गणनायक

साकेतानन्द | क्लिक : सहजानंद सिंह
कथा ::
गणनायक : साकेतानन्द

एकटा आदंकक लहरि हुनकर ढोंढ़ी लग देने ऊपर चढ़’ लगलनि। अपन माथ पर चुहचुहा आएल पसेना केँ अपन गमछी सँ पोछि क’ ओ एक बेर काल-वैसाखीक बिड़रो सन चलि जाइत एहि गाड़ी केँ देखलनि। लगलनि छीतन सदा केँ जे जँ बेसी काल धरि ओ खिड़कीक बाहर तकैत रहला तँ जरूर हुनकर माथ घूमि जेतनि आ बादहोसी घेर लेतनि। ओ आँखि मूनि लेलनि। आँखि मुनिते चारि रातिक जगरना आँखि मे कटकटाए लगलनि। भरिसक चारि मास भेल हेतै जमीन पर झँझट भेना। तहिया सँ भूखो पियास तिरोहित छनि, तँ निन्नक के लेखा करैत अछि। ...हुनका मोन पड़लनि, घराड़िक सटले पश्चिम चारि कट्ठाक बाड़ी। हुनका मोन पड़लनि ओकरा हासिल करबा मे भेल नतीजा। पूरा जोआनी गुदस्त भ’ गेलनि ओकरा अपन बनाब’ मे। ओ चरिकठवा हुनकर जवानीक निशानी छिअनि। ओही जमीन लए कैक बर्ख धरि ओ दरभंगा मे रिक्शा चलौलनि... नरे बाबूक बाप दिग्विजय बाबूक खबासी केलनि... राति-दिन, भरला-भादो आ सुखला चैत मे सब बापे-पूते ओकरा मे लागल रहला। तखन जा क’ खाधि आ झौंखी सँ भरल ओहि चरिकठवाक मुँह-कान बहरेलै। एकटा परती आ उस्सर धरतीक टुकड़ा तखन गलि क’ राँग बनल छल, आर जखन ओ धरती सोनाक टुकड़ा बनि गेलै अछि त’ सबहक गृद्ध-दृष्टि आब ओही पर लागल छै।

बड़ी काल बीत गेल। ओना ओ गाड़ी मे बैसल छल, जे काल-वैसाखीक बिड़रो सन दिल्ली दिस भागल जा रहल छलै, मुदा हुनकर मोन मे ओएह चरिकठवा अहुड़िया काटि रहल छलनि। मुदा समय ककर प्रतीक्षा करैत छै? छीतन जी नई दिल्ली प्लेटफार्म पर छलाह। हुनका मोन पड़लनि-कामेसर कहैत रहए, कहाँदन पनिजाब डिल्लिये भेने जाइ छै ? ओ स्टेशन सँ बाहर आबि जाइत छथि। आगाँ जनसमुद्र केँ अवाक देखैत ओ नई दिल्ली स्टेशनक बाहर ठाढ़ छथि। फेर आगाँ बढ़ि ई जनसमुद्रक अंग बनि जाइत छथि। फुटपाथ पर बढ़ल चल जाइत हुनका मोन भेलनि जे कत्तौ चूड़ा-दीहक दोकान भेटतनि तँ भरि पेट खैतथि। जेबी सँ चून-तमाकू बाहर कएलनि। ...नहि, जा धरि नरे बाबू सँ भेंट क’ सविस्तर कहि-सूनि नहि लेता, ताबे अन्न-जल नहि करता। छीतन सदाक चालि मे तेजी आबि गेलनि। तिलक ब्रिज धरि ओ खैनी चुनबिते आबि गेला। रामबरन सिंहक नंगटपनीक सजाइ दिएबाक सप्पत मोन मे अहुड़िया काट’ लगलनि। ओकर इशारा पर कोना हुनकर बेटा-भातिज मारि खेलक, बेइज्जत भेल! कोना क्षणहि मे भरि ठेहुन तमाकू केँ जोति क’ माँटि मे मिला देल गेल। फेर ओकरे इशारा पर कोना गामक दू टा लबरा नेता बनि क’ पंचैती करै लए आएल। कोना मामला कायम क’ लेलक। सब बात नरे बाबू केँ खोंइचा छोड़ा क’ कहथिन। रामबरन सिंह केँ की नरे बाबू नहि चिन्है छथिन ? केहन जालिया आदमी अछि से सभ केँ बुझल छै की। नरे बाबू जरूर एहि समय मे ठाढ़ हेथिन। फेर मोन पड़लनि वोट। हिनकर मेहनति देखि क’ नरे बाबू दस लोकक सोझाँ मे कहने रहथिन जे अहि परोपट्टा मे पिछड़ल जनताक माइन्जन छीतन जी छथि। हिनके राय विचार सँ काज हेतै। आखिर खान्दानी लोक कहलकै ककरा? जमीन्दार घरानाक पढ़ल-लिखल लोकक इएह तँ गुन छै। असली लोक केँ परेखबाक। ओहि बेर नरे बाबू ढेर वोट सँ जितला! आ तहिया सँ सब चुनाव जितैत अएलाह, सब चुनाव मे सबटा छोटकाक वोट हिनके भेटैत अएलनि। ई सत्य, जे ओहि चुनावक बाद सँ छीतनक एकबाल बढ़लनि। लोक राय-विचार पूछ’ लगलनि, पंचैती मे बजाओल जाए लगला। ओहो खखसि क’ कहैत रहथिन जे हमरा सबहक असली नेता छथि नरे बाबू। ऊँच जाति मे जनमला सँ की हेतनि, हमरा सबहक सब हाल ओएह टा जनैत छथि आ ओएह एकरा सोझराइयो सकैत छथि। हुनका मोन छनि जे ओइ चुनाव मे ओ कोना बाझल छला। ओही बीच करिक्की बाछी मरि गेलनि... कनकिरबीक सर्दी-जर निमोनियाँ बनि गेलनि... खेती पछुआ गेलनि। ऐ धरानिएँ जकरा लए एत्ते कएलखिन, से एखन नहि सहाय हेता तँ कखन हेता?

