साँझ भरल, दीप जरल न आएल बोनिहार हमर 


"हम अपन गजलक माध्यम सँ हताश आ निराश जन-जीवन मे नव प्राण फुँकबाक प्रयास करैत छी। जँ शब्द सँ ओ महत्वपूर्ण आ अवश्यम्भावी क्रान्ति भ' सकैत अछि तँ हम गजलक माध्यम सँ ओहि क्रांतिक आह्वान करैत छी। अपन निरन्तरता मे ई सहस्त्रो मनुक्ख कहियो पराजित नहि भेल, हमरालोकनि कहियो पराजित आ हताश नहि होयब। गजल निश्चित रुप सँ हमरा सभक क्रांतिक संवाहिकाक रूप मे काज करत।  गजल हमरा अभिव्यक्तिक सभ सँ सहज-सुलभ माध्यम बुझाइत अछि, तेँ अपन हृदयक सम्पूर्ण भाव-राशि केँ हम गजलक माध्यमे व्यक्त करबाक चेष्टा करैत छी।"  


|| कलानन्द भट्टक किछु गजल ||


१).

बाट बाधित पहाड़े छै  फाटल  जखन 
सीयत दरजी के आकासे फाटल जखन

आइ अंगा फकीरक धरा अछि बनल 
सौंसे  चेफड़ी समस्येक साटल जखन

द्वेष, ईर्षा, धृणा, उर, तनावक लहरि 
एक दोसर सँ दूध जकाँ फाटल जखन

गर्म मौसम बनल लपलपाबैछ जीह 
प्यास छै शोणिते केर जागल जखन

लीख पर ने अपन वियातनामे रहल
देश हमरो,  वैह  लीख लागल जखन

२). 

प्रीत कोमल हमर अछि सोहारी बनल
भोर भागल छै साँझ शिकारी बनल

हम झरल पात गाछक सदृश ठाढ़ छी
अछि समस्या अगारी पछारी बनल

धरती फाटल गगन माथपर अछि चढ़ल
ने सहारा कोनो बोझ भारी बनल

छल जकर आस अछि ओ टूटल खाट सन
सुखा क' ओकर रूप कारी बनल

३).

घर घरेक आगि सँ अछि जरल जा रहल
भाइ सँ भाइ द्वेषे भरल जा रहल

कोन आयल जमाना जुआरी एतय
भावना अविवेकी बनल जा रहल

क्षुब्ध धरती गगन नयन मूनल अपन
अछि बसाती बलाती बनल जा रहल

फूल-कांट मे अंतर कयनिहार जे
ओ चमन छोड़ि क' अछि चलल जा रहल

के कहत चोर केँ चोर सभ चोर अछि
आइ रामो सँ चोरी कयल जा रहल

४). 

मुँह देखि-देखि मुङ्गबा बंटै छी अहाँ
लाभ जकरे सँ पात भरै छी अहाँ

चान दुतियाक कम सँ अधर पर बढ़य
रंग गिरगिट जकाँ बदलै छी अहाँ। 

छी महामान्य विष-मध भरल घैल सन
व्यूह रचि क' सहायक बनै छी अहाँ

डेग नापल उठय ने हुसल आइ तक
धरा-अम्बर केँ मुठिये रखै छी अहाँ

सभ जानय मुदा क्यो न बाजैत अछि
जे बाजय करेजे कटै छी अहाँ

५). 

कहू की कथा कहुना जीबि रहल छी
 फाटल गुदरी अपन हम सीबि रहल छी

 दाम श्रम केर संचित भजा हाट पर
बोझ महगी बनल हम लीबि रहल छी

भार परिवार जिनगी बनल ठूंठ सन
आब सूदिक जहर हम पीबि रहल छी

 कोना बाँचत प्रतिष्ठा विवशता भरल
असल टाँग दलदल मे खीचि रहल छी

पौरुष गमा हम ने बेसी, अछि चिन्ता 
 चिंताकुल माथ अपन पीटि रहल छी

६). 

सभ लूटै छै लूटू ने लूट मचल छै 
सक जकरा ने वैह इमानदार बनल छै

कागत पर  देखू  जँ देखक हो योजना  
धरती पर सूखल आमिल बनल छै

मरू विवेक चलू पेटो ने भरैछ
नीति कानय कुनीतिक अवार चलल छै

जँ चूकब तँ चूकब मुँह चुकरी होयत 
के कहत उँट कोन गरे बैसि रहल छै

बात  रखबारक तँ कात करू काका 
औ खोपड़िये खेत उजारि रहल छै




७). 

