भोजन

राजमोहन झा 

कथा : भोजन


हम भितरका कोठरी मे कल्हुका क्लास लेल नोट तैयार करैत रही, आ ममता ड्राइंग रूम मे कॉपी जाँचि रहल छल। कने काल बाद ममता केँ सुनलहुँ रमुआ केँ जोर सँ आदेश दैत-खाना भ’ गेलौ रे, रमुआ? भ’ गेलौ तँ लगो। 
हमरा छल जे ई आखिरी नोट तैयार क’ ली, तहन उठी। जोर सँ बजलहुँ-हमरा कने ई नोट पूरा क’ लेब’ दिअ’। कोन हड़बड़ी अछि, एखन (घड़ी उठा क’ देखलहुँ) साढ़े आठे बाजल अछि।

-तँ साढ़े आठ अहाँ केँ कम्म बुझाइए? हमरा भोरे आठ बजे कालेज पहुँचि जएबाक अछि।


-हमरो काल्हि नौए बजे सँ क्लास अछि।- हम चिकरलहुँ।
-अहाँ केँ की अछि, अपन आठ बजे उठब। हमरा भोरे उठि सभ किछु करबाक रहैए। नोट पूरा क’ लेब अपन खएलाक बाद।
नहि मानतीह ई। हम किताब केँ तकिया पर उन्टा क’ राखि बाहर अएलहुँ। ममता कापी जाँचिए रहल छल। कहलिऐ-वाह, हमरा तँ बन्द करबा देलहुँ, आ अपने पोथा पसारने छी।
-इएह, जा रमुआ थारी अनैए!-कॉपी सँ मूड़ी उठौने बिनु ममता बाजलि।
-अच्छा, हम अहाँ केँ कए बेर कहने छी जे कम सँ कम नौ बाज’ दियौ। केओ सभ्य लोक नौ बजे सँ पहिने नहि खाइत अछि।
-तँ नौ तँ बाजिए जाएत खाइत-खाइत।-ममता कॉपी मे नम्बर चढ़बैत बाजलि।
हम ओकरा आगाँ सँ कॉपी झिकैत कहलिऐ-नौ बजे माने खा क’ उठी नहि, नौ बजे खाए बैसी!
-अच्छा एक्के बात भेलै।-ममता सोझ होइत बाजलि-अहीं जकाँ आठ बजे धरि हमहूँ सूतल नहि ने रहै छी। हमरा भोरे उठि...
-अच्छा एकटा कहू।-बात कटैत हम कने गम्भीर भ’ ममता केँ पुछलिऐ-भोरे उठि अहाँ केँ की सभ करबाक रहैए, जखन कि सभटा काज तँ रमुआ करैत अछि?
-अहा हा! आ रमुआ केँ भोरे भोर के उठबैत छै?-ममता चहकैत बाजलि-एक दिन हम छोड़ि दिऐ तँ ई छौंड़ा तँ आओर नौ बजे उठत। आ, एक बेर उठौला सँ उठि जाइत ई छौंड़ा, तहन कोन बात छलै। एह, फेर जा क’ सूति रहत। एकरा तँ दस बेर उठबियौ तहन जा क’ तँ एकर आँखि फुजैत अछि! कए दिन तँ हमरा पानि ढार’ पड़ल अछि छौंड़ा पर, तेहन ई अछि।
हमरा कने अमानुषिक जकाँ लागल। कहलिऐ ममता केँ-अहाँ बड़ निरदयी छी। ममता तँ बेकारे अहाँक नाम रखलक, जे केओ रखलक से। अच्छा, के रखलक अहाँक नाम सत्ते?
-आब छोड़ू, हमरा नहि मोन अछि के रखलक।-ममता अपन कॉपीक थाक उठबैत बाजलि। रमुआ पानिक जग आ दू टा गिलास आनि क’ टेबुल पर राखि गेल। ई एहि बातक पूर्व सूचना छल जे आब ओ थारी आनत। खाए पड़त।
हम ममता केँ कहलिऐ-अच्छा, अहाँ केँ एना नहि लगैत अछि जे हमर मतलब अछि, भोजन जे हम सभ करै छी नित्त दिन, से नहि लगैत अछि जे एकटा यांत्रिक प्रक्रियाक अन्तर्गत क’ लैत छी? माने, अपन आन सभ काज जकाँ? भोजन काज जकाँ नहि करबाक चाही।
-वाह, भोजनो तँ एकटा काजे भेलै। काज तँ भेबे केलै।
-तेना नहि। हमर मतलब ‘भोजन करब’ क्रिया सँ नहि छल। ‘भर्व’ तँ भेबे केलै। ‘वर्क’ नहि होएबाक चाही ई। एकरा ‘टास्क’ बुझि क’ नहि कएल जएबाक चाही।-हम बुझौलिऐ।
-अच्छा ई सभ फिलाॅसाॅफी अपन राखू अपनहि लग। अहाँक हिसाबें जँ चल’ लागी हम तँ भ’ गेल! कोनो काजे नहि हो।


रमुआ थारी राखि गेल। हम एकटा उड़ैत दृष्टि थारीक वृत्त मे दौड़ौलहुँ। बाटी केँ अपना आओर लग घुसकबैत हम ममता केँ पुछलिऐ-अच्छा, काल्हियो तँ भरिसक इएह आलू-परोड़ आ रामतरोइक भुजिया बनौने रहए! नहि?