...छीतन सदा बाँचि गेल रहथि। आगाँक गाड़ी मे बहुत जोर सँ ब्रेक लागल रहै आ गाड़ी जोर सँ किकिया उठल रहै। सड़क पर चलैत लोक उनटि-उनटि क’ ओम्हरे देख’ लागल रहए। जाहि ठाम जनपथ, राजपथ केँ कटैत छै, ठीक ओही चैबटिया पर गाड़ी सँ बाल-बाल बचल रहथि, काँख त’र पोटरी नेने... रस्ताक गन्दा धोती आ गोल गला पहिरने बनकट्टाक छीतन सदा। एक दिस संसद दोसर दिस सचिवालय आ तकर सामने चलैत धर्रोहि लागल कारक पतियानी केँ बड़े कातर दृष्टिएँ देखि रहल छला ओ। पहिल बेर हुनका बुझि पड़लनि जे एहि ठाम ककरो दोसरा लए एक्को मिनटक समय नहि छै। अहि ठाम समस्या लाज बचेबाक नहि, जान बचेबाक छै। अनचोके मे सही, बीच चैबटिया पर ठाढ़ भ’ क’ यातायात केँ छन भरि लए रोकबाक गलती तँ हुनका सँ भ’ए गेल छनि। तैं हुनकर दुनू हाथ जुटलनि आ सामने रुकल कार सँ गुड़रैत आँखि केँ कहलखिन-गलती।-आ झटकि क’ सड़क टपि गेला। हुनका सन्देह भेलनि जे की ई डिल्लियो अपने देश मे छै? राष्ट्रपति भवन, संसद, सचिवालय, कनाट प्लेस ओही डिल्ली मे छै जाहि मे कमेसरा कमाइ छै? जे अबै छै तँ तीन मासे देह जुटै छै, तेहन दुहै छै देह केँ दिल्ली मे। आ पाइ कत्ते अनै छै? जँ पाइ कमाइ के ढेरियन मौका छै दिल्ली मे तँ पाइ गमबै के सेहो ओतबे उपाय छै। हँसी लगलनि छीतन सदा केँ। एतबो नहि ओ बुझै छथिन जे ई दिल्ली मातबर लोकक दिल्ली छै। अपन दिल्ली तँ पुरानी दिल्ली छै, कि जमुना पारक दिल्ली। जत’ सँ संसदक गोलार्ध सब सँ नीक लगै छै, ऐन ओही ठाम रुकि गेला ओ। करीबन आधा घण्टा सँ जाहि तमाकू केँ ओ रगड़ि रहल छला ओकरा आराम सँ ठोर मे द’ क’, बड़ी काल धरि संसदक भव्य गोलार्ध केँ, ओहि पर धीरे-धीरे फहराइत तिरंगा केँ देखैत रहला। हुनका एहि दृश्यक भव्यताक कारणें आदंक तँ भेल छलनि, मुदा ओ आगाँक भव्य-दृश्य केँ मोन राख’ चाहै छला, तैं बड़ा एकाग्र भ’ क’ ओकरा देख रहल छला। एकरा ओ सभ दिन लए स्मृति-पटल पर आँकि लेब’ चाहै छला...

