कविता आ लाठी


विद्रोही : एकटा किंवन्दति। हिंदी कविताक एकटा एहन फक्कड़ कवि जे सत्ता प्रतिष्ठानक आँखि सँ आँखि मिला जीवन पर्यंत संवाद करैत रहल। एकटा एहन कवि जे जिवैत मे गुमनाम रहल मुदा मृत्युक बाद एकटा पीढ़ीक क्रांति चेतनाक गीत बनल। प्रसिद्ध गीतकार पद्मश्री गोपाल दास नीरज हुनका हिंदी के नजरुल इस्लाम कहि हुनक रचनात्मक क्रान्तिधर्मिता केँ रेखांकित कएलनि।

रमाशंकर यादव 'विद्रोही'क किछु कविता :

अनुवाद : विकास वत्सनाभ

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१. जन-गण-मन 

हमहूँ मरब
आ भारतक भाग्य विधाता सेहो मरताह 
मुदा हम चाहैत छी
जे पहिने जन-गण-मन अधिनायक मरए
फेर भारत भाग्य विधाता मरए
फेर साधूक कक्का मरए
माने सभटा बड़का-बड़का लोक पहिने मरि लिए
फेर हम मरी आराम सँ
ओमहर चलि कए वसंत ऋतु मे
जखन दाना मे दूध आ आम मे मज्जर आबि जाइत छैक
आकि फेर तखन, जखन महुवा चूब' लगैत छैक 
आकि फेर तखन, जखन वनतुलसी फुलाइत छैक 
धारक कात मे हमर अचिआ दहकि कए महकए 

आ मित्र सभ करए सिनेहबन्ध 
जे ई विद्रोही सेहो की तगड़ा कवि छल
जे  सभटा बड़का-बड़का लोक केँ मारि कए तखन मरल ।

२. नवका खेती 

हम किसान छी
अकास मे धान रोपि रहल छी
किछु लोक कहि रहल छथि
कि पगला ! अकास मे धान नहि जमैछ 
हम कहैत छियै पागल ! 
अगर जमीन पर भगवान जमि सकैत छै 
तँ अकास मे धानो जमि सकैत छै
आ आब तँ दुनू मे सँ कोनो एक भए कए रहतै
चाहे तँ जमीन सँ भगवान उखड़तै 
चाहे अकास मे धान जमतै

३. कविता आ लाठी 

रे दोस 
तूँ हमरा सँ मोनक हाल नहि पूछ 
तूँ हमरा सँ सोझे-सोझे मिजाजक गप कह
आ मिजाज तँ एखन ई कहि रहल छौ की 
मृत्युक मुँह मे लाठी ठेलि दी
आकि चुट्टीक मुँह मे आटां कोंचि दी
आ तूँ- तोहर मुँह
की चाहैत छौक  'आली जनाब'
स्वाभाविक छैक  जे  तूँ भूखल नहि छें
तोरा लाठीए चाहियौक
तँ क़ी -
तूँ हमर कविता केँ सोंटा बुझैत छें ?
हमर कविता वस्तुतः
लाठिए  अछि।
एकरा ले आ भाँज
मुदा ठहरि जो
ई ओ लाठी नहि छैक जे
सभ दिस भँजा जाइत छैक 
ई मात्र ओही दिस भँजाइत छैक 
जेमहर एकरा हम प्रेरित करैत छियै
मानि लें तूँ एकरा बड़का केँ विरुद्ध भँजबें  
भ' जेतौ
छोटका केँ विरुद्ध भँजबें 
न,
नहि भंजेतौ 
तूँ एकरा भगवान केँ विरुद्ध भँजबें  
भँ जेतौ
मुदा तूँ एकरा मनुख  केँ विरुद्ध भँजबें  
न,
नहि भँजेतौ 
कविता आ लाठी मे इएह अंतर छैक।

४. बीड़ी पिबैत बाघ 

से एखन अहाँ केँ हम नहि कहब
जँ कहब तँ अहाँ डरा जाएब 
हमर आगाँ बला एहि जेबी मे 
एकटा बाघ सूति रहल अछि 

मुदा अहाँ डराउ नहि 
एहि बाघ केँ 
हम तेना ट्रेंड कएने छी 
जे आब अहाँ देखू 
हमर आगाँ बला एहि जेबी मे एकटा बाघ सूति रहल अछि
मुदा अहाँ केँ थाह नहि लागत
जे बाघ छैक 
सोँझा बला जेबी मे एक-आधटा बाघ पड़ल रहए 
तँ कविता सुनाब' मे सुभीता रहैत छैक 
मुदा एकटा बात कहु ?
आइ हम दोस सभक बीच मे कविता सुना रहल छी 
तें हमरा जेबी मे एकेटा बाघ अछि 
मुदा जखन हम कविता सुनबैत छियै -'ओमहर'
ओमहर -जाहि दिस हमर शत्रु रहैत अछि
एसगर अपनहि बुत्ता पर 
तँ हमरा जेबी मे एक नहि दूटा बाघ रहैत अछि 
आ तखन हम अपन ओ ललका  बुसट पहिरैत छी
जकर, दोस सभ बड़ बड़ाइ करैत अछि  
जाहि मे सोझा मे दूटा जेबी छैक 
हम कविता पढ़ैत जाइत छी 
आ हमर बाघ सुतैत नहि अछि 
बीड़ी पिबैत रहैत अछि 
आ बीच-बीच मे 
धुआँक छल्ली छोड़ैत जाइत अछि...
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विकास वत्सनाभ सँ vikash51093@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। हिनक अन्य काज आ परिचय देखबाक लेल निम्न लिंक चटकाबी - 

एक्कैसम शताब्दीक हाट पर

आबो तेजु ई कोकनल बुधि

कविता आ लाठी कविता आ लाठी Reviewed by e-Mithila on December 08, 2019 Rating: 5

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