Sunday, June 11, 2017

यात्रीजीक पाँच गोट कविता

विद्यापतिक मैथिली जे एकाधिक भाषा कें भठ्ठा धरा सृजनताक व्याकरण सिखौलक ताहि मैथिली केँ प्रखरतम समकालीन अभिव्यक्ति सँ पुनः सोंगर लगा ठाढ़ करबाक श्रेय बीशम शताब्दीक महत्वपूर्ण घटना सँ निर्मित व्यक्तित्व यात्री के छनि। मैथिली कविता मे आधुनिकताक पसार, प्रगतिवादक स्वर,यथार्थवादक विस्तार,जनतेचनाक हुंकार,लोकसरोकारी प्रवृतिक विचार एहि लेखनी सँ अपन पाँखि खोलैत अछि। हिनक कविताक कथानक मे मिथिलाक गाम ,लोकाव्यवहार,माटि-पानिक सुवास,लोकक संघर्ष आ समृद्ध अतीतक अप्रतिम अभिव्यक्ति भेटैत अछि। ११ जून १९११ केँ हुनक जन्म भेल छलनि। एहि जन्मतिथि आइ पढ़ू हुनक पाँच गोट कविता :

१. हे मातृभूमि, अंतिम प्रणाम

अहिबातक पातिल फोड़ि-फाड़ि
पहिलुक परिचय सब तोड़ि-ताड़ि
पुरजन-परिजन सब छोड़ि-छाड़ि
हम जाय रहल छी आन ठाम
माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम
दुःखओदधिसँ संतरण हेतु
चिरविस्मृत वस्तुक स्मरण हेतु
सूतल सृष्टिक जागरण हेतु
हम छोड़ि रहल छी अपना गाम
माँ मिथिले ई अंतिम प्रणाम
कर्मक फल भोगथु बूढ़ बाप
हम टा संतति, से हुनक पाप
ई जानि ह्वैन्हि जनु मनस्ताप
अनको बिसरक थिक हमर नाम
माँ मिथिले, ई अंतिम प्रणाम!