-ओए, किथ्थे जाणा?

-आँइ?-अकचकाइत छीतनक मुँह सँ बहराएल। घूमि क’ देखलनि, सामने एकटा अधवयसू, अधपाकल दाढ़ी बला सरदारजी रहथि। देखि क’ भेलनि, एकरा सँ बाबा खड़ग सिंह मार्गक पता पूछल जा सकैत अछि।

-हमरा नरे बाबू कन जएबाक है।

-कौण से बाबू के लग?-सरदार जी अपन खिचड़ी दाढ़ी मे बिहुँसल रहए।

-नरे बाबू दरिभंगा का नामी नेता हींया बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर रहते हैं...।-सरदारक मुँह देखि क’ बुझएलनि छीतन सदा केँ जे ओ आधे बात बुझलकनि। सत्ते सरदार जी कने काल असमंजस मे ठाढ़ रहल आ फेर अपन बाट धएलक। ओकरा बिनु किछु उत्तर देने जाइत देखि हुनका बड़ आश्चर्य भेल रहनि-मर बहिं, एहनो लोक होइ छै? ने गप्प ने सप्प, ने परणामे-पाती, सोझे बिदा? बाह रे लोक दिल्ली के! फेर हुनकर हाथ डाँड़ मे बान्हल नोट केँ टोहि क’ देखलनि। सब किछु ठीक छलनि। बस ई टा पता लागि जैतनि जे बाबा खड़ग सिंह मार्ग कोम्हर छै। ओ संसद मार्ग भेने फेर कनाट प्लेस अएला। भरि रस्ता ओ लोकक मुँह निहारैत हियासैत एलखिन। मुदा क्यो एहन नहि बुझेलनि जे पलखति मे हो आ हिनका बाबा खड़ग सिंह मार्ग देखा दनि। तैं ओ बढ़ैत गेला। रीगल सिनेमा सँ बामा घूमि क’ ओ किछुए दूर बढ़ल हेता कि देखलखिन एकटा छौंड़ा एकटा मेसीन सँ पानि बाहर क’ बेचैत अछि। चारि आने गिलास, ठंढा पानि! पियास हुनको लागि गेल छलनि। कत्तौ पानि पियैक दौरे ने लगै छलनि। एहि पानि पियाब’ बलाक क’ल दिस ध्याने ने गेल छलनि। पानि पीबि ओ गिलास देलखिन आ ओ छौंड़ा केँ पुछलखिन-बुच्ची! बाबा खड़ग सिंह मार्ग कौन है?-ओ छौंड़ा हिनका ऊपर सँ नीचा धरि देखलकनि आ फेर मैल कुचैल दस सालक छौंड़ा भभा क’ अपन कच्चा दाड़िम सन दाँत बहार करैत कहलकनि-ओए शाहजी। तुम कौण से मारग पर पाणी पी रहे हो? यही है खड़ग सिंह मारग।

एतबा सुनैत माँतर जेना छीतन सदा केँ बिरनी बीन्ह लेलकनि। पाइ दैत ओ पैर झटकारने बिदा भेला। आ फेर हुनकर मोन मे ओ चरिकठवा नाच’ लगलनि। तैं ओ बिना बामा-दहिना देखने बमरिए फुटपाथ देने जा रहल छला कि गुरुद्वारा सँ निकलल भीड़ मे घेरा गेला। चारू कात मुरेठे-मुरेठा, कारे पर कार, लोके पर लोक। भीड़ मे कोनहुना रस्ता बनबैत निकलैक चेष्टा केलनि तँ बड़ी जोर सँ कोनो मंसुगरि पंजाबिनक देह सँ दबि क’ चेहा उठला। हुनका ओना चेहाइत देखि ओ पंजाबिन ठिठिया देने छलनि। जेना छीतन जी सन भरल-पुरल लोकक भीतर एत्ते भीरु हृदय केँ परखि क’ हँसल हो। ओ ओकरा भरि नजरि देखिए क’ रहि गेला, ताबए भीड़ आगाँ बढ़ि गेल रहए।

