Monday, March 9, 2015

फगुआ मे नहि ओ रंग रहल आ नहिए ओ उमंग

चित्र साभार: विकिपीडिया 
होरी शब्द ठोरपर अबिते मोन मे एकटा फराके अनुभूति होइत अछि . होइयो कियैक नहि 'होरी' रंग आ उमंगक पर्व जे छैक .रंग-अबीरक गंध आ प्रभावे तेहन होइत छैक जे लोक ओकर संपर्क मे अबिते मातल सन रहैत अछि. आ ताहि पर सँ बहैत फगुनहटि बयार. मनुख तँ मनुख प्रकृति धरि निशां मे डूबल रहैए.  हम सेहो कोनो अपवाद नै छी ,हमरो मोन होरी मे किछु-किछु एहने सन भऽ जाइत अछि .

एम्हर पछिला चारि बर्ष सॅ पटना-दिल्ली मे होरी मे रंगायत रहल छलहुँ. किंतु एमकी  गाम मे होरी खेलबाक अवसर प्राप्त भेल .दुर्गास्थान हमर घर सँ सटले छैक,आ तकर ठीक सोंझहे  मे कालीस्थान आ मध्य विद्यालय करियन. गामक चौक सेहो एहिठाम छैक, जाहिठाम सँ  रोसड़ा- बहेड़ी लेल बस भेटैत अछि .

स्कूलपर सम्मत (होलिका दहन)'क बेस तैयारी भऽ गेल छलैक. गाम मे खूबे ढ़ैचा भेलैए एमकी. से स्कुल पर लागल सम्मत देखबा सं  बुझा पड़ैत अछि .  करीब चालीसो बोझ ढ़ैचाक ठाढ़ कयल गेल छलैक. सभ  घुरि-घुरि,  बेर-बेर सड़क दिस देख रहल छल, कि  आब भोला बाबा मंदिर सॅ कीर्तन मंडली 'शिवतट पर राम खेलै होरी ,शिवतट पर ... हो खेलै होरी , हो मचै होरी ... गबैत औताह , आ रामपिलेस सम्मत लेसताह, किंतु जाह ई की देखि रहल छी, किछु नवतुरिया सम्मत फूंकि लेने छथि. सूखल ठाढ़ ढ़ैचाक बोझ धूॅ-धूॅ कऽ जड़ि उठलै. लोक-वेद  पाछाॅ हटैत गेल . कीर्तन मंडली एखन धरि नहि  पहुॅचल. आगिक लपटि  किछु कम भेलै. पबीतर लग्गी सॅ आगि पसार' लागल. ढ़ैचा-संठी छाउर भेल जा रहल छल.  ओम्हर दू गोट छौड़ा  'जे मरद छें से आगू आ' कहैत आगि पार करबाक लेल कूदि पड़ल. मुदा ई की,  दूनु अपने मे ओझरा आगि मे खसि पड़लाह .उ तॅ भलमानस बुझियौ पबीतरा केॅ जे दूनु के बहार कयलक . रामपिलेस आब आबि रहल छल.  दूनु छौड़ा बेस झरकि गेल छलैक.  नीक बात ई, जे बाॅचल छलैक दुहू. हम ई नै बुझि सकलहुँ  जे दूनु आगि मे  जखन खसलै तखान  उठलै कियैक नहि ! बैजनथबा कहलक -  नै बुझलहो भाइजी, दुनू  (दारू) पीने छैक .जल्दीए सधुआक बोलेरो भाड़ा कऽ दूनु केॅ डाॅक्टर लग लऽ गेल गेलै . नूनू कक्का कहलनि  - गाम मे पहिलुक बेर एहन भेलैए जे किओ सम्मत मे झड़कलए . काल्हि भऽ पता चलल जे दूनु जीबैत छै।  कहाँदन मुहॅ -हाथ बेस झड़कि गेलै. 

 भोरे सुति उठि  बम-बम बाबू ओहिठाम गेलहुँ. गोर लगैत पुछलियनि - काल्हि राति कीर्तन नै भेलैक की ? ओ कहलनि - बौआ आब गाम मे  ओ लोक नै रहलै . एसगरे कियो  की करतैक. नीक लोक सब कमाय लेल बाहर चलि गेलै. किछु लफुआ सभ छै जकरा ताश, दारू आ लफुआबाजी सॅ फुरसति नै छै ...आ छैक किछु so called इज्जति बला लोक  सभ , जे घरे मे रहै छथि . कीर्तन-गोष्ठी मे भाग लेब हुनका अदलाह, हीन काज बुझाइत छनि . ई सभ कहैत हुनक ऑखि नोरा गेलनि . हमरो स्मरण भऽ उठल  जे कोना बम-बम बाबू डाढ़ मे ढ़ोलक बान्हि, भोला बाबा मंदिर सॅ शंभु पाठक, अभिलाष झा ,विनोद पासवान, मुरलीधर झा, कालीचरण  आदि-आदि संगे ढ़ोलक पर थाप दैत आबथि आ  जा धरि सम्मत जड़ैत रहै ता धरि सारा रा रा रा आ डिंग रहै होइत रहै . एखन कीर्तनिया सभक ई गीत मोन पड़ि रहल अछि.... 

