कनी लीखि क' देखियौ ने!


सम्प्रति हैदराबाद रहनिहार मनोज शाण्डिल्य मैथिलीक युवा पीढ़ीक सुपरिचित कवि छथि. औखन धरि हिनक एकटा काव्य कीर्ति 'सुरुजक छाहरि मे' शीर्षक सँ प्रकाशित छनि. सँग्रह पुरस्कृत सेहो भेलनि अछि मुदा एहि सभ सँ फराक देखबा पर हिनक कविता सभ एकटा प्रश्नाकुल युवाक सोचबा योग्य कविता सब अछि. कविता मे निरंतर प्रश्न अछि. प्रश्न सँ लड़बाक जिजीविषा अछि. सहज भाखा आ साधल शिल्प अछि आ एहि सभ सँ खास गप्प ई कि हिनक कविता सभ मे कतहुँ कोनो हड़बड़ी नहि अपितु एकटा प्रौढ़ स्थिरिता अछि. एहि सभ सँ फराक मनोज शाण्डिल्य वर्तमान समयक विडम्बना सँ लड़ैत अप्पन अंदरक अंतर्द्वंद सँ सेहो निरंतर अप्पन कविताक मादे भिरैत रहैत छथि.

मनोज शाण्डिल्यक तीन गोट कविता 

१. रिक्तता
नेनपन मे पुबरिया टाटक ओहि पार बँसबिट्टी सँ अबैत भयाओन स्वर डेरा दैत छल हमरा बड्ड जोर जेना गुम्हरैत हो कतेको प्रेत एक संग, समवेत.. मुदा आब नहि डेरओबैत अछि कोनो प्रेत ने पोखरी-पूब बला राकस सभ आ ने भुतही गाछीक ओ गाछ धवल इजोरिया राति मे एकपेरिया पर बुलैत जकर ठारि सभ बुझाइत छल पिशाचक नमरल हाथ सन अट्टहास करैत हमर कंठ दिस बढ़ैत.. आब सियान भेलहुँ हम आब ड'र होइत अछि हमरा कल्पनातीत वास्तविकता सँ कोलाहलक माँझ चुपचाप फरैत चीत्कार करैत निस्तब्धता सँ.. आब भयाक्रांत रहैत छी हम चहुँदिस पसरल शून्यता सँ आब रोइयाँ भुलकैत अछि हमर मानव-कंठक रिक्तता सँ...

२. उपनिवेश


कखनो काल हमरा देखाइत अछि बिहुँसैत ढहैत देबाल ढहै छै देबाल तँ खण्ड-खण्ड भ' खसै छै छत सेहो संपोषक होयबाक ओकर मिथ्याभिमान होइत छै चूर-चूर मुदा, ढहत नहि ई देबाल कनी डोलत आ ढाहि देत छतकेँ अहिना बिहुँसैत उठैत-बैसैत कतेको भग्नावशेष मे देखने छी औखन ठाढ़ देबाल आ निपत्ता छत ठीके, अलबत्त!!

३. चैन 

सरकार
हमर घाम सँ सनायल देह
जे लगैत अछि अहाँकेँ असर्ध
से जँ सत्त पूछी तँ
अहींकेँ करैत अछि बेपर्द


करियौ ने कनी बिचार
अपनेक ई चिक्कन-चुनमुम
संगेमरमर सनक देह
ई जगमगाइत कोठा-महल
लहलहाइत खेत-खरिहान
क'ल-कारखाना, गोदाम-दोकान
उज्जर चमकैत दाँत
आ सदिखन भरल आँत
होइतय किन्नहु संभव
जँ रहितय हमरहु देह
अहीं सन चिक्कन-चुनमुन?


हमर ई बगय-बानि देखि
किए होइत छी एना भयाक्रांत
किए होइत अछि आश्चर्य?

बूझल जाय श्रीमान
सुख आ चैनक बँटवारा मे
अहाँ भनहि हँसोथि लेने होइ सुख
मुदा चैन आयल अछि हमरहि हिस्सा मे
धरि नहि करू कनिको दुःख
हम छी इहो बाँटय लेल तैयार
अहूँकेँ भेंटि सकैत अछि
राति भरिक
सोलह आना खाँटी निन्न
अनेरे भेल छी भिन्न

सरकार
एकटा नबका कथा
कनी लीखि क' देखियौ ने!
एक टुकड़ी रौद
कनी चीखि क' देखियौ ने!!
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रचनाकार संपर्क:


मनोज शांडिल्य
इमेल: manoj.jha.in@gmail.com


कनी लीखि क' देखियौ ने! कनी लीखि क' देखियौ ने! Reviewed by बालमुकुन्द on April 19, 2017 Rating: 5

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