युवा रचनाशीलताक अर्थ : स्वाति शाकम्भरी

लिखब जतबे आवश्यक आ महत्वपूर्ण अछि, ततबे आवश्यक आ महत्वपूर्ण ई सेहो जे की लीखल जा रहल अछि. विषयक चयन, भावक संग शब्दक ट्रीटमेन्ट आ ओकर अरेंजमेंट एहि मे बेस महवपूर्ण जग्गह रखैत अछि. समकालीन मैथिली कविताक एकगोट सशक्त युवा स्त्री कवि स्वाति शाकम्भरी युवा रचनाशीलता पर किछु उपयोगी आ सोचबा योग्य गप्प सब राखि रहलीह अछि. पढ़ि सकी तँ स्वागत- मॉडरेटर. 


...आइ युवा साहित्यकार सदैव अपन अस्तित्वक रक्षार्थ कलम उठा साहित्यक माध्यम सँ यथार्थक अभिव्यक्ति रूढ़िवादक विरोध मे स्वर उठा रहल अछि। युवा साहित्यकार भेद सँ दूर अभेदक स्थिति मे लोक केँ देख' चाहैत अछि। ओ धर्म हो, जाति हो, लिंग हो, समाज आ देश हो सब ठाम कोनो ने कोनो परतंत्र रूढ़िताक कारणें स्वर उठेबा मे असमर्थ अछि। ताहि ठाम युवा साहित्यकार अपन साहित्यक माध्यम सँ संदेश देब' चाहैत अछि जे वर्तमान Globlisation युग मे ककरो सँ पाछाँ नहि रहि आ युगदौर मे हमहुँ सम्मिलित भ' ककरो पाछू नहि, मुँहलग्गू नहि, प्रपंचीक पेंच मे नहि पड़ि हम ओकरा जानि, परखि आ अपन विचारक प्रति सशक्त रही। ओ विचार जे हमर मानवीय मूल्य केँ ह्रास नहि क' सकय।

आजुक समय मे जे अन्हार अछि तकरा निर्विवाद रूपेँ चीरैत अर्थात तिरोहित करैत नव-नव रास्ताक खोज करैत आगू बढ़ैत रही। व्यक्तिगत साम्राज्यवादी, रूढ़िवादी वर्चस्वताक परास्त करैत व्यापक जन आन्दोलन केँ माध्यम बना एक नवआयाम धरि पहुँची जे हमर अस्तित्व केँ कायम राखि सकत। ई योजना साहित्यकारे सँ सम्भव भ' सकैत अछि। युग केँ बदलबाक शक्ति साहित्यकारे अपन साहित्यिक शस्त्र सँ क' सकैत अछि। किएक तँ मिथिलाक मैथिलीक सहज संस्कार रहल अछि। जाहि ठाम युवा केँ अन्तस मे साहित्यिकताक सरसता अन्तः सलिला त्रिवेणीक सरस्वती जकाँ अदृश्यो रहैत निःसारित अछि। रचनाधर्मिता सम्वेदनशील मानवताक पर्याय थिक आ वर्तमानो मे युवा जन एहि धर्मक निर्वहन निर्भीकताक संग क' रहल छथि।

युवा लेखन तेँ स्वतंत्र, अपरिमित, विकाररहित आ लेखनी मे भाव हेबाक चाही आ जेना हमरा सब लोकनि जनैत छी जे सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया:' एहि पंक्तिक यथार्थताक जनैत आंशिक रूप नहि पूर्ण रूप सँ छूबैत, परखैत आ अपन संस्कृति, सभ्यताक परिचय दैत रचनाक समरसता जोड़ैत नव रूप मे सृजन करबाक चाही।

आजुक वर्तमान परिवेश मे युवा वर्गक रचना विभिन्न जातिक धर्म, संस्थान आदि पर टिप्पणी करैत ओकर निर्गुणताक बखानैत आ समभाव समरसता सँ कोसों दूर जे सृजन भ' रहल अछि ओ परिणत भ' केँ 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' पर स्वतंत्र रूप सँ निर्भर करैत रचना प्रकिया केँ सही दिशा प्रदान करबाक चाही।  किछु दिन पहिने हमर समाज मे जाति-पाति, ऊँच-नीचक सम्प्रदाय शोषण आदि प्रचुर मात्रा मे व्याप्त रहए तेँ साहित्यकारक मानसिकतो एतबहि मे समटि केँ रहि जाइत रहए मुदा आजुक स्थिति एहन सन नहि । आजुक सोचनिहार कोनो विशेष मुद्दा पर नहि वैश्विक स्तर पर सोचैत अछि।

आओर हुनक रचना शीशा जकाँ पारदर्शी, दिव्य अलौकि आ विलक्षणता सँ परिपूर्ण होअए जे जीवन पथ पर चलैत चलैत निराश आ श्रांत पथिक शांति, आशा आ आश्वाशन बनि क' एक स्तम्भक रूपें कार्य करय। आ जे पढ़ए हुनका लागनि कि ई हमरे ल' विशेष रूपेँ लिखल गेल अछि। किएक तँ आजुक समय मे विश्व एक camera मे बन्द भ' गेल अछि। एहि स्थिति मे युवा लेखनक लेल एकटा नव आ गंभीर चुनौती समक्ष अछि जे ओ एहि विश्वव्यापी चेतनाक प्रति साकांक्ष आ जागृत होअए। आओर ई मात्र तीन टा शब्द सँ बान्हल अछि - मातृशक्ति, मातृभूमि आ मातृभाषा। जौं युवा एहि शब्दक गरिमा केँ बूझैत एहि पर कार्य करताह तँ हुनक लेखन मे, हुनक सोच मे आ हुनक जीवनो मे समरसता बनल रहत एवं स्वतः भविष्य स्वर्णिम दर्शित होअए लागत।

(प्रथमसः सजग कविता सांस्कृतिक विचार पत्रिका मे प्रकाशित)


1 comment:

Theme images by enjoynz. Powered by Blogger.