कारी सागर मे डूबि गेल अछि सुरूज किरिन


|| ललितेश मिश्र केर किछु कविता ||


1).अस्तित्व

अस्तित्वक नाम पर हमरा लोकनिक
जीह सँ कण्ठनलिकाक माध्यमे
संयुक्त अमाशय-पक्वशय टा धरि
निरापद बाँचल अछि
धमनी, शिरा, आ मस्तिष्क पर
जेना बर्फक हिमालय
जमि गेल अछि-अपरा भेदी !
विस्मित हमर मोन-प्राण
बूझए चाहैछ
जँ कष्ट-भोगक प्रारब्ध समतुल्य अछि
तँ देह आ आदर्शक व्यापार मे
कोनो विभेद नहि ?
एहि वैविध्यपूर्ण संसारक
नाटक लीला मे
सरिपहुँ पात्र-उपपात्र बनल
मुनक्खक लेल
निष्कर्ष प्राप्तिक अनिश्चितता सँ
पैघ कोनो विरोधाभास नहि
नापल-जोखल जीवनक
इएह अनिर्णयात्मकता तँ
भेल हमर अस्तित्व !

2). कतए अछि हमर देश

सुरक्षा आ हित साधनक नाम पर
हमरालोकनि युग-युगान्तर सँ
ढाहने जाइत छी पहाड़
कोड़ने जाइत छी वन-प्रान्तर
बन्हने जाइत छी नदी ओ आकाश
मुदा, कहाँ बचि पबैत छी कहियो
आगि, पानि आ ठनका सँ
कहाँ मुक्त होइत छी
असुविधा, असमता, विषमता सँ ?
युग-युगान्तर सँ हमरा सभ
दौड़ैत रहल छी कोनो नाम
कोनो गाम लेल
मुदा,
सभ्यताक नव परिभाषा गढ़ैत
असभ्यताक प्रदर्शन करब
भ’ गेल अछि हमर नियति
कोनो गाम, कोनो सार्थक नाम लेल
कोनो छाहरि तरक मचान लेल
सभ्यता ओ असभ्यताक मध्य
पसरल द्वन्द्व ओ विवादक माँझ पड़ल
अनिर्णित हमर मनुक्ख
विवश अछि सोचबाक लेल युग-युगान्तर सँ
कतए अछि हमर देश
किएक लुप्त भेल हमरा लोकनिक भेष...।

3).जँ सरिपहुँ रचबाक हो

हत होएबा सँ पहिने
हे हमर हतभागिनी कविता
गाउ कोनो राग
कोनो भनिता...
नहि बाँचत आब अहाँक
अस्तित्व ओ मर्यादा!
सत्येक सप्पत ल’
घोषित क’ देलहुँ अछि
हमरालोकनि स्वयं के आब
सत्यक हत्यारा।
थोड़बे रास सुख-सुविधा लेल
‘असत्यमेव जयते’क
सभ केओ
द’ रहल अछि गगनभेदी नारा....

एहि अकाल बेला मे
असंभव बनल उजासक मेला मे
जँ रचबाक हो कोनो राग, कोनो देश
तँ उतारू बन्धु अपन अमानवीय
छोटका-बड़का भेष
जाफना आ सिंध बनैत अपन आँगन मे
झहरए दिऔक मौलश्री आ सिंगरहार
अणु-आयुध नहि होएत रक्षा कवच
खसए दिऔक सद्भावपूरित
हमर-अहाँक आँगन मे शीत जलक ढार
जँ सरिपहुँ रचबाक हो
कोनो देश, कोनो राग।


ललितेश मिश्र


4).अभियान

कोनो भदबारि-राति मे
लेधरल बहुत रास बादरि मध्य
घेरा कए
एकसरूआ चाल लगैछ,
कोनो एकटा मुनक्ख जकाँ-
बेबस, पराजित, नत ग्रीव
कारी बादरिक वितान मध्य
पराभव उघैत
हमरा, एकसर यात्री चान जकाँ,
अपन मरणशीलता सँ, अपन नियति सँ
अपन पतनशील जीवन-व्यवस्था सँ
कोनो दुःख नहि अछि
जँ हम तोड़ि नहि सकैत छी
भदवारि रातिक
कांरी बादरि केर चक्रव्युह...
जँ हम नवोदित सुरूजक स्वागत मे
नहि जाए सकैत छी
एटलांटिकक लिधुराह हिलकोर धरि...।
खुशी-खुशी गर्दनि झुकौने
कोनो भदवारि रातिक मेघाच्छन्न आकाश मे
घेराएल, निरूपाय भेल चान जकाँ
हमरालोकनि कें अपन मृत्यु, अपन अन्त
स्वीकार्य होएबाक चाही
पराभवक यंत्रणा-बोधक
एक गोट सार्थक
समाप्ति उपक्रम/अभियान होएबाक चाही।

