Wednesday, October 18, 2017

इजोत हमर मित्र थिक, हम इजोत सँ प्रेम करैत छी : नारायणजी


"बहुत रास फूल साँझ मे फुलाइत अछि, भोर मे झरि जाइत अछि। गेनाक फूल तीन मास मे विकसित होइत अछि। नारायणजीक कवि गेना फूलक माली नहि, खाद नहि, पानि नहि। ई कवि जीवनक अनुभव केँ काव्य आ इतिहास बनबैत छथि।
अपहरण आ हत्या केँ आजीविकाक आधार बनयबाक युग अछि, तथापि बेटीक विदागरी मे आइयो समदाओन गबैत अछि। कदाचित समदाओनक धुन एलेक्ट्रिक गिटारे पर किएक ने बजाओल जाइत हो, ओ आँखि मे नोर भरि दैत अछि। बर्फ जकाँ पधिलब सिद्ध करैत अछि, स्नेह छैक आ जीवनक दिवारी मे ई स्नेह इजोत केँ बचओने छैक। कुण्ठा रहित ई इजोत मैथिली कविता केँ भारतीय भाषा मे उच्चासन देने अछि। नारायणजी एहि भाषाक प्रतिनिधि कवि छथि। हिनक प्रत्येक रचना आश्चर्यजनक अछि आ उल्लसित करैत अछि" : जीवकान्त
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 प्रस्तुत अछि हिनक तीन गोट कविता। क्रमशः हम इजोत सँ प्रेम करैत छी, चौमुख दीप आ प्रकाश लेल नहि। 
पढ़ल जाय।


हम इजोत सँ प्रेम करैत छी

हम इजोत सँ प्रेम करैत छी 

हमरा घृणा नहि अछि 
कोनो तरहक 
अन्हार सँ 
बिजली फेल भेला सँ 
तत्काल हमरा कोठली मे पसरी जाइत अछि 
छेकि लेत अछि घरक कोन -सान्हि 
हमरा लेल ईर्ष्याक पात्र 
हमर दुश्मन नहि थिक 
हमरा समक्ष 
अपन अनिवार्यता जनबैत 
बहस लेल अपन तर्क रखैत अछि 
हँसैत अछि हमर विवशता पर 

बच्चा खरकैत अछि दियासलाई 

स्वर कण मे पड़ैत रहैत अछि 
एकता व्यापक स्मृति 
अनैत अछि जरैत लालटेन 
हमरा कोठली मे 
इजोत नाच' लगैत अछि 

अन्हार हमर दुश्मन नहि थिक 

इजोत हमर मित्र अछि 
हम इजोत सँ प्रेम करैत छी 
***
१९९१ 
चौमुख दीप 




(१)
सपना 
निन्न सँ जगैत अछि
अँगनाक अढ़ाइ हाथ नाम-चाकर हिया 
तीर्थ बनि जाइत अछि 
हाथक तरल स्पर्श पाबि 
मान-सुख मे.... 

पसरैत अछि ठांओ पर आकाश 
चन्दा नहु-नहु उगैत छथि 
नहु-नहु अबैत छथि सँझा 
अबैत छथि गंगा 
स्वर्ग सँ 
अदृश्य हिलकोर संग 
कलस मे बैसि जाइत छथि 
पृथ्वीक मस्तक पर 

पृथ्वी 
से आइ नहि बनलि छथि 
अपन छाती पर उघैत 
पहाड़ आ जंगल 
बर्खा-बिहाड़ि 
खाल-खाल बहैत धार, जल सँ.... 

कहाँ बनल अछि जल आइ 
पृथ्वीक गर्भ मे घुरि अबैत बेर-बेर 
पाथर सँ छिटकैत 
बहैत हमर भूख मे 
हरियर-हरियर गाछ सभक शिरा मे 

आत्मा मे जकर 
असंख्य चिड़ैक प्रेमालाप अछि 
आ एकटा डेरबुक प्रेत अछि 
घनघोर रातियो मे हारैत अछि 
निफाह आकाश तर 
आ तकरा पराजित क' पल्ल्वित होइत अछि 
कतेको दिनुका प्रतीक्षाक बाद 
गाछ से 
आइ नहि बनल अछि 
पृथ्वी आ जल आ आम्र -पल्लव 
सम्पूर्ण श्रद्धा सँ पूजनक बाद 
ओहि पर जरि रहल अछि, आइ 
चौमुख दीप 

(२)

हमरा सँ  दूर छथि सूर्य 
चन्दा आ तरेगण 
हम नहि बनाओल अछि 

हमरा सँ परोक्ष 
जत' हम नहि छी 
अपन असीम धारक क्षमता संग छथि 
अनन्त सम्भावनाक जोगओने 
पृथ्वी 
हमर तरवा तर छथि 
हम नहि बनाओल अछि 

जल, हम नहि बनाओल अछि 
जाहि मे हम डूबि जाइत छी आकंठ 
लाख चेष्टा कयलो पर उबरि नहि पाबैत छी 
कखनहुँ विकल पूजित छी इंद्रा केँ 
अपन देहक ओहि अवयव सँ कयने रसपान 

