घर-घुरंती


कथा ::

|| घर-घुरंती : विभूति आनन्द ||

                          
          करमान लागल लोक रहै । देखने रहिऐ । सड़क जाम करैत। स्टेशन घेरैत।  जेना खाली होबऽ लेल विवश भऽ रहल छलै दिल्ली! एहिना महाराष्ट्र, गुजरात, पंजाब, सगरो देशे जेना !
          लोक चलि रहल छलै। चोरा कऽ। नुका कऽ । ट्रक सऽ । कन्टेनर सऽ । टेंपो सऽ । ठेला सऽ । रिक्शा सऽ । पैदल । जेना-तेना, सभ क्यो घरमुँहाँ रहै । सभ के अपन मातृभूमि बजा रहल छलै। से सरिपहुँ, ई समय जेना सभ लेल तारनहार बनि गेल रहै ! 
          सभ गाम जेतै । आब सभ गाम जीतै । सभ गाम हँसतै । ककरो गाम मर' नै देतै । माय छै, तऽ जीवित रखबे करतै । मरऽ नै देतै, सफ्फा ।
          एखन स्कूल पर आबि गेल छी । एतऽ कोरेन्टाइन मे छी । बड़ भीड़ छै । से बढ़ले जाइ छै । आर दोसर उपायो कोन ! भीड़ छै तऽ छै ! क्यो आन तऽ नै छै ! 
          अरे अपने गाम-ठामक छै। अपने माटि-पानिक छै । अपने हवा-बसातक छै । आम फड़ल छै । आब तऽ कोसा सेहो भऽ गेल हेतै । आ ताइ पर सऽ कतहु दूर सऽ अबैत कोइलीक अवाज ! कैयन बर्ख पर सुना पड़ि रहल छै । 
          से जखन सऽ अएलिऐ, किदन भऽ गेलिऐ ! मोन बौआइते जा रहल छै । से कहै छी, आन तऽ रहिऐ ओकरा सभ लेल, जकरा अप्पन भऽ कऽ बुझलिऐ । देह के देह नै जनलिऐ । राति के राति आ दिन के दिन नै देखलिऐ । भूख-पियास सभ टा बिसरि कऽ खटलिऐ । 
          कत्ते गन्हाइत रहै घर-दुआरि ! मुदा दुगो रूपा होइ, से ओहनो गन्ह के सहाज करैत रहलिऐ । से ओहनो घर मे रहि लेलिऐ ! तेहना मे, ई अप्पन लाख कच्छे नीक । सभ ठीक भऽ जेतै ।
          आ सेहो की एतऽ सभदीना थोड़बे रहक छै ! बेसी-सऽ-बेसी पंद्रह-बीस दिन, बस । से ओतऽ तऽ बर्खक बर्ख नर्क मे रहि लेलिऐ, तखन तऽ अगुतेबे नै केलिऐ ! आ आब अपन गाम आबि कऽ गाम सऽ अगुतयबै ! न: ! 
          अरे, अपन देस-कोसक हवा-बयार लगतै, ओतुक्का हवा-बियार हटतै, तऽ सभ टा ठीक भऽ जेतै । आ जखन आबि गेलिऐ, तखन ई कोरोना-फोरोना सभ की करतै ! किछुओ नै करतै । ओतऽ रहि कऽ कोनो की गलत काम थोड़े कयलिऐ ! अरे पसीने तऽ चुएलिऐ ! आ तखन ई पसेनाक पोसल देह कहूँ धोखा दै ! नै, किन्नौ नै देतै । ई कोरोना-फोरोना जेतै निखत्तर...
विभूति आंनद

          ई छै हमर अपन गामक शरीर । ऐ माटिक शरीर । ई तऽ पहाड़ सऽ लड़ि लै छै । दुख होइ छै, जिद्द चढ़ै छै तऽ ओकरो तोड़ि रस्ता बना लै छै । आ से एखने की भेलैए ! टेकटारि गामक ओ ज्योती ! हद्दे कऽ देलकै ! कहियौ जे अपन माटिक नाम अकास मे फहरा देलकै ! दुखित बाप के दिल्ली सऽ लऽ कऽ दरभंगा चलि अयलै । सेहो साइकिल पर ! लोड कऽ कऽ ! आ से आठे दिन मे ! सीट पर अपने, बाप कैरियर पर । बीच मे एक टा छोट-छीन बैग, बस । आ से वयसो जे कहबै से की कहबै, इएह बेसी-सऽ-बेसी तेरह-चौदह बर्खक हेतै ! अपने लिक-लिक, बाप मुदा मोट-डाँट । मुदा देह की होइ छै ! हिम्मत चाही हिम्मत । से ओ छौंड़ी देखा देलकै !
