Wednesday, December 13, 2017

हमर अहाँक राजकमल

राजकमलक अपन एकटा कविता मे कहैत छथि : कविता हमर काँचे रहि गेल /एहि जारनि सँ उठल कहाँ धधरा। से  ई धधरा तँ उठल मुदा  राजकमल देखि नहि सकला ! जेना जेना समय बढ़ैत अछि एहि धधराक पसार बढ़िए रहल अछि। काल्हि राजकमल जयंती पर समकालीन अभिव्यक्तिक विराट मंच 'फेसबुक' एहि धधरा सँ चहुदिस प्रकाशित छल। वस्तुतः रचनाकारक दू गोट जीवन होइत छैक। ओकर दोसर जीवन तखन आरम्भ होइत छैक जखन ओ मात्र अपन रचना मे जिअब आरम्भ करैत अछि। एहि सन्दर्भ मे हम फूल बाबू केँ एखनहुँ मैथिलीक आँगन मे कतहुँ भरि मुँह पान खएने जुआन होइत देखैत छियनि। मैथिली-हिन्दीक अप्रतिम शब्दशिल्पी राजकमल अपन साहित्यिक प्रगतिशीलता ,आधुनिक चेतना तथा समाजक यथार्थवादी चित्रणक सामर्थ्य सँ एखनहुँ भोरुकबा तरेगन सन प्रेरणाक अहर्निश स्रोत बनल छथि। कृति राजकमल हुए अथवा व्यक्ति राजकमल , ई दुनू दंतकथाक एकगोट एहन संगोर अछि जाहि मे वर्जना नव वितानक संग परिभाषित होइत अछि । ई मिथिलाक एहि प्रस्तुति मे आउ पढ़ी एहि युगद्रष्टा साहित्यकारक मादे नवतुरिया सृजक  'मुकुंद मयंक'क विचार  : विकाश वत्सनाभ। 



आई दिसम्बर महिनाक तेरह तारीख अछि।  हम साल केँ दु टा दिन जल्दी नहि बिसरति छी, दिसम्बर महीनाक तेरह तारीख आ जून महिनाक उन्नीस तारीख।  बिसरल कोना जा सकैत अछि  ?  हिंदी आ मैथिली साहित्यक  सरोवर केँ "राजकमल" के  सम्बन्ध जे छनि एहि दुनू  दिन सँ।  नागार्जुन एक ठाम लिखैत छथि -

  बिम्बग्राही तुम स्वच्छ स्फटिक तुम प्रभा तरल , 
भासित जिसमे सित- असित, मलिन एंव उज्ज्वल
   तुम चर्चाओ के केन्द्रबिन्दु , तुम नित्य नवल ,

इस-उस पीढ़ी के लिए विरोधाभास प्रबल 
     बाहर छलमय, भीतर भीतर थे निश्छल , 

तुम तो थे अदभुत व्यक्ति, चौधरी राजकमल ।

राजकमल चौधरीक परिचयक  लेल यात्री जी केँ ई चारि पाँती बहुत हद तक सहायक होएत अछि राजकमल अर्थात राजकमल चौधरीराजकमल अर्थात वीर विक्रम फूल बाबू राजा मणीन्द्र नारायण मधुसूधन दास चौधरी राजकमल अर्थात मणीन्द्र राजकमल अर्थात फूल बाबू। अझुके दिन 1929 ई के राजकमल चौधरी के जन्म अपन मामागाम रामपुरमे भेल छलनि ओना हिनक पैतृक गाम मिथिलाक महिमामण्डित संस्कृतिनिष्ठ मण्डन मिश्रक गाम आ जगत जननी माँ उग्रताराक सुप्रसिद्ध पीठ महिषी छलनि । हिंदी आ मैथिली साहित्य के अपन कलम सँ समृद्ध कर' वाला राजकमल अपन व्यक्तिगत जीवन केँ कहियो समृद्ध नहि क' सकला । विवाह उपरांत राजकमल अपने अपन परिस्थिक दारुन चित्रण एकठाम 'हितोपदेश' शीर्षक कवितामे कहनहु छथि -
     