ममता रोटीक टुकड़ी तोड़ि दालि मे डुबबैत बाजलि-तँ और की बनौत? आइ-काल्हि गनि-गुथि क’ इएह तँ तीन-चारिटा तरकारी भेटै छै, भाँटा, करैल आ कि इएह परोड़ आ रामतरोइ। परोड़ खाइत-खाइत मुदा हमरो मोन भरि गेल अछि सत्ते।
-खाली इएह नहि ने। हमरा तँ लगैत अछि, परोड़क बदला मानि लिअ’ जे करैले बनबय ई, तैयो हमरा नहि लगै अछि जे स्वाद मे कोनो विशेष अन्तर पड़’वला अछि। असल मे बनएबाक एकर जे पद्धति कहू वा प्रक्रिया छै, से एक्के छै। तैं चाहे परोड़ बनबओ वा करैल, स्वाद एके रंग होइ छै करीब-करीब। किछु हम सभ खाइतो तेना छी, जाहि मे स्वादक प्रायः बहुत स्थानो नहि रहै छै। ...नहि?
ममता पानिक घोंट ल’ क’ बाजलि-आब जे बनबैत अछि बेचारा, बना तँ लैत अछि! हमरा ओते समयो नहि रहैए जे किछु देखाइयो देबै।
हम मोन पार’ लगलहुँ जे ममताक हाथक भोजन पछिला बेर हम कहिया कएने रही। नहि मोन पड़ल। मोन भेल जे ममते सँ पुछि लिऐ। मुदा तुरन्त डर भेल जे एहि बातक ओ आन अभिप्राय ल’ लेत।
-आब की सोच’ लगलहुँ अहाँ?-ममता मुँह मे क’र लैत पुछलक।
-नहि, सोचब की? सोचैत रही जे ई सभटा निघँटेबाक अछि।-हम आगाँक थारी-बाटी दिस इंगित करैत कहलिऐ।
-हे, खा लिअ’ जल्दी। ओकरो छुट्टी हेतै!-हमरा देरी सँ चिबबैत देखि ममता टोकलक।
रमुआ दूधक कटोरा ल’ क’ आएल तँ ममता ओकरा पापड़ सेदि क’ आन’ कहलकै।
अच्छा, एना नहि भ’ सकैत अछि कहियो जे... हम कहैत रही एक दिन जँ एना करी...
-कोना करी?-ममता टोकि क’ हमरा दिस ताक’ लागल।
-असल मे हमर एकटा बहुत दिन सँ इच्छा अछि। इच्छा ई अछि जे एक दिन अहाँ हमरा पर जबर्दस्ती नहि करी खाइ लेल। हमर जखन मोन होएत, माने हमरा जखन खूब भूख लागत, राति मे एक वा दू बजे, अथवा जखन, तखन खाइ जाइ!-हम प्रस्ताव रखलहुँ।
-हँ, आ रमुआ बैसल रहत ता धरि?-ममता आँखि मे प्रश्न ल’ क’ तकलक।
-मानि लिअ’ ओ अपन खा क’ सूति रहत।-हम आँखि मे प्रश्न ल’ क’ तकलिऐ।
-नहि, हम नहि जागल रहब ता धरि। हमहूँ खा क’ सूति रहब। अहाँ लेल परसि क’ राखि देत, अहाँ अपन उठि क’ खा लेब जखन मोन हो!-ममता सोझे कन्नी काटि लेलक।


एसगरे खएबाक विकल्प हमर उत्साह ठंढा क’ देलक। रमुआ पापड़ सेदि क’ ल’ अनलक आ हमर सभक गप्प सुन’ ठाढ़ भ’ गेल। ममता ओकरा कहलकै-जो तोंहूँ अपन परसि क’ ल’ ले। खा क’ सूत जल्दी, भोरे उठबाक छौ।


हम पापड़ तोड़ि दाँत तर देलहुँ। कुड़कुड़बैत-कुड़कुड़बैत पता नहि हम कोना बहुत दिन पहिलुका देखल गाम परक एकटा दृश्यक आगाँ आबि क’ ठाढ़ भ’ गेलहुँ-बाबा भोजन पर बैसल छथि, आ मैंयाँ आगाँ मे पंखा ल’ क’ बैसलि छनि। कतेक रास गप्प आ सूचनाक आदान-प्रदान दुनू गोटे केँ एही मध्य होइन। बाबा बहुत रुचिपूर्वक भोजन करथि। धात्राीक चटनी हुनका दुनू साँझ अनिवार्य छलनि। बाबा केँ खाएल भ’ जानि तँ मैंयाँ भूमि पर हाथ रोपैत उठि क’ ठाढ़ होथि-थम्हू, दही नेने अबैत छी।-हमर बाल-मोन पर ई छवि लगैए बहुत गहींर जा क’ अंकित भ’ गेल अछि। तें हमरा आइयो ओहिना मोन अछि। एकटा कारण इहो भ’ सकैत अछि जे बाबाक भोजन करबाक ई दृश्य भोजनक प्रति एकटा आकर्षक स्वाद उत्पन्न करैत अछि। ओहि जमाना मे लोक होइतो छल भोजनक परेमी। मैंयाँ सभ दिन साँझ मे बाबा सँ पुछनि-आइ की तरकारी बनतै राति मे?-आ बाबा कहथिन। खाली तरकारीक नामे नहि, कोना बनतै सेहो कहथिन। जेना, भाँटा साग द’ क’, अथवा सजमनि मुरइ द’ क’!...