जे रहैत अछि अन्हार मे विवश 
पल्लवित करैत अछि एकेक शिखा केँ 
जाहि मे नहियो किछु तँ एकटा लुक्खीक जगरना 
आ कुमारि कन्याक तृष्णा रहैत अछि 
गाछ से हम नहि बनाओल अछि 
पृथ्वी आ जल आ आम्र -पल्लव 
ओकरे आधार तल पर 
मैना जरोओलनि अछि 
हम जराओल अछि 
चौमुख दीप 

(३)

हमरा बुझल नहि अछि 
कहिया जरल ई पहिल बेर ?
सन सोलह सालक अकाल जे देखने रहथि 
मानैत छथि -
हुनका जन्मो सँ पहिने जरैत छल 
बियालीस ईस्वीक मूवमेंट 
आ गणतंत्र दिवसक बसात सिहकल नहि जत'
जरैत रहल ओहूठाम 

जरैत अछि 
आकाश सँ अगिन-बर्खा नहि होइक 
पृथ्वी डूबि नहि जाय महाप्रलय मे....

जरैत अछि 
विपदाक बाद 
विपदाक सागर मे 
जरैत अछि 
अन्न सँ भरल आगत रितुक महोखा मे 

हम देखल अछि 
जरैत अछि कांच माटिक चौमुख दीप 
तखन संपूर्ण पृथ्वी 
आ पृथ्वीक सभटा जल आ गाछ 
नाच' लगैत अछि 
ओकर कपैत इजोत धरि आबि, उमंग मे 
*** 
१९९९ 

प्रकाश लेल नहि 


अन्हार अछि
रातुक अन्हार
गाछक अन्हार

गाछक गुमकी
आ औल अछि

गुमारक मास मे
बदलैत मौसम संग बदलल
गाछक

गाछ तर सँ बहरा'
इजोरिया मे आबि जाइत छी

प्रकाश लेल नहि
प्रकाश मे ताक'
जयबाक रस्ता


संपर्क :


नारायण जी 

घोघरडीहा, मधुबनी- 847402 
मोबाइल : 9431836445 


Thursday, August 3, 2017

नहि जानि धरोहरि कत' हेरायल - अशोक कुमार दत्त


अशोक कुमार दत्तक काव्य-गुण सँ प्रथम परिचय 'पुर्वोत्तर मैथिल' पत्रिका सँ भेल छल. बाद मे अशोक जी 'साहित्यिक चौपड़ि' मे सेहो अपन काव्य-संसारक संग सहभागिता दर्ज करौलनि. आब 'झिझिरकोना' नाम सँ हिनक पहिलुक कविता संग्रह बहरौलनि अछि. कायदे सँ तँ ई कविता सभ कम सँ कम तीन दशक पूर्वहिं पाठकक समक्ष आबि जयबाक चाही छल मुदा अहाँ  पूछि  सकैत छी जे आबिए जयतैक तँ की भ' जयतैक ? यैह गप्प एकर ठीक विपरीत अर्थ मे सेहो पूछल जा सकैछ ? जे-से, औखन हिनक किछु कविता कविक आत्म-वक्तव्यक संग प्रस्तुत अछि. पढ़ल जाए- मॉडरेटर. 

अशोक कुमार दत्त 

हम अपना केँ कवि नहि मानैत छी, मुदा मैथिल होयबाक कनियो संस्कार अपना मे सहेज सकी हमरा लेल सैह बहुत। प्रवेशिका धरि हमर जीवन निछच्छ देहात चहुटा (त्योंथ) मे बीतल। मैथिली भाषा सँ सम्बन्ध मात्र एतबा भरि जे कहियो काल गामक अयोध्या स्मारक पुस्तकालय मे पत्रिकाक रूप मे 'वैदेही' आ 'मिथिला मिहिर' आबि जाएल करए तँ पढ़ि ली। उच्च विद्यालय, खिरहर मे जखन छलहुँ तँ कोनो सहपाठी सँ हरिमोहन बाबूक 'खट्टर ककाक तरंग' पढ़बाक सौभाग्य भेटल। मोन अछि सभक सँग पढ़ैत-पढ़ैत लोट-पोट भ' गेल रही। हँसैत-हँसैत पेट मे बग्घा आ आँखि सँ नोर छलकि गेल छल। ओहि दिन मैथिली भाषाक माधुर्यक आभास भेल छल।