राति खन भोजन काल कहलनि सतमाय 
बाउ, बहराउ कविताक कोहबर सँ 
नौकरी-चाकरिक करू उपाय 
अहाँ असकरे नहि छी 
एकटा कन्याक हाथ छियै धएने 
नहि चलत काज 
कालिदास बाणभट्ट विद्यापति कएने 
विक्रमादित्य ,श्रीहर्ष, लखिमा ठकुराइन सभ 
भए जाउथ स्वाहा 
जाइ छी, फोलब पान-बीड़ीक दोकान दरभंगा 
टावर-चौराहा
   
क्रमशः हिंदी आ मैथिली साहित्य मे जे आधुनिकता के प्रयोगक संग संग मौलिकता सँ पूर्ण अपन समय सँ बहुत आगा के रचना जाहि तरहे राजकमल कएलनि भरिसके कतोह और भेटत । और एहि कारण राजकमल भीड़ सँ एकदम अलग साहित्यक आकाश में ध्रुव तारा जकाँ चमकैत छथि । जहिना राजकमलक कृतित्व प्रभावित करैत अछि तहिना राजकमल क'  आकर्षक व्यक्तित्व छल ।एहि बातक प्रमाण एहि सँ भेटैत अछि जे हम सभ जखन हिनक विषय मे सुनैत छी/ पढ़ैत छी तँ एतेक आकर्षित होएत छी तँ राजकमल के प्रत्यक्ष दर्शी कतेक आकर्षित होएत हेतैक एकर अनुमाने टा लगाओल जा सकैत अछि । स्वछंद प्रविर्तीक लोक, राजकमल स्वभाव सँ बहुत जिद्दी छलाह कारण कहियो भावावेशमे बाजल छलाह जे एहन पिताक (अपन पिता के मादे) मृत्यु भेला पर संस्कारो मे उपस्थिति नहि होएब आ से 10 जनवरी 1967 कँ जखन हिनक पिताक मृत्यु भेलनि तँ समाद आयला बादो अंतिम संस्कार मे शामिल नहि भेला हँ मुदा पाछा श्राद्ध कर्म कएलनि । राजकमलक मोन मे एक बेर जे भाव उत्पन्न भेल से अंत धरि बनल रहैत छल ।जँ राजकमलक रचना सभकेँ गप्प करी तँ स्वयं व्यंगसम्राट हरिमोहन झाक ई उदगार छनि जे - 
   सुकुमार काव्यकेर ताजमहल 
    प्रतिभाक पुंज हे राजकमल 
     वाणीक दिवंगत पुत्र सबल 
    अगणित मानसमे रहब बनल 
      हे अमर ! हमर शुचि राजकमल ।

तहिना मैथिली के दोसर विद्वान श्रीशजी कँ कथन  छनि -"प्रतिभाक धनिक राजकमल मैथिली साहित्यक आकाशमे प्रज्वलित धूमकेतु जकाँ अपन प्रतिभाक दाह क्षण भरिक हेतु अंकित कए विलीन भ' गेलाह"राजकमल एकहि संगे कवि, कथाकार ,समालोचक तँ छथिहे संगहि उपन्यासकार सेहो छलाह ।रामनुग्रह झा एक ठाम ठीके लिखने छथि जे ई निर्णय करब बड़ कठिन की छलाह ? कवि ,कथाकार ,उपन्यासकार,समीक्षक, वा सम्पादक । 
 राजकमल जीवते दन्तक कथा के नायक बनि गेल छलाह ,मातृहीन, घरनिकलुआ ,भृमणशील अपन ऊपर आस्था रखनाहर , तर्कवादी , घनघोर नास्तिक संगहि मनुष्य मे जतेक प्रकारक दुव्यर्सन होएत अछि ओ   सबटा हिनका मे छलनि ।

