखी ...........  

धरणि सँ गगन धरि अहिकेर माया,
अहिकेर सुधा सँ बनल शुभ्र काया ,
तखन मंजुषा कोन छी नेह रखने  ।
दशा की ने देखी ...........    



•••

एहि प्रविष्टि मे प्रयुक्त मैथिलीपुत्र प्रदीपक छवि, मणिश्रृंखलाक कवि मणिकांत झाक सौजन्य सँ साभार। प्रस्तुत गीत सब मैथिलीपुत्र प्रदीपक एकाधिक सँग्रह सँ चयनित अछि आ प्रविष्टि मे प्रयुक्त वर्तनी आदि रचनाकारक अनुसार यथावत राखल गेल अछि।
मिथिलाक धिया सिया, जगत जननि भेली मिथिलाक धिया सिया, जगत जननि भेली Reviewed by e-Mithila on May 30, 2020 Rating: 5

8 comments:

  1. Great work vikash ji. बहुत उत्तम श्रद्धा सुमन अहाँ देल।

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  2. हिनक किछु रचना सँ परिचय भेल । सादर नमन आ श्रद्धा सुमन ।

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  3. विकास जी के धन्यवाद जे एतेक कम समय में प्रदीप जी पर एतेक पाठ्य सामग्री उपस्थित क देलनि।

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  4. शत शत‌ नमन। जगदम्बा हुनका शरण लगाबथिन। विकास जी केऀ धन्यवाद।

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  5. शत शत नमन एहि महापुरूषकेँ । एहन कमे लेखकके भाग हेतनि जे हुनक काेनाे गीत लाेक गीत कहाए लागैए ।

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  6. प्रविष्टिमे प्रयुक्त वर्तनी आदि रचनाकारक अनुसार यथावत् राखल गेल अछि …………… मुदा बहुत दुखक संग आ पूर्ण उत्रदायित्वक संग कहि रहल छी जे गीतसभ आधा-अधूरा, जोड़-तोड़ कएल शब्दक संग अछि । यथा —

    गीत सं. १५ — ६ या ७ अनुच्छेदक गीत अछि ।
    अन्तिम अनुच्छेद अछि —

    जपै छी सदा हम अहीं केर नामें ।
    जननि पूर्णकामा शिवे श्याम शयामें ।
    "प्रदीप"क प्रभाव आब राखू ने झँपने ।
    कतऽ छी हे अम्बे श्रवण-चक्षु मुनने ।।

    गीत सं. १४ — काली-लक्ष्मी-कल्याणी ...... आ हम भरि जग सँ ठुकरायल...... एहि दूनू पाँतिक स्थान MUTUALLY INTERCHANGE भऽ गेल अछि ।

    गीत सं. ८ — बाबा वैद्यक नाथ कहाबी ......

    गीत सं. ५ — तोँ ने बिसरिहें गे माए,तोँ जे बिसरबें तँ दुनियाँ मे पड़तै बौआए ।

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    1. Correction

      उत्रदायित्वक = उत्तरदायित्वक

      "प्रदीप"क प्रभाव = "प्रदीप"क प्रभा

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  7. गीत सं. १५ केर एकटा आओर अनुच्छेद —

    सुनल अछि कतेको कथा माँ दया के ।
    बुझल अछि अनेको अमर कीर्ति माँ के ।
    तखन मंजुषा कोन छी नेह रखने ।।


    धरणि सँ गगन धरि अँहीं केर माया ।
    प्रतिक्षा कतेक ई करत तुच्छ काया ।
    शरण मे एलहुं तऽ सम्हारूने अपने ।।

    अहाँक शरण मे जते जीव आयल ।
    तकर कष्ट सभटा क्षणहि में बिलायल ।
    हमर बेर अम्बे की रहल शेष तप ने ।।

    अनुच्छेदक Sequence ठीकसँ यादि नञि आबि रहल अछि ।

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