लाकडाउन मे मजूरक पैदल घर-वापसी


किछु कविता ::

|| लाकडाउन मे मजूरक पैदल घर-वापसी || 

— तारानन्द वियोगी 


।। कौतुक ।।

केवल एगारह किलोमीटर बचल रहै आब गामक डीह
पाँच सौ तिरसठ तं ओ आबि चुकल छलि
तत्तय आबि क' मरल बचिया।

कौतुक होइ छनि सुधीजन लोकनि कें
उमंगो तं कोनो चीज छियै
आबिये तं गेल छल गाम, किए छोड़लक हिम्मत
किए मरल बचिया गामक लग आबि
--कौतुक होइ छनि।

उमंगक सीमा हुअए हरदम
बिना कारणक आशावादी नै बनल रहि सकैए देस
--बनल तं अछिये
तखन कहू जे सदा सर्वदा नै बनल रहि सकैए।
बचिया कें लागल‌ हेतै भूख
बचिया कें रछबबा बला प्यास लागल हेतै
एन एच धसतिहै तं अबितय अगिला कोनो गाम
ओतय चापाकल भेटतिहैक तक्खन पिबितय पानि
एन एच पर कतय पाबी चापाकल?
गरीब कें पानिये पियाबक लेल भेल छै विकास की?
उमंगे पर तं तखनहु दौड़ल जाइत रहय बचिया।

छुच्छे उमंगक बल पर अहां कें दिल्ली सं दरभंगा आबि हैत?
बिसरि जाउ
बहुत दूर छै अखनो सभ्यता गाम सं!
गामक मौअति शहरे मे गेने भ' सकै छै
से भैयो रहलै-ए
से मुदा अपन होइ छै, होउ
के ओकरा पर दैए कानबात
जाबे दुर्दिन नै घेरि लै, के दैए कानबात?

एगारह किलोमीटर पर मरि गेल बचिया
एगारहे कहै छियै से गलत कहै छियै
ओइ मे  पांच सौ तिरसठ आउर जोड़ि लियौ
गाम सं ओतबा दूर छै सभ्यता एखनो।

बचियाक मरबा पर मुग्ध नै होउ
ओइ पर कानू
गाम सं दूर छै सभ्यता एखनो
शहर मे रहिनहि की ?
दूर छी अहां सभ्यता सं तखनो
सभ्यता बिखधर नागक बिख हवा मे रखैत अछि
कांखतरक केश मे रखैत अछि चिल्लर के अंडा जकां मनुखता
ओहो चिलरबे एते तुमुल स्वच्छता बीच जिबैत रहि सकथि तं रहथु

कहलहुं ने
छुच्छे उमंग पर दिल्ली सं दरभंगा नै पहुंचल जा सकैए
एगारह किलोमीटर पहिनहु खसि सकैत अछि विकेट।


तारानन्द वियोगी | छायाकार : डॉ. नीलाभ पंकज

।। दस चंगला पर एक बंगला ।।

एत्ते एत्ते लोक कें चलैत अबैत देखै छी 
बाले-बच्चें लत्ते-पत्तें
एते लोक कें देखै छी हकोपरास
एते लोक किए घुरय चाहै अछि गामे
शहर तं ओकरे बसायल रहैक!

नै छै जगह शहर मे गामक लेल
बुझनिहार तं कैक जुग सं बुझै छथि बात
शहरे नहि मानैत अछि
दस चंगला पर ओकरा एक बंगला चाही
चंगलाक सप्लायर के तं गाम
गामे नै बुझैत अछि जा बिपति नै पड़य

एत्ते एत्ते लोक आबि रहल अछि लत्ते-पत्तें
पैदल चलैत बुलैत, कुहरैत, मरैत
बुझियौ जे गामक गाम आबि रहल अछि!

ई सब फेर जेतै शहर?
फेर शहरे जेतै?
जेतै ने कोना अवश्य जेतै
ओकरा दस चंगला पर चाही एक बंगला
संख्या पुरौतै ने कोना?

।। तैयो ।।

भूत प्रेत पिशाच जिन्न चुड़ीन
ब्रह्मराक्षस आ चंठबैताल
एहि सभक स्मृति सं भरल अछि लोकसाहित्य
एकर निवारण लेल 
जानि नहि कते कते देबा आ मनुखदेबा आविष्कृत भेला
कतहु काली खेहारलनि पिशाच कें
कतहु भूतप्रेत कें हनुमानजी
कतहु कतहु तं छोटे मोटे भैरवलाल
अपन मुदगर सं मारि खसौलनि
सौ-हजार ब्रह्मराक्षस

ई सब मुदा आब बीतल जुगक बात भेल
अइ पर आब के करत भरोस
जे अदृश्य देवता सब किछु क' सकता
आ से कयने सुरक्षित बनत लोक
के करत विश्वास?