  ताहि हेतु हिनका सम्बन्ध मे किछु लिखब एतेक आसान नहि । तन्त्रनाथ झा कहैत छथिन  भुट्ट लोक जे यदि बाँहि उठा क' गाछक फुनगीपरक गोपी तोड़ चाहय तँ, ओ जेहेन उपहासक विषय हेतैक सैह स्थिती राजकमल चौधरी के विषय मे लिखबा काल हमरा होएत अछि । ओना कहलो गेल छैक - हरि अनंत हरि कथा अनन्ता । तखन एकटा गप्प और छैक जे कोनो ने कोनो गुण, विशेषता राजकमल मे एहन अवश्य छलनि जे मात्र अड़तीसे बर्षक अल्पायु मे अपन तीव्र आलोक सँ साहित्यक तिमीराच्छन्न गगन मे एहन नक्षत्र जकाँ उदभासित भेलाह जे ककरो-ककरो चिंतन मनन करबाक लेल अवश्य कए दैत अछि ।


                                                                                                                                                                     बस एतेबा कहब जे राजकमल रचना आइयो ओतबे प्रसांगिक छथि जतेक की ओहि समय मे छल होएत । आइ जखन फेसबुकक दौर मे जखन इनबॉक्स मे लोकक मोनक अन्हार उतकरबाक गप्प सामान्य भ' गेल अछि ताहि समय मे राजकमल कनिये बेसीये मोन पड़ैत छथि , ओ राजकमल जे वर्जना के भाषा सँ मुक्त  राख' चाहैत छला । जँ आइ राजकमल जीवित रहितथि तँ बस एतबे प्रश्न करितोह जे कोना एहेन व्यक्तित्व बनेलीये , कोना के एहेन कृतित्व रचलीये । मुदा कियाक अपन जिम्मेदारी सँ भगलिये ???

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मुकुंद मयंक सम्प्रति पटना रहैत छथि आ मैथिली पोथीक ऑनलाइन स्टोर 'सेप्पीमार्ट'क संचालन करैत छथि। अपन भाषा साहित्यिक आग्रही एहि नवतुरिया सृजकक रचना सभ समय समय पर प्रकाशित होइत रहैत अछि। हिनक एकगोट लघु प्रेम कथाक सहयोगी सङ्कलन 'प्रेमक टाइमलाइन' सेहो प्रकाशित भेल छनि। 

Friday, December 8, 2017

युवा रचनाशीलताक अर्थ : स्वाति शाकम्भरी

लिखब जतबे आवश्यक आ महत्वपूर्ण अछि, ततबे आवश्यक आ महत्वपूर्ण ई सेहो जे की लीखल जा रहल अछि. विषयक चयन, भावक संग शब्दक ट्रीटमेन्ट आ ओकर अरेंजमेंट एहि मे बेस महवपूर्ण जग्गह रखैत अछि. समकालीन मैथिली कविताक एकगोट सशक्त युवा स्त्री कवि स्वाति शाकम्भरी युवा रचनाशीलता पर किछु उपयोगी आ सोचबा योग्य गप्प सब राखि रहलीह अछि. पढ़ि सकी तँ स्वागत- मॉडरेटर. 


...आइ युवा साहित्यकार सदैव अपन अस्तित्वक रक्षार्थ कलम उठा साहित्यक माध्यम सँ यथार्थक अभिव्यक्ति रूढ़िवादक विरोध मे स्वर उठा रहल अछि। युवा साहित्यकार भेद सँ दूर अभेदक स्थिति मे लोक केँ देख' चाहैत अछि। ओ धर्म हो, जाति हो, लिंग हो, समाज आ देश हो सब ठाम कोनो ने कोनो परतंत्र रूढ़िताक कारणें स्वर उठेबा मे असमर्थ अछि। ताहि ठाम युवा साहित्यकार अपन साहित्यक माध्यम सँ संदेश देब' चाहैत अछि जे वर्तमान Globlisation युग मे ककरो सँ पाछाँ नहि रहि आ युगदौर मे हमहुँ सम्मिलित भ' ककरो पाछू नहि, मुँहलग्गू नहि, प्रपंचीक पेंच मे नहि पड़ि हम ओकरा जानि, परखि आ अपन विचारक प्रति सशक्त रही। ओ विचार जे हमर मानवीय मूल्य केँ ह्रास नहि क' सकय।