प्रवेशिकाक बाद महाविद्यालयक अध्ययन वास्ते जखन पटना अयलहुँ, 'आर्तावर्त' आ 'मिथिला मिहिर' अपन उच्च शिखर पर छल। आर्यावर्तक 'चुटकुलानन्द की चिट्ठी' आ मिथिला मिहिरक 'बहिरा नाचे अपने ताले' बेस रसगर लागए। ओहि समयक विद्यापति समारोह मैथिल समाजक वास्ते एक महापर्व सदृश। मधुरताक लोकप्रियता एहन जे आन-आन भाषा-भाषी सेहो सभ रसपान करए वास्ते उमड़ि पड़थि। हेंजक हेंज मिथिलावासी, धरोहि बान्हि छावनी सदृश विस्तृत पंडाल मे गज-गज करथि। ओहि मे रविन्द्र-महेन्द्र जोड़ीक गान सुनबा लेल मारि पड़ए।  श्री रवीन्द्र जीक गायन- "के छथि मैथिल की थिक मिथिला, हम कहैत छी ओरे सँ, मिथिलावासी सुनू पिहानी, हम कहैत छी जोरे सँ।" सुनि रोमांचित भ' जाइ। जेना मिथिलाक राज्य गान हो ! ओहि समय मे गोलघर मुहल्ला मे डेरा छल। समारोह सँ छुटि क' डेरा आबी तँ किछु-किछु  लिख' बैसी।  कहियो काल लिखयलाक बाद पुरना अंगनाक मध्य मड़बा पर बैसि लिखल रचना सभ केँ सुनाब' बैसि जाइ। छपयबाक वास्ते नहि अपितु मात्र मनोरंजनक वास्ते।


किछु सालक बाद घरेलु बाध्यताक कारणें हमरा पटना छोड़ि दरभंगा आबय पड़ल। स्नातकोत्तर मे जखन दरभंगा मे छलहुँ तँ विद्यापति समारोह ओहो ठाम खूब घूम-धाम सँ मनाओल जाइत छल। ओतहु रविन्द्र-महेन्द्र जोड़ीक रंग-विरंगा गाना सुनि श्रोतागण झूमि उठथि। आर्यावर्त-मिथिला मिहिर बन्न भेलाक बाद कहियो काल 'माटि-पानि' पत्रिका पढ़बाक लेल भेंटि जाएल करए। ओहि समय तीन गायकक एकटा समूह तिजोड़ी बनि सेहो अभरलाह। ओहो सभ नीक गाबथि। विद्यापति समारोहक ओहि समय जेना दुन्दुभी बजैत छल। लहेरियासरायक एम.एल. एकेडमी उच्च विद्यालय मे संकल्प लोकक तत्वाधान मे साहित्यिक आयोजन भेल छल जाहि मे गायकक एक आर जोड़ी उभरलाह। शशिकान्त-सुधाकान्त। ओहि जोड़ीक मुँह सँ किछु गीत सुनल- मोन होइए अहाँ केँ देखिते रही, किछु बाजी अहाँ हम सुनिते रही; तोरा अंगना मे बसन्त नेने आएब सजना। सुनि मोन गदगद भ' उठए।


काल बितैत गेल। मिथिला मिहिर बन्ने भ' गेल छल। माटि-पानि सेहो काल कवलित भ' गेल। हमहुँ बैंकक चाकरी मे आबि गेलहुँ। मैथिली साहित्य सँ लगाव पूर्णतः बिखरैत चलि गेल। विद्यार्थी जीवन मे छपबाक लेल नहि अपितु स्वान्तः सुखाय लेल रचनाधर्मिताक मादे शब्द जोड़ि पयलहुँ ओ शनै: शनै: पझाइत गेल। ओम्हर रवीन्द्र-महेन्द्रक जोड़ी बिछुड़ि गेल। विद्यापति समारोह सेहो विस्तृत मैदानक बदला छोट छिन प्रांगण मे नाम धराइ होमय लागल। हमरा लेल साहित्याकाश मे बुझू अन्हार पसरि गेल। कतहुँ किछु नहि। बिल्कुल शांति।

बैंकिंग सँ सेवानिवृत भेलाक बाद रचना करबाक आगि पझाइत-पझाइत करीब छाउर सदृश भ' गेल। मुदा ओहि छाउरो मध्य शाइत साहित्य अनुरागक एक चिनगी कतहुँ सन्हिआएल होएत। एक दिन सेवानिवृत भेला उत्तर मोन नहि लगैत छल तें पुरना डायरी मे लिखल रचना केँ उलटाव' पुलटाव' लगलहुँ। गम्भीर छलहुँ। चौका सँ पत्नी कल्पना डायरी उलटबैत देखि कहलीह एहिना डायरी मे सभ सँठने रहू। एक दिन मिक्स अचार बना लेब।......।

ई पोथी दू कालखण्डक थिक। हम कोनो काव्यक गूढ़ बातक चर्च नहि कयल अछि, मुदा अपन जीवन मे गाम-घर मे रहैत आ एखन शहर मे अपन जीवन व्यतीत करैत जे मैथिल संस्कारक बदलैत स्वरूप केँ अनुभव कएल अछि ओकरे शब्दक माध्यमे अभिव्यक्ति देल अछि।

अशोक कु. दत्तक काव्यकृति 'झिझिरकोना' सँ किछु कविता

[1]. यौ बाबू ! हद्द भ' गेल !

यौ बाबू ! आब हद्द भ' गेल !
कन्यादान करबा मे बाप बिका गेल !
जनैत छलहुँ जे देवी एक शक्ति
जिनका लेल देवो करैत भक्ति
देवीक पाछाँ घुमैत छल देवो
सीता लेल मिथिला अयला रामो
मुदा माटियों सँ तुच्छ बेटी भ' गेल
यौ बाबू आब हद्द भ' गेल !

