मिथिलाक मानचित्रपर भुतिआएल


 सुमित मिश्र गुंजनक किछु कविता :


।। युद्ध ।।

बहुतो ऐतिहासिक घटनाक साक्षी
पहाड़, नदी, घाटी आ मैदान
कहियो काल सुनाबै छै गाथा
संघर्ष करैत लोकक
कुरुक्षेत्र सँ ल' क'
प्लासी, हल्दीघाटी, कारगिल, सियाचिन
वा वाटरलू, हीरोसीमा, बोस्टन
चाहे पर्ल हार्बर, वांडीवाश, वियतनाम
एहि धरतीक एकहक टा कण
सुआदने अछि मनुखक शोणित
जानैत अछि तरुआरिक धार
भालाक नोकक सटीकता/मारक क्षमता
गोलीक गति
बम-बारुद आ विस्फोटक अँटकर
कोनो मनुख लेल
दोसर मनुखक मोल

अदौसँ परंपरा चलि आएल अछि
अपन अस्तित्वक रक्षार्थ
मेटा देबाक चाही अनकर अस्तित्व
सृजन केर एकमात्र प्रारब्ध छै संहार
एहि यात्रा मे सभठाम भेटत
युद्धक खिस्सा कहैत अवशेष

हमरालोकनिक आवश्यकता थिक युद्ध
लड़' लागै छी जन्मिते
कियो लड़ैत अछि अपना लेल
कियो दोसराक लेल
कियो केवल यैह लेल— 
जे बस्स लड़बाक छै ओकरा,
एहन सन अकलबेरा मे
शेष रहि जाइत अछि एकटा प्रश्न
भीषण नरसंहार आ भयावह युद्धक
की होइत छैक अस्सल कारण?
शांतिक स्थापना
मानवताक रक्षा
आ कि हत्या आ विनाश करब
आदति भ' गेल छै हमरालोकनिक।

लहासक अमार केँ लतखुरदन करैत
तप्पत शोणितक धाह अकानैत
वातावरण मे बारूदक गंध सुंघैत
बीच युद्धभूमि मे ठाढ़
हमरा सभ केँ करबाक चाही विचार
युद्धक मादे
एकर समवेत सफलताक मादे
हिंसा-प्रतिहिंसाक मादे
गुणबाक चाही
हमसभ आब कतेक दूर छी विनाश सँ ?


।। हारल झमारल यात्री ।।


नदी मे चलैत अछि पानि
पटरीक पीठ पर रेलगाड़ी
हम देखैत रहि जाइ छी
अपना सँ दूर होइत हवाजहाज
जेना कि पछिला बाढ़ि मे
बान्ह पर ठाढ़ भऽ देखने छलहुँ
धार मे भसियाइत अपन घर,
आइये जकाँ
हारल सन बुझाएल छल उहो दिन।

एन. एच. पर चलैत बस मे बैसल
सोझरा रहल छी प्रश्न
के ककरा सँ भऽ रहल छै दूर
हम आ कि रोड कातक गाछ-बिरीछ
ओम्हर जजाति नहि हेबाक कारणे
नांगट भेल अछि चऽर-चाँचर
बीच मे असोथकित सन
ठाढ़ छै एकटा बूढ़ पीपड़
माथपर तांडव करैत रौद सँ
मौला गेल छै पात-पात
ओहो हारल सन लगैत अछि
हमरे जकाँ।

लोके सन जीव सँ सहसह छै
समस्तीपुर, दरभंगा आ कि मधुबनी
एतेक दिन बजार मे रहलाक बादो
हमरा मे नहि अछि एक्को कनमा बजार
पैघ-पैघ इमारत सँ छाड़ल छै
शहरक सगर देह
उड़ियाइत धूरा मे हेरैत अछि अस्तित्व
इहो हारल सन बुझाइत अछि
हमरे जकाँ।

