समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत


।। दीप नारायणक किछु कविता ।।


१). आँगन मे बिहुँसैत कनैल

आइ भोरे
जखन सुरुज अकास पर
धरैत छैक पहिल डेग...
आ पातक सोपान पर
नान्हि-नान्हि
निर्मल, गोल ओसक बुन्न धरि
नहुँ-नहुँ उतरैत छैक
सिनुरिया किरिन

आँगनक पुबरिआ कोन मे
देबाल पर बाँहि अरकौने
गाछक सभ डारि पर
सोनाक घाँटी जकाँ
लटकल बिहुँसैत देखलियैक
पीयर-पीयर कनैल

कि एकाएक
बाजि उठैत अछि
हमरा मोन मे सहस्त्रहुँ घंटी
आ घोरि दैत अछि अंतरमन मे संगीत

बसातक स्नेहास्पर्ष सिहकी सँ
डोलैत हर्षातिरेक मे कनैलक डारि
घर मे...मन मे...अंतरिक्ष मे
सौंदर्य घोरैत अछि

आम गाछक फुनगी पर बैसल कौआ सँ
बतियाइत अछि कनैल...

स्वभिमान सँ ठाढ़ अभयदान परसैत
खहरि गेल अछि हृदयक अंतस मे
बिहुँसैत कनैल...

कनैल बिहुँसैत अछि जतय आँगन मे
ओतय, जतय अकास मे उड़ैत अछि चिड़ै
शुरु होइछ अंतरिक्ष ओतहि सँ...
ओतहि सँ जीवन आ कविता सेहो।

२). हमरा एखन आर बेसी जीबाक अछि

हमरा लग एकटा पुरान किताब अछि
ओहि मे फूल अछि एकटा बड़ पुरान

सुखाए गेल अछि फूल
चोकटि कारी स्याह भ' गेलैक अछि ओकर गात-गात

किताब केँ बचौने छल फूल
आ फूल केँ किताब, परस्पर
एक-दोसरा केँ बचौने रहबाक सोन्हाउन गमक
घोरि रहल अछि
नहुँ-नहुँ जीवन मे

निरवधि समयक नुकाएल एकटा सपना
मैलमुँह पन्ना सँ उपटि
दूभिक मूड़ीपर अड़कल ओसक बुन्नीक बरोबरि
ज्योति
चुबैत अछि हमर चेतना मे
आ सभ्यताक नेहाइपर पिटाइत
हमर बासि देह मे
ब्रहाण्ड बनि पसरि जाइत अछि

जखन पघिलैत अछि इतिहास
वर्तमान मे बड़ गहीँर धरि देखाइत अछि टघार

गढ़ाइत प्रेमक अकथित व्याकरण
हमर लेखनी सँ टघरल अछि
एखन किछु शब्द...
हम दु:ख केँ बचाय केँ रखलहुँ
आ दु:ख हमरा

हम फेकब नहि सुखाएल फूल
हमरा एखन आर बेसी जीबाक अछि।

३). समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत
                                 
वर्ख दू हजार बीसक पूर्वार्ध
आ लॉकडाउनक नव सभ्यता मे साँस लैत
हम किछु दिन सँ...
दस बाइ बारह केँ एक किरायाक कोठली मे
आइसोलेट क' चुकल छी स्वयं केँ

जखन किओ एसगर होइत अछि
तँ ओ स्वयं केँ मोन पारैत अछि वा ईश्वर केँ…

समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत
एहन विचार आएल हमरा मस्तिष्क मे
हम समय केँ हैंगर पर खोंसि—
कमरा मे हेर' लगलहुँ किछु डायरी, फाइल आ किताब सभ
स्कूलक समय केँ पुरना डायरीक पजरा मे तक्खा पर राखल भेटल—

ओ हम स्वयं रही

बहुत वर्खक बाद
ई कहि सकैत छी जेँ कय बिलियन वर्ख पहिले
पृथ्वीक इतिहास केर पहिल युग सँ हमरा भीतर नुकायल हम
फरीछ भ' क' सोझा आयल अछि पहिलबेर
पहिलबेर साक्षात्कार भेल अछि हमरा सँ हमरा

ओना हम स्वयं केँ ताकय केँ प्रयास
पहिलहुँ क' चुकल छी, कय बेर
साहित्य, समाज, नोकरी, परिवार आ बन्ध-सम्बन्धक बीचि
ओझरा क' समये नहि द' सकलियै आइ धरि...