सुनैत छलहुँ जे जनकक ई मिथिला
मंडन अयाची भारतीक मिथिला
जतय कोठी बखारी मे लक्ष्मी मुनल छल
सुग्गो झुमि झुमि देव भाषा पढ़ै छल
मुदा उल्लू घर वाणी बन्हक पड़ि गेल
यौ बाबू आब हद्द भ' गेल !

जतय हिमालय कहथि 'महान बनू'
जतय गंगा कहथि 'दानी बनू'
गंगा मे पैसि कविकोकिल कहल-
'सदिखन देवीक सेबी बनू'
मुदा स्वर्ग सन मिथिला नरक बनि गेल
यौ बाबू हे आब हद्द भ' गेल

बेटी बाप आन्हर बनल भीख मंगै छथि
बरक बाप निष्ठुर भ' लात मारैत छथि
बिनु कलंके बेटी कलंकित भ' गेलि
घरक लक्ष्मी बेमोल बिकि गेल
कतेको कुमारि बेमौत मरि गेल
यौ बाबू आब हद्द भ' गेल

बरागत लोकनि बाघ बनल छथि
कन्यागतक भक्षण करय
कखन सँ कानन मे कोइली कनैए
पाथरक आगू मे दुखड़ा सुनबैए
बेटीक सिन्दूर शोणित भ' गेल
यौ बाबू आब हद्द भ' गेल ।

[2]. हम हेरै छी अपन मिथिला

सगरो पसरल घुप्प अन्हरिया, ने बाट सुझय मतिमान यौ
हम हेरै छी अपन मिथिला, राजा विदेहक शान यौ।
पाग किनको शीश ने देखी, ने त्रिपुन्ड चंदन
नहि टीका, नहि अग्निहोत्र, नहि देखी संध्यावंदन
बिनु गायत्री-जप कोना पायब, तीनू ताप सँ त्राण यौ।

कुर्ता-धोती, डोपटा, नहि टीक, माथ शोभायमान
जनेउ मे तँ कुंजी झुलैए, शौचो चढ़े नहि कान
मिथिलाक्षर नहि, मैथिली बाजब, कत' मिथिलाक पहिचान यौ।

पैर छूअब पहाड़ बनल, दूरहिं सँ छूबथि ठेहुना
अढ़ेला पर हुनका घाम छुटन्हि, संगे ओ जीवथि केउना
जेठक बोली सुनि कान पकन्हि, अपना केँ बुझथि महान यौ।

बोआय-कट केश कटा बेटी, घूमे गामे-गाम
मोबाइल सँ दिन भरि चैट करे, क' रहल ओ नाम
बाहरे अपने बियाहल तँ कोना, बाप करौ कन्यादान यौ।

केओ कन्या जीन्स-गंजी मे, सिल्की हेयर उधिएने
केओ सलवार-समीज पहिरने, बिनु दुपट्टा रखने
अहिवातीक अँचरा, नहि देखी कोना, खोइंछ भरल दूभि-धान यौ।

दुलहिन हाथ ने लहठी-चुड़ी, स्वजन सँ नहि कोनो काज
झिझिया, छठि गीत नीक ने लागे, बजाबी म्यूजिक जाॅज
सोहागिन सीथ ने सेनुर देखी, कोना पूजब हनुमान यौ।

बिनु फूलक फुलहर मे सीता, कोना करती गिरिजा-पूजन
पुष्प-वाटिका उजड़ल, कोना होयत राम-सिया के दर्शन
कतहुँ ने नचारी गूँजैए, ने मधुश्रावणीक गान यौ।

नहि भित्ति-चित्र, नहि कनियाँ संग कोनो साँठ -उसार
गाम मे आब बेन की देब, नहि दुरगमनिया भार
नहि सौजनि, नहि पाथेय होए, ने समधि-मिलान यौ।

बरेबक टाट ने देखी कतहुँ, ने भेटय देसी-पान
डबरा-पोखरि सभ भथायल, कुमही तोड़ए तान
कोजगरा मे आब कोना, बाँटब पान-मखान यौ।

अजोहे मे तँ आम बिकायल, सुन्न मालदह गाछ
सड़ल आन्ध्रा माछ सभ तरि, टटका नहि पोखरिक माछ
बिनु तिलकोर, खम्हारू कोना, करू सन्मान यौ।

कोना 'भैयाक मुख पान' हो  आ चुगला मुँह अंगोर
बिनु नेओंते भरदुतिया मे कोना, भैयाक बढि क' जोर
सजबी-दही बिनु मड़र कोना, देखब चौठी चान यौ।

उठू ! जागू ! मिथिलावासी ! पूब अम्बर अरूणायल
सोलहो कला सँ उगला सुरूज, देखि मिथिला करूणायल
सँगहि शक्ति समेटू सभ केओ, राखू मिथिलाक मान यौ।

[3]. नहि जानि धरोहरि कत' हेरायल ?

चीनियाँ दीया, चीनियाँ गणेश
चीनियाँ झालरि, चहुँ दिस चतरल
चीनियाँ चाउमिन, चीनियाँ मोमो
चीनियाँ जाल सगरो परसल

माटिक लक्ष्मी, माटिक डिबिया
तुलसी चौराक दीप कत' भुलायल ?
नहि जानि धरोहरि कत' हेरायल ?