२. नबतुरिए आबओ आगाँ 
तीव्रगंधी तरल मोबाइल
क्षणस्पंदी जीवन
एक-एक सेकेन्ड बान्हल!
स्थायी-संचारी-उद्दीपन-आलंबन...
सुनियन्त्रित एक-एक भाव!
परकीय-परकीया सोहाइ छइ ककरा नहि
खंड प्रीति सोन्हगर उपायन?
असह्य नहि कुमारी विधवाक सौभाग्य
असह्य नहि गृही चिरकुमारक दागल ब्रह्मचर्य
सरिपहुँ सभ केओ सर्वतंत्र स्वतंत्र
रोक तोक नहिए कथूक ककरो
राखने रहू, बेर पर आओत काज
अमौटक पुरान धड़िका...
धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष!
पघिलओ नीक जकाँ सनातन आस्था
पाकओ नीक जकाँ चेतन-कुम्हारक नवका बासन
युग-सत्यक आबामे...
जुनि करी परिबाहि बूढ़-बहीर कानक
टटका मंत्र थीक,
नबतुरिए आबओ आगाँ!!
उएह करत रूढ़िभंजन, आगू मूँहें बढ़त उएह...
हमरा लोकनि दिअइ आशीर्वाद निश्छल मोने;
घिचिअइ नहि टांग पाछाँ...
ढेकी नहि कूटी अपनहि अमरत्वता’क...
३.  वन्दना 
वैद्यनाथ मिश्र "यात्री"
हे तिरहुत, हे मिथिले, ललाम !
मम मातृभूमि, शत-शत प्रणाम !
तृण तरु शोभित धनधान्य भरित
अपरूप छटा, छवि स्निग्ध-हरित
गंगा तरंग चुम्बित चरणा
शिर शोभित हिमगिरि निर्झरणा
गंडकि गाबथि दहिना जहिना
कौसिकि नाचथि वामा तहिना
धेमुड़ा त्रियुगा जीबछ करेह
कमला बागमतिसँ सिक्त देह
अनुपम अद्भुत तव स्वर्णांचल
की की न फुलाए फड़ए प्रतिपल
जय पतिव्रता सीता भगवति
जय कर्मयोगरत जनक नृपति
जय-जय गौतम, जय याज्ञवल्कय
जय-जय वात्स्यायन जय मंडन
जय-जय वाचस्पति जय उदयन
गंगेश पक्षधर सन महान
दार्शनिक छला’, छथि विद्यमान
जगभर विश्रुत अछि ज्ञानदान
जय-जय कविकोकिल विद्यापति
यश जनिक आइधरि सब गाबथि
दशदिश विख्यापित गुणगरिमा
जय-जय भारति जय जय लखिमा
जय-जय-जय हे मिथिला माता
जय लाख-लाख मिथिलाक पुत्र
अपनहि हाथे हम सोझराएब
अपनेक देशक शासनक सूत्र
बाभन छत्री औ’ भुमिहार
कायस्थ सूँड़ि औ’ रोनियार
कोइरी कुर्मी औ’ गोंढि-गोआर
धानुक अमात केओट मलाह
खतबे ततमा पासी चमार
बरही सोनार धोबि कमार
सैअद पठान मोमिन मीयाँ
जोलहा धुनियाँ कुजरा तुरुक
मुसहड़ दुसाध ओ डोम-नट्ट...
भले हो हिन्नू भले मुसलमान
मिथिलाक माटिपर बसनिहार
मिथिलाक अन्नसँ पुष्ट देह
मिथिलाक पानिसँ स्निग्ध कान्ति
सरिपहुँ सभ केओ मैथिले थीक
दुविधा कथीक संशय कथीक ?
ई देश-कोश ई बाध-बोन
ई चास-बास ई माटि पानि
सभटा हमरे लोकनिक थीक
दुविधा कथीक संशय कथीक ?
जय-जय हे मिथिला माता
सोनित बोकरए जँ जुअएल जोंक,
तँ सफल तोहर बर्छीक नोंक !
खएता न अयाची आब साग !
ककरो खसतैक किएक पाग ?
केओ आब कथी लै मूर्ख रहत ?
केओ आब कथी लै कष्ट सहत ?
केओ किअए हएत भूखैं तबाह ?
केओ केअए हएत फिकरें बताह ?
नहि पड़ल रहत, भेटतैक काज !
सभ करत मौज, सभ करत राज !
पढ़ता गुनता करता पास-
जूगल कामति, छीतन खवास
जे काजुल से भरि पेट खएत
ककरो नहि बड़का धोधि हएत
कहबओता अजुका महाराज
केवल कामेश्वरसिंह काल्हि
हमरालोकनि जे खाइत छी
खएताह ओहो से भात-दालि
अछि भेल कतेको युग पछाति
ई महादेश स्वाधीन आइ
दिल्ली पटना ओ दड़िभंगा
फहराइछ सभटा तिनरंगा
दुर्मद मानव म्रियमाण आइ
माटिक कण कण सप्राण आइ
नव तंत्र मंत्र चिंता धारा
नव सूर्य चंद्र नवग्रह तारा
सब कथुक भेल अछि पुनर्जन्म
हे हरित भरित हे ललित भेस
हे छोट छीन सन हमर देश
हे मातृभूमि, शत-शत प्रणाम!!