झोल-गर्दा सँ बोदा भेल हमरा देखि
हमर हाथ मे
समय रखलक हमर कान्ह पर हाथ आ
भावनाक बाढ़ि मे भसियाति हम
अतीतक स्मृति मे टूटि गेल खेलौना जकाँ उदास देखैत छी
स्वयं केँ...

कि तखने खिड़की पर उगि अबैत अछि सुरुज
आ हमर हाथ केँ ल' अपना हाथ मे सोहरबैत
नहुँये सँ हमरा कान मे कहैत अछि...
बधाइ हो !
बीत गेल बहुत किछु मे तैयो रहैछ बहुत किछु शेष
एखने भरखर आँगन मे फुलायल अछि
अपराजिताक पहिल फूल
नव दिनक संग...नवका उमंग लेल।

४). कविताक वितान मे...

हम नहि! अहूँ नहि!
एहि बातक पाछा
व्याकुल अछि
समुच्चा मानव जाति,
कौआ-चील
गाछ-वृक्ष, चुट्टी-पिपरी...
एहि फूल परहक फतिंगा सेहो
विकराल अछि ई समय
से ठीके!
हमरे लेल नहि,
कि अहीँक लेल नहि
समुच्चा पृथ्वीक लेल...

पृथ्वीक अंतिम हिचकी सँ पूर्व
नहि देखबा मे आबि रहल अछि,
एखन ओ, कल्याणकारी नीलकंठ महाराज
जे उड़ि-उड़ि क'
अबैत छल बैस' लेल
हमरा घरक सोझाँ मे
बिजलीक तार बला पोल पर,
नहि पहुँचि रहल अछि कान धरि
महादेव मंदिरक घण्टा आ आरतीक स्वर सेहो

कू...कू...जतेक बेर कहैत छलियै हम
ततेक बेर हमर कू...कूक प्रतिउत्तर मे
आम गाछक फुनगी पर सँ नित्तह
ओ कोइली अपन अवाज मिठाबय लेल
करैत रहैत छली हमरा संगे रियाज
कतय चलि गेली ओ ?
कियो नहि देखलखिन!

गाम-घर, शहर
देस-विदेस
सिकुड़ि गेल अछि सभ
'आइसोलेट' भ' चुकल छी हम
अपन घर मे, घरक एकटा कोन मे
आ दोसर कोन मे अहाँ...
नहि जानि कतेक प्रकाशवर्खक दूरी पर

धर्म-अधर्म
युद्ध-महायुद्ध
अणु-परमाणु
क्रूज-मिसाइल
वर्ण-जाति
खण्ड-पाखण्ड
ढोंग-चमत्कार
भक्ति-अंधभक्ति
वेद, पुराण,उपनिषद
गीता, रमायण, कुरान...
एतय धरि कि जासूसी उपन्यास पर्यन्त
निःशब्द अछि
फुटि नहि रहल छनि बकार
नहि सूझि रहल छनि कोनो उपाय
नहि लागि रहल छनि कोनो उक्ति

चौपेतले रही गेलैक उतरबरिया हन्नाक
पुबरिया कोन महक कोठीक कान्ह पर रक्षातंत्र

जेना पोखरिक पानि मे
ढ़ेप मारलाक बाद...
डोलय लगैत छैक अपने मुँहक छाह
तहिना डोलि रहल अछि एखन पृथ्वी
जेना बिग देलकैक अछि कियो जुमा क'
सुरुज केँ कारी समुद्रक बीच