पहिरि बड़बुडा, कुंडलधारी
जुट्टी बन्हने पहुना बैसल
सुटुक्का जीन्स, ड्रेगन टी-शर्ट
गोगल्स लटकौने कनियाँ घमकलि

लहठी-साड़ी, डोपटा-धोती
अहिबातक सेनुर कत' बिलायल ?
नहि जानि धरोहरि कत' हेरायल ?

नहि वंश-गोत्र, नहि ठाँओ-पाँजि
अपने मोने बियाह रचौलक
अपन महिस कुड़हरिए नाथब
लिभइन रिलेशनक पाठ पढ़ौलक

कौनी-मौनी, पुरहर-पाती
अहिबक फर, कत' ओंघरायल ?
नहि जानि धरोहरि कत' हेरायल ?

भाषण आँगल, भोजन आँगल
पहिरब आँगल, रहब आँगल
मंडनक सुग्गा मोन बैसल
सौराठ सभा थाकल हारल

एहि घिचि-घाच, एहि राजनीति मे
कैथी-तिरहुता कत' लुटायलि ?
नहि जानि धरोहर कत' हेरायल ?

बेटा उड़ि गेल बैसल विदेश
बेटी उडंत भ' खोप तानल
मातु-पिता टग हनथि खाट पर
छोड़इ सरबन लंक पड़ायल

एहि भागम-भाग, एहि उहा-पोह मे
मनुक्खक ममता कत' मेटायल ?
नहि जानि धरोहरि कत' हेरायल ?

संपर्क :



अशोक कुमार दत्त
गोला रोड, दानापुर, पटना
मो. 09431645105

Tuesday, July 25, 2017

सृजनात्मक स्वतंत्रताक किछु पक्ष-विपक्ष

पावेल कुचिंस्कीक चित्र 
जरूरी बेसी तकर नहि जे किछु लिखल जाय, बेसी जरूरी एकर अछि जे लिखबा सँ पूर्व बहुत रास पढ़ल जाय. साहित्य जगतक विभिन्न रास कथा-उपकथादि सँ परिचय-पात बढ़ाओल जाय. देखल कि गेल अछि जे अधिकांश साहित्यसेवी मे स्वीकारोक्ति आ सेल्फ-जजमेंटक पैघ अभाव रहल अछि, जे कि  स्वयं मे बड्ड बेसी भयाओन स्थिति अछि. परिणामस्वरूप साहित्य आमलोकनिक मध्य समाजक यथार्थ रूप केँ उपस्थापित करबा मे विफल रहल अछि.  मैथिलीक समकालीन  कविता मे नीक दखल बनौनिहार 'मनोज शाण्डिल्य' एम्हर बहुत रास छिट-फुट गद्य आभासी जगत मे लिखि छोड़लनि अछि. तकर अंत कतय होएत से तँ वैह नीक जकाँ बुझा सकैत छथि, तत्काल एहिठाम ओकरा सभ केँ एहि उद्देश्य सँ प्रस्तुत कयल जा रहल अछि कि ई जग्गह नीक बातक संवाहक बनि अपन भूमिकाक संग मिसियो न्याय क' सकय- मॉडरेटर. 

मनोज शाण्डिल्य 
"सृजनात्मक स्वतंत्रताक किछु पक्ष-विपक्ष"
 - मनोज शाण्डिल्य 

                                                                   [१]  
मनुक्खक अंतर्मन मे कतेको तरहक भावना निरंतरताक संग अनवरत बहैत रहैत छैक। कलकल बहैत नदी मे बहैत जाइत असंख्य नाह जकाँ। गीत गबैत, मुस्काइत, हँसैत, हँसबैत, कनैत, कनबैत, उद्द्वेलित करैत, आक्रोशित करैत, आनंदित करैत, मलहम लगबैत कतेको रंगक मनोभाव सदिखन बहैत रहैत छैक। रचनाकार एहि सभ केँ आत्मसात करैत शब्दबद्ध करैत अछि आ अल्हड़ सन बहैत भावना केँ अमरत्व प्रदान करैत अछि। संगहि अपनहु अमर भ' जाइत अछि।
तखन अचांचके अभरैत छैक एकटा विकराल गतिरोधक। हृदयविदारक। पहाड़ जकाँ सोझा ठाढ़ भ' जाइत छैक आ रोकि लैत छैक समस्त भावनाक प्रवाहकेँ। अपन जड़ता मे सभ किछुकेँ बान्हि लैत छैक आततायी। सभ किछु रुकि जाइत छैक, सभ किछु थमकि जाइत छैक। सभ बहाव बन्न, सभ प्रवाह बन्न। मनोभावकेँ आब शब्द नहि भेंटैत छैक, अमरत्व नहि भेंटैत छैक। कते किछु जेना मरि जाइत छैक एकहि संग, एकहि ठाम। मृत्यु एकसर कहाँ अबैत छै!

