नहि गाबैत अछि कियो 'मर्सिया'


गुफरान जीलानीक किछु कविता ::


1). लाल ओसक बुन्न

देश बदलि रहल अछि
दिन-प्रतिदिन
असहिष्णुता बढ़ि रहल अछि
लव-जिहाद
घर वापसी भ' रहल अछि
देशभक्तिक अर्थ
सेहो बदलि रहल अछि
तरुआरि तेजगर
त्रिशूल नोकगर भ' रहल अछि
लोकक मानसिकता
हरियर सँ आर हरियर
केसरिया सँ आर केसरिया भ' रहल अछि
बस, थाना, कोर्ट-कचहरी सेहो
केसरिया भ' रहल अछि

एहिना रहत तँ
एक दिन हमर देश
पूर्ण केसरिया भ' जाएत
ओहिना जहिना
हमर पड़ोसीक भूखण्ड अछि
हरियर
आ एहेन हरियर
जे दिन-प्रतिदिन
ओकर गाछ-पात सँ टपकैत अछि
लाल ओसक बुन्न
आ साँझ धरि
भ' जाइत अछि
समस्त भूखण्ड हरियर सँ लाल।

2). काल्हि किछु आर हेतैक

चौरासी भेलै
हम चुप छलहुँ
किएक तँ हम ओ नहि छलहुँ
जकरा संग ई भ' रहल छल

अयोध्या भेलै
गोधरा भेलै
हमर संवेदना हिलबो नहि कएल
किएक तँ हम ओ नहि छलहुँ
जकरा संग ई भ' रहल छल

हिटलर जर्मनी मे की-की नहि कएलक
के नहि जनैत अछि
मुदा हम किछु नहि कएलहुँ
किएक तँ हम ओ नहि छलहुँ
जकरा संग ई भ' रहल छल

आतंकवाद पनपलै
आईएसआई जन्म लेलकै
कोहराम मचेलकै
हाहाकार मचेलकै
हम एकदम शांत छलहुँ
किएक तँ हम भारतीय नहि छलहुँ
अमेरिकी नहि छलहुँ
आ ने ब्रिटिश छलहुँ
हम ओ कियो नहि छलहुँ
जे आतंकवाद आ आईएसआई केँ झेलि रहल

फिलिस्तीन मे बहुत किछु भेलै
मुदा हम कनबो नहि कएलहुँ
किएक तँ हम ओ नहि छलहुँ
जकरा संग ई भ' रहल छल

ईराक-अफगानिस्तान मे की-की भेलै
मुदा हमरा कोनो फरक नहि पड़ल
किएक तँ हम ओ नहि छलहुँ
जकरा संग ई भ' रहल छल

म्यांमार मे की नहि भेलै
मुदा हम अपसोचो नहि कएलहुँ
किएक तँ हम ओ नहि छलहुँ
जकरा संग ई भ' रहल छल

आइ सीरिया भ' रहल छैक
आ हम चैन सँ सुतल छी
किएक तँ हम ओ नहि छी
जकरा संग ई भ' रहल छैक

काल्हि किछु आर हेतैक
बल्कि हिंदुस्तान हेतैक
आ हेबेटा करतैक
मुदा
एखन तुरत ओ
हमर घर आयल अछि
आ दोहरा रहल अछि
ओहि सभटा घटना केँ

हमर नजरिक सोझाँ मे
जूजी काटि रहल छैक
हमर छोट बेटाक
हमर माय केँ बीच सँ
चीरि रहल छैक
छाती काटि रहल छैक
हमर बहिनक
हमर बेटीक बोटी-बोटी
नोचि रहल छैक
बलात्कार क' रहल छैक
हमर कनियाँक
आ हम जोर-जोर सँ
चीख रहल छी
चिल्ला रहल छी
मुदा कियो नहि आबि रहल अछि
किएक तँ ओ सभ
ओ नहि छथि
जकरा संग ई भ' रहल छैक।

3). फैज़

लोकतंत्र मे
जखन-जखन तानाशाही
विकसित भेलैए
ओहि सभटा दौर मे
एकटा फैज़ अहमद 'फैज़' रहलैए

एखनो लोकतंत्र मे छैक
एकटा तानाशाह
तेँ
हम फैज़ छी
एहि दौरक

रे! तानाशाह
तों दबा देबही
हमर अबाज
काटि लेबही
हमर जुबान
छीनि लेबही दुनू हाथ सँ
हमर कलम
आ तोड़ि देबही ओकरा
तैयो कोनो गम नहि
हम चीरि लेब
अपन हाथक अँगुरी
आ लिखैत रहब
अपन अंतिम साँस धरि
तोहर जुल्मक खिलाफ।

4). मुसलमान छी हम

के छल बाबर
आ के छल गजनी
हम नहि चिन्हैत छी,
दुख होइए
जखन लोक हमरा
बाबर आ गजनीक
वंशज कहैए

वंशज हम नहि छी
बाबर आ गजनीक
हम तँ
एहि माटि-पानि सँ उगल
माँ जानकीक संतान छी
मुसलमान छी हम
मिथिलाक मुस्लिम

रहय छी हमहुँ
सीता जीक
एहि पवित्र धरतीपर
मुदा
आपवित्र छी!