चलैत-चलैत
चलि देने छी प्रसिद्ध धरोहर दिस
सोझाँ मे ढनमनायल आ छहोछित अछि इतिहास
हमरा देखिते
ठिकिअबैत अछि
भजिअबैत अछि
आ बाजि उठैत अछि खंडहर
हे यात्री!
तूँ तँ हारल छह
झमारल छह
अनमन हमरे जकाँ।




।। बुलेटप्रूफ मंच सँ ।।


अहाँ एतए
बुलेटप्रूफ आ वातानुकूलित मंच सँ
विकासक शंखनाद करै छी
आ ओम्हर
खेतिहरक खेत मे
ह'र नै तरुआरि चलैत अछि
धन्य छी अपने

औ जी साहेब!
अहाँक नहि बूझल होयत
एकटा भूखल पेटक आगि
आँखिक सोझाँ
भासैत भविष्यक दृश्य
जकरा देखि
कलपि जाइछ हृदय

बड़ सहज होइत छैक
ए.सी. चैम्बर मे
गद्देदार सोफा पर बैसि
आगाँ मे
कॉफी, फ्राइ काजू
आ ठंडा बिसलरीक बोतलक संग
कोनो कंगाल गरीबक
हित केर बात करब
जकर कतेको पीढी
साटैत रहलए चेफरी
फाटल आकाश मे
जकरा ल'ग
ने घ'र, ने खेत आ ने आश
किछु नै बाँचल छै

हे मालिक!
कहियो उतरियौ अपनहुँ
गरीबक संग थाल मे
नीक सँ बुझबैक
अपन मंच/ए.सी. चैम्बर
आ हमर माटिक थाल-कादोक
बीचक अथाह अंतर।


।। देश-बंद ।।


जखन राजनीतिक चुल्हि पजरैत अछि
सेकल जाइत अछि स्वार्थक सोहारी
देश-बंद करबाक होइत अछि घोषणा
नारेबाजी आ जुलूसक धर्रोहि
आ तकर भीषण अनघोल मे
लोक बनि जाइए भीड़
दम टूट' लागैए मानवताक।

असहाय भ' जाइत अछि एम्बुलेंस
थरथराइत अछि आसक टेमी
शहर धसि जाइत अछि धुइयाँक सुमुद्र मे
रस्ता-पैरा पर डर करैत अछि कैटवॉक
कोनो माए अपन दुधमुँहा उमेदक लहास केँ
आँचर मे नुकेबाक भरिसक प्रयास करैत अछि
ओकर नोर मे
देशक भविष्य ल' लैए जल-समाधि।

जखन बारुदक गन्ध केँ
मानि लेल जाइत अछि सफलताक प्रमाण
लहास लोकतंत्रक मुँह दुसैत अछि
फूल ठाढ़ि केँ कहैत अछि विदा
तितली सभ करैत अछि आत्महत्या
आ वसंत केँ मानि लेल जाइत अछि अपराधी

आइ अकास कानत सगर राति
धरती नहि करत भोजन
चान डूमि जएत नदी मे
हवाक समूचा देहपर
उखरि जाओत ददरा
एम्हर,
लहास केँ कन्हा दैत रहत लोक
ओम्हर बनि चुकल होएत
गरमागरम सोहारी।





।। आजीक दम्मा सन राति ।।


भोरका सुरूज सिनूर छैक
जाहि सँ
सेनुराओल जाइत छैक
हरियर नूआ पहिरने बैसल
पुबरिआ बाधक सिउँथि
हुलसित होइत छैक खेत-पथार
स्वागत करै छै चिड़ैँ सभ

दुपहरिया सुरूजक पुरूषार्थ छैक
एकर प्रभाव सँ
प्रभावित होइत छैक समूचा प्रकृति
टक-टक रौद
शीतलता आ उष्णता दुनूक मिझ्झर छै
दया झाँपल रहै छै क्रोध सँ

नहुँ-नहुँ होइ छै साँझ
अकास सँ खस' लागै छै दिनमान
साँझुक सूर्य थकनी छै
जेना कि
हाड़ तोड़ि क' काज करैत लोकक
थाकल रहै छै देह
हाँफै छै आत्मा धरि
एहिना हरेक साँझ समाप्त होइ छै
एकटा नव भोरक गारंटी पर