आ फेर एकटा विस्फोट होइत छैक। मृत्युक एहि भयाओन प्रहार सहियो क' जे भावना सभ बचा लैत अछि स्वयं केँ, से सभ हाथ मिलबैत अछि, बाँहि पुरैत अछि, जोर लगबैत अछि, आ ध्वस्त क' दैत अछि ओहि पहाड़ सन गतिरोधक केँ। युद्धक अंत होइत छैक। प्रवाह फेर स्थापित होइत अछि। जीवन फेर कलकल बहैत नदी बनि जाइत अछि। नाह सभ फेर चलि पड़ैत अछि, गीत गबैत अछि, हँसैत अछि, हँसबैत अछि। अमरत्व मृत्यु केँ पराजित करैत अछि।

धीर हो हे मन हमर, बढ़ैत चल, ने हो विकल
मुक्तिमार्ग पर पथिक चलल तँ रोकि के सकल..

                                                                     [२]
अहाँ मैथिल छी। अहाँक एक पुत्र छथि (नहियो छथि तँ कनी कालक लेल मानि लिअ जे छथि)। ओ अहाँ केँ कहैत छथि जे ओ एखने सौराठक एक ब्राह्मण द्वारा बाजल मैथिली सुनि क' आबि रहल छथि। आ जें कि अहाँ सभ जे भाखा बजै छी तकर स्वरूप ओहि सौराठक ब्राह्मण द्वारा बाजल गेल मैथिली सँ कनी भिन्न बुझना जाइत अछि, तें आई सँ अहाँ सभक भाखाक नाम 'हुइंगजुइंग' भेल, 'मैथिली' नहि। तँ की एहन स्थिति मे अहाँ मानि लेबै जे अहाँक भाखा मैथिली नहि, हुइंगजुइंग अछि?
एहि ठाम अहाँक जे उत्तर होयत, सएह उत्तर 'अंगिका' आ 'बज्जिकाक' प्रसंग मे सेहो होयब उचित, खाहे अहाँ दड़िभंगा/मधुबनी सँ होइ आकि भागलपुर, सीतामढी, बेगूसराय, सहरसा, पूर्णिया, अररिया वा समस्तीपुर सँ।

                                                                        [३]
फेसबुक पर प्रोफाइल चालू केना तँ बहुत दिन भेल, मुदा ढंग सँ सक्रिय भेलहुँ प्रायः दिसंबर २०१४ सँ। ई प्रोफाइल चालू करबाक उद्देश्य मूलतः साहित्यिक छल। अपन रचना सभ केँ अपन समाज धरि पहुँचायब आ साहित्यिक माहौल आ सत्संग मे अपन लेखनक धार तेज करब। आ एही उद्देश्य पर चलैत तहिए सँ अनवरत किछु ने किछु अपने सभक संग साझा करैत रहलहुँ अछि। किछु पोस्ट केँ छोड़ि दी तँ बाँकी सभ साहित्यहि सँ सम्बद्ध।
करीब दू बर्ख पहिने एकटा मित्र सँ मैसेंजर पर गपसप भ' रहल छल। ओही क्रम मे मित्र कहलथि जे किछु दिन पूर्व ओ मैथिलीक कतिपय वरिष्ठ रचनाकार सभक संग कोनो कार्यक्रमक क्रम मे कतहु बैसल रहथि। ओहि अनौपचारिक बैसार मे विद्वद्जन ई दुख प्रकट कएलन्हि जे फेसबुक सन निकृष्ट मंच पर साहित्य परसल जा रहल अछि। हुनकर सभक मंतव्य रहनि जे नीको रचनाकार फेसबुक पर अपन रचना पोस्ट कय फेसबुकिया लेखक भ' जाइत अछि, अर्थात् ओहि रचनाकरकेँ गंभीरता सँ नहि लेल जा सकैत अछि। हम चुपचाप सभ सुनलहुँ आ अंठा देलहुँ।