आजुक समय मे जे अन्हार अछि तकरा निर्विवाद रूपेँ चीरैत अर्थात तिरोहित करैत नव-नव रास्ताक खोज करैत आगू बढ़ैत रही। व्यक्तिगत साम्राज्यवादी, रूढ़िवादी वर्चस्वताक परास्त करैत व्यापक जन आन्दोलन केँ माध्यम बना एक नवआयाम धरि पहुँची जे हमर अस्तित्व केँ कायम राखि सकत। ई योजना साहित्यकारे सँ सम्भव भ' सकैत अछि। युग केँ बदलबाक शक्ति साहित्यकारे अपन साहित्यिक शस्त्र सँ क' सकैत अछि। किएक तँ मिथिलाक मैथिलीक सहज संस्कार रहल अछि। जाहि ठाम युवा केँ अन्तस मे साहित्यिकताक सरसता अन्तः सलिला त्रिवेणीक सरस्वती जकाँ अदृश्यो रहैत निःसारित अछि। रचनाधर्मिता सम्वेदनशील मानवताक पर्याय थिक आ वर्तमानो मे युवा जन एहि धर्मक निर्वहन निर्भीकताक संग क' रहल छथि।

युवा लेखन तेँ स्वतंत्र, अपरिमित, विकाररहित आ लेखनी मे भाव हेबाक चाही आ जेना हमरा सब लोकनि जनैत छी जे सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया:' एहि पंक्तिक यथार्थताक जनैत आंशिक रूप नहि पूर्ण रूप सँ छूबैत, परखैत आ अपन संस्कृति, सभ्यताक परिचय दैत रचनाक समरसता जोड़ैत नव रूप मे सृजन करबाक चाही।

आजुक वर्तमान परिवेश मे युवा वर्गक रचना विभिन्न जातिक धर्म, संस्थान आदि पर टिप्पणी करैत ओकर निर्गुणताक बखानैत आ समभाव समरसता सँ कोसों दूर जे सृजन भ' रहल अछि ओ परिणत भ' केँ 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' पर स्वतंत्र रूप सँ निर्भर करैत रचना प्रकिया केँ सही दिशा प्रदान करबाक चाही।  किछु दिन पहिने हमर समाज मे जाति-पाति, ऊँच-नीचक सम्प्रदाय शोषण आदि प्रचुर मात्रा मे व्याप्त रहए तेँ साहित्यकारक मानसिकतो एतबहि मे समटि केँ रहि जाइत रहए मुदा आजुक स्थिति एहन सन नहि । आजुक सोचनिहार कोनो विशेष मुद्दा पर नहि वैश्विक स्तर पर सोचैत अछि।

आओर हुनक रचना शीशा जकाँ पारदर्शी, दिव्य अलौकि आ विलक्षणता सँ परिपूर्ण होअए जे जीवन पथ पर चलैत चलैत निराश आ श्रांत पथिक शांति, आशा आ आश्वाशन बनि क' एक स्तम्भक रूपें कार्य करय। आ जे पढ़ए हुनका लागनि कि ई हमरे ल' विशेष रूपेँ लिखल गेल अछि। किएक तँ आजुक समय मे विश्व एक camera मे बन्द भ' गेल अछि। एहि स्थिति मे युवा लेखनक लेल एकटा नव आ गंभीर चुनौती समक्ष अछि जे ओ एहि विश्वव्यापी चेतनाक प्रति साकांक्ष आ जागृत होअए। आओर ई मात्र तीन टा शब्द सँ बान्हल अछि - मातृशक्ति, मातृभूमि आ मातृभाषा। जौं युवा एहि शब्दक गरिमा केँ बूझैत एहि पर कार्य करताह तँ हुनक लेखन मे, हुनक सोच मे आ हुनक जीवनो मे समरसता बनल रहत एवं स्वतः भविष्य स्वर्णिम दर्शित होअए लागत।