अनसोहात लागैए
जखन लोक हमरा
सीताक धरती पर
मलेच्छ कहैए
बात-बात पर
पाकिस्तानी आ तुरुक कहैए

हे यौ हमर भाइ!
अहाँ किएक नहि बुझैत छी
पाकिस्तान आ तुरुक नहि छै हमर घर
हम तँ
एतहुका धूरा-माटि फांकि क'
अशफाकउल्लाह
आ वीर अब्दुल हमीद छी

अर्थो नहि बुझैत छी हम
पाकिस्तानक
इहो नहि बुझैत छी जे
कतय छै तुर्की
केहेन अछि लाहौर आ करांची
कोन रस्ता छै
आ कोना जाइत छै ओतय
रेल सँ कि बस सँ
सेहो नहि बुझैत छी

किरकिट मे जखन
हारैए भारत
दु:ख होइए हमरो
सदमो लगैए
कहियो-कहियो तँ
निन्न नहि होइए

पठानी सूट
आ अरबी लेबास
हम नहि बुझैत छी
हम तँ फाटल लुंगी
आ गंजी पिन्हइ छी

बिरयानी आ तन्दूरी
हम नहि खाइत छी
हम तँ
दालि-भात
साग-भात
सूक्खल रोटी, नोन-मिरचाइ खाइत छी,

दुइटा रोटीक चिन्ता मे
मजूरी करैत छी,
मजूरी करैत-करैत
हमर दिन गुजरि जाइए
आ , हम बम बनबैत छी
ई पुलिस कहिए

कियो नहि चाहैत छैक
मलेच्छ जकाँ रहब
हमहुँ नहि चाहैत छी
मन करिए हमरो
दरोगा-बी.डी.ओ
डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर
आ कलक्टर बनबाक
मुदा
बनि नहि पबैत छी।
बनब कोना
बाबू छैक हमर हरबहा
माय करैत छैक रोपनी
पाँचटा भाइ छैक
आ पाँचटा बहिनो
भाइ सगरे
भदोही-बनारस
दिल्ली-मुम्बइ
आ कलकत्ता खटय छैक
दरी-गलैचा बीनैत छैक
कियो करैत छैक जरीक काज
किओ बैगक
किओ दार्जीक
किओ माय संग करैत छैक रोपनी
आ बाप संग हरबाही

किएक रहैत छैक मैला
हमर टोल, आ
किएक गंध अबैत छैक
हमर टोल सँ

किए हम
खून-पसेनाक अपन कमाइ
द' दैत छी
डॉक्टरक फीस मे
आ महाजनक सूदि मे
कनेक कहब अहाँ...?

5). मर्सिया

आब
नहि आबैत अछि
छठिक ठेकुआ
भुसबा आ पुरुकिया
दीवालीक मुंगबा लड्डू
तिलासकराँतिक लाइ
चूड़ाक बड़का झोरा

दहीक छाँछी

नीक जकाँ हमरा
मोन पड़ैए
होरी
दीवाली
छठि
तिलासकरांति
आ सरस्वती पूजा मे
जाइत रही हम
हरिहर काका
रामचंदर बाबा
सीता मौसी

सुनीता दीदीक घर,
दैत रही शुभकामना
सभ साल

पाबनिक बिहान भ' क'
अबैत रहय हमर घर
पथिया भरि सनेस

मुदा
आब हम
नहि जाइत छी
कोनो पाबनि मे

ने ओ आबैत छथि
आब हमर कोनो त्यौहा रमे
ने ईद मे
ने मुहर्रम मे

आब तँ
हमर काका
हमर बाबा
हमर दीदी आ मौसी
बिसरि गेल अछि
सेबइक स्वाद

बिसरि गेल अछि
या अली, या अली
या हुसैन, या हुसैन

आब
मुकेसबा, नरेसबा
नहि बनैत अछि
मुहर्रम मे जंगी,
नहि खेलाइत अछि
केयो झरनी

नहि गाबैत अछि कियो
मर्सिया।
●●●

गुफरान जीलानी (जन्म : 11 जनवरी 1987) मैथिली कविताक युवा पीढ़ी सँ सम्बद्ध सम्भावनाशील कवि छथि। हिनक उपस्थिति आ सक्रियता मैथिली कविताक लेल कइएक अर्थ मे महत्वपूर्ण अछि। हिनक कविता वर्तमान समयक विद्रूपताक स्पष्ट किन्तु सपाट आ वेदनामय विवरण सँ पाटल अछि।  गुफरान घुमा-फिरा क' बात करबाक अपेक्षा सोझाँ-सोझी बात करैत छथि। निडरतापूर्वक व्यवस्था सँ टकराइत छथि। स्वयं गुफरान कहैत छथि- "हम बस स्याही केँ स्याही आ सफेदी केँ सफेदी लिखैत छी। जँ सफेदी मे स्याही आ स्याही मे सफ़ेदीक अंश रहैत अछि तँ सेहो लिखैत छी"। 'लाल ओसक बुन्न' शीर्षक सँ एकटा काव्य-संकलन प्रकाशित। सम्प्रति मौलाना आजाद नेशनल यूनिवर्सिटी मे अध्यापन कार्य। हिनका सँ ghufranjeelani@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। 

नहि गाबैत अछि कियो 'मर्सिया' नहि गाबैत अछि कियो  'मर्सिया' Reviewed by e-Mithila on January 10, 2020 Rating: 5

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