आब कनी वस्तुस्थितिकेँ देखल जाय। मूल प्रश्न ई जे कोनो रचनाकार रचना करैत किए अछि? लिखबाक उद्देश्य की होइत छैक? एहि प्रश्नक हमर उत्तर इएह जे हम अपन जनसाधारणक हेतु लिखैत छी, आम पाठकक लेल लिखैत छी। जँ हमर लेखन हमर पाठक केँ अपन समाज आ परिवेशक लेल सकारात्मक रूप सँ किछु बिचार करबाक दिस प्रेरित क' सकय तँ हमर लेखन सफल होयत, अन्यथा नहि। आ एहि लेल हमर रचना सभकेँ पाठक तक पहुँचब परमावश्यक भ' जाइछ।
आब प्रश्न ई उठैछ जे हमर रचना सभ जनगण तक पहुँचय कोना? मैथिली मे दैनिक पत्र एकहु टा नहि। गिनल-चुनल द्वैमासिक/त्रैमासिक/अनियतकालीन पत्रिका। अहू सभ मे रचनाकार अपन रचना पठओबथि तँ पहिने तँ रचना छपतनि कि नहि तकर कोनो ठीक नहि। जँ छपियो गेलनि तँ मैथिलीक पाठकीय स्थिति केँ देखैत ई कहब महाग मस्किल जे कते लोक तक पत्रिका पहुँचत। जिनका लग पहुँचबो करतनि ताहि मे सँ कए गोटा पन्ना उनटओताह, आ जे उनटयबो करताह ताहि मे सँ कए गोटा ओहि रचनाकारक रचना धरि पहुँचि सकताह। अर्थात, एहि बाटे रचनाकारक अपन पाठक धरि पहुँचब बड्ड कठिन।
तखन उपाय रहल पोथी छपा क' पाठक धरि पहुँचब। मुदा इहो कम कठिन नहि। जँ अहाँ कम-सम लिखैत छी तखन तँ कोनो तेहन बात नहि, मुदा जँ खूब लिखैत छी (जे कि कोनो गंभीर रचनाकार केँ अवश्य करबाक चाही) तखन समस्या ई जे कते पोथी छपायब? जँ छपेबो करब तँ कए टा प्रति छपा सकब? कए टा प्रति बेचि सकब? कते प्रति बिलहि सकब? मोट बात जे कते पाठक धरि अपन रचना पहुँचा सकब? हमरा जनैत एकर उत्तर कोनो खास संतोषजनक नहिए होयत।
आब फेसबुकक विकल्प (एतय ब्लॉग आ वेबसाइटकेँ सेहो गानल जा सकैछ) देखल जाय। नगण्य खर्च मे अधिकाधिक पाठक धरि रचना त्वरित रूप मे निःशुल्क पहुँचा देबाक क्षमता रखैछ ई माध्यम। आम पाठक सँ ल' क' प्रबुद्ध आलोचक धरिक प्रतिक्रिया सुलभ भ' जाइछ। जँ रचनाकार फूजल मानसिकताक होथि तँ अपन लेखन मे सुधार सेहो अपेक्षाकृत द्रुत गतिएँ आनि सकैत छथि। एकर अतिरिक्त पत्र-पत्रिका मे रचना छपयबाक आ कालक्रम मे पोथी प्रकाशित करबाक विकल्प तँ फूजल रहिते छैक, संगे इहो अंदाज लागि सकैत छैक (जँ उचित स्थान सँ मार्गदर्शन लेल जाय तँ) जे रचना सभक गुणवत्ता प्रकाशन योग्य अछि आकि एखन किछु आर साधना करबाक अछि। मूल बात ई जे रचनाकारक अपन उद्देश्य मे सफल होयबाक संभावना एहि माध्यम सँ निश्चित रूप सँ बढ़ैत छैक।
तैं, हम फेसबुकिया रचनाकार घोषित होइ आकि किछु आर, गंभीरता सँ लेल जाइ आकि नहि, यथासंभव अपन रचना सभ अन्तर्जालक माध्यम सँ अपने लोकनि धरि पहुँचओबैत रहब। बदला मे स्नेह, आशीष आ मार्गदर्शनक याचक बनल रहब। आगाँ भगवतीक कृपा रहलनि तँ पत्र-पत्रिका, पोथी-पतरा तँ होइते रहत। 