बाबा खड़ग सिंह मार्ग, तकर दुनू दिस पतियानी सँ लागल गाछ, जे फुटपाथ पर निहुँड़ल छै, ताही पर पैर झटकारने जा रहल छला, चैदह लम्बर-चैदह लम्बर रटैत बनकट्टाक छीतन सदा।

कोठीक नम्बर पढ़ियो क’ ओहि हत्ता मे पैसैक हिम्मति नहि भेलनि हुनका। ओ बड़ी काल धरि फुटपाथ पर ठाढ़ भेल गेट पर लटकल बोड मे नरे बाबूक नाम आ कोठीक नम्बर पढ़ैत रहला। ठीक ओएह कोठी छै, नरे बाबूक नामो छनि। अपन ठेहुन धरि ससरि आएल धोती केँ ओ फेर सम्हारलनि, एक बेर फेर अपन धुरियाओल पैर केँ पटकि क’ धूरा झाड़लनि आ डराइत-धखाइत गेट खोललनि।

कोनो विदेशी संगीतक लहरि ग्रिलक परदाक ओइ पार सँ आबि रहल छल। ओकरे सँ छनाइत प्रकाशक थक्का लौनक घास पर पड़ि रहल छल। एक बेर ई सब देखि मोन भेलनि जे घूरि चली। मुदा फेर मोन पड़लखिन नरे बाबू... वोट मँगै लए आएल रहथिन, ओ कोना ओकर जौड़खट्टा पर बैस रहल रहथिन? सब दिन सँ जमीन्दार नरे बाबूक मोन केहन नेनु सन? टुनटुनक बाप केँ कोना इलाजक वास्ते सौ रुपैया झट सँ द’ देने रहथिन? सब मोन पड़लनि छीतन सदा केँ। वोटक समय गामे-गाम घुमनाइ, जँहि-तँहि, जैह-सैह खेनाइ, सब स्मरण छनि हुनका। तैं ओ आगाँ बढ़ला। लौनक मोलायम घास पैर तर बड़ी कालक बाद जे पड़लनि से बड़ नीक लगलनि। ओ असमंजस मे ठाढ़े रहथि कि नरे बाबू दरबाजा पर ठाढ़ भेला आ जमीन्दारी रोब भरल आवाजमे  गरजला-रौदिया! रौदिया!! कत’ गेलें? देख तँ लौन केँ के धंगने जा रहल अछि?

-हैये सरकार।-कहैत रौदिया छीतन सदा दिस लपकल रहए।

-कौन है तुम?

-हम छीतन छी, बनकट्टाक छीतन सदा!

-तँ ओम्हर लौन किऐ धंगने जाइ छ’?

-घास नहि धंगाइ छै-छीतन जी रौदी दिस सहटला।-हमरा नरे बाबू सँ भेंट करा दैह भाइ; बड़ उपकार मानब’!

