कनमो भरि इजोत कम नहि होइत छैक !


राजीव रंजन झाक किछु कविता ::

1. सोहारी

भूख !
ओह ! एहेन भूख !!
सत्तर बरखक उमेर आ 
पेट डेंगौने ठाढ़ अछि सोहारी
हपोसि रहल अछि हाँजक हाँज
उज्जर-उज्जर पोथी पर दगल दगल-कारी आखर जकाँ, चट्ट क' रहल अछि भफाइत आँखि सभ

तंदूर बनल ट्रेन मे झोंका रहल अछि जेरक जेर
मुँह बौने टाढ अछि सोहारी
पीबि रहल अछि लोह लोह भेल सपनाक घोंट
भकोसने जा रहल अछि सड़कक कात टउआइत 
कारी झामड़ देह
एक दोसराक नेह

लगा देने अछि आगि सभतरि
सिझा रहल अछि पसाही लागल खेत मे
पथार लागल टटायल लोक
औना रहल रहल अछि बाट-घाट, मंडिल महजिद सभतरि

मुदा नहि फूलि रहल छैक ओकर पेट
खपटी बनल अछि चोकटि केँ आद्यपर्यंत
ठनठन बाजि रहल छैक ठोकने

मुदा निस्बद्ध पड़ल छैक ओ 
झँपने अपन अपन मुँह
जे फुला सकैत अछि सोहारीक पेट
भफा सकैत छैक एकर चोकटल अस्तित्व केँ
मुदा ओकरा सोहारीक ड'रे कहाँ छैक
ओकर सोहारी तँ मंदाग्निक‌ शिकार भेल
सेरा रहल छैक रेफ्रिजेरेटर मे।

2. ओहि बाट पर

सृष्टि आओर 
ओकर व्युतक्रमक भार 
अपन कान्ह पर धयने
निस्तब्ध 
बँटैत रहलि अछि ओ 
वाणी, वैभव आओर चिर शांति

अपनहि जीवन केँ गीरि
उदरस्थ करैत रहल अछि जीवन
अपनहि रक्तक लोढा सँ
गढैत रहल अछि
नवल शरीर

करैत रहल अछि सृजन
नव-नव जीवनक

अपनहि शोणितक श्वेद् धार सँ
सिंचित करैत रहल अछि 
नव-नव अंकुर

पटबैत रहल अछि सदति 
अपनहि लगायल भुतही गाछी
अपनहि स्वेद-बिन्दु सँ

अपनहि स्वत्व केँ डाहि
करैत रहल अछि इजोत
पीबैत रहल अछि
वमन कैल विखक अतखाइन घोंट

कखनो पाश मे हारलि गेलि
तँ कखनो बाहुपाश मे
उजारलि गेलि

मुदा,
तइयो डँटलि रहल अछि सदति
दुस्सह सर्जन आओर
विसर्जनक दुहू कनछरिक मध्य 
निर्झरणी बनि

महिषासुरक
संहारिनी बनि
तँ देवासुर संग्रामक
मोहिनी बनि

लक्ष्मीबाइ बनि
तँ दुर्गा भाभी बनि

मिलबैत रहल‌ अछि
सुर मे सुर
लोपा बनि
तँ घोषा बनि
भारती बनि 
तँ बहुत किछु आर बनि

नहि पर्वत डेरा सकल
नहि असमान‌ हेरा सकल
सभतरि बढितहि रहल अछि
ओ 
सभ छान पगहा तोड़ि
ओहि बाट पर 
जकरा लेल 'स्त्रीत्वक' नहि

'पुरुषार्थ' शब्दक आविष्कार
कएने होयत 
कहियो ई
पुरूखवादी समाज...।

3. कनमा भरि इजोत

अहाँ जहिया भरि पोख
तरेगनक अभिलाषा मे 
लगा नेने रही कामनाक सहस्रों पाँखि
आओर उड़ि गेल रही अकासक अंगना दिस

हम कनमा भरि उधारीक इजोत सँ
नीपैत रहि गेल रही
अपन नौनिआयल सन छोटछीन अँगना

आ रोपि देने रही ओकर चारुकात
तीरा-मीरा, गेना-गुलाब आदिक
बीत-बीत भरिक गाछ

करैत रहि गेल रही ओकर
कमौनी-पटौनी
कटनी-छटनी

आइयो ओ क्रम ओहिना
चलि रहल‌ अछि 
अविरल
अविराम

फूटय लागल अछि कोढही सभ
फुलाय लागल अछि कोनो-कोनो कोढही
पसरय लागल अछि सौरभ दूर-दूर धरि
जे पहुँचि रहल होअ किंसाइत अहूँ धरि

मुदा बूझब कोना से ?
कोना बूझब कतय धरि पहुँचल अछि
अहाँक यात्रा
कहिया धरि होयत एहि दीर्घ-यात्राक
समापन !

