हम इजोत सँ प्रेम करैत छी

नारायणजी | क्लिक : सत्यम कु. झा

बहुत रास फूल साँझ मे फुलाइत अछि, भोर मे झरि जाइत अछि। गेनाक फूल तीन मास मे विकसित होइत अछि। नारायणजीक कवि गेना फूलक माली नहि, खाद नहि, पानि नहि। ई कवि जीवनक अनुभव केँ काव्य आ इतिहास बनबैत छथि।
अपहरण आ हत्या केँ आजीविकाक आधार बनयबाक युग अछि, तथापि बेटीक विदागरी मे आइयो समदाओन गबैत अछि। कदाचित समदाओनक धुन एलेक्ट्रिक गिटारे पर किएक ने बजाओल जाइत हो, ओ आँखि मे नोर भरि दैत अछि। बर्फ जकाँ पधिलब सिद्ध करैत अछि, स्नेह छैक आ जीवनक दिवारी मे ई स्नेह इजोत केँ बचओने छैक। कुण्ठा रहित ई इजोत मैथिली कविता केँ भारतीय भाषा मे उच्चासन देने अछि। नारायणजी एहि भाषाक प्रतिनिधि कवि छथि। हिनक प्रत्येक रचना आश्चर्यजनक अछि आ उल्लसित करैत अछि : जीवकान्त

नारायण जीक तीन गोट कविता


1). हम इजोत सँ प्रेम करैत छी

हम इजोत सँ प्रेम करैत छी 
हमरा घृणा नहि अछि 
कोनो तरहक 
अन्हार सँ 
बिजली फेल भेला सँ 
तत्काल हमरा कोठली मे पसरी जाइत अछि 
छेकि लेत अछि घरक कोन -सान्हि 
हमरा लेल ईर्ष्याक पात्र 
हमर दुश्मन नहि थिक 
हमरा समक्ष 
अपन अनिवार्यता जनबैत 
बहस लेल अपन तर्क रखैत अछि 
हँसैत अछि हमर विवशता पर 

बच्चा खरकैत अछि दियासलाई 
स्वर कण मे पड़ैत रहैत अछि 
एकता व्यापक स्मृति 
अनैत अछि जरैत लालटेन 
हमरा कोठली मे 
इजोत नाच' लगैत अछि 

अन्हार हमर दुश्मन नहि थिक 
इजोत हमर मित्र अछि 
हम इजोत सँ प्रेम करैत छी 

2). चौमुख दीप 

१)
सपना 
निन्न सँ जगैत अछि
अँगनाक अढ़ाइ हाथ नाम-चाकर हिया 
तीर्थ बनि जाइत अछि 
हाथक तरल स्पर्श पाबि 
मान-सुख मे.... 

पसरैत अछि ठांओ पर आकाश 
चन्दा नहु-नहु उगैत छथि 
नहु-नहु अबैत छथि सँझा 
अबैत छथि गंगा 
स्वर्ग सँ 
अदृश्य हिलकोर संग 
कलस मे बैसि जाइत छथि 
पृथ्वीक मस्तक पर 

पृथ्वी 
से आइ नहि बनलि छथि 
अपन छाती पर उघैत 
पहाड़ आ जंगल 
बर्खा-बिहाड़ि 
खाल-खाल बहैत धार, जल सँ.... 

कहाँ बनल अछि जल आइ 
पृथ्वीक गर्भ मे घुरि अबैत बेर-बेर 
पाथर सँ छिटकैत 
बहैत हमर भूख मे 
हरियर-हरियर गाछ सभक शिरा मे 

आत्मा मे जकर 
असंख्य चिड़ैक प्रेमालाप अछि 
आ एकटा डेरबुक प्रेत अछि 
घनघोर रातियो मे हारैत अछि 
निफाह आकाश तर 
आ तकरा पराजित क' पल्ल्वित होइत अछि 
कतेको दिनुका प्रतीक्षाक बाद 
गाछ से 
आइ नहि बनल अछि 
पृथ्वी आ जल आ आम्र -पल्लव 
सम्पूर्ण श्रद्धा सँ पूजनक बाद 
ओहि पर जरि रहल अछि, आइ 
चौमुख दीप 

२)
हमरा सँ  दूर छथि सूर्य 
चन्दा आ तरेगण 
हम नहि बनाओल अछि 

हमरा सँ परोक्ष 
जत' हम नहि छी 
अपन असीम धारक क्षमता संग छथि 
अनन्त सम्भावनाक जोगओने 
पृथ्वी 
हमर तरवा तर छथि 
हम नहि बनाओल अछि 

जल, हम नहि बनाओल अछि 
जाहि मे हम डूबि जाइत छी आकंठ 
लाख चेष्टा कयलो पर उबरि नहि पाबैत छी 
कखनहुँ विकल पूजित छी इंद्रा केँ 
अपन देहक ओहि अवयव सँ कयने रसपान 

जे रहैत अछि अन्हार मे विवश 
पल्लवित करैत अछि एकेक शिखा केँ 
जाहि मे नहियो किछु तँ एकटा लुक्खीक जगरना 
आ कुमारि कन्याक तृष्णा रहैत अछि 
गाछ से हम नहि बनाओल अछि 
पृथ्वी आ जल आ आम्र -पल्लव 
ओकरे आधार तल पर 
मैना जरोओलनि अछि 
हम जराओल अछि 
चौमुख दीप 

३)
हमरा बुझल नहि अछि 
कहिया जरल ई पहिल बेर ?
सन सोलह सालक अकाल जे देखने रहथि 
मानैत छथि -
हुनका जन्मो सँ पहिने जरैत छल 
बियालीस ईस्वीक मूवमेंट 
आ गणतंत्र दिवसक बसात सिहकल नहि जत'
जरैत रहल ओहूठाम 

जरैत अछि 
आकाश सँ अगिन-बर्खा नहि होइक 
पृथ्वी डूबि नहि जाय महाप्रलय मे....

जरैत अछि 
विपदाक बाद 
विपदाक सागर मे 
जरैत अछि 
अन्न सँ भरल आगत रितुक महोखा मे 

हम देखल अछि 
जरैत अछि कांच माटिक चौमुख दीप 
तखन संपूर्ण पृथ्वी 
आ पृथ्वीक सभटा जल आ गाछ 
नाच' लगैत अछि 
ओकर कपैत इजोत धरि आबि, उमंग मे 


3). प्रकाश लेल नहि 

अन्हार अछि
रातुक अन्हार
गाछक अन्हार

गाछक गुमकी
आ औल अछि

गुमारक मास मे
बदलैत मौसम संग बदलल
गाछक

गाछ तर सँ बहरा'
इजोरिया मे आबि जाइत छी

प्रकाश लेल नहि
प्रकाश मे ताक'
जयबाक रस्ता
●●●

नारायण जी मैथिलीक समादृत कवि-कथाकार छथि। हम घर घुरि रहल छी,अंगना एकटा आग्रह थिक, धरती पर देखू, चित्र, जल - धरतीक अनुराग मे बसैत अछि आदि हिनक प्रमुख कृति छनि। एकरा अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिका मे रचना प्रकाशित- प्रशंसित। 
हम इजोत सँ प्रेम करैत छी हम इजोत सँ प्रेम करैत छी Reviewed by बालमुकुन्द on October 18, 2017 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.