किरिण डूमिते
खिड़की आ केबाड़क दोग सँ
हुलकी मारै छै अन्हार
सियाह राति
हमर बुढ़िया आजीक दम्मा सन छै
खोंखैत रहै छै आजी
ससरैत रहै छै राति
डूमैत रहै छै गाम
औनाइत रहै छै कुकूर
असहाय होइ छै तरेगन
आँखि मे पैसल रहै छै निद्रा
रातिक कोनो छोर पर
लड़ैत रहै छै सूरज।


।। अपन प्रेमिकाक लेल ।।


नहि जानि
अहाँक ठोर परहक मुस्की
छिलकि क' आएल अछि एम्हर
आ कि ठीके
एखन अंगना मे ठाढ़ अछि बसंत

हमर घर मे
लजाइत-धखाइत
बिहौती साड़ी पहिरने
घोघ तानि क' बैसलि ओ स्त्री
अहीं थिकहुँ प्रेयसी
वा काल्हुक स्वप्न
एखनधरि गछारने अछि हमरा
ई के थिक
जे रोज भोरमे आबि क'
सुनबैत अछि पराती

के पाछा सँ आबि
गाछ पर लतरल लत्ती जकाँ
पजिया लेलकए हमरा
किएक लगैत अछि
जेना करेज मे सटि क'
कियो कहि रहल होअए
चलू ने प्रिये
उड़ि आबैत छी हवा मे कने काल
देखू ने— 
उगैत सुरूजक लालिमा
कतेक रमनगर लगैत अछि
हमर सिउँथ पर

हमर सभ सँ प्रिय शहर
जतय हम कहियो नहि गेल छी
किएक लगैत अछि जे
एकहक टा गली चिन्हैत अछि हमरा
बहुत दिन पहिने
अहाँक आँखि मे देखने छलहुँ
आ कोना
समूचा शहर बहि आएल
हमर आँखि मे

कतोक दिन पहिने
हमर मोनक चिनबार पर
कियो बारि गेल अछि दीप
हम जे सुनि रहल छी कोइलीक हूक
एहन तँ नहि
ओ अहींक गाओल
प्रेमगीतक प्रतिध्वनि मात्र होइक

एकटा जोरगर द्वंद
उफनि रहल अछि हमरा भीतर
जनउक ओझराओल सूत सन
अपन मोनक एहि स्थिति केँ
मानि ली मृगतृष्णा
वा फेर गछि ली जे-
हम एखन अहाँक सुरभित प्रेम मे
भासल जा रहल छी
बहुत गतिसँ
आ संगहि 
एहि धार सँ बहरेबाक
कोनो इच्छा सेहो
नहि रहि गेल अछि आब





।। प्रेमपत्र ।।


(एक)

हम-अहाँ दू टा व्यक्तिवाचक
जकर मध्य भाववाचक संज्ञा जकाँ
डोलैत रहैत अछि प्रेम

निर्वात मे चिकरब
अथाह केँ थाहब
अनंत केँ व्यक्त करब
सभटा काज निर्रथक होइत छैक
तेँ,
नहि लिखलहुँ एक्कहु टा आखर
वर्षाऋतुक कोइली जकाँ
धयने रहलहुँ गुम्मी
अंगेजने रहलहुँ सभटा प्रेमक भाव

मुदा नहि चलल कोनो जूति
सशक्त जननायक बनि
अभिव्यक्ति केर स्वतंत्रता लेल
आवाज उठौलक कलम
एकटा जोरगर द्वंदक बाद
अभिव्यक्त करए पड़ि रहलए
चपोति कऽ राखल मोनक भाव केँ
लिखऽ पड़ि रहलए प्रेमपत्र
अहींक नाम
अनामिका।

(दू)