-उपकार मानब’ पछाति, पहिने लौन सँ बाहर आब’। नहि तँ एखने थाना पुलिस भ’ जेत’।-रौदीक रौद्र रूप देखि क’ सकपकेला छीतन सदा।-हम बनकट्टा के छी। नरे बाबूक इलाकाक लोक!-रौदी ओकर कातर स्वर सुनि क’ ठमकल। तँ छीतन केँ साहस बढ़लनि। -परोपट्टाक सब भोंट हमहीं दियेने रहिअनि नरे बाबू केँ, हमरा नीक जकाँ चिन्है छथिन। -फेर ओ रुकला। सोचलनि जे असली बात तँ कहिए ने रहलखिन अछि। -हे बड़ सतेलक अछि दरोगा। बेकसूर केँ पेमाल क’ रहल अछि गामक लबरा-लुच्चा, तँ गोहारि करै लए बड़ी दूर सँ आएल छी। -छीतन सदा केँ अपनहिं स्वर रेरिएनाइ सन लगलनि। मुदा हुनका बुझल छनि जे ई आखिरी मौका छनि। जँ नरे बाबू ठाढ़ नहि भेलखिन तँ क्यो हुनका बचा नहि पौतनि। तैं एकरा ओ कोनो तरहें गमाब’ नहि चाहै छथि। रौदी केँ भेलै जे ओ जँ, हिनकर गपमे  बाझत तँ साहेबक कमरा मे स्नैक्स समय पर नहि पहुँचा सकत। एक घंटा पहिने सँ साहेब किछु सांसद सब संगें बियर पीबि रहल छला। कोनो बान्ह बन्हैक योजना पर घनघोर बहस चलि रहल छलै। आब तँ ह्निस्कियो खूजि गेल हेतै! तैं छीतन सदा केँ कहलकनि-जाह, सामने कोठली मे एक पतियानी सँ कुरसी राखल छै, ओही पर बैस रह’। हम थोड़े कालक बाद आबि क’ कहै छिय’।-कहैत रौदी अलोप भ’ गेल। छीतन सदा आब कने सुस्थिर भेला। कुर्सी पर बैस गेला। सामने एक पतियानी सँ लागल गोड़ दस-पन्द्रह टा कुर्सी, एक कात दिवान, नीचा मे गलीचा जाहि पर अपन लकुटिया नेने गांधी बाबाक फोटो। हुनका एबा सँ पहिने कोठली मे आर दू गोटे बैसल छलै। हिनका अबितहिं दुनू चुप भ’ गेल। दुनू माने एकटा धवल जटाजूट बला बबाजी आ हुनके संगें आएल एकटा पम्हउट्ठा छौंड़ा। कनेक काल धरि दुनू चुप रहल, फेर बबाजी पुछलखिन-की हौ, रौदी की कहलक’? आइयो नेताजी सँ भेंट हैत कि नहि?-फेर अपन धवल दाढ़ी पर हाथ फेर’ लगला, एना जेना ओकरा चुचकारि रहल होथि। एकाएक पुनः साकांक्ष होइत बजला-बाप रे बाप! तीन दिन सँ दर्शन लए कुसोथ्थरि देने छी।-छीतन सदा केँ बाबाक ई उक्ति सूनि आदंक भेलनि।-की गाय चरवाहिये मे बिका जेतनि? हुनका जिम्मा तीने साँझक चूड़ा छनि! पाइयो गनले-गूथल सबील क’ सकला! तीन मास सँ लधल एहि रगड़ा मे सब जमा-जथा सोख्त भ’ गेल रहनि। तैं हुनका ड’र भेलनि। जँ, हुनको तीन-चारि दिन लगलनि भेंट करबा मे, तहन तँ गेल महींस पानि मे। कत’ रहता, की खेता-पीता? कथुक तँ जोगाड़ नहि छनि। तैं ओ बड़ सम्हरि क’ बजला-आइ भेंट नहि करथिन की? हम तँ  बड़ी दूर सँ आएल छी!