          एह, रस्ते-पयरे कोन-कोन ने खेला सभ देखलिऐ ! सुरुजदेव कहथिन, आइ आगि उझिलबे करबै । इंद्रदेवक अजबे लीला! कहथिन जे आइ नहि बरसलौं तऽ कहिया बरसब ! आ पवनदेव ! ओह, कय बेर तऽ हमहूँ गुरकि गेल रही ! 
          मुदा न:, कथी लेल ककरो कनियों डेग रुकतै ! बच्चा मे बाबा कहल करथिन जे लंका मे जखन आगि लगलै तऽ उंचासो पवन बहऽ लागल रहै ! से सएह सभ तऽ देखलिऐ, भोगलिऐ ! 
          अरे की-की सभ मोन पाड़ू ! सभ तऽ ओहिना रील जकाँ चलि रहलय ! क्यो स्त्री अपन कोरा मे दुधपीबा नेन्ना लेने, तऽ क्यो अपन असक माय के कान्ह पर धेने ! चलैत-चलैत ककरो पएर मे फोंका फुटि जाइ, तऽ क्यो चलैत-चलैत ठेहुनिया देबऽ लागय । एक गोटेक छोट बेटा तऽ जखन चलैत-चलैत रोडे पर ओंघरा गेलै, तऽ बाप ओकरा ट्रॉलीवला सुटकेश पर पारि देलकै आ अपने हैंडल पकड़ि गुड़कबैत निकलि गेलै । एक नम्बरक जोगाड़ एकरे कहै छै ! आ दोसर, 'मरता क्या नहीं करता !' कोन एहन समस्या छै, जकर रस्ता नहि छै !
          कि तखने चलैत बच्चाक मुँह लग क्यो माइक बढ़ा देलकै- 'कहाँ जा रहे हो ?' 
          कि ओ भोकासी पाड़ि कऽ कानऽ लगलै ! माइक वला तऽ जेना अकबका गेलै । मुदा बच्चाक माय जवाब देलकै- 'कत्तऽ जा रहे हैं, गाम जा रहे हैं !'
          - 'कहाँ ?'
          - 'मधबन्नी !'
          - 'कहाँ ?'
          - 'बिहार नै जानते हैं !'
          - 'कितनी दूर है, जानती हैं ?'
          - 'तऽ की करितिऐ ? भुक्खे मरि जैतिऐ ! जऽर मे कुछ पाइ रहै, तऽ खेलिऐ । आब तऽ मरऽ के नौबत आबि गेलै तऽ सोचलिऐ जे अहू ठाम  मरबे करबै । चाहे भूख सऽ, चाहे कोरोना सऽ । तखन अपने जल्मथान पर कइला ने मरिऐ !'
          - 'चली जाएंगी ?'
          - 'अब एतना बकतूत करे के नै छइ हमरा !' आ बजैत घुनघुनायलि- जनू दीनो मे रतौन्धी धेने छइ ! देखै नै छइ जे जाइये तऽ रहल छिऐ !
          से ठीके, रस्ता मे टीवी वला सभ सेहो बड़ दिक् करै । मुदा तैयो क्यो रुकलै नै ! चलैत-चलैत जवाब दैत, आगू बढ़ैत गेलै । 
          आ से धियापुता सभ कमाल केने रहै ! घर मे खाय-पीबऽ लेल कतेक ने हो- हल्ला करैत रहितै ! मुदा एखन...! ठीके, समय ककरो असमय सियान बना दै छै !