ई मंगल वा कि चंद्रयात्रा नहि थिक
जकरा नापि लेबै रॉकेट सँ झट द'
ई चीन, अमेरिका, इटली
रूस, फ्रांस आ भारत... थिकि
ई पृथ्वी थीकि मीत
एतय दुनू पाएर मात्र साधन छैक
जकरा एखन गछेर लेने अछि निठुर समय

समय एखन बटि गेल अछि
कय गोट खेमा मे
आ ओ सभ खेमा आपस मे
क' रहल अछि वार्तालाप
तार्किक वार्तालाप !
ओहि वार्तालाप सँ भ' रहल अछि
नव-नव विचारक प्रस्फुटन
जकरा ओ सभ मौलिक कहि
विदेशी लेबुल लागल लिफाफ सँ बारह क'
पैक क' रहल अछि पॉलिथिन मे

बात जे किछु होउ मुदा,
सत्य आ बहुत कठिन वाक्य अछि...

ई समय धकिया रहल अछि हमरा सभ केँ
आ धकियबैत-धकियबैत
द' आओत पाछु, बहुत पाछु
हमरा लोकनि चलि जायब
आगू सँ पछिला शताब्दी दिस...
साँपक केँचुआ जकाँ

हमरा डर अछि!
ताहि सँ बेसी हिम्मति अछि!
ई जे अन्तिम वाक्य जे ओ कहि रहल छथि
से कोनो कवियेटा कहि सकैत छथि...

हम बचा लेबै पृथ्वी केँ अपन कविताक वितान मे
कविता केँ डर नै होइत छैक
बहुत निडर अछि!
तेँ ईश्वर जकाँ लगैत अछि कविता।

५). दार्जिलिंग यात्रा सँ...

मुँह पर सँ हेठ क' कारी ऊनी चद्दरि
गुलाबी कलस थम्हने सुरुज केँ
कञ्चनजंघाक कान्ह पर सँ
हुलकी दै सँ पहिने
जागि जाइत अछि पर्वतक रानी


नव सूर्योदयक छिटकति उजासक बीच
बदलैत बर्फक रंग केँ काछि
टाइगर हिल सँ खहरि
हैप्पी वेली टी गार्डन मे नित्तः उनटा-पुण्टा क'
सुखबैत रहैत अछि अपन घाओ

गत्र पर कय गोट चेन्ह छैक घाओ केर
कनेक गहींर धरि जा क' देखबै
एकटा वेदना जमल भेटत
हृदयक भीत पर
जे कि अपने लोक सँ भेटल छैक ओसा क'

नहि जानल गेल अछि दार्जिलिंग
पांगल गेल अछि दार्जिलिंग
नोचल गेल अछि
खोंटल गेल अछि
काटल गेल अछि छेनी-हथौड़ी सँ
ढाहल गेल अछि दार्जीलिंग

नीचा चायक बगान सँ अबैत
कपासक गेठरी उघने बेबस मेघक हेंज
एकास केर सुनाबय चाहैत अछि
माँटिक खबरि
की
एकाश स्थल मे फेर मेघक घर ढ़ाहि दैत अछि
दक्षिण सँ अबैत बसात

बसात एखने भनभनाइत गेल अछि हमरा पांजर दने
अपन अस्तित्वक यात्रा मे
ठेहुन सिकुड़ने सिनकोनाक छाह तर सुस्ताइत
पर्वतक रानी देखि रहली अछि
समय केँ टाँगल बाँसक छीप पर आ
पहाड़ पर मैदान मे
जत्र-तत्र छिड़ियायल अदखिज्जु सम्बन्ध

अटालिकाक छत पर अटकल एक अखरा चुप्पी
सिमसीमाएल सिहकीक संग
पर्यटकक लेल मीठ आह्लाद परसैत आ
नव कपल्स केर दैत खोंइछ भरि आशीष
आँखिक भीतर टघरैत
एक गोट दुनियाँ अंगेजने
चौरस्ता सँ बाहर भ'
ऑब्जवेर्टरी हिल होइत
जाइत अछि महाकालक मोख धरि
जे कि आब शिव सँ शिला भेल छथि