हमरा मोन भेल जे ई बात ममता केँ कहिऐक। मुदा हमरा लागल जे एकरा ओ सही परिप्रेक्ष्य मे नहि ल’ स्त्राी जाति पर पुरुषक आधिपत्य-माने एकरा नारी स्वातंत्रयक प्रश्न सँ जोड़ि क’ देखत। तें बात बदलि क’ पुछलिऐ-अच्छा, अहाँ केँ अपन दादा मोन छथि?


ममता दूधक कटोरा उठा ‘सिप’ कर’ लागल छलि। ओ कने काल हमर आँखि तकैत रहलि, जेना एहि प्रश्नक तात्पर्य बुझबाक प्रयास क’ रहल होथि। बाजलि-हँ, मोन छथि। मुदा एखन हमर दादा अहाँ केँ कत’सँ मोन पड़ि गेलाह?


-कत’सँ नहि, असल मे हमरा अपन बाबा मोन पड़ि गेलाह। अहाँ तँ हुनका नहि देखलियनि। अच्छा, मैंयाँ मोन छथि?
-किए नहि मोन रहतीह? मुदा अहाँ ई सभ फालतू बात की सोच’ लगैत छी थारी आगाँ मे राखि क’?
हम अप्रतिभ भ’ गेलहुँ। नीक नहि लागल ममताक ‘फालतू’ शब्द प्रयोग। हम पानि पीबि दूधक कटोरा थारी मे आगाँ रखलहुँ।


ममता सँ किछु कहब व्यर्थ छल। ओ अपन दूधक कटोरा शेष क’ नेने छलि आ हमर प्रतीक्षा मे बैसल छलि। हम ओकरा उठ’ कहलिऐ, मुदा ओ बैसल रहलि। बाजलि जे तखन तँ अहाँ आओर देरी करब!

कने काल बाद ओ फेर नेहोरा कएलक-हे, छुट्टी दियौ ओहू छौंड़ा केँ। जते जल्दी खएबै, ओकरहु काज होएतै।

हम बाबाक जमाना सँ आगाँ बढ़ि बाबूजीक युग मे आबि गेल रही। बाबा जकाँ ओ सभ दिन कोन तरकारी बनतै, से फरमान तँ नहि जारी करैत रहथिन, मुदा माइ सँ पुछथिन जरूर जे आइ की तरकारी बनल अछि? की तरकारी बनौतीह, से माइ अपने निर्णय लेथि। ई भार बाबूजी माइये पर छोड़ि देने रहथिन प्रायः। अथवा माइ अपनहि ई अधिकार स्वतः ल’ नेने रहथि। एक युग मे एतेक प्रगति तँ हेबाके चाही। हम सोचलहुँ, निर्णय जकर ककरो रहै होइ आ अधिकार चाहे जकर होइ, ई बात छलै जे भोजन एकटा रुचिकर आ आकर्षक वस्तु होइ छलै ताहि दिन। हमरा हँसबाक मोन भेल जे आब हमरा सभक युग मे आबि क’ ई निर्णयक अधिकार पति आ पत्नीक हाथ सँ निकलि नौकरक हाथ मे आबि गेल अछि।
हमर ध्यान ममता दिस गेल, जे हमर प्रतीक्षा मे बैसल छल। हमरा लागल जे एतीकाल सँ हमरा पर नजरि गड़ौने ममता हमर मोन मे आएल सभटा भाव जेना पढ़बाक प्रयास करैत रहल अछि। हम कटोरा उठा एके साँसे मे बचल सभटा दूध पीबि गेलहुँ।

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राजमोहन झा (27 अगस्त,1934-07 जनवरी, 2016) मैथिलीक समादृत साहित्यकार-संपादक छथि। वर्ष 1996 मे कथा-संग्रह 'आइ-काल्हि-परसू' लेल हिनका साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित कएल गेलनि। एक आदि एकांत, झूठ-साँच, एकटा तेसर, अनुलग्नक, आइ-काल्हि-परसू, गलतीनामा, भनहि विद्यापति, टिप्पणीत्यादि, इत्यादि-इत्यादि, प्रसंगतः आदि हिनक प्रमुख कृति छनि। सम्प्रति मैथिलीक  सुचर्चित पत्रिका 'आरंभ'क सम्पादकक रूप मे लब्धप्रतिष्ठित आ वर्ष 2009 मे प्रबोध साहित्य सम्मान सँ सम्मानित साहित्यकार। 
भोजन भोजन Reviewed by e-Mithila on August 27, 2019 Rating: 5

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