भूत प्रेत पिशाच जिन्न चुड़ीन
ब्रह्मराक्षस आ चंठबैताल
सभक सब विराजित अछि आइ राजगद्दी पर
आ लोक पड़ायल चल जा रहल अछि
माथ पर उघने मोटरी पोटरी
कन्हा पर बैसौने बालबोध
पयर मे ओझरेने प्लास्टिकक बोतल ताप-रक्षाक लेल
शीतल जल के स्मृतिटा बचल जै बोतलक धाजा मे,
चलल जा रहल अछि अपन अपन गामक दिस
वश रहलै तं गामे जा क' मरय चाहैत अछि

गामो मे शासन छै अही भूत प्रेत पिशाच जिन्न चुड़ीनक
पहिने काली हनुमान भैरव छला गद्दीनशीन
तं बालापीर आ छेछन महराजो धरि क' देल करथि गोहारि
आब गद्दी पर छै भूत प्रेत पिशाच...

मुदा लोक तैयो अपन गामे जाय चाहैए
किछु आर शक्ति होइक बचल गामक लग जनु
कोनो सूक्ष्म, प्रच्छन्न शक्ति!

।। धरतीक बचल काज ।।

मूड़ी नमरा नमरा क' हियासैत अछि गामक धरती
विदा होइ गेल अभगला सब कि नै, कते दूर आएल
कते बंदा बचल अछि एखनो धरि चलायमान?
मूड़ी नमरा नमरा क' हियासैत अछि गामक धरती
देशबंदी मे गाड़ी-घोड़ा एक्ट्री-फेक्ट्री सब बंद छै
तें ओकरा सूझियो जाइत छै अग्गह बिग्गह परदेस

अभगला सब कें सेहो हियास छै गामे पर
ओ मरय चाहे जीबय, गामे आबि क' चाहैए, हो
गाम पर लाठी ल' क' तैयार छथि मुखिया-सरपंच
अरगड़ा नियत भ' क' तैयार छै
सत्ताक जं बचल अछि आब कोनो काज
 तं शासने बहाल राखब टा बचल अछि
 होहकारी टा देब कि ओ सर्वोपरि थिक
 एक सं एक कर्मठ अधिकारी तैनात छथिन
 ढठ्ठा लगा क' ठाढ़ छथि मुखिया-सरपंच चौकीदार समेत

धरती कें मुदा एखनो ओतबे काज बचल छै जतबा तहिया रहै
ओ मूड़ी अलगा अलगा क' तकैत अछि अभगला सभक बाट
विदा होइ गेल कि नै, कते दूर आएल, कतबा बचल चलायमान?


•••

तारानन्द वियोगी मैथिलीक समादृत कवि, कथाकार, आलोचक छथि। हिनक प्रस्तुत कविता सभ वैश्विक महामारी कोरोना वायरस केँ केन्द्र मे राखि क' लिखल गेल अछि आ एक संग समयक अनेकानेक चित्र उपस्थित करैत अछि। जकर केन्द्र मे छथि बाट पर पएरे चलबा लेल विवश असहाय मजदूर, एन. एच पर पानिक एक-एक बुन्न लेल हकासल-पियासल मजदूर लोकनिक नेना-भुटका। माथपर, कान्हपर मोटरी-चोटरी आ धिया-पुताक बैसा हजारक-हजार किलोमीटर पएरे चलबाक लेल विवश एहि लोक सभक संग अछि मात्र एकटा उमंग, छुच्छे उमंग। गाम पहुँचबाक एकटा उत्कट अभिलाषा। दोसर दिस, कोरोना सन वैश्विक संकट रहितो कोना सभ्यता हिनकालोकनिक शत्रु बनल ठाढ़ अछि, प्रस्तुत कविता सब मे तकर स्पष्ट चित्रण भेटैत अछि। से शहर सँ गाम धरि। एतय सभ्यताक प्रयोग बेस विस्तृत अर्थ मे कएल गेल अछि, जे कि एहि तमाम समस्याक मूल मे तँ अछिए आ एहि शब्द विशेष पर बेस चिंतनक मांग करैत अछि। गाम सँ लोकक शहर प्रस्थान सँ ल' क', एहि परिस्थिति विशेषक स्थिति धरि अनेकानेक चित्र आ ब्यौरा प्रदर्शित करैत ई कविता सब, पाठ केर उपरांत पाठकक मोन मे एक संग कइएक प्रश्न छोड़ि जाइत अछि। कविता समाप्त होइत अछि किन्तु प्रश्न शेष रहि जाइत अछि मोन मे। निश्चय एहि कविता सभक ई सार्थकता अछि जे अहाँ एहि प्रश्न केँ कात नहि क' सकैत छी, ई प्रश्न सब बेर-बेर विचार करबाक मांग करैत अछि, ताधरि जा अहाँ एकर निदान दिस नहि उन्मुख होइ। सभ सँ पैघ बात ई, जे जँ ई कविता सब कोरोनाकाल पर केंद्रित नहियो होइत तैयो अन्य स्थिति मे सेहो ओतबी प्रासंगिक आ जरूरी प्रश्न बनल रहि जाइत अछि। तारानन्द वियोगी सँ tara.viyogi@gmail.com पर गप्प कएल जा सकैत अछि। हिनक परिचय आ 'ई-मिथिला' पर प्रकाशित अन्य काजक लेल एतय देखी : 

लाकडाउन मे मजूरक पैदल घर-वापसी लाकडाउन मे मजूरक पैदल घर-वापसी Reviewed by e-Mithila on May 19, 2020 Rating: 5

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