Sunday, June 14, 2015

नवल कविक नूतन काव्य धारा : "धरतीसँ अकास धरि"

चंदन कुमार झाक पोथी 'धरतीसँ अकासधरि' प्रकाशित भेला आइ लगभग दू साल भ' गेल मुदा ई पोथी आब लाइटमे आबि रहल अछि. पछिला तीन मासमे एहि  पोथीक चर्च विभिन्न पत्रिका सभमे देखलहुँए, सोशल मीडिया पर सेहो एहि काव्य संग्रह पर चर्च होएत देखैत रहलहुँए. आइ एहि ठाम शिव कुमार झा'टिल्लू' द्वारा कयल समीक्षा साझा क' रहल छी, समीक्षा किछु पुरान जरूर छैक मुदा अपनेक निराश नै करत -माॅडरेटर.
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धरतीसँ अकास धरि तरुण कवि चन्दन कुमार झा क ७० ( सत्तरि ) गोट काव्यक संकलन थिक जे सन २०१३ मे प्रकाश मे आयल.एकर पाठकीय
सन्दर्भक विषय मे किछु विशेष कहब शीघ्रता होयत मुदा काव्य लोचक गहन विमोचनक पश्चात ई अवश्य प्रतीत भ' रहल जे कांच
कवि चन्दन विद्यापतिक प्रगीतवाद, भुवनक अनुनयवाद राजकमलक प्रयोगवाद, किसुनजीक नवकवितावाद, अमर जीक सहज प्रगतिवाद ,
मायानन्द मिश्रक अभिव्यंजनावाद आ नचिकेताक नवचेतनावादक खुटेसल सँ उन्मुक्त भ' छाहरिवादक एकटा नव-किंचन प्रयास कयलनि .
एहि प्रयास मे कवि अंशतः सफल सेहो भ' रहल छथि.
एहि संकलन मे नव-छायावादक रहस्य सँ भरल अतुकांत उन्मुक्त छंद नव रूपेँ देख' मे आयल .ई सहज सामाजिक व्यवस्था पर कतेक अविरल
दृष्टांत प्रस्तुत कयलक एकरा त' भविष्यक गर्त मे मानल जाय मुदा एतेक त' निश्चित कहल जा सकैछ अछि जे रामलोचन ठाकुर जीक आमुख
मे " आंचलिकता मे विश्वस्नीयताक बानगीक" जाहि रूपेँ उल्लेख कयल गेल , ओ पोथी पढ़लाक बाद सहज लागल.
चन्दन जी चिन्तनक नव रूप ल' क' आयल छथि , चिंता आ प्रतिरोधक नहि, एहि मे प्रतिरोधक स्वर जे देखवा मे आयल ओ कविक उद्विग्नता मात्र
थिक. कविक चिंतन मे विश्वसनीयता सेहो छन्हि , कवि सदिखन बाजय चाहै छथि , कहय चाहैत छथि , चुप रहि क' अपन भाव संयोजन करब
हिनक प्रवृति नहि .भोरुकवा केँ कवि सतर्क क' रहल अछि, जे रवि ओकर अर्चिस केँ आभाहीन क' देत. कवि राहु-केतु सँ घबरा क' अपन चिंतन
केँ लोलुप नहि करत, ओ त' अपन प्रांजल काव्यक संग जीवन केँ साम-रस सँ घोरि बांछित बनब' चाहैत अछि...
जौं कदाचित अहाँ