-देखियौ। ओही भरोसे तँ हमहूँ बैसल छी।-बबाजी अपन भरि दाढ़ी मे बिहुँसल रहथि... छीतन सदा कतहु असोथकित भ’ गेल रहथि... बड़का बेटा सूरो केँ की कहथिन... भातिज रमेश केँ कोन जवाब देथिन? काल्हि वंश बढ़तनि, कत’ बसतनि? इएह तँ एकटा चरिकठबा छलनि अपन अरजल, अपन जुआनीक निशानी, नरे बाबूक बाप दिग्विजय बाबूक निशानी, जे पछिला पच्चीस वर्ष सँ हुनकर दखल-कबज मे छनि। ओकरे बचबै लए ओ आइ एत’ दिल्ली मे छथि, जकरा छीतन सदा डिल्ली कहि दै छथिन। रामबरन सिंह परोपट्टा मे आतंक मचेने अछि। हुनका बूझल छनि, नरे बाबू तक ओकर शिकाइत पहुँचि गेल हेतै। ओएह आइ छीतन सदा केँ पानि पिया रहल छनि। अपन बढ़ैत परिवार केँ बसबै लए रामबरन चुप्पे-चाप जमीन्दारक पुरना रसीद उपरेलक। फेर जालसाजी क’ क’ दाखिल खारिजो करा लेलक। छीतन केँ भनक तक नहि लगलनि। फेर एक दिन अनचोके मे जमीन पर चढ़ि बैसल। हिनक केवाला, दाखिल खारिजक रसीद, पछिला पचीस वर्षक लगानक रसीद कोनो काज नहि देलकनि। ठेहुन भरिक तमाकू छनहि मे धंगाएल सामने मे छलनि। आब ओकरा हड़पै मे कैक दिन लगतै? जखनहिं पुलिस ओकर जाली कागज केँ मोजर द’ चैआलिस क’ देलकै, तखनहिं रामबरन सिंहक हाथ ऊपर भ’ गेलै। मुदा? मुदा नरे बाबूक एकटा इशारा दूध केँ दूध आ पानि केँ पानि क’ देतै। हुनकर मोंछक लाज रहि जएतनि! ...ओह, आगाँ-आगाँ रामबरन सिंह पाछाँ-पाछाँ ओकर हाथी सन-सन चारि टा बड़द आ सभ सँ पाछाँ चानीक मूठि बला लाठी हाथ मे नेने रामबरन सिंह। दस टा ज’न लगा क’ कोना तमाकू जोति गेलनि? ...नहि, छीतन सदा रहता, भुखलो रह’ पड़तनि तँ रहता दिल्ली मे, मुदा कोनो नौ छौ कइए क’ घुरता। ओ पलथी बदलि क’ बैसैत छथि। रौदी भीतर जे बिलाएल से बिलाएले अछि। आब राति भ’ गेलै अछि। आठ-नौक अमल। भितरी सँ एखनहुँ कोनो विदेशी धुनक लहरि एत्त’ धरि आबि जाइत छै। ताबे सामनेक केबाड़ खुजैत छै। इएह अठारह-बीसक रहल हेतै! छीतन सदा अंटकर लगबै छथि। ओकर एक झलक देखलाक बाद फेर ओइ दिस नहि देखल गेलनि हुनका। ओ देह सँ सट्टल एकटा जीन्स आ ऊपर मे तहिना गंजी मात्रा पहिरने छल। ओकर ई रूप देखल नहि गेलनि हुनका सँ। ओइ कपड़ा सँ ओकर देह जत्ते झँपाएल नहि छलै, ओइ सँ बेसी ओकरा उघाड़ करैत रहै। तैं छीतन सदा देबाल दिस ताक’ लगला। मुदा बबाजी आ पम्हउट्ठा छौंड़ाक गंथाइत नजरिक बिनु एक्को रत्ती परवाहि केने ओ ठसका सँ बाहर लौन दिस गेल आ फेर ओहने ठसका सँ वापस भ’ क’ भीतर अलोप भ’ गेल। की ई नरे बाबूक परिवारक क्यो छनि? छीतन सदा एकटक ओकरा जाइत देखैत रहलाक बाद अंटकर लगा रहल रहथि। भ’ सकैत अछि क्यो अड़ोसिया पड़ोसिया कि क्यो दोसर... मुदा से के कहतनि?

भीतर सँ अबैत विदेशी धुन एकाएक बन्न भ’ गेल। डेरा कने निसबद्द भेल। किछु काल धरि सब शान्त रहल। शान्ति भंग केलक रौदी, जे अही बीच मे कोनो दरवाजा खोलि क’ प्रगट भ’ गेल छल। कुर्सी पर बैसल धवल जटाजूटबला बबाजी ताबे अपन समाधि मे लीन भ’ गेल छला आ कि निन्न मे झुकि रहल छलाह। बगल मे बैसल पम्हउट्ठा छौंड़ा कोनो फिल्मी पत्रिका अपन कोरा मे खोलि क’ तेना मूड़ी निहरौने रहए जे बगल मे ज’ बमो फुटितै तँ ओकर ध्यान टूट’ बला नहि रहै। तैं रौदी जीक नजरि सभ सँ पहिने छीतने जी पर पड़लनि-साहेब सँ आइ भेंट नहि हैत!-रौदीक उद्घोषणा हुनका गोली सन लगलनि। ओ किछु पुछतथिन तइ सँ पहिने बबाजी धड़फड़ा क’ अपन समाधि, कि निन्न तोड़लनि-हौ जी रौदी।-रोज-रोज एक्के बात। आइ कि भेलै हौ?

-की कही हम? हमरा हाथ मे कुच्छो है? भेंट तँ ओएह करता।-रौदी अपन असहायता प्रगट करैत बाजल। बबाजी अपन धवल दाढ़ी पर तीन-चारि बेर हाथ फेरलनि। फिल्मी पत्रिकाक अध्ययन करैबला पम्हउट्ठा छौंड़ा ठाढ़ भ’ क’ अँगेठी-मोचाड़ केलक।

-अँए हौ?-बबाजीक स्वर कने तेज भेल-हमरा सबहक समयक कोनो मूल्य नहि?