(प्रथमसः सजग कविता सांस्कृतिक विचार पत्रिका मे प्रकाशित)


Wednesday, October 18, 2017

इजोत हमर मित्र थिक, हम इजोत सँ प्रेम करैत छी : नारायणजी


"बहुत रास फूल साँझ मे फुलाइत अछि, भोर मे झरि जाइत अछि। गेनाक फूल तीन मास मे विकसित होइत अछि। नारायणजीक कवि गेना फूलक माली नहि, खाद नहि, पानि नहि। ई कवि जीवनक अनुभव केँ काव्य आ इतिहास बनबैत छथि।
अपहरण आ हत्या केँ आजीविकाक आधार बनयबाक युग अछि, तथापि बेटीक विदागरी मे आइयो समदाओन गबैत अछि। कदाचित समदाओनक धुन एलेक्ट्रिक गिटारे पर किएक ने बजाओल जाइत हो, ओ आँखि मे नोर भरि दैत अछि। बर्फ जकाँ पधिलब सिद्ध करैत अछि, स्नेह छैक आ जीवनक दिवारी मे ई स्नेह इजोत केँ बचओने छैक। कुण्ठा रहित ई इजोत मैथिली कविता केँ भारतीय भाषा मे उच्चासन देने अछि। नारायणजी एहि भाषाक प्रतिनिधि कवि छथि। हिनक प्रत्येक रचना आश्चर्यजनक अछि आ उल्लसित करैत अछि" : जीवकान्त
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 प्रस्तुत अछि हिनक तीन गोट कविता। क्रमशः हम इजोत सँ प्रेम करैत छी, चौमुख दीप आ प्रकाश लेल नहि। 
पढ़ल जाय।


हम इजोत सँ प्रेम करैत छी

हम इजोत सँ प्रेम करैत छी 

हमरा घृणा नहि अछि 
कोनो तरहक 
अन्हार सँ 
बिजली फेल भेला सँ 
तत्काल हमरा कोठली मे पसरी जाइत अछि 
छेकि लेत अछि घरक कोन -सान्हि 
हमरा लेल ईर्ष्याक पात्र 
हमर दुश्मन नहि थिक 
हमरा समक्ष 
अपन अनिवार्यता जनबैत 
बहस लेल अपन तर्क रखैत अछि 
हँसैत अछि हमर विवशता पर 

बच्चा खरकैत अछि दियासलाई 

स्वर कण मे पड़ैत रहैत अछि 
एकता व्यापक स्मृति 
अनैत अछि जरैत लालटेन 
हमरा कोठली मे 
इजोत नाच' लगैत अछि 

अन्हार हमर दुश्मन नहि थिक 

इजोत हमर मित्र अछि 
हम इजोत सँ प्रेम करैत छी 
***
१९९१ 
चौमुख दीप 




(१)
सपना 
निन्न सँ जगैत अछि
अँगनाक अढ़ाइ हाथ नाम-चाकर हिया 
तीर्थ बनि जाइत अछि 
हाथक तरल स्पर्श पाबि 
मान-सुख मे.... 

पसरैत अछि ठांओ पर आकाश 
चन्दा नहु-नहु उगैत छथि 
नहु-नहु अबैत छथि सँझा 
अबैत छथि गंगा 
स्वर्ग सँ 
अदृश्य हिलकोर संग 
कलस मे बैसि जाइत छथि 
पृथ्वीक मस्तक पर 

पृथ्वी 
से आइ नहि बनलि छथि 
अपन छाती पर उघैत 
पहाड़ आ जंगल 
बर्खा-बिहाड़ि 
खाल-खाल बहैत धार, जल सँ.... 