४  . पत्रहीन नग्न गाछ 
पत्रहीन नग्न गाछ
लगइए कारी बस कारी, ठुठाकृति
अन्हार गुज्ज रातिमेँ
स्पंदनहीन, रक्ष, तक्षक शिशिर
पसरल अछि सबतरि दूबिक मोलाएम नवांकुर
बाँटि रहल रोमांचक - टटका प्रसाद सउँसे शरीरकेँ
मोन होइए, गाबी हन्हरिओमेँ वसन्तक आगमनी
आउ हे ऋतुराज,
नुकाएल छी कालक कोखिमेँ अनेरे।
दिअउ निश्छल आशीर्वाद
तकइए अहीँ बाट घासक पेंपी
आउ हे ऋतुराज
५. कविक स्वप्न 
जननि हे! सूतल छलहुँ हम रातिमे
नीन छल आयल कतेक प्रयाससँ।
स्वप्न देखल जे अहाँ उतरैत छी,
एकसरि नहुँ-नहुँ विमल आकाशसँ।
फेर देखल-जे कने चिन्तित जकाँ
कविक एहि कुटीरमे बैसलि रही।
वस्त्र छल तीतल, चभच्चामे मने
कमल तोड़ै लै अहाँ पैसलि रही।
श्वेत कमलक हरित कान्ति मृणालसँ
बान्हि देलहुँ हमर दूनू हाथकेँ।
हम संशकित आँखि धरि मुनने छलहुँ,
स्नेहसँ सूँघल अहाँ ता’ माथकेँ।
फेर देखल कोनमे छी ठाढ़ि मा,
किछु कहय ओ किछु सुनय चाहैत छी।
भय रहल अछि एहन कोनो वेदना
जाहिसँ शिरकेँ धुनय चाहैत छी।
बाजि उठलहुँ अहाँ हे कल्याणमयि!
उठह कवि! हमही थिकहुँ ओ देवता।
राति-दिन जकरा तकैत रहैत छह
आँखि मुनि, लय कल्पनाक सहायता।
विद्ध क्रौंचक वेदनासँ खिन्न भय
बाल्मीकिक कण्ठसँ फूटलि रही।
आइओ हम पड़लि कमला कातमे
छी उपेक्षित, पूल जनु टूटलि रही।
तोर तन दौड़ैत छहु कोठाक दिस,
पैघ पैघ धनीक दिस, दरबार दिस।
गरीबक दिस ककर जाइत छै नजरि,
के तकै अछि हमर नोरक धार दिस।
कय रहल छह अपन प्रतिभा खर्च तोँ
ताहि व्यक्तिक सुखद स्वागत गानमे।
जकर रैयति ठोहि पाड़ि कनैत छै
घर, आङन, खेत ओ खरिहान मे।
श्वेत कमलक हरित कान्ति मृणालसँ
बान्हि देलियहु तोहर दूनू हाथकेँ।
ओम्हर देखह हथकड़ी सँ बद्ध-कर
देशमाता छथि झुकौने माथकेँ।
हाय! ई राका निशा, तोँ मस्त भय
करइ छह अभिसार नीलाकाशमे।
कल्पनाक बनाय पाँखि उड़ैत छह
मन्द मलयानिलक मृदुच्छवासमे।
तोँ जकर लगबैत छह सदिखन पता,
सुनह कवि! हमही थिकहुँ ओ देवता।
जिन्दगी भरि जे अमृत-मन्थन करय,
जिन्दगी भरि जे सुधा संचित करय,
ओ पियासेँ मरि रहल अछि, ओकरे
अमृत पीबासँ जगत वंचित करय,
परम मेधावी कते बालक जतय
मूर्ख रहि, हा! गाय टा चरबैत छथि।
कते वाचस्पति, कते उदयन जतय
हाय! वन-गोइठा बिछैत फिरैत छथि।
तानसेन कतेक रविवर्मा कते,
घास छीलथि वाग्मतीक कछेड़मे।
कालिदास कतेक, विद्यापति कते
छथि हेड़ायल महिसवारक हेँड़मे।
अन न छैं, कैंचा न छैं, कौड़ी न छै’
गरीबक नेना कोना पढ़तैक रे!
उठह कवि! तोँ दहक ललकारा कने,
गिरि-शिखरपर पथिक-दल चढ़तैक रे!
हमर वीणा-ध्वनि कने पहुँचैत जँ
सटल पाँजर बोनिहारक कानमे।
सफल होइत ई हमर स्वर-साधना
चिर-उपेक्षित जनक गौरव-गानमे।
नावपर चढ़ि वाग्मतीक प्रवाहमे
साँझखन झिझरी खेलाइ छलाह तोँ।
वास्तविकता की थिकै’ से बुझितहक
बनल रहितह जँ कनेक मलाह तोँ।
आइ गूड़ा, काल्हि खुद्दी एहिना,
तोहर बहिकिरनी कोना निमहैत छहु?
साँझ दैं छहु हाय! ओ पतलो जरा,
गारि, फज्झति मोन मारि सुनैत छहु।
ओकर नोरक लम्बमान टघारमे
गालपरसँ कवि! हमहु बहि जाइ छी।
कल्पनामय प्रकृति तोहर देखिकेँ,
की करू हम ऐंचि कय रहि जाइ छी।
छह तोरा जकरा सङे एकात्मता,
सुनह कवि! हमही थिकहुँ ओ देवता।

No comments:

Post a Comment