-आब से हमरा की कहि रहल छी?

-सामने मे तँ तोंही छ’ तँ कहियौ ककरा, देबाल केँ? सुनह, बात जानी हम सफा-सफी। पूछि क’ बताब’ जे भेंट करता कि नहि? नहि तँ एहन नेता सभ गोड़ पचासेक परमानन्द झाक जेबी मे रहै छथिन... मुदा बात तँ बुझिऐ, जे हमरा सब केँ भेंट किऐक नहि होइत अछि?

-से साहेब हमरा नहि कहलनि अछि। ओ एखन फाइल देखबा मे लागल छथि। अपने लोकनि काल्हि आबी। हमरा इएह हुकुम भेटल अछि!-रौदी अपना भरि कोमल भ’ क’ बाजल।

-तँ जाह! अपन साहेब केँ कहि दहुन, परमानन्द झा चललाह। आब कहियो फेर ई देह एत’ पैर धरि नहि देत। हह... हद्द भ’ गेल साहेब! तीन दिन सँ कुसोथ्थरि देने एत’ बैसल छी आ हिनका लेखें धन-सन। कहै लए हमरा लोकनिक प्रतिनिधि छथि...।

बाबाक बात बिच्चहि मे रुकि गेल। फाटकक आवाजक संग ड्राइंगरूमक दरबाजा खुजल। सामने गहुमनक खूनल पोआ जकाँ लहलह करैत, एक हाथ मे जरैत सिगार आ दोसर हाथे साँची सम्हारने नेता जी, माने नरे बाबू छलाह। ओ एकटक बबाजी दिस तकैत बजला-की बाजि रहल छलहुँ एखन?

बबाजी असमंजस मे चुप्पे रहला।-अहाँ हमरे घर आबि क’ हमरे गारि पढ़ि रहल छी। एत्ते हिम्मति अहाँ केँ? के छी यौ अहाँ?-नरे बाबूक स्वर बाबा खड़ग सिंह मार्गक यातायातक स्वर सँ ऊपर उठि चुकल छल।-जी हमरा लोकनि तीन दिन सँ घूमि रहल छी।-बबाजी अपन दाढ़ी पर हाथ फेरैत बजला।

-तँ की भेलै! अहाँ तीन कि तीस दिन सँ अबैत होइ। ई झोंटा-दाढ़ी बढ़ा क’ हमरा प्रभावित करए चाहैत छी। हम सात दिन धरि भेंट नहि करब। अहाँ कि कोनो पार्लियामेन्ट छी जत’ हमरा जाइए पड़त?-नरे बाबू चश्मा उतारि क’ हाथ मे लेलनि। एतबे गरजला सँ हुनकर ब्लड प्रेशर बढ़ि गेल रहनि। ओ बबाजी केँ गीरि जाइबला नजरि सँ देखि रहल छलखिन। बबाजी केँ सनाका लागल रहनि। छीतन जी आ ओ पम्हउट्ठा छौंड़ा एखन धरि विमूढ़ जकाँ ठाढ़ भ’ ई सभ चकित भेल देख रहल छल। किछु काल तँ क्यो किछु नहि बाजल। नरे बाबू स्वयं एहि नातिदीर्घ अन्तराल केँ तोड़लनि आ बबाजी केँ डपटैत पुछलखिन-की काज अछि अहाँ केँ?

-जी हमरा नहि, हिनका छलनि। ई अपने इलाकाक सुरेन्द्र झाक बालक आइ. आइ. टी. मे प्रवेश चाहैत छथि। अपनेक अनुशंसा चाहैत छथि! -बबाजी धखाइत बजला।

-हम ने हिनका चिन्हैत छिअनि आ ने जनैत छिअनि, तखन अनुशंसा कोना करबनि!

-जी कुशेश्वरक सुरेन्द्र झाक बालक छथि ई।-बबाजीक ई उत्तर सुनिते नरे बाबू फेर तिड़ंगला।

-हम कुशेश्वर स्थानक ककरो नहि चिन्है छिऐ। कोनो सुरेन्द्रक दर्शन धरि नहि भेल अछि आ ने होएत।

-जी ओ अपनेक चुनाव मे जी-जान लगौने छला। ओतुक्का प्रमुख छथि। एकबाली लोक छथि!