कहाँ बनल अछि जल आइ 
पृथ्वीक गर्भ मे घुरि अबैत बेर-बेर 
पाथर सँ छिटकैत 
बहैत हमर भूख मे 
हरियर-हरियर गाछ सभक शिरा मे 

आत्मा मे जकर 
असंख्य चिड़ैक प्रेमालाप अछि 
आ एकटा डेरबुक प्रेत अछि 
घनघोर रातियो मे हारैत अछि 
निफाह आकाश तर 
आ तकरा पराजित क' पल्ल्वित होइत अछि 
कतेको दिनुका प्रतीक्षाक बाद 
गाछ से 
आइ नहि बनल अछि 
पृथ्वी आ जल आ आम्र -पल्लव 
सम्पूर्ण श्रद्धा सँ पूजनक बाद 
ओहि पर जरि रहल अछि, आइ 
चौमुख दीप 

(२)

हमरा सँ  दूर छथि सूर्य 
चन्दा आ तरेगण 
हम नहि बनाओल अछि 

हमरा सँ परोक्ष 
जत' हम नहि छी 
अपन असीम धारक क्षमता संग छथि 
अनन्त सम्भावनाक जोगओने 
पृथ्वी 
हमर तरवा तर छथि 
हम नहि बनाओल अछि 

जल, हम नहि बनाओल अछि 
जाहि मे हम डूबि जाइत छी आकंठ 
लाख चेष्टा कयलो पर उबरि नहि पाबैत छी 
कखनहुँ विकल पूजित छी इंद्रा केँ 
अपन देहक ओहि अवयव सँ कयने रसपान 

जे रहैत अछि अन्हार मे विवश 
पल्लवित करैत अछि एकेक शिखा केँ 
जाहि मे नहियो किछु तँ एकटा लुक्खीक जगरना 
आ कुमारि कन्याक तृष्णा रहैत अछि 
गाछ से हम नहि बनाओल अछि 
पृथ्वी आ जल आ आम्र -पल्लव 
ओकरे आधार तल पर 
मैना जरोओलनि अछि 
हम जराओल अछि 
चौमुख दीप 

(३)

हमरा बुझल नहि अछि 
कहिया जरल ई पहिल बेर ?
सन सोलह सालक अकाल जे देखने रहथि 
मानैत छथि -
हुनका जन्मो सँ पहिने जरैत छल 
बियालीस ईस्वीक मूवमेंट 
आ गणतंत्र दिवसक बसात सिहकल नहि जत'
जरैत रहल ओहूठाम 

जरैत अछि 
आकाश सँ अगिन-बर्खा नहि होइक 
पृथ्वी डूबि नहि जाय महाप्रलय मे....

जरैत अछि 
विपदाक बाद 
विपदाक सागर मे 
जरैत अछि 
अन्न सँ भरल आगत रितुक महोखा मे 

हम देखल अछि 
जरैत अछि कांच माटिक चौमुख दीप 
तखन संपूर्ण पृथ्वी 
आ पृथ्वीक सभटा जल आ गाछ 
नाच' लगैत अछि 
ओकर कपैत इजोत धरि आबि, उमंग मे 
*** 
१९९९ 

प्रकाश लेल नहि 


अन्हार अछि
रातुक अन्हार
गाछक अन्हार

गाछक गुमकी
आ औल अछि

गुमारक मास मे
बदलैत मौसम संग बदलल
गाछक

गाछ तर सँ बहरा'
इजोरिया मे आबि जाइत छी

प्रकाश लेल नहि
प्रकाश मे ताक'
जयबाक रस्ता


संपर्क :


नारायण जी 

घोघरडीहा, मधुबनी- 847402 
मोबाइल : 9431836445