साँझ भरल, दीप जरल न आएल बोनिहार हमर 
प्रतीक्षा मे आँखि दुनू भेल अछि पथार हमर 

घूमि अबैछ रोज-रोज ने लागैछ बोनि कतहु 
भूख ! भूख ! भूखक लेल ज्वाला भकराड़ हमर 

थिर रहतै प्राण कते अन्न बिना देह बीच 
सागेटा करमी केर जिनगीक आधार हमर 

होइतै जँ टिकसो केर टाका हम पठा दितिऐ 
जा रहलै पनिजाब सभ होइतै उद्धार हमर 

करबा ले कुटौनो-पिसान कोनाक' निकलू  हम 
अछि नेना पिहुआ, भेल नुआ तार-तार हमर 

८).

एहि जंगलसँ ओहि जंगलक जानवर 
नीक अछि, आदमीसँ  कतहु जानवर 

दिनमे रूप किछु आ रातिमे रूप किछु 
नहि बनाबैत अछि बन्धु, ओ जानवर 

उर बसा द्वेष, ईर्ष्या, घृणा केर लहरि 
रक्त-तर्पण करैछ ने कोनो जानवर 

डूबिक' वासना केर दुर्गन्धमे
नहि सुनल, बलात्कारी बनल जानवर 

अपन हाथे अपने परिधि आदमियतक 
तोड़ि देलक मनुख, ने तोड़ल जानवर 

९).

मोन पड़ल आइ अपन आँगन, घर, गाम 
पत्र लिखू ककरा, छी सोचि रहल नाम 

जिनगीक क्षण ओ इतिहासक पृष्ठ भेल 
गलियारी गंगा, सीमान बनल धाम 

मीत मनक नांगर, सरतियो भुलाएल 
दूर गेला भैया हमर जगसँ राम 

घर छोट-छोट भीत चूनासँ ढेउरल
चित्र ओहिपर राधा कृष्णक ललाम 

देखबा ले आँखि कान सुनबा ले आकुल 
ढोरबा चमार केर, बउआ परनाम 

संत्रासक युग ई अभावक बिहाड़िमे  
कोम्हर के ठाढ़ अछि कत कोन ठाम 

१०).

कथनी आ करनी मे अंतर पड़ै-ए 
औ भाषण जते कहाँ राशन पबै-ए 

पूजी, मशीन दुइ पाट बीच आदमी 
पिसा रहल, चिक्कस गहूँमक बनै-ए 

श्रमसँ जकर खेत उपजैछ आइ ओ 
रोटी पर नून, मरचाय लय झखै-ए 

सत्ता केर शासन व्यवस्थाक अढ़मे  
अंगुरी अनीतिक संगमे रमै-ए 

मैथिल किछु तहिना मैथिलीक नामपर 
अपने हित सधबा ले आकुल रहै-ए 

११).

मैथिली केँ मैथिले किछु दाबि रहल छै 
ठाढ़ भ' गाछ तर ठारि पांगि रहल छै 

देखू इतिहास, आकाश देखला सँ की 
चोर खिड़कीसँ घरकेँ निहारि रहल छै 

मौक़ा आयल ने धोखा मे क्यो जन पडू 
पीठ पाछाँ ओ छुरा उसाहि रहल छै 

मातृभाषा मधुर माय केर दूध सन 
युग-युगसँ मनुक्ख गीत गाबि रहल छै 

जँ चुकब त' चुकब हम अधिकार सँ 
बिनु झगड़ने ने क्यो हक पाबि रहल छै 


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कलानन्द भट्ट मैथिलीक सुप्रतिष्ठित गजलकार छथि। 'कान्ह पर लहास' हुनक एक मात्र प्रकाशित गजल-सँग्रह छनि। एतय प्रस्तुत गजल आ आत्मव्यक्तव्य एही सँग्रह सँ आ प्रयुक्त छवि मैथिलीक वरीय आलोचक डॉ रमानन्द झा 'रमण' केर सौजन्य सँ साभार लेल गेल अछि।


साँझ भरल, दीप जरल न आएल बोनिहार हमर  साँझ भरल, दीप जरल न आएल बोनिहार हमर  Reviewed by e-Mithila on May 15, 2020 Rating: 5

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