-एकबाली रहथु कि सिकन्दर। लाउ कत्त’ अछि फौर्म! लाउ लिखि दैत छी जे ने हम हिनका चिन्है छिअनि आ ने हिनकर बापे केँ। इह, पूरा परोपट्टा केँ लोकक जनबा-चिन्हबाक जेना हम कोनो ठीका नेने रही!-नरे बाबू एतबा बजैत-बजैत पस्त भ’ गेल रहथि। बबाजीक जवाब हुनका आर उत्तेजित क’ देने रहनि। ई चिकड़ा-भोकड़ी सूनि ओ पैंट आ गंजी वाली कत’सँ पहुँचि गेलै क्यो ने देखलकै। ओ थरथराइत आ घुमड़ैत नरे बाबू केँ अपन पाँज मे ध’ नेने छलनि। ओहि छौंड़ीक ढेसा नेने नरे बाबू दिवान पर बैस रहला। हुनकर आँखि बन्न छलनि, शरीर निढाल। ठोरक दुनू कोर पर फेन आबि गेल छलनि। ई तीनू सामने ओहिना इतस्ततः मे ठाढ़ छला... दाढ़ी पर हाथ फेरैत धवल जटाजूट बला बबाजी... हाथक फिल्मी पत्रिका केँ मचोडै़त पम्हउट्ठा छौंड़ा, आ काँख तर पोटरी दबौने छीतन सदा।

छौंड़ी सँ टेक नेने नरे बाबू माथ केँ ग’र लगेबाक प्रयास केलनि आ हुनकर आँखि खूजि गेलनि। आगू मे पूर्ववत ठाढ़ ई तीनू गोटे केँ देखि ओ फेर चिचिएलाह-जाउ अहाँ सभ!-नजरि पाछाँ ठाढ़ छीतन पर पड़लनि, तँ ठहरि गेलनि-तोरा की छियौ रौ?

-जी हमरा जे बुढ़ा मालिक जमीन देने रहथिन तइ पर रामबरन...

-जी हमरा जमीन पर रामबरन...-नरे बाबू मुँह दुसैत छीतनक बात दोहरेलनि। बनकट्टाक माइन्जन छीतन सदा केँ एतबे बाजि भेलनि। नरे बाबू ओहिना गरजि क’ कहलखिन-जमीन पर झँझट छौ तँ कोट-कचहरी जो। थाना पुलि कर ग’। हमरा लग की करै लए अएलें? खाली तंग करै लए? भरि दिन तोरे सबहक काज मे लागल रहै छी से क्यो देखनिहार नहि।-एतबा बाजि ओ ओहिना ओलरल आँखि फेर बन्न क’ लेलनि। असोथकित नरे बाबू। किछु काल इहो लोकनि जकथक ठाढ़ भेल रहला कि ओ छौंड़ी एकबाइग कोरा मे पड़ल नरे बाबूक बन्न आँखि केँ देखि हिनका सभ केँ बाहर चल जाइक इशारा केलकनि।

ओना रातिक दस बजैत हेतै, मुदा बाबा खड़ग सिंह मार्ग पर यातायात पूर्ववते छल।
●●●

साकेतानन्द (26 जनवरी, 1941- 21 दिसम्बर, 2011) मैथिलीक समादृत कथाकार-उपन्यासकार छथि। मैथिली कथा साहित्य मे 1962 सँ सक्रिय । विभिन्न पत्र-पत्रिका मे कथा, रिपोर्ताज. संस्मरण, यात्रा विवरण प्रकाशित। प्रथमतः मैथिली कथा 'ग्लेसियर' 1962 मे ‘मिथिला मिहिर’ मे प्रकाशित। हिन्दियो मे दू दर्जन कथा आदि प्रकाशित । गणनायक (कथा-संग्रह) आ सर्वस्वांत (उपन्यास) मैथिली मे तथा बरफ की अरणियाँ (कथा संग्रह) हिंदी मे प्रकाशित। संग्रह गणनायक लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार सँ सम्मानित। 
गणनायक गणनायक Reviewed by e-Mithila on October 20, 2019 Rating: 5

1 comment:

  1. नीक कथा एकर उर्दू भाषा मे हम अनुवाद कैने छी जे साहित्य अकादमी सं प्रकाशित अछि।

    ReplyDelete

Powered by Blogger.