"सदा आनंद रहे ओहि द्वारे,मोहन खेले होरी हो
इक ओर खेले किशन कन्हाई ,इक ओर राधा गोरी हो"

जखन भोरूका दस बजलैक.  नहा-धो उज्जरा कुर्ता पहिर हम  गाम भ्रमण लेल  निकललहुॅ . डीह टोलक ठकुरबाड़ी सॅ पंचोभैए टोल , दक्षिणबाड़ी टोल आ फेर उत्तरबाड़ी टोल . सभ दिस लोक अपना-अपना घर मे बन्न  छल सिवाए  आठ-दस वर्षक नेना सभ केँ,  वैह लोकनि कतहुँ कतहुँ  हाथ मे फुचकारी लऽ होरी खेला रहल छलैक. 

फुचकारी सँ मोन पडल. जखन पटना सँ गाम अबैत रही .  फोन पर भौजी कहलीह  जे भातिज लेल एकटा फुचकारी किनने आएब . जाहि मे पाइप सॅ सेलैंडर जुड़ल रहैत छै . स्प्रे मशीन जकाँ.  तीन दिन सॅ भातिज  एहिलेल भाभटि पसारने अछि .

एक तँ होरी ताहू मे भौजीक  आज्ञा कोना काटितहुँ, तेँ हुनक बात  मानैत सात सए मे फुचकारी कीनि लेने अयलहुँ. मुदा से  चारियो घंटा कहाँ  टिकलै ओ फुचकारी ! खैर ई प्रसंग फेर कहियो। एखन हम अपन अतीत मे हेरा गेल छलहुँ.  जे  कोना हम फुचकारी लए जिद्द पसारने रही नेनपन मे  आ बाबू , जीबू राम सॅ बाॅसक बेस हाथ भरिक फुचकारी बनबा केॅ आनि देने रहथि .  जीबूआ ततेक ने नीक ,मजगुत आ  सुन्नर बाॅसक फुचकारी बनेने  रहै जे तीन बरखि धरि हम ओहि पिचकारी सॅ होरी खेलाएत रहलहुॅ ...उ तॅ रामजपो ओकरा कान्ड़िह (गए-महींस केॅ दबाइ दै लेल एक तरहक चम्मच) बना देलकै किंतु ओ टुटलै नै .

खैर आगाँ बढलहुँ.  गामक सड़क पर  कतहुँ लोकक दरसि नहि छलैक  .ठाकुरबाड़ी ,भोला बाबा मंदिर ,हनुमान स्थान कोनो ठाम नहि .हम अपन दूनु  स्कूलिया संगी  जकरा संग कहियो  नङटे बौआइत रही , हुनक घर पर रंग खेलऽ गेलहुॅ . मुदा ओहो लोकनि  भारत-वेस्टइंडीज क्रिकेट मैच मे ओझरायल रहथि  .हम घुरि अयलहुॅ आ सोच' लगलहुँ- कतेक बदलि गेलैए गामक होरी .कहियो माय केॅ लाख बुझेलो पर हम घर सँ निपत्ता भ' जाइत रही. होरी खेलबाक लेल. उदंडपानी करबाक लेल, मित्रलोकनि संग रग्धुम्मस करबाक लेल. मुदा आब गामक होरी मे नहि  ओ रंग रहलै आ  नहिए  ओ उमंग. आ नहि  रहलै माय  हाथक ओ पुआक  स्वाद. 

मोन पड़ैत अछि पाॅच वर्ष पहिलुक कथा, जखन कुनकुनमा भंग शर्बत पिआ देने रहै आ  हम मायक बनाओल पुआ सभ  , एक-एक कऽ निघटा देने छलहुॅ . तहँ पुआ तॅ एखनो बनैत अछि गाम पर , किंतु आब नै पुआ मे ओ सुआद रहलै आ नै होरी केॅ ओ उल्लास आ उमंग. 

स्मरण भऽ रहल अछि, नेनपनक ओ होरी जखन चारू टोलक लोक ,कीर्तनिया दल पूरा गाम घुमि, चौक पर आबि ,सभ कियो मिलि केॅ गबैत रहथि. 

"खेले मसाने मे होरी दिगम्बर,खेले मसानेमे होरी
भूत पिशाच बटोरी ,दिगम्बर खेले मसाने मे होरी
लखि सुंदर फगुनी छटाकेॅ ,मन से रंग गुलाल हटा के
चिता भस्म भर झोली ,दिगम्बर खेले मसाने मे होरी "

आब बस यु-ट्युब पर पंडित छन्नू लाल मिश्रक भव्य स्व रमे ई गीत सुनि रहलहुँ अछि  आ  अपन बहसल मोन बहला रहलहुं अछि.
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बालमुकुन्द 
संपर्क: 
mukund787@gmail.com 
+91- 9934666988 
                        


3 comments:

  1. पढलाक उत्तर अतीतमे डूबि गेलहुँ।
    एक-एक शब्द वर्तमानक यथार्थ।

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  2. पढलाक उत्तर अतीतमे डूबि गेलहुँ।
    एक-एक शब्द वर्तमानक यथार्थ।

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