पाथर पर जनमल दूभि देखि
सरिपहुँ मोन पड़ि जाइत अछि अपन प्रेम
बेर-बेर मूड़ी खोंटलाक बादो
पनकैत रहल अछि निरंतर

हमर हृदय सँ अहाँक हृदय धरि
एकटा नमहर सुरंग अछि
जकर एक दिस गुजगुज अन्हार
दोसर दिस भकइजोर
एहि पार सँ ओहि पार धरिक
यात्रा थिक प्रेम
स्वीकार करै छी
हमर हिया एहि देश सन अछि
जतय गरीबी आ भ्रष्टाचार जकाँ
व्याप्त छी अहाँ

अहाँ हरित-लवक जकाँ मिझराएल छी
हमर हरियर कचोर मोन मे
जतए फूलाइत अछि
उज्जर-उज्जर आस
सदिखन मुस्कियाइत अछि
पुरबैया बसातक गुदगुदी सँ

(तीन)

अहाँक रोपल गुलमोहर
आ हमर रोपल अमलतास
आब भऽ गेल छै पैघ
मिझरा गेलैए एकदोसरा मे
फूल सँ लदल ठाढ़ि सभ
लहराइत रहै छै हवाक झोंक मे
अनमन हमर पसिनक अहाँक ओढनी सन

लोक आ गाड़ीक अबरजात सँ थाकल बाट
निसभेर राति मे निचैन भेला पर
यादि करैत अछि अहाँ केँ सभदिन
अहाँक फेवरेट महुआक सुरभि सँ
एखनो महमह होइत छैक अंगना

जेना कि,
नीमक गाछ पर बैसि कऽ
कोइली गाबि लैत अछि मिठगर गीत
प्रिये अहाँक बिन
हमहूँ जीबि लैत छी तहिना।





।। भाँटि ।।


लोक देख रहल अछि
समस्त व्यथा केँ
नूका लिय' पीठ पाछू
ठोढ़ पर आनू चौवनियाँ मुस्की
आ खिलखिला उठू खूब जोर सँ
जेना मनबैत होइ दुखक उत्सव

ठीके,
सभटा सेहन्ता भट्ट द' खसैत अछि
सैजमनिया आम जकाँ
आ छिरिया जाइत अछि यत्र-तत्र
समयो बीतल जा रहल छै
सुखद क्षण तूबि रहल छै
महुआ जकाँ
जीवन एकटा कैनवास
जाहि पर बनल छलै
एकटा कुशल प्रवीण चित्रकारक
कोनो सर्वश्रेष्ठ चित्र
मुदा,
कियो उझलि देलकै ओहि पर
करिया रंगक डिब्बा

ओना कहबाक लेल
बहुत किछु अछि हमरा ल'ग
बहुतो किछु होयत अहाँ ल'ग
मुदा चुप्पे रहु
मुँह बन्न क' लिय'
लोक देख रहल अछि
चौवनिया मुस्की दियौक
आ खिलखिला उठू जोर सँ
देखियौ ओहि रंगहीन-गंधहीन
जंगली भाँटिक फूल केँ
कोना निर्लज्ज जकाँ मुसकै छै
हमहूँ-अहाँ किछ भाँइटे सन।


।। बैचलर ।।


गाम सँ आबैत काल
सीधाबाड़ी सँ भरल बोरा मे
माए राखि दैत अछि
एक मोटरी विश्वास
जखन बाबू केँ करैत छी प्रणाम
सिनेह सँ कान्ह पर हाथ राखि
असथीर सँ जेबी मे धऽ दै छथि
कैंचाक संग बहुतो आस
हम बस मे बैसि
चलि दैत छी शहर दिस
ओ सभ सड़क कात मे ठाढ़
देखै छथि ओझर होइत गाड़ी केँ
बड़ी काल धरि

एतय,
दुनिया सँ अनभुआर
लॉजक छोटछीन कोठरी मे
औनाइत रहै छी
फूटैत लाबा सन
बरोबरि अखियासैत छी लक्ष्य
अकसरहाँ सन्हिया जाइत अछि
भविष्यक अदंक
परिवारक मनोरथ केँ
माथपर उठौने
पीसमपीस भीड़ मे
कएल जा रहल छी लतखुरदन