          हमरो तऽ साला, चलैत-चलैत ठेस लागि गेल रहय ! खसि पड़ल रहिऐ । दूनू केहुनी मे चोट से लागि गेल रहय । चछा सेहो गेल । खैर, आब आबि गेलिऐ, सभ ठीक भऽ जेतै ।
          से मोन पड़ल, एकबेर जोगाड़ टुटि गेल रहै ! से सोझे हड़हड़ा कऽ दू महल निच्चा खसि पड़लिऐ । लागल जेना डाँरे मचकि गेल ! ठिकदार आनि देलकै कोनो दबाइ । से सट दऽ दरद घीच लेलकै ! फेर अधे घंटा बाद फुरफुरा गेलिऐ । तखन ई की छै ! मेहनत करऽ वला के ई छोट-मोट चोट किछुओ असर नै करै छै । धरि जखन-जखन पुरबा बहै छै तऽ ई डाँरक दर्द, इस्स !...
          से अंतिम बेर कहिया आयल रहिऐ गाम ? ठीक-ठीक साल सेहो मोन नै छै ! बस, एतबे मोन छै जे बाबूक जे काज कऽ कऽ गेलिऐ, से फेर नहियें आबि सकलिऐ । कोना अबितिऐ ! अबितिऐ तऽ गाम पर खैतिऐ की ? ओतऽ तऽ रोजक कमाइ रहै । अपनो खैऐ, आ गामो पठबिऐ ! 
          एह, की ठाठ रहै जिनगी के ! बस, कहियो-कहियो माय मोन पड़ि जाय । आ तखन झूठ किए कहब, कनियाँ सेहो मोन पड़थि ! आ बेटी तऽ आब जेना चिन्हबो नै करत ! से तऽ हमहूँ अंदाजे चिन्ह पयबै ! मुदा माय हमरा जरूर चिन्हतै । ओकरा नहि बिसरायल हेतै । बच्चा मे कहाँदुन हम जे कानऽ लगिऐ, से बुढ़िया बुझि जाइ कि हमरा भूख लागि गेलै ! छाती लगा दै ! तखन रहली कनियाँ... तऽ आब से सभ छोड़ू ! वएह तऽ छथि जे हमरा सन बतहा के...। अरे की हेतै, शुरू मे कनी-मनी मनौन करेथिन, फेर...
          न: न: ! क्यो नहि बिसरल हेतै । रोजे तऽ सभ दिन सभ सऽ फोन-फान होइते रहलै । आ एमहर तऽ ई भीडियो वला फोन से लऽ लेने रहिऐ । तखन इएह दु-चारि दिन सऽ जे कही ! चार्ज नै भऽ सकलै । से अनेरोक ने हम शंका करै छिऐ ! धु:, हमरो मोन छै ने, बिना किछु आगू-पाछू सोचने किछु-सऽ-किछु सोचऽ लगै छै । बुझू, एहनो मोट बात मोन नै रहलै !
          हँ, मोन सऽ मोन पड़ल ! एक बेर जखन रेजाक काज करैत रहिऐ तऽ एक दिन एपार्टमेंटक सभ सऽ उपरका छत पर असगरे चलि गेल रहिऐ ! जेना पूरा दिल्ली देखाइ ओतऽ सऽ । हमरा तऽ लगै जेना पूरा संसारे इएह छिऐ ! 
          से ओहिना सोचा गेल रहै– कोनो लाथे एकबेर कनियाँ के दसो-बीस लेल एतऽ अनबै ! की हेतै, जेना-तेना कऽ अही टुटली मरैया मे रहि लेबै । आ एक दिन ऐ अपार्टमेंटक छत पर अनबै ! छत पर सऽ पूरा संसार देखबैत कहबै, जे हे देखियौ ! हमहीं बनेने छिऐ ई एते ऊँच ! ईंटा सुरखी लोहा सभ सऽ ! आ हे एमहर निच्चा आउ, आ देखियौ जे ई कीचेन छिऐ ! भनसाघर । आ ई दू-दू टा बेडरूम, सूतऽ वला ! आ ई पेखेना भेलै ! एकरा कहै छै ड्राइंगरूम ! अपना सभ जकरा दरबज्जा कहै छिऐ, सएह बुझू...