कहिया धरि घूरि आयब पुन:
धरती परक अपन घर-अंगना

जे जंगलाह सन लागि रहल अछि
अहाँ बिनु
उजरल- उपटल सन लागि रहल अछि
सब किछु

ढहि ढनमना गेल अछि
अंगनाक छहरदेबाली
खसय खसय पर अछि
घरक पछबरिया देबाल

हे! घूरि जाउ आबहु
जौं सुनि रहल छी हमर अबाज
सम्हारि लिय' अपन 
उजरैत उपटैत जिनगी

आखिर कतय राखब 
ओतेक रास तरेगन 
जँ ढहि जायत पीढीक नेओँ पर ठाढ़
एकहक महल
अहाँक आपसी धरि

हे सत्ते कहैत छी
घूरि आउ
जीबाक लेल
कनमो भरि इजोत कम नहि होइत छैक !

4. प्रेमक मरीचिका

सृष्टिक एकहक कण सँ ध्वनित होइत
प्रेम केँ अपन स्पन्दन मे व्यक्त करैत
इलेक्ट्राॅन कहिया कएने हएत 
प्रोटाॅन संग अपन प्रेमक अभिव्यक्ति पहिलबेर

कहिया सँ कएने हएत सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी
ग्रह, नक्षत्रादि अपन प्रेम प्रसंगक प्रारंभ
अछि कियो एहिठाम जे कहि सकत 
किएक करैत अछि कोनो चकोर 
अपन  चन्ना सँ एतेक बेसी प्रेम

किएक नाचि उठैत अछि मयूर
पावसक एकटा झलक मात्र सँ

के जानि सकल अछि आइ धरि
दू अणुक मध्य आकर्षणक रहस्य
आखिर किएक आ कोना ठाढ अछि, 
नृत्यरत आकाशीय पिंड 
बिना कोनो सोंगर केँ

क्यो लाख व्याख्यायित क' लेथि
एकर पाछूक करण-कारण संबंध केँ
कसि लिय' भने कोनो‌ वैज्ञानिक निकषपर

मुदा हम कहैत छी एकरा प्रेमक नैसर्गिकता
प्रेमक निष्कामता, जे
बिना कोनो अभिलाषा
बिनु कोनो कामना
प्राप्त कए लैत अछि अमरत्व
बनि जाइत अछि गीताक सार
सगर सृष्टिक आधार

जे नोचैत नहि अछि कहियो 
कोनो रोमन साम्राज्यक रोइयाँ
नहि स्थानापन्न करय चाहैत अछि कोनो 
लुकरपेलियाक उत्सव केँ
प्रोमोत्सवक छद्म क्रीड़ा सँ
नहि भरलक अछि कोनो वैलेंटाइनक स्वांग

प्रेम नहि रहल अछि क्रीड़ा हमरा लेल कहियो
प्रेम मे प्रतिष्ठापित करैत रहलहुँ अछि
हम अपन अराध्य केँ
अर्पित करैत रहलहुँ अछि एहिपर
गुलाबक ओ अरुणिमा
जकरा बाजारू बना ठाढ कए
ओ सुदृढ कए लेमय चाहैत अछि 
अपन अर्थव्यवस्था 
जकर चकमक्की सँ चोन्ही लागल हमर आँखि केँ
नहि नजरि आबि रहल छैक

मीराक आँखिक टघार
माँझीक गामक पहाड़ 
आ शायत तँइ, 
हम छोड़ि देने छी विश्वास करब अपन आँखिपर
आ कान पाथने छी जेफ्री चौसरक ओहि दूपँतिया पर
जकर कृत्रिम आभा मे

निस्तेज भ' रहल अछि राधा-कृष्णक ओ मंदिर जतय सुनने रही हम कहियो
निष्काम प्रेमक प्रवचन
जकर मुँह दुसैत इतरा रहल अछि 
आइ बाटे घाटे
सतरंगा ग्रीटिंग कार्डक पुलिंदा

जे भने नहि तय करैत होअ 
प्रेमक एहि गंभीर सरिताक ओर छोर
मुदा, टिका नेने अछि अपन कान्हपर
सगर विश्वक अर्थव्यवस्था
जाहि सँ तय कैल जा रहलैए मनुखताक सभटा मापदंड
खाहे ओ प्रेम होअ किंवा घृणा
सभ किछु तय भ' रहलैए 
शेयर मार्केटक चढाव सँ
आ शायत तँइ, 
छोट नजरि आबय लागल अछि प्रेम
जे दूर छैक सत्य सँ ओहिना
जहिना रहैछ कोनो मरीचिका
आगि उगलैत मरुथल मे

5. कठपुतरी

दिनकरक कमंडल सँ
छींटल जाइत अछि
अकासगंगाक पिरौंछ अछिन्जल
आओर
फुजि जाइत अछि
धरतीक कोरा मे
निभेर सूतल
गुलाबक आँखि

