Tuesday, April 11, 2017

'जेनरेशन गैप' केँ खपैत डेग :अकानल डेग

'जेनरेशन गैप' केँ खपैत डेग :अकानल डेग

-विकाश वत्सनाभ


अकानल डेग  एकटा संवाद अछि जाहि मे परिवर्तन केँ स्वीकार करबाक आग्रह तँ अछि मुदा से आँखि मुनने नहि अपितु सचेष्ट होइत किछु सिद्धांतक संग। ई सिद्धांत अछि अपन अतीत सँ सकारात्मक तत्व सबकेँ लए ताहि प्रवाभ केँ समेटैत समाज केँ पुनर्गठित आ चेतना सम्पन्न बनेबाक आग्रह। पुनर्जागरणक बाद मिथिला पर एहि पुनरोत्थानवादी प्रवित्ति जकर जड़ि मे अपन माटि-पानिक अजस्रता छैक तकर विशेष प्रभाव पड़लै। कवि एहि प्रभाव सँ सरिपहुँ प्रभावित छथि। कवि मे पुरातन आ नूतन मनोभावक तेहन मिझराएल अनुभूति छनि जे ओ मडुआ गुमाएब तँ जनैते छथि सङ्गे आलोपित होइत एहि फसिल केँ छवि फेसबुक पर परसैत नवतुरिया केँ अपन माटि-पानिक सुवास सँ सेहो परिचय करबैत छथि।