          धुर, नहि सोची ई सभ ! सोचने तऽ रहिऐ जे जाधरि रहथिन, ताधरि एतै रखबै । ततेक ने फ्लैट छै जे... आ से सभ बनैत बिकाइत कि कोनो कम समय लगै छै !
          मुदा जाह ! ई कतऽ सऽ कतऽ जा भट दऽ खसि पड़लिऐ ! ओह, ने राधा के नओ मन घी भेलनि, आ ने राधा नाचिये सकली ! मातारामक बूढ़ देह, से तेहन ने मोन खराब भेलनि जे कनियाँ...! मोनक मनोरथ रामा मोने रहि गेल ! सभ परोग्राम फएल !
          ओह, दुखक दिन सभ बेसी नै मोन राखी । नै छलै कनियाँक संगे सुख-भोग ! मुदा ताहू लेल कोन दुख ! सपना देखलिऐ तऽ देखलिऐ । आ से कोनो जरूरी तऽ नै, जे सभ सपना पूरे होइ ! बस, सपना देखैत रहना चाही । आब तऽ गामे पर रहि सपना देखबै...
          मुदा एकटा बात छै ! शहर जरूर हमरा सऽ धोखा केलकै ! धरि देलकै एक जरूरी शिक्षा । लाज-संकोच मेटा देलक ! गाम पर रहितिऐ तऽ प्रतिष्ठे प्राण त्यागि देने रहितिऐ । बाभन भऽ कऽ जन्म लेने रहिऐ ने ! ककरो ओतऽ जनौरी मे कोना कऽ खटितिऐ ! आ नै खटितिऐ तऽ खैतिऐ की ! पढ़ाइ-लिखाइक समय मे तऽ टल्ली मारैत रहलिऐ । बाबू-माय सेहो ओतेक ताकुत नहि केलथिन । बस, जे किछु जथा-पात रहै, चट होइत गेलै । असल मे हमर बाबू रहथिन पंडित । मुदा पुरहिताइ सऽ चारि गोटेक पेट कोना चलि पबितै ! तें तऽरे-तऽर स्वाहा करैत चल गेलथिन ।
          ओ तऽ गोअरटोलीक हमर मीता मिट्ठू के बलिहारी कहियौ जे एकबेर गाम आयल तऽ घुरती खेप हमरा पटिया कऽ लेने चल गेल ! दिल्ली मे ओ भाड़ा वला ऑटो चलबैत रहै । से शुरू मे तऽ हमरो सिखेबाक कोशिश कयलक । मुदा कपार मे से लिखल रहय, तहन ने ! फेर हारि कऽ अपन एक चिन्हारक सैलून मे रखा देलक । पुछने रहय जे— 'अपन दाढ़ी काटऽ अबै छौ ने ?' हम 'हँ' मे मूड़ी डोला देलिऐ, तऽ कहलक— 'ठीक छौ ! फेर धीरे-धीरे अपन बाबरी काटब सेहो सीख लिहें !'
          मुदा किछुए दिन बाद सैलून वला हटा देलक । दाढ़ी बनबैत घड़ी एक दिन एक कस्टमर के कनी लागि गेल रहै...
          से अंततः लाज-धाख त्यागि कऽ, रेजा-मजूरक काज करऽ लगलिऐ । तखन तऽ धीरे-धीरे अपन अलग डेरा सेहो लऽ लेलिऐ । एह, ओहि बीचे कते ने अपार्टमेंट बनेने हेबै ! से जाधरि बनैत रहै, कहाँ लागै एकोरती जे ई अपन नै छै ! सभ अपने तऽ छै ! 
          मुदा ई कोरोना, फेर लॉकडाउन...
कि भक् टुटल ! धुह, बीती ताहि बिसारिये । गाम आबि गेलिऐ तऽ आब एत्तै कोनो जोगाड़ करबै । आब ओ गाम थोड़बे हेतै, जे छोड़ि गेल रहिऐ । आब की बाभन, आ की सोलकन्ह ! सभ एक्के, सभ मनुक्खे । नहि तऽ कोनो बिजनेसे शुरू कऽ देबै ! क्यो-ने-क्यो तऽ संग देतै ! बहिं, घरारी तऽ बंचल छै ने रे ! नहि हेतै तऽ ओत्तै दू टा सैलून खोलि लेबै । मेल-फीमेल, दुन्नूक ! एक कात अपने, दोसर कात कनियाँ । ओ अपन करती, हम अपन ! हुनका नैहरे सऽ मेकअप-फेकप के सौख छलनि । ई तऽ हमरा सन बलेलक संग लागि गेलनि जे...
