Wednesday, August 26, 2015

मैथिली भाषा ओ साहित्य

ई-मिथिला पर आइ श्री शरदिन्दु चौधरीक आलेख 'मैथिली भाषा ओ साहित्य' देल जा रहल अछि. आइ-काल्हि शरदिन्दु चौधरी मैथिली भाषाक वर्तमान स्थिति पर चिंतन करैत मैथिलीक विकास आधारित आलेखक एकटा श्रृंखला लिखि रहल छथि. प्रस्तुत आलेख ओहि श्रृंखलाक दोसर कड़ी अछि - माॅडरेटर.

बिहारक (मिथिला)क मूल भाषाक रूपमे मैथिली सभ तरहेँ समृद्ध अछि तकरा कोनो तरहेँ अस्वीकार नहि कयल जा सकैछ. से एहि कारणे जे कोनो भाषाक समृद्धताक मापदंड साहित्यसँ होइत छैक आ ताहिमे मैथिली बिहारमे शिखर पर अछि से हमरालोकनि जनैत छी. मुदा वर्तमान कालमे भाषा आ साहित्यक जे स्थिति समाजमे अछि ताहिपर विचार कयल जायब आवश्यक अछि किएक तँ भाषा आ साहित्यक कार्यमे कतहु मिलान नहि बुझना जाइत अछि, दुनू अपना-अपना स्तरसँ अपन-अपन कार्यमे लागल अछि जखन कि भाषा-साहित्यक विकास तखनहि भऽ सकैछ जखन दुनू एक दोसराक पूरक, सहायक भऽ काज करय.

प्रसन्नताक विषय अछि जे मैथिली साहित्यक विकास लेल पटनामे मैथिली अकादमी, दिल्लीमे साहित्य अकादमी क्रमश: 1976 आ 1965 सँ कार्यरत अछि आ आब दिल्लीमे सेहो मैथिली-भोजपूरी अकादमी बिहारक मूल भाषा मैथिली-भोजपूरी साहित्यक विकासक हेतु क्रियाशील भऽ उठल अछि. अपन धरतीसँ सुदूर अपन साहित्यिक सुगंधकेँ परसबाक लेल विभिन्न प्रकारक क्रियाकलापक सरंजाम करैत रहैत अछि. मुदा चिन्ताक विषय ई अछि जे जतय साहित्यक अलख जगयबाक संकल्प लेल जाइत अछि ततय भाषाक प्रचार-प्रसार कोनो होअय ताहिपर कोनो निस्सन काज नहि भऽ रहल अछि. बौद्धिकताक छाहरिमे अबोध मनमे मैथिल चेतना जगयबाक काज ठप्प जकाँ भऽ गेल अछि. फुनगीपर मैथिली (साहित्य रूपमे) मे बेस स्पर्धा देखना जाइछ मुदा जड़ि (शिक्षा व्यवस्था) मे खाद-पानि नहि पड़लासँ मैथिली भाषाक ओ रूप देखबामे नहि अबैछ जे चारि करोड़ भाषा-भाषीक होयबाक चाही.

कोनो भाषा स्थान विशेषमे कोनो खास समाज-समुदायक भावाभिव्यक्तिक रूपमे विकसित भऽ अपन परिचिति बनबैत अछि आ अपन वाहक द्वारा सिंचित-पल्लवित होइत क्षेत्र विस्तार करैत अछि. मुदा ओकर वाहक जावत धरि ओकरा अपन अन्तरमे बसा कऽ रखैत छथि आ अपन घर-परिवार, समाजमे ओहि माध्यमसँ अपन भावाभिव्यक्तिक आदान-प्रदान करैत छथि तावत धरि ओकर जड़ि मजगूत रहैत छैक मुदा जखने ओ आन भाषाक प्रभावमे आबि मातृभाषाक व्यवहारमे कमी अनैत अछि तँ ओकर स्थिति दयनीय होअय लगैत छैक. आइ मैथिली मिथिलासँ आ भोजपूरी भोजपूरसँ चलि देशक राजधानी दिल्लीमे अपन संस्था बना लेलक अछि मुदा ओकर भाषा कोना धियापूताक शिक्षाक भाषा बनैक, कोना घर-घरमे मैथिली ओ भोजपूरी अपन साम्राज्य कायम रखने रहय ताहि दिस ने बिहारक शासन-प्रशासनक ध्यान छैक आ ने शिक्षा व्यवस्थामे लागल अधिकारी-पदाधिकारी ओ समाजसेवी-भाषासेवीकेँ छैक. गोटापगराक रूपमे जँ क्यो-क्यो काज कइयो रहल छथि तँ ओ ऊँटक मुँहमे जीरक फोरनक सदृश बुझना जाइत अछि.

एकटा छोटछिन उदाहरण द्वारा भाषा आ साहित्यक तुलनात्मक दृश्य देखल जा सकैछ. आइ बिहारक पटना विश्वविद्यालय, ललित नारायण मिथिला विश्वविद्यालय, बिहार विश्वविद्यालय, मगध विश्वविद्यालय, भागलपुर विश्वविद्यालय, भू. ना. मं. विश्वविद्यालय सहित नालंदा विश्वविद्यालयमे मैथिलीक पढ़ौनी होइत अछि मुदा भाषा-विज्ञानक रूपमे मात्र पं. गोविन्द झाक पोथी उपलब्ध अछि, शेष जे एक बेर प्रकाशमे आयल से दुतीयाक चान भ' गेल. मुदा साहित्यिक पोथीक जहाँ धरि प्रश्न अछि, सभ अपस्यांत छथि जे हमर पोथी पाठ्यक्रममे लागय तँ हमर. भाषा संबंधी पोथी दस वर्षमे एकाध टा प्रकाशमे अबैत अछि मुदा साहित्यिक पोथी प्रत्येक वर्ष सैकड़ामे आबि रहल अछि. ज्ञान संबंधी पोथीक तँ मैथिलीमे नितांत अभाव अछि जाहिसँ भाषा-भाषी मैथिलीसँ प्रत्यक्ष रूपें जुड़ि सकैत अछि. कोनो प्राध्यापक आब विद्वान बनय नहि चाहैत छथि, साहित्यकार बनि इतिहास-पुरूष बनबा लेल अपस्यांत छथि.

भारतीय संविधान मैथिली भाषाकेँ आठम अनुसूचीमे स्थान द' भाषाक विकास होअय तकर मार्ग प्रशस्त करबाक व्यवस्था देलक अछि मुदा से काज नहि भ' रहल अछि. एहि प्रकारे मैथिली आब संघ लोकसेवा आयोग एवं बिहार लोकसेवा आयोगक परीक्षामे शामिल भ' पठन-पाठनक दर्जा पाबि गेल अछि. ओहूठाम यैह समस्या विद्यमान अछि- भाषा विज्ञानक सामग्रीक तँ वैह हाल अछि मैथिली साहित्यक इतिहास धरि अद्यतन नहि अछि. डाॅ जयकांत मिश्रक 1949 मे प्रकाशित शोधग्रन्थ संशोधित रूपमे इतिहासक रूपमे चलि रहल अछि, 1983-84 मे लिखल दुर्गानाथ झा श्रीश ओ दिनेश कुमार झाक लिखल क्रमशः मैथिली साहित्यक इतिहास ओ मैथिली साहित्यक आलोचनात्मक इतिहास पढ़बा लेल विद्यार्थी विवश अछि. बालगोविन्द झा 'व्यथित' क संक्षिप्त इतिहासक 1988 मे आयल. अंग