5).कारी सागर मे डूबि गेल अछि सुरूज किरिन

कारी सागर मे डूबि गेल अछि
सुरूज किरिन
पसरि गेल चतुर्दिक अन्हार
अन्हार! आदिम अन्हार!!
च‘र-चाँचर सभतरि
पसरल जाइछ हाहाकार।
जाति-उपजाति मे वर्गीकृत
हेंजक हेंज मनुक्ख
आ’ हेंजक हेंज चिड़ै-चुनमुनी
सन्धानि रहल अछि बाट
एकहि गाछ ओ एकहि डारि पर
एकहि राग मे, एकहि ताल मे
सन्धानि रहल अछि प्रात।
हेंजक हेंजक मनुक्ख
एकहि देश मे, एकहि नीति पर
अलगल-अलगल
फराक रीति ओ अवसर लेल
बिमछल-बिदकल
चाँछि रहल’छि तकरार
संभव नहि होएत प्रात।
कारी सागर मे डूबि गेल
सुरूज-किरिन
पसरल जाइछ अन्हार
अन्हार! आदिम अन्हार!!
देखब हम ओही दिन

6).देखब हम ओहि दिन रहब

(हेअर द चॉक वाल फाल्स टू फोम
एण्ड इट्स टॉल लेजेज
ओपोज द प्लक एण्ड
नॉक ऑफ द टाइड)

छल-बल सँ बान्हल
ठाम-ठाम दगनी सँ दागल
हमर बाँहि एकटा अननत आकाश थिक
जकर छाहरि मे
समस्त भूमण्डल करैछ
सूर्यक परिक्रमा
उत्थान-पतन होइत अछि
सुख-दुविधा होइत अछि।
क्लीव, शिखण्डीक दुरभिसन्धि मे
हमर बाँहि, मुदा, बान्हल रहैत अछि
छल-बल सँ दागल रहैत अछि
किन्तु, हमर बाँहि एक दिन एतेक
मोट भ’ जाएत
एतेक पैघ ओ बली भ’ जाएत
जे बान्हि लेत समस्त संसार कें
अपन पाश मे
जकड़ि लेत सूर्यपिण्ड कें
आ रोकि देत हवा-बसात कें
देखब हम ओही दिन अहाँक
दुरभिसन्धि प्रभाव कें
जे उकासी मेटएबाक लेल
अहाँ चाहक फरमाइस करैत छी
आ कि छीकैत रहि जाइत छी...।

7).जीवन-कामनाक डोरि

के कहलक सुरूज मरैछ नहि!
अपन शाश्वत संघर्ष मे
शक्ति संचय लेल
पुनर्जीवित भ’ घनघोर युद्ध
ठनबाक लेल
प्रत्येक दिन सुरूज
अन्हार कें सत्ता-साम्राज्य
सौपैत अपन अवसान
स्वीकार करैछ;
मुदा, हमरा लोकनि की करैत छी?
कतए जाइत छी?
प्रत्येक दोसर दिन
अपन अभियान मे नव ऊर्जाक संग
फेर ठाढ़ भेल सूर्य कें देखि
हमरा कहियो, कदाचितो
अपन नपुंसकताक बोध नहि होइछ!
हम जीबाक मात्र कामना करैत छी
यथास्थितिवादी भ’
संघर्ष हमर ईष्ट नहि, ध्येय नहि
सभ दिन, सभ क्षण, नीक-अधलाह मे
बरखा-बसात मे
हम मरितो नहि मरैत छी
कारण मरबाक कोनो टा कामना
नहि होइछ हमर मोन-प्राण मे
मोन-प्राण मे टांगल रहैछ सदिखन
जीवन-कामनका डोरि
लाल-पीयर सूत-ताग
हमरा नहि चाहि शक्ति, नहि चाही पुनर्जीवन,
पसरल रहए दिऔक
मोन-प्राण मे
अपन लहास उघबाक कामना।
जरथु मरथु बरू
दैदीप्यमान भास्कर!


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ललितेश मिश्र (जन्म : 3 मार्च, 1950) मैथिलीक सुप्रतिष्ठित कवि-कथाकार-समीक्षक छथि। ललितेश मिश्रक साहित्यिक यात्रा  कविता आ कथा सँ आरम्भ होइत समीक्षात्मक-निबन्ध-लेखन दिस अग्रसर भेलनि। अपन समीक्षात्मक-निबंध-लेखन लेल प्रबुद्ध समाजक-मध्य हिनका एकटा विशिष्ट स्थान सेहो प्राप्त छनि। प्रस्तावना (समीक्षापरक-निबंध-संकलन) आ बीच वैतरणी मे (कथा-सँग्रह) हिनक प्रकाशित कृति सभ छनि। एकर अतिरिक्त चांगुर आ सह-रसा पत्रिकाक सम्पादन। ललितेश मिश्र विगत किछु समय सँ सोशल-मीडियाक माध्यमे अपन अंग्रेजी-अनुवाद कार्य सँ मैथिली-कविताक विराट छवि विश्व-पटल पर अंकित करबाक अनुष्ठान-कार्य मे जुटल छथि, जे कि बेस सार्थक आ महत्वपूर्ण अछि। हुनका सँ mishralalitesh@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि।  
कारी सागर मे डूबि गेल अछि सुरूज किरिन कारी सागर मे डूबि गेल अछि सुरूज किरिन Reviewed by e-Mithila on May 28, 2020 Rating: 5

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