'हम छी नेआय' अमुक स्वीकारोक्ति सँ उठाओल गेल डेग 'अकानल डेग' होएबाक क्रम मे कुल एक सए छओ डेगक यात्रा तय करैत अछि। एहि संपूर्ण यात्राक अवधि रहल अछि मात्र एक बरख (मई२०१५-मई२०१६)। सृजनताक बाट पर एतेक झटकारि चलब लिक सँ इतर होएबाक प्रबल संभावना उत्पन्न करैत छैक। मुदा, जखन उठाओल एकहेक टा डेग अपन तत्परता आ सम्हार सँ उपस्थितिक निस्सन आभास करबैत हुए तखन ई सृजन यात्राक एकगोट महत्पूर्ण उपलब्धि कहल जा सकैत अछि। एहि एक सए छओ डेगक समवेत स्वर 'अकानल डेग' ओही उप्लब्धिक गबाही अछि।
ई ओहि लगन आ कर्मनिष्ठताक गबाही सेहो अछि जे मात्र एक बरखक भीतर साहित्यक फुलवारी मे कोढ़ी सँ भकराड़ होइत अपन सार्थक उपस्थितिक सद्यः भान करबैत अछि।
एहि डेग सभ सँ एकनिष्ट होएबाक क्रम मे पद्यक एकाधिक विधा सँ परिचय होइत अछि। एहि परिचय मे विविधता छैक। कथ्यक विविधता ,भावक विविधता ,कालखण्डक विविधता। एहि मे विषय-वस्तु केर ट्रीटमेंट एना जेना बहुत रास रोगक निदानक लेल एकगोट 'कॉम्पेक्ट एंटीबायोटिक' | एहि एकनिष्टताक क्रम मे कखन अहाँ मे प्रतिवादक स्वर मुखर होएत, कखन अहाँ मे अपन जड़ि दिस देखबाक प्रवृत्ति अनायास प्रस्फुटित होएत,कखन अहाँ राजनितिक प्रपंच सँ अवगत होएब, कखन दलित किंवा नारी विमर्श अहाँक प्रगतिशील चेतना केँ पाँखि देत, कखन अहाँक स्मृति मे जोगाओल हास्य सद्यः मुखर होएत तेकर अँटकर कठिन अछि। इएह विविधता संग्रह केँ पठनीय बनबैत अछि।
अकानल डेग केँ पढ़ब एखनुका समय मे द्रुत गतिए बदलैत समाज मे पनुघल 'जेनरेशन गैप' सँ तारतम्य स्थापित करब अछि।
एहि सँ उपजल परिवेश केँ बुझबाक एकगोट उपक्रम अछि। ई एकटा संवाद प्रक्रिया अछि जाहि मे परिवर्तन केँ स्वीकार करबाक आग्रह तँ अछि मुदा से आँखि मुनने नहि अपितु सचेष्ट होइत किछु सिद्धांतक संग। ई सिद्धांत अछि अपन अतीत सँ सकारात्मक तत्व सबकेँ लए ताहि प्रवाभ केँ समेटैत समाज केँ पुनर्गठित आ चेतना सम्पन्न बनेबाक आग्रह। पुनर्जागरणक बाद मिथिला पर एहि पुनरोत्थानवादी प्रवित्ति जकर जड़ि मे अपन माटि-पानिक अजस्रता छैक तकर विशेष प्रभाव पड़लै। कवि एहि प्रभाव सँ सरिपहुँ प्रभावित छथि। कवि मे पुरातन आ नूतन मनोभावक तेहन मिझराएल अनुभूति छनि जे ओ मडुआ गुमाएब तँ जनैते छथि सङ्गे आलोपित होइत एहि फसिल केँ छवि फेसबुक पर परसैत नवतुरिया केँ अपन माटि-पानिक सुवास सँ सेहो परिचय करबैत छथि।
ई जे व्यतिगत जिनगीक एकटा विराट अनुभव, परिवर्तनक स्वरबोध आ अतीतक उत्स केँ जोगेबाक त्रिवेणी बहराइत अछि से कविताक क्रम मे एकाकार होइत 'अकानल डेग' नामक संगम मे समावेषित भए जाइत अछि।
योजन भरि योजना बनैत छैक।अनुमोदन होइत छैक। मुदा 'माधव हम परिणाम निराशा'। एहि निराशा मे भविष्यक अन्हार छैक, सरकारी विफलता सद्यः वर्तमान छैक। एहि सँ उपजैत भविष्यक परिदृश्य केर आगम केँ सम्बोधित करैत 'हे यौ' कविता शीर्षक मे कवि कहैत छथि- भस्मासुर भेल आइ,जकरे बलिदान देल/जीविका देल अहाँ/बिनु चालने,बिनु छनने/पीढ़ी दर पीढ़ी केर,भविष्यहुँ धसान भेल। बिसुखैत सामाजिक चेतना आ परस्पर घटैत आपकता कवि केँ व्याकुल करैत छनि। वैश्वीकरण नवीन परिवेश ,संकुचित होइत ग्रामोद्योग आ ताहि सँ ग्रामीण स्तर पर उत्पन्न रोजगारक समस्या सं कवि चिंतित छथि। समाज मे पसरल कुरीति,राजनितिक शिथिलता सन अनन्य विषय केँ आत्मसात करैत कवि एहि संशय मे छथि जे की लिखबाक चाही ? अपन हृदयक एहि दरेग केँ ‘की लिखू’ शीर्षक कविता मे सम्प्रेषित करैत लिखैत छथि :-
लिंगभेद आ कन्या-भ्रूणहत्या भयावह
बलात्कार,काटर,दहेजदानव पराभव
बजार मे उघरैत चीर,तेज़ाब ढारल शरीर
लागल नपुंसकक भीड़ ,सुन्न संवेदन पीड़।
की लिखू ?
एतेक लिखलाक बादो जखन आत्मावलोकन करैत छथि कविक संवेदना बृहद रूप लेब लगैत अछि। ओ परिवेश आ समाजक ओहि समस्त चेतना केँ अकानबाक यत्न करैत छथि जे एहि सभ कुरुति आ अमानवीय तत्व सँ विरोधक संवाद करैत छथि। एहि प्रश्न सबहक उतारा दैत कवि केँ बहुत रास प्रश्न अनुत्तरित सेहो भेटैत छनि। एही क्रम मे अनचोके एकगोट आओर दुरूह प्रश्न सँ प्रत्यक्ष होइत छथि से ‘अनुत्तरित प्रश्न’ कविता शीर्षक मे लिखैत छथि :
मुदा हम ओझराएल छी
सात बरखक पोतीक प्रश्न मे
जे आइ भोरे भोर अनचोक्के पुछलक
'बाबा! जाति की होइत छै '?

