मनोज शांडिल्यक लघुकथा 'अछओँ'

भूख मनुखकेँ किछु करबाक लेल विवश क' दैत छैक. भूक्खल मनुख ई नै देखैत छैक की ओ जे क' रहल छैक ओ ठीक छैक वा अदलाह ? ओकरा इहो नै भाँज रहैत छैक जे लोक-वेद ओकरा देखि-देखि की सौचैत छैक ? सुरूजक छाहरि मे काव्य संग्रहसँ लाइटमे आयल सशक्त कवि मनोज शांडिल्य भूखकेँ केन्द्रमे राखि एकटा मार्मिक लघुकथा लिखलनिए, पढ़ि क' कहू -माॅडरेटर.
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अछओँ

सड़कक कात बला लाइन होटलक बाहर सभ दिन दुपहरिया आ राति मे ठाढ़ भ' जाइत छल छौंड़ा आ टुकुर-टुकुर गहिंकी सभके भोजन करैत देखैत रहैत छल। किछु काल अहिना देखैत-देखैत ओतय सँ चलि जाइत छल।

होटलक मालिक ई खेल सभ दिन देखैत छल। शंका होइत छलै जे छौंड़ा चोरि करबाक ब्योंत क' रहल अछि। फेर किछु बिचारि क' बिचार बदलि लैत छल।मुदा ओहि दिन नहि रहल गेलै। थाना फोन कइए देलकै।
हवलदार किछु पुछबा सँ पहिने छौंड़ा केँ लतियाब' आ थपड़ियाब' के औपचारिकता पूरा केलक। तकर बाद पुछलकै " चोरि करय अबैत छैं?"

छौंड़ाक ठोर सँ सोनित खसैत रहै, मुदा ओकरा लेल धनि सन। भावहीन स्वर मे कहलकै, " नहि बाबू, चोरि करय नहि अबैत छी'।

"हँ रौ, बड़का धर्मात्मा छैं! चोरि करय नहि, एतय प्रवचन सुनय अबैत छैं।सच बाज नहि तँ एक-एक टा हाड़ झाड़ि देबौ!", हवलदार चाहक चुस्की लैत गजरल।

छौंड़ा ओहिना भावहीन छल।बाजल, सत्ते कहैत छी बाबू। चोरि करय नहि अबैत छी।भूख लगैत अछि तँ अबैत छी।किछु काल तक एतेक लोक केँ खाइत देखैत आ तरह-तरह के भोजन सभ देखैत मोन अछओँ भ' जाइत अछि। भूख मरि जाइत अछि।तैं ठाढ़ रहैत छी।चोरि करय नहि अबैए। अबितय तँ जहल जैतहुँ। ओतय कहाँदन खाय लेल भेटैत छै। लेने चलब?"

हवलदार के सेहो अछओँ भ' गेल रहै।आई ई चारिम केस रहैक। एहन सभ केस मे ओकरे पठा दैत छै। होटलक मालिककेँ गरियबैत मोटरसाइकिल स्टार्ट केलक आ बिदा भेल।

छौंड़ाक भूख एखन जिबिते रहैक। पुनः खेनिहार सभ दिस ताकय लागल।

रचनाकार संपर्क:
मनोज शांडिल्य
इमेल: manoj.jha.in@gmail.com
फोन :09866077693
मनोज शांडिल्यक लघुकथा 'अछओँ' मनोज शांडिल्यक लघुकथा 'अछओँ' Reviewed by बालमुकुन्द on June 07, 2015 Rating: 5

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