                                                                      [४]
कष्ट होइए जखन देखैत छी जे अपना केँ फेसबुकक 'सेलिब्रिटी राइटर' बुझय बला किछु स्वघोषित 'विद्वान' लोकनि मात्र सस्ता वाहवाही लुझबाक लेल किछुओ अल-बल लिखैत रहैत छथि। कष्ट वस्तुतः एहि कारणें होइत अछि जे हमर किछु युवा प्रतिभा सभ एहन स्वयंभू 'स्टार' लोकनिक जाल मे अनचोक्केे फँसि जाइत छथि आ निरंतर बर्गलायल जाइत छथि। 

                                                                       [५]
हमर ई दृढ़ मान्यता अछि जे पहिने स्थिति जे रहल हो, मुदा आब मैथिली केँ हिंदी सँ कोनो खतरा नहि छैक (जे खतरा छैक से ओहि भूतपूर्व मैथिल सँ छैक जे अपन अज्ञानतावश कहियो हिन्दीक बलात्कार कएलक आ आब अंग्रेजीक क' रहल अछि), उनटे हिंदी केँ मैथिली सहित समस्त क्षेत्रीय भाखा आ बोली सँ खतरा छैक आ तकरे ई महोदय पुष्टि क' रहल छथि।
हिंदी अछि कतय? बिहार मे बिहारी 'हिंदी', उत्तर प्रदेश मे उर्दू-अवधी-भोजपुरिया 'हिंदी', दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, कश्मीर, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र, हैदराबाद मे स्थानीय भाखाक संबल पर कोनहुना ठाढ़ 'हिंदी'। बाँकी पुबरिया आ दछिनबरिया प्रांत सभ में पूर्णतः नदारद। कनी-मनी जँ बाँचल अछि तँ से मध्यप्रदेश/छत्तीसगढ़ मे आ ओतहु किछु ने किछु 'लोकल फ्लेवर'क असरि छैके। अपन साहित्य पर दम्भ भरय बला एहि भाखा मे आइ 'नई वाली हिंदी' आ 'पुरानी वाली हिंदी'क राड़ि ठनल छै। हिंदी राष्ट्रभाषा नहि, मात्र भारत गणराज्यक राजभाषा थिक, आ सेहो थोपल, जकरा देशक बहुसंख्यक आबादी सोझे रिजेक्ट करैत अछि। आ ताहि पर सँ अंग्रेजीक आक्रमण। एना मे जँ 'हिंदी बचाओ मंच'क संयोजक केँ चिंता भ' रहल छनि तँ किम आश्चर्यम? वस्तुतः मैथिलीक बहन्ने ई महोदय समस्त भारतीय भाषा सभ पर फायर क' रहल छथि, आ सेहो खाली बंदूक सँ। की भेटतनि, अल्हुआ?
भारतक अनेक क्षेत्रीय भाषा आ बोली हिन्दीक श्रृंगारे टा नहि, प्राणवायु सेहो छैक। एकर सभक बिना हिंदीक सांस लेब असंभव। रहल बात विद्यापतिक, तँ हुनका हिंदीक पाठ्यक्रम मे घुसियओलक के? अपने ई लोकनि विद्यापतिक पयर पकड़ि मैथिली केँ हिंदीक बोली साबित करबाक दुष्प्रयास करैत रहलाह, आ जखन से नहि पार लगलनि तँ आब भारी बुझा रहल छनि। निकलबा लेथु विद्यापति केँ हिंदीक पाठ्यक्रम सँ, मैथिलीक लेल धनि सन।
हिंदी केँ लड़ाइ अवश्य लड़बाक छै, मुदा से कोनो आन भाषा सँ नहि, अपनहि जड़ता आ पूर्वाग्रह सँ। अंत मे एतबे कहब जे ई एहि कुंठाग्रस्त महोदयक व्यक्तिगत विचार मात्र छनि। विस्तृत हिंदी जगत मे मैथिलीक यथेष्ट मान-मर्यादा आ आदर-सम्मान छैक, आ से हम व्यक्तिगत रूप सँ अनुभव करैत रहैत छी। आ तहिना हमहूँ सभ हिंदीक प्रति प्रेमभाव रखैत छी, जेना अन्य कोनो भाषाक प्रति रखैत छी किएकि हम सभ ईर्ष्या मे नहि जरि रहल छी! बकौल चचा ग़ालिब:
हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को 'ग़ालिब' ये ख़याल अच्छा है


                                                                    [६]
जमाना बड़ बदलि गेल छै। सूचनाक ओवरडोज़क जमाना छै। लोक आब वैह आ ओतबे बुझैत अछि जे आ जतबे ओ बुझैत चाहैत अछि। तह तक जयबाक पलखति ककरा छैक। अहाँ किछु लिखि लिअ, भावना अहाँक किछुओ हो, लोक ओकर अर्थ अपने हिसाबे लगायत। सकारात्मकता केँ नकारात्मकता मे बदलैत क्षणहु मात्र कहाँ लगैत छै आई-काल्हि।
अस्तु, जे हो, ताहि लेल हम कि अहाँ लिखब तँ नहिए छोड़ि देब। किए छोड़ब? हम तँ एतबे बुझैत छी जे पारस्परिक स्नेह आ विश्वास ने एक दिन मे बनैत छैक आ ने एक दिन मे बिगड़बाक चाही। शंकाक स्थिति मे ' बेनिफिट ऑफ डाउट' तँ बनिते छैक

                                                                     [७]
जँ ई कही जे मैथिली लेखकक परिस्थिति बद सँ बदतर भेल जा रहल अछि, तँ कोनो अतिशयोक्ति नहि होयत। मैथिली पोथीक विक्रय संबंधी समस्या तँ ठामहि अछिए, मुदा ई समस्या एतहि तक सीमित नहि अछि।
अहाँ अपन पेट काटि क', दरमाहा मे सँ पाइ निकालि क' पोथी छपबै छी आ सम्मानवश वरिष्ठ साहित्यकार लोकनि केँ अवलोकनार्थ पठबैत छियनि। किछु लोकनि केँ छोड़ि अधिकांशतः आशीर्वचनक तँ बातहि कोन, पोथीक प्राप्ति धरिक सूचना देब अनावश्यक बुझैत छथि। आ तखन जँ अहाँ अपनहि सँ फोन कय पूछि दैत छियनि जे पोथी प्राप्त भेल कि नहि, तँ हुनका अर्थ ई लगैत छनि जे ई लेखक हमरा सँ अपन प्रशंसा मे किछु लिखेबाक लेल तगेदा क' रहल छथि आकि कोनो तरहक लाभ प्राप्त करबाक लेल अपसियांत भेल छथि।

अपन वरिष्ठ साहित्यकार सभ सँ करबद्ध निवेदन जे सभ केँ एकहि रंग मे नहि रांगि दी। प्रशंसा सभ केँ नीक लगैत छै, मुदा एखनहु किछु एहन रचनाकार जीबि रहल छथि जिनकर लेखन किनकहु अनुकम्पा पर निर्भर नहि छनि। ई लोकनि अपने सभक सम्मान करै छथि, खुशामद नहि। कृपया सम्मानक अपमान नहि कयल जाय। हिनका लोकनि केँ जे कहबाक हेतनि से साधिकार सोझा-सोझी कहताह, घुमा-फिरा क' नहि। आश्वस्त रहै जाउ जे लोभमुक्त रचनाधर्मिता औखन साँस ल' रहल अछि। आ आगुओ साँस लैत रहत।
                                                                    [८]