Tuesday, August 2, 2016

अजित आजाद केर किछु कविता

'ई-मिथिला' पर आइ एकटा एहन जानल-मानल कवि अजित आज़ाद केर कविता देल जा रहल अछि. जिनक परिचय ककरो सं नुकायल नहि अछि. ई एकटा पैघ समयावधि धरि पत्रकारिता करैत रहलनिए. कइएक बर्ख सं मैथिली एक्टिविटी मे निरंतर लागल छथि. लेखकक विवशता आ पोथीजगत मे क्वालिटी पुस्तकक खगता कें देखैत सम्प्रति 'नवारम्भ ' प्रकाशनक स्थापना क' मैथिलीक पाठकवर्ग मे कतिपय उत्कृष्ट पोथी मुहैया करा चुकल छथि, आ वर्तमान मे सेहो एहि लेल प्रयत्नशील छथि. एकर अतिरिक्त, जेना हम पयलहुँए अजित आज़ाद व्यक्ति सेहो कम दिलचस्प नहि छथि. ई एकटा कुशल वक्ता छथि, जिनका सुनब एहि दुआरे सेहो नीक लगैए, किएक तं सहज सम्प्रेषणताक कारण श्रोताक संग ई जे तारतम्य स्थापित करैत छथि, ओ अपना-आप मे अद्भुत अछि. तत्काल हिनक कविताक संबंध मे एहि कारणें किछु कहैत नहि बनि रहलए, किएक तं अजितजी ओहि कवि मे सं छथि जिनका पढ़ी कें, सुनि कें हम कविता गढ़ब सिखिलहुँए, कविता बुझब सिखिलहुँए. तें एहि पर फेर कहियो. एखन अहां कें हिनक कविता सभक संग छोड़ि रहल छी, पढ़ि क' अपन विचार सं अवगत कराबी-(मॉडरेटर)


(१). प्रमाण


अपन जिद पर अड़ल
खुट्टा जकाँ गड़ल
विचार मे सड़ल
ओछानि पर पड़ल बूढ़ा
सदि घड़ी कनखरल रहथि हमरा पर
ओ वाम केँ मानथि काम
हुनक रग-रग मे रहनि रंग-रभस
स्त्री केँ वामांगी मानि
अपना केँ मानैत रहलाह वामपंथी
मरबो कयलाह उनटे मुहें
मुदा हुनक लहास केँ
गाय गोबर सँ नीपल चौरा लग
दकछिन पंथी बना देल गेलनि
बेटा मे लेब, बेटी मे देब
उचित मानथि ओ
हुनक मानब रहनि
जकरा बेटिये बेसी भेलैक
से ओकर भाग्य-दोष थिक
ओ बेसी काल बाजल करथि
सभटा होइ छैक लिखलाहा
हद त ई छल जे ओ
देवता सँ बेसी
मोदीक भक्त रहथि
बात-बात पर ओ कहथि
हम अपन बात पर अटल छी
आब एहि सँ बेसी की चाही प्रमाण।

(२). बुत्ता

बरू कतबो पानि
कतबो बाढ़ि कियैक ने आबौक
ठाढ़ हेबा लेल लोक
ताकिये लैत अछि ठीहा
कतबो अजबारल कियैक ने रहौ पृथ्वी
अजबारने रहैत अछि
पोन भरि जग्गह सभक लेल
कोरैला बच्चाक हाथ जेना
छुबय चाहैत अछि स्तन
तहिना छुबय चाहैत अछि लोक
साओन मे शिवलिंग
घरे लग ताकि लेलक अछि देवघर
असंख्य कामना-लिंगक बीच उपलाइत मनुक्ख
ताकिये लेत अछि अपन महादेव
अन्हार जंगल मे चमकैत
एकटा भगजोगनीक भरोस पर
नापल जा सकैए रस्ता
बबूरक गाछ सँ निकलब बंद
नहि भेलैक अछि लस्सा
एतबो लस्सा सँ
जिनगी मे आनल जा सकैए लैसि
छानल जा सकैए आँजुर मे शुद्ध जल
भीजल चार पर सँ उठैत धुआँक सौन्दर्य
स्त्रीगनक छाती मे राखल सलाइ सँ
बड्ड बेसी दूर नहि छैक भाइ।