कियो देखैत होएत औखन
घोड़ापर बैसल
दिव्य राजकुमार केँ
जे स्वप्नलोक सँ आबि कऽ
लऽ जेतै ओकरा अपना संग
ओकर सभटा लिलसाक पूर्ति लेल
रोपि देतै एकटा कल्पवृक्ष
हमरा लगैत अछि
ओहि राजकुमारक अस्तित्व लेल
हमहीं होएब जिम्मेबार

रोज राति मे
उकड़ू भऽ पड़ि रहै छी
ओछाओन पर
पैर सोझ करबाक प्रयास मे
माथ ठेकि जाइत अछि
देबाल मे
कछमछाइत-छटपटाइत
खन करोट फेरैत
हम सुति रहै छी
भोरहरिया धरि
मुदा,
सगर राति जागल रहैत अछि
विश्वास, आस, मनोरथ आ लिलसा
पेटकुनिया लधने
हमरे सिरहन लऽग।





।। उत्सव ।।


ओस बनि क' बरसै छै निराशा
रेलवे लाइनक कात सूतल हमर देह
झलफाँफी भेल धोती केँ
वस्त्र, सुजनी, ओछाओन, कंबल आ गेरुआ
सभकिछु बनएबाक अथक प्रयास मे
बेर-बेर
नहि जानि कएक बेर
डूमि जए चाहैत अछि
ओसक सभ सँ शीतल बुन्न मे
आँखि खुजबा सँ पहिने

हमरा लगैत अछि
ई जीवनक अंतिम पहर छै
कोनो क्षण मे
भाफ बनि सकैत अछि
धरती परहक समस्त जीवित प्राणी
हिमालय डूमि सकै छै मेरियाना मे
भारतक मानचित्र
उगि सकैत अछि प्रशांत महासागर मे
वा फेर धसि सकैत अछि
रसातल मे

जेना कि
समयक बहुत छोट टुकड़ी मे
भुरकुस भ' जाइत अछि
कोनो स्त्रीक आस्था आ विश्वास
एहि मे कनिको आश्चर्य नहि
जे ठीक तहिना भखरि जाइ धरती
अपन अस्तित्वक कोनो चेन्ह छोड़ने बिना
उड़िआ जाइ अनंत ब्रह्मांड मे

रातिक तेसर पहर
हमर मस्तिष्क देखैत अछि स्वप्न
जाहि मे दैखाइ पड़ै छै एकटा मैदान
जतए टटका बनाओल खंडहर
शोणित सँ लेबल माटिपर छिरिआएल लहास
कोनो भीषण नरसंहारक चित्र बनबैत अछि
एहि चित्र मे
जीयब सौभाग्य थिक आकि दुर्भाग्य 
ताहि प्रश्नक बीच
जीबैत एक बरखक नेना
अपन मरल माएक छाती केँ
चूसैत अछि बेर-बेर
आ शोणितक सुआद पाबिते
मुस्किया दैत अछि भोरका सुरूज जकाँ।

अचक्के जागि जाइत अछि हमर देह
घुरि आबैत अछि आत्मा
आ कहैत अछि असथीर सँ
तोरा उत्सव मनेबाक चाही औखन।


।। लंदन शहरक चौबट्टी पर ।।


लंदन शहर मे एकटा चौबट्टीपर ठाढ़
रूइयाक फाहा जकाँ खसैत बरफ केँ निहारै छी
धरती पाटल छै सभतरि
एहन मौसम मे राति कतेक शांत
कतेक गहींर होइत छैक
अनमन ओकर आँखि सन
जे अपन दुःख केर उफनैत समुद्र केँ
हमरा सँ नुका लेबक लेल बिर्त रहैत अछि सदिखन