भारतक सभ सँ ऊँच आ विश्वक धरोहरि
घुम स्टेशन सँ टॉय ट्रेन मे घूमती काल
बेर-बेर ऐड़ी उचका क' देखय चाहैत अछि
बतासिया लूप सँ हिमालयक दरद
मिसियो भरि नहि पघिल रहल अछि

विश्वक शान्तिक लेल बनल
उज्जर दप-दप शंखमर्मर सँ
विश्व शांति स्तूप
आब कहाँ भेट रहल अछि शांति
बुद्धक शरण मे गेला सँ सेहो
जापानी मंदिर
लाल कोठी
आभा आर्ट गैलरी आ
धीरधाम मे हेरैत अछि अपन इतिहास
दार्जिलिंग

कखनो झिंसियाति बर्खा मे तीतल
वेधशाला पहाड़ी पर चढ़ि
नेपाल
भूटान
तिब्बत आ
कखनो सिक्किम दिस ताकैत अछि
दार्जिलिंग

कखनो चाय बगान
पहाड़, नद-नदी, झड़ना केखनो
मठ-मंदिर, शहर-बाजार, मॉल तँ कखनो
रॉक गार्डन
रोपवे, तेनजिंग रॉक, रॉय विला
कखनो चिड़ै-चुनमुन्नी
अकादारुन गाछ-बिरिछ आ ठाढ़ि-पात सँ
कहैत अपन आत्मकथा
कखनो चढ़ैत, कखनो खहरति
एकटा उभर-खाभर अकुलाहटिक संग
औहरि मारैत
कतय-कतय नहि
तकैत अछि दार्जिलिंग
कतेक दिन सँ दार्जिलिंग केँ

६). अर्जिनामा

मी लॉर्ड!
गीता पर हाथ राखि क' कहैत छी
हम जे कहब सुप्पत कहब—

आइ फेर अजीब तरहक
घिघिएनाइ केँ स्वर सुनायल अछि
हमरा लाइब्रेरी सँ...
फेर शब्दकोश मे
एकटा शब्द केँ गरदनि मोकि
क' देने छैक हत्या आ
कतेक भेल अछि खूने-खुनाम
तोड़ि देने छैक पैर-हाथ कतेकोक
मुह, कान, नाक, आँखि, कपार
भसकल छैक

चौक-चौराहा, बाट-घाट,
मन्दिर-मस्जिद
मॉल हो वा सिनेमाघर
रेलवे स्टेशन वा हाट-बाजार
शब्दक संग कयल जाइत अछि बलत्कार

अर्थक अनर्थ भ' रहल अछि
मी लॉर्ड!

ताधरि एहि शब्दक अर्थ देख लेल जाउ हजूर
लॉर्ड माने भगवान कहैत अछि डिक्सनरी
कोनो मनुख केँ भगवान सम्बोधित करब
कतेक उचित अछि ?
कि ठीक-ठीक मेल खा रहल अछि एकर अर्थ शब्दकोश सँ...?

हत्या पर हत्या भ' रहल अछि शब्द केँ
एकटा नमहर असमसान होयबाक
ओरिआओन मे अछि शब्दकोश
आइ धरि एकहुँटा केश दर्ज नहि भेलैक
शब्दक पक्ष मे
नहि भेलैक तैयार कोइ दैक लेल गवाही
कान सँ ठोकराइत अश्लील ध्वनि हमरा
निन्न सँ जगा दैत अछि बेर-बेर

शब्द ककरो बपौती नहि अछि मी लॉर्ड !
जे, जकरा जेना मन हेतैक
तेना खेलेतैक शब्दक जीवन सँ...