(३). षड़यंत्र

फुल लोढ़नीक हेर मे
फूल लोढ़ितौं
डोका छनितौं
कमासुत बेदरा सभक संग
गेनी बनि नचितौं ककरो हाथ
रंग झहरबैत आकास मे फुटितौं
आकासतारा जकाँ
लहका खेलैतों
चिट्ठी लिखितौं
भौजी जे लिखबितय
मुदा नहि
कोनो मनोरथ पूर नहि भ सकत आब
जिनगीक कान्ह पर पड़ल अछि जुआक दाब
गाछ पर लटकल
खोदलहा आम पर झटहा फेकैत
बीत गेल अछि बहुत रास समय सेहो
भैया एक्सप्रेस पर सवार भ
बौआइत रहलहुँ रने-बने
फोक मुट्ठी सँ बहरा नहि सकल हवा पर्यन्त
पन्ना पर ढबकल रोशनाइ मे
देखैत छी अपन बिम्ब आ
सुति रहैत छी निभेर
कोनो सेहेन्तगर सपनाक आस मे
राटन सँ
बिन दाम पओने घुरैत किसान जकाँ
मनोरथक उधारी मे
जीबय पड़ैत अछि हमरो
जखन कि ई बूझल अछि
आजुक सभ सँ पैघ षड़यंत्र थिक जीयब।

(४). विज्ञापन

किनसाइत ई शहर चितकाबर आ नपुंसक अछि
सफ़ेद दाग आ नामर्दी भगयबाक विज्ञापन सँ
छारल अछि सभटा मकान आ छहरदेबाली
नव-पुरान बिनु पलस्तरक मकान सभ केँ
झाँपन दैत
बाँझपन दूर करबाक विज्ञापन सेहो
हुलकी द रहल अछि ठाम-ठीम
पन्नी सँ जाम भेल चाकर-चौरस नाला केँ
थुथुना रहल अछि सुग्गर
गुहानि गंध केँ थत्मारैत
तेज़ाबी भभक सँ आच्छादित आकाश मे
उड़ियाय रहल अछि किछु गुड्डी
धुआँ उगिलैत चिमनी सभ
लिखि रहल अछि एहि शहरक पटकथा
ट्रेनक गति
कम भेल अछि किछु
आउटर सिग्नल लाल अछि साइत
खिड़की कात बैसल-बैसल
एही गुनधुन मे छी हम
ई विज्ञापन सभ जँ नहि रहैत
त कोना जानि सकितहुँ एहि शहरक नाम
शहर भीतर शहर केँ
बाहरे सँ गेल छी जानि
कतबा पूर्ण, कतबा अपूर्ण
मुदा बहुत किछु जनतबक संग
पार क रहल छी टीशन
अगिला शहर सेहो
आरम्भ होयत
एही तरहक विज्ञापनी मुद्रा सँ
उज्जर दाग आ नामर्दी
पछोर क रहल अछि एखनहुँ हमर।

संपर्कसूत्र  :-

ईमेल- ajitazad@ibibo.com 
मोबाइल- 08434680149 

3 comments:

  1. ई ठीकठाक कविता छैक ,नवकविताक शिल्‍पसजगताक संग ,मुदा मैथिली मे मुकम्‍मल कविताक तलाश जारी रहबाक चाही ......

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  2. स्वनामधन्य कवि अजित आजाद वस्तुतः आजाद कवि छथि ! आजाद कहैत काल हमर तात्पर्य हिनक कविता मे परिलक्षित ओहि मनोभाव सभक रेखांकन सं अछि जाहि मे कवि एकोठाम झिझिरकोना खेलाइत नहि भेटैत छठी ! ठोकल संवाद करैत हिनक कविता पाठकक मष्तिष्क मे बहुत देर धरि पिंच करैत रहैत छनि ! बदलैत परिवेस आ बदलैत सरोकारक संग जिनगीक खाँटी अनुभव हिनक कविताक विशिष्ठता बनि बहराइत अछि ! औखन जखन की कविताक समकालीन स्वरुप पर मारीते रास टिका टिपण्णी भ' रहल अछि एहन समय मे हिनक कविता समकालीन कविताक सोंगर भ' सोंझा अबैत अछि ! एकटा पाठक कें रूप मे हिनक दोसर कविता संग्रहक (पहिल युद्धक विरोध मे बुद्धक प्रतिहिंसा )विह्वल प्रतीक्षा अछि !

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  3. अजित आजाद अस्सल मे वैह लिखैत छथि जे ओ छथि वा जे ओ अनुभूति करैत छथि। तैं कही सकैत छी जे एकटा ईमानदार रचनाकार छथि आ संगहि नियमित लेखक सेहो। बहुत कम्म वा गोटपगरे लेखक भेटैत छथि जे नियमित लिखथि। कविता सब नीक लागल। सबटा कविता अपना संगे पाठक के ठाढ़ करबा मे सफल अछि। शुभकामना आ बधाई !

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