एहिना अमेजन नदीक विषय मे सुनि क'
छगुन्ता मे पड़ि गेल छल मोन
हजारो नदी केँ समेटने
चुपचाप करैत अछि यात्रा अटलांटिक दिस
एकरे जकाँ कियो
हमर सभटा आफति-विपति केँ
अपनामे समेटि लेब' चाहैत अछि

हवाक सिहकी मात्र सँ
लहकि उठै छै स्टेपी घासक विशाल मैदान
ओहिना-
जेना कि एकबएग छिलमिला उठैत अछि ओ
जखन ओकर दिआदिनी कहै छै
तोहर घरबला तँ विदेशमे मजूरी करै छौ

ई सभटा बात हमर स्मृति केँ हिलकोरि देलक अछि
नगदापर हेलि रहलए
अंटार्कटिका महादेश जकाँ गंभीरता ओढ़ने
हमर पत्नीक छवि,
पत्नी-
जे मिथिलाक मानचित्रपर भुतिआएल
बढ़मोतर बाधक कोनो खेत मे
किनसाइत एखन उखाड़ि रहल होएत बथुआ। 


•••

सुमित मिश्र गुंजन मैथिलीक प्रतिभाशाली रचयिता आ समर्पित कार्यकर्ता छथि। मैथिली कविताक नव्यतम पीढ़ी सँ सम्बद्ध ई कवि अपन आगमनक किछुए समय मे काव्य-प्रेमी लोकनि केँ अपन काव्य-चेतना सँ आकृष्ट कएलनि अछि। हिनक कविता सभ स्वयं सँ आरम्भ होइत सर्व धरि पहुँचैत अछि आ एहि क्रम मे सर्वक पीड़ा हिनक स्वयं केर पीड़ा बनि जाइत छनि। यद्यपि हिनक कविता सभक भाषा, स्वरूप आ बिम्बक चयन कतहु-कतहु हिनक काव्य-यात्रा लेल बाधक बनैत सेहो प्रतीत होइत छनि, तथापि एहि कठिन समय केँ अंकित करबाक हेतु सदिखन प्रयासरत भेटैत अछि हिनक कविता सभ। एकटा विचित्र तरहक व्याकुलता समेटने एहि कवि मे अपार सम्भावना छनि। 'ई-मिथिला' पर प्रकाशनक एहि प्राथमिक अवसर पर सुमित गुंजनक स्वागत आ भविष्य लेल अनन्त शुभकामना। उदयनडीह करियन निवासी गुंजन वर्तमान मे दरभंगा रहैत छथि आ अपन जिनगीक ओरियाओन मे जुटल छथि। हिनका सँ sumitmishragunjan@gmail.com सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। फीचर्ड सभटा चित्र: सुमित मिश्र गुंजन।
मिथिलाक मानचित्रपर भुतिआएल मिथिलाक मानचित्रपर भुतिआएल Reviewed by e-Mithila on June 09, 2020 Rating: 5

4 comments:

  1. बहुत सुनर कविता!

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  2. समयातीत आ सार्थक कविता।गूंजन के शब्द विन्यास सेहो नीक..... शुभकामना !

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  3. गुंजन जी बहुत सुन्दर रचना सब अछि

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  4. मनुख केँ भीतर करुणा आ प्रेम जिया के राखब संगहि मानवीय संवेदना के रक्षार्थ भ' रहल संघर्षक लेल तैयार करवा मे देश दुनिया के कवि लोकनिक भूमिका अग्रणी रहल अछि । हुनक कल्पना, दृष्टि आ विषय वस्तु केँ फरिछ करबाक लेल प्रयोग कएल गेल प्रतीक कविताक मूल तत्व रहल अछि.

    मित्र सुमित देश-काल-परिस्थिति सब पर गहींर चिंतन करैत छथि. कविताक शिल्प शैली आ प्रयोग कएल गेल प्रतीक बेस प्रभावित करैत अछि.

    मैथिलीक प्रतिष्ठित भरचुअल डीह पर अपनेक कविता केँ माध्यम सँ साक्षात्कार क' नीक लागल । खूब बधाई ��

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