शिव कुमार झा'टिल्लू
राहु कि केतु बनि
बनाइयो लेब हमरा अपन ग्रास
त' कनियो नहि घबराएब हम
बूझल अछि हमरा
लगले भेंटत उग्रास .....
कांच कवित्व मे एहेन सार्थक आ आशावादी दृष्टिकोण वर्तमान परिपेक्ष्य मे अपन जनभाषा मे विरले भेंटत ...ओना एक ठाम कवि क्षणहि रुष्टा क्षणहि तुष्टा :
रुष्टा तुष्टा क्षणहि क्षणहि " क सत्यता सँ ओझल नहि भ' सकल .अपन कांच वयसक लाक्षणिक विवर्त केँ कवि झाँपि नहि सकल आ ई सहज रूपेँ हिनक एकटा काव्य
रूपक "भ्रम" मे परिलक्षित भ' गेल . .
मुदा देखैत नहि छी
अपन चित्त
जे अछि कलुषित ....
प्रथम ग्रास आशावादिता तकर बाद भ्रम ..ई लेखनीक अपरिपक्वता मानल जा सकैत अछि . जौं कवि एहि कविता माध्यम सँ किछु आर कहय चाहैत होथि
तकरो स्पष्ट उल्लेख त' करब आवश्यक छल ..किएक त' अतुकांत काव्य छलनि तें एहि मे ग़ज़ल-गीत जकाँ कोनो छंद -व्याकरणक बान्ह नहि ...
तें एकर अपूर्ण छाहरिवादक लेल कवि दोषी छथि .ओना एकरा यथोचित सेहो मानल जा सकैत अछि किएक त' तरुआरिक धार सेहो शनैः शनैः निकसैत अछि
वयसक उन्मुक्त स्वभाव सँ राजकमल आ मैथिली साहित्यिक कथाकथित वर्ड्सवर्थ जीवकांत सेहो बचि नहि सकलाह त' तरुण कवि सहज स्वछन्द छथि.
वर्तमान मैथिली मे आवश्यकता अलेक्ज़ेंडर पोप सन सहज काव्य-प्रवृतिक अछि , जटिल आ बोझिल कवित्व सहज पाठक केँ भ्रमित क' सकैत अछि .
एहि संकलन मे जाहि कवित्वक प्रदर्शन कएल गेल ओ नवांकुर कवित्वक लेल अनुकरणीय सेहो मानल जाय किएक त' चन्दन मे प्रतिभाक कोनो
खगता नहि..जरुरति छन्हि त' सहज पाठक लेल सहज आखर -आखर संयोगि ओकर सहज प्रदर्शन करब.जौं एहि तरहेँ कवि अपन कवित्व केँ प्रवृत्ति सँ
बान्हि सकथि त' निश्चित रूपेँ ई मैथिली साहित्यक भविष्य भ' सकैत छथि.
" रावण त शत्रुक
ललकारा सुनितहि
रणक्षेत्र मे आबि जाइत छल
मुदा ई भीत सभ
शत्रुक आभास पबिते
हाथ पएर समेटि
घुरछी मारि देह कठुआ लैए .....
कवि क कविता मे भाव अछि , प्रवाह अछि , शब्दक भण्डार अछि तें कविता ओछ नहि लगैछ .
कवि " जरुरति " क हिसाबें " दीप" जड़ाक' भय" क "बिहाड़ि" सँ साहित्य केँ मुक्त करय चाहैत अछि .कवि आशावान अछि जे "फेर हेतैक भोर "
एहि आशा मे "कृत्रिमता" नहि ई त' कविक "मोनक बात " थिक .कविक आत्माक विलाप की सपने रहत ?...ई त' पाठक पर निर्भर करैत अछि ,
मुदा कतहु -कतहु कवि सेहो अपन प्रवीण प्रतिभाक प्रदर्शन मे चूकि गेल अछि ...
मौसी
माए नहि होइत छैक
सतमाइयो नहि होइत छैक
तखन मसियौत
कोना भ' गेल बेमात्रे
एहि कविता मे कवि की कहय चाहैत अछि ई बूझब हमरा सन सहज पाठक लेल कदाचित संभव नहि अछि ..ओना पहिलुक प्रदर्शन तें आर आश कयल जा सकैछ
किछु ऊहापोहक संग संग कविक काव्य रूपी सरिता मे बहुत रास रंगक आकर्षक जलचर सेहो अछि ..
खोता मे, आशा , मोन मे उठैत अछि प्रश्न , जीवन यात्रा , विद्रोह ,अपना अपनी आदि कविता बहुत नीक अछि , कोनो रूप सँ ई सभ काव्य कांच कविक रचना
जकाँ नहि लगैछ
ओना एहि कविक एहि संकलन मे कवित्वक सभ सँ पैघ कमी अछि जे कवि अनचोके मे अपन अतुकांत काव्य छाया सँ पाठक केँ कतहु कतहु बेसी ओझरा देलक , जौं अपन भाव केँ सोझ रूपेँ स्पष्ट प्रदर्शन करितथि त' संग्रह आर नीक होइतनि ...एना नहि करू , बंद कलम मे आदि कविता केँ छाहरि सँ बेसी घेर देलनि .
:"हे भाय कविता" त' बड्ड नीक लगैछ मुदा एहि तरहक विषय :"हे भाय' शीर्षक नाओं सँ फज़लुर रहमान हासमी जीक कविता बहुत पहिनहि आयल अछि तें एहि काव्यक अपन गुण कनेक लीपित लगैछ .
दशो -दिशि अवलोकनक बाद इएह कहल जा सकैछ जे चन्दन जी प्रतिभाशाली कवि छथि ..संभवतः कवि नचिकेताक " कवयोः वदन्ति" क बाद तरुण कविक समूह मे चन्दन कुमार झा क काव्य " धरतीसँ अकास धरि "अपन विलग स्थान राखत .शुभकामना ..


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