कवि आत्म-कथ्य मे अपन वृत्ति केँ भले शुष्क कर्म कहैत होथि मुदा कविता मे सरिपहुँ सरस भेटैत छथि। मोन पड़ैत अछि अलबर्ट आइंसटाइनक एक उक्ति जे :Pure mathematics is, in its way, the poetry of logical ideas. कमरस सन नीरस विषय पढ़ैत एतेक रसक कविता लिखब तें संभव। जँ नारी केँ दाढ़ी होइतइ, पुरुखोक देह जँ भारी होइतइ, पोथीपर हावी थोथी ,पोथी आ थोथी कविता शीर्षक सभ मे कवि व्यंगक पराकाष्ठा छुबैत छथि। पढ़ैत काल स्नेहातिरेकक नैसर्गिक अनुभूति होइत अछि। एहूँ सभ सँ विशेष जे एहि कविता सभ मे व्यंग पूर्ण लॉजिकक संग अबैत अछि। जँ नारी केँ दाढ़ी होइतइ शीर्षक कविताक किछु पाँती :
केहन समस्या भारी होइतइ,जँ नारीके दाढ़ी होइतइ।
अकल सँ रहितइ तेज मुदा,सकल सरदारसँ गाढ़ी रहितइ
गाल रहैत गुलजार दाढ़सँ चतरल,साग गेनहारी होइतइ
केहन समस्या भारी होइतइ,जँ नारीके दाढ़ी होइतइ। 
जेठ मे हेठ बदरिया ,फगुआ अगुआ बनि के आउ, माँछ भात -पाँच हाथ ,वसंत वेदन आ आकुल मोन कविता सभ पारम्परिक पृष्टभूमिक कविता थिक। कवि केँ 'Back to root' होएबाक प्रवृत्ति विशेष आह्लादित करैत अछि। नवतुरिया केँ विषयक बोध करबैत अछि। प्रवासी केँ नॉस्टैल्जिक करैत अछि। अपन प्रयास मे कविता सभ पूर्ण सफल होइत अछि। माँछ भात ,पाँच भात कविता शीर्षक किछु पाँति एहिठाम देखल जाए सकैत अछि :
उष्ण भात पर मीन रहै, ताहू पर जौ पीन रहै
जंबीरी नेबोक संग हो, राजा मन ,नै दीन रहै
मिथिला केर सभजन बुझू जे ,माँछ -मासु सौखीन रहै
दुनू तबला -डुग्गी बनि कए,ताक धिना -धिन धीन रहै।

अकानल डेग मे संकलित कविता सभक जे पक्ष सबसँ बेसी प्रभावित करैत अछि ओ अछि कविता सभ मे निहित समयक बोध। साल भरिक कविता दस्तावेज बनि सोझा अबैत अछि। तेँ एहि कविता सभ केँ पढ़ब अपन संस्कृति ,समाज ,परिवेश आदि सँ प्रत्यक्ष होएब सन लगैत अछि। बिसरायल शब्द सबहक समुचित प्रयोग,बूढ़-पुरानक मुहे सुनल लोकोक्ति आदि केँ समावेश आ पुरान शिल्पक नवीन ट्रीटमेंट कविता सभ केँ बेस मनलग्गू बनबैत अछि। पाठक एहि सँ कनेक्ट भए पबैत अछि। संप्रेषणीयताक समस्या नहि छैक किएक तँ कवि यूटोपिया नहि वास्तविक परिवेश मे उठैत-बैसैत छथि।
कविता सभ मे ई जे लोकसरोकारी तत्व अछि से कविताक प्राण कहल जा सकैत अछि आ एकर प्राणप्रतिष्ठा मे कवि खूबे सफल भेल छथि।
जेना की पहिनहुँ संकेत कएने छलहुँ श्री झाक सृजनता केँ कोनो विचारधारा विशेषक अएना सँ देखब समीचीन नहि होएत। हिनक रचना कर्मक विविधता सँ प्रत्यक्ष होएबाक लेल 'वादक' परित्याग करब सएह यथेष्ट। हिनक कविता मे एकटा साकांक्ष मनोभावक बृहद विमर्शक संग अपन माटि-पानि सँ विमुख होइत लोकक प्रति चिंता छनि। जाहि सँ कविता सभ मे लोक जीवनक प्रभाव गहींर होइत अभरैत अछि। अहुना कविता अथवा कोनो आन सृजन अपन परिवेश तथा ताहि मे निहित सरोकार सँ विमुख भए विशेष दिन नहि खेप सकैत अछि। एहन मे अकानल डेगक कविता सभ मे बिहुँसैत गमैया शब्द, विधि-व्यवहार,पाबनि-तिहार आ लोकाव्यव्हारक सार्थक उपस्थितिक संगे एखुनका समयक अतिरेक सँ दग्ध संस्कृतिक अपरूप जाहि रुपे मुखर होइत अछि से रचना केँ स्मृति मे जोगौने ओहि पर चिंतन करबाक लेल पर्याप्त अछि।
श्री झाक एहि ईमानदार प्रयास केँ (कविता चयनक क्रम मे सम्पूर्ण लेखन प्रक्रिया सँ पाठक केँ अवगत करेबाक हेतु जे प्रतिनिधि रचना नहियो छल तकरो संकलन मे स्थान देल गेल अछि) मैथिली साहित्यक निस्सन डेग कहैत पोथीक मादे प्रतिष्ठामूलक भाव उठैत देखैत छी। हिनक ई पहिलुक मुदा समधानल डेग अवश्य अकानल जएबाक चाही।दोसर पोथीक प्रतीक्षाक संग अकास भरि शुभेक्छा ।



पोथी - अकानल डेग ,कवि -अमरनाथ झा 'अमर'
प्रकाशन -मैलोरंग, मूल्य -२०० टाका /- 
समीक्षा- विकाश वत्सनाभ

3 comments:

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    अहि लिंक पर किताब खरीदल जा सकैया !

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