          से नै हेतै तऽ हुनकर दोकान पर एगो पैघ साइनबोर्डो टँगबा देबै– 'आलिया भट्ट ब्यूटीपार्लर' ! केहन रहतै ? देहात छै, कस्टमर तऽ टूटि पढ़तै ! 
          मुदा हम अपने बेसी दिन अही पर अँटकल नै रहबै ! धीरे-धीरे खेती-बारिक नाम पर बैंक सऽ लोन लऽ कऽ एगो ट्रैक्टर लऽ लेबै । फेर ताइ सऽ जे किछु आय हेतै, तऽ ओकर लोन सधा कऽ एगो नै हेतै तऽ जेसीबी लऽ लेबै । एखन ओकरे सभ के समय छै । से बिजनेस, बरोबरि बदलैत रहक चाही । समय बहुत तेजी सऽ बदलि रहल छै !
          - 'यो भाइसाहेब, आइ राति भरि जगले रहि गेलिऐ !'
          - 'अयँ, से की !' हम धरफरयलहुँ ।  अरे ठीके, भरि राति जगले-जगले की-की सभ ने सपनाइत रहि गेलिऐ !...
          से तामसो भेल । एखने किए टोकि देलक ! मुदा ईहो की करितय । फेर किछु लोक अयलैए । गलगुल बढ़ि गेल रहै ।
          - 'अहाँ सब कतऽ सऽ ?'
          - 'मोदी जी के गाम सऽ !'
          - 'दिल्ली ?'
          - 'नै नै, सूरत ! बहिं एकदम सऽ फेल भऽ गेलै !'
          - 'अपशब्द नै निकालू !'
          - 'निकालू नै तऽ की! हमरा सब के जे गारि पढ़ल करय, कि 'ई साला बिहारी सब, देश को कोरोना कोरोना कर दिया !'
          धु:, एत्तौ शुरू भऽ गेलै ! रे, आबो तऽ गीरह चिन्है जाही ! किएक कहै जाइ छिही जे भजपा खराब छै ! तऽ ई कंगरेसे कोन दूध के धोअल छौ ! देखले कनियाँ देखले बर...
          असली खराब तऽ हम सभ अपने छिऐ ! आइ जँ सभ क्यो टाइट भऽ जैऐ, तऽ नानी ने मरिहें जे...
          से आब टाइट होबऽ पड़तै । आ से ई जे लॉकडाउन भेलै आ सभ गरीब-मजूर गाम दिस एकमुहरी भेलै, ताइ सऽ जरूर उमेद जगै छै ! बबा-दादाक मुँहें सेहो कहाँ सुनलिऐ कहियो कि अपन माटि पर आबै लेल लोकक एना धरोहि लागल होइ ! ■

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विभूति आनन्द मैथिलीक सुप्रतिष्ठित कवि-कथाकार छथि। कथा-सँग्रह 'काठ' लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार। विभूति आनन्द बहुविधावादी रचनाकार छथि आ एक संग कइएक विधा मे निरन्तर सक्रिय छथि यथा गजल, गीत, कविता, कथा, उपन्यास, चरिपतिया, लप्रेक, डायरी, रंग-समीक्षा, आलोचना आदि। विभिन्न पत्र-पत्रिकाक संग-संग विद्यापति पदावली, ललित समग्र, ज्योत्स्ना समग्र सहित कइएक पोथीक सम्पादन। हुनका सँ bibhutianand5@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। एहि प्रविष्ट मे प्रयुक्त प्रतीकात्मक छवि 'इंडियन एक्सप्रेस', छायाकार : गजेंद्र यादव सँ साभार प्रस्तुत। विभूति आनन्दक 'ई-मिथिला' पर पूर्व प्रकाशित कार्यक लेल एतय देखी : 


घर-घुरंती घर-घुरंती Reviewed by e-Mithila on May 22, 2020 Rating: 5

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