हमर याचिका दर्ज कयल जाउ
हमर न्यायक गुहारि पर विचार कयल जाउ
मी लॉर्ड!
हम कविता सुनब' नहि एलहुँ अछि
हमरा केश दर्ज करेबाक अछि
अपन पीढ़ी बचेबाक अछि हमरा।

७). कविता हमर प्रेमिका अछि

लालटरेस आँखिक नीचा
माउस फूलि गेल अछि हमरा
पीपनी पर ओँघा रहलि अछि निन्न
बहुत निनवासलि अछि जेना
खसि रहलि अछि
धव'- धव' पृथ्वी पर

हम छी जे
सुतबाक नामे नै ल' रहल छी
कय दिन, कय राति सँ...
हमरा भीतर एकटा युद्धक
सुरुआत भ' चुकल अछि

विचारक युद्ध !

मारय नहि चाहैत छियै हम
ओहि सभ विचार सभ केँ
हृदय मे भरि लेबय चाहैत छी आ
सहेज लेबय चाहैत छी ओ किताब वला रैक
लेकिन, हम जतेक ओकरा स्पर्श करय छी
जतेक ओकरा चाहैत छी हम प्रेम करय
शब्दक आँखिये हम हुलकी मारय चाहैत छी
ओकर आँखिक ब्रह्मांड मे जतेक
कि ओ ततेक आओर
छितनारे भेल जा रहलि अछि

भरि राति अपन लाइब्रेरी मे बैसल
बुनैत रहलहुँ एकटा गहींर चिन्तन
शून्यक अंतिम छोड़ धरि
जाइत रहलहुँ बेर-बेर
घुमैत रहल मस्तिस्कक चारू कात आकाशगंगा
हम ओकरा मे आ ओ हमरा मे
करैत रहल यात्रा
हजारो मिलक यात्रा
बेर-बेर टकराइत रहल
मस्तिष्कक भीत सँ विचारक थोका
विचार सँ कविता आ
कविता सँ ब्रह्माण्ड रचबाक क्रम
चलैत रहल हमरा भीतर लगातार
आ अनुभव करैत रहलहुँ एगोट अजीब छटपटाहति...

कहाँदनि प्रेम होइत छैक तँ
एहिना बौर जाइत छैक लोक अनंत मे
एहिना राति-राति भरि निन्न नहि अबैत छैक
किछु एहने सन होइत छैक छटपटाहटि
भीतर किछु थिर नहि रहि जाइत छै साइत
हमर कविता हमर प्रेमिका अछि
आ हमर प्रेमिका हमर जीवन
आ ईश्वर सेहो

कोइ जीवन आ ईश्वर केँ बिना कि जीवि सकैत अछि ?
जीवि सकैत अछि कविताक बिना।


____________________________

दीप नारायण (प्राथमिक लेखन विद्यार्थीक नाम सँ) मैथिली काव्य-संसारक युवापीढ़ी सँ सम्बद्ध सुपरिचित कवि-गजलकार छथि। विगत किछु वर्ष सँ अपन सक्रिय उपस्थिति आ काव्य-चेतना सँ दीप नारायण निरन्तर आकृष्ट करैत रहलनि अछि। हिनक उपस्थिति मैथिली कविताक नीक भविष्यक आश्वस्ति अछि। 'जे कहि नञि सकलहुँ' शीर्षक सँ हिनक एकगोट गजल-सँग्रह प्रकाशित एवं साहित्य अकादमी युवापुरस्कार सँ सम्मानित छनि। एतय प्रस्तुत कविता सभ हिनक शीघ्र प्रकाश्य काव्य-संग्रह 'आब कतेक चुप रहू' शीर्षक सँ प्रकाशित-संकलित अछि। एकर अतिरिक्त सम्प्रति साहित्यिक पत्रिका 'अनुप्रास'क सम्पादन एवं बिहार सरकारक शिक्षा विभाग मे प्र. प्रधानाध्यापकक पद पर कार्यरत। हिनका सँ deepnarayang47@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। 
समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत समयक घाओ पर पट्टी बन्हैत Reviewed by e-Mithila on July 14, 2020 Rating: 5

4 comments:

  1. डीप नारायण केँ पढ़ि आह्लादित होइत छी । नीक कविता सब बनल अछि ।

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  2. डीप नारायण केँ पढ़ि आह्लादित होइत छी । नीक कविता सब बनल अछि ।

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