गाबि उठैत अछि 
कामनाक अनंत मधुप
जकर ताल मे ताल मिलबैत
चिड़ै चुनमुन्नीक स्वर सँ
फड़फड़ा उठैत अछि
अनगनित स्वप्नक अनंत पाँखि

आओर बनि जाइछ 
दूर सँ आबैत राग भैरवीक
सुमधुर आलाप
जाहि मे अकानैत रहैत छी हम
उम्मेदक नवल बंद 
जे प्राय: विलीन होइत रहैछ
बाबा विदेसरक थान सँ आबैत 
घंटा-ध्वनि 
आओर महजिदक अजान मे

हँसोथय लगैत छी 
हम अपन माथ
उद्यीपित करय लगैत छी
अपन संवेदना
जे लहास बनि गन्हा रहल अछि
हाड़क बनल‌ एहि खोधरि मे

ओहिना
जेना
गन्हाइत रहैत अछि
रोड -कातक नाला मे
क्षत-विक्षत पड़ल नन्हकिरबी
छौड़ीक लहास

जकरा चाटैत रहैत अछि
किछु पिलियाही कुकुर सभ
ओहिना 
जेना चाटैत रहैत अछि 
ओ, अपन बच्चा सभक घबहा देह
जाहि पर अंकित रहैत छैक
मनुक्खक दाँतक चेन्ह

जे रहरहाँ हबकैत रहैत अछि
हमरो हृदयक
अलिंद आओर निलय
जाहि मे जमि केँ बर्फ बनि गेल अछि
हमर रक्त
आओर हम बनि गेल छी
काठक एकटा मुरूत मात्र

जकरा जल‌ फूल चढा 
गोहरियाबैत रहैत अछि किछु
श्वेत वसनी पंडित सभ
रंगैत रहैत अछि 
हमर पाषाण-हृदय केँ
अपन अपन रंग मे

आ, हम बिसरय लगैत छी
अपन स्वत्व
अपन पहिचान
आ बनि जाइत छी 
ओकर हाथक कठपुतरी

नचैत रहैत छी
ओकर आँगुरक ईशारा पर
नहि चीन्हि पबैत छी
अपनहिं ठोरक मुस्की
आ की आँखिक रोशनी

नहि देखि पबैत छी
मंदिरक गुम्बद सँ फुदकि फुदकि
महजिदक मुंडेर पर गुटरगू्ँ क' बैसेत 
परबाक झुंड दिस
टकधेयान लगौने उड़ैत गिद्धक झुंड केँ

आ की 
असोराक बरेड़ी मे टाँगल
पिजरा मे आफन तोड़ैत 
सुग्गाक‌ छहोछित भेल पाँखि

नहि देखा रहल अछि 
अहाँक व्यक्तित्व मे कोनो
सुशिक्षित दृष्टिकोण
जे देखि सकितैक
हमर सर्वांग मे पड़ल दराड़ि सभ
जे कहि रहल अछि
हँसौली आ मछहा बाधक 
एकहक कथा

नहि देखा रहल अछि अहूँ केँ
पाखरिक गाछ मे टाँगल लहास सन
कठपुतरी बनल हमर अस्तित्व

आओर शाइत.. तँइ, 
पाड़ि रहल छी अहूँ थोपड़ी
हमर एहि कृत्रिम नाच पर
जाहि मे विलीन भ' रहल अछि
ओहि सभटा प्रश्नक उत्तर
जे नाचि रहल अछि सद्य:
किछु आँखि मे

बढा रहल अछि लोकक भीड़ दिसि
अपन कटोरी
अनघोल मचौने अछि 
कोरा मे मे छटपटाइत नेना
कनमा भरि दूधक लेल

आओर 
अहाँ सबकिछु देखियो केँ
बनल रहैत छी अनजान
लगौने रहैत छी टकधेयान
कठपुतरीक नाच दिस
नहि अकानि पबैत छी अहूँ
ओहि आँखिक लुत्ती
जे सुनगि रहल अछि नहुँ-नहुँ...


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राजीव रंजन झा मैथिली काव्य-संसार सँ सम्बद्ध सम्भावनाशील युवा कवि छथि तथा विगत किछु समय मे अपन काव्य-प्रतिभा एवं सक्रियता सँ अपन एकटा फराक परिचिति गढ़बा मे निरन्तर प्रत्यनशील छथि। भीठ भगवानपुर, मधुबनी निवासी राजीव रंजन झा बी.ए. एल. एल. बीक शिक्षाक उपरांत एखन सम्प्रति भारतीय जीवन बीमा निगम, समस्तीपुर शाखा मे कार्यरत छथि। हिनका सँ rajeevranjanjha80@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। 

कनमो भरि इजोत कम नहि होइत छैक ! कनमो भरि इजोत कम नहि होइत छैक ! Reviewed by e-Mithila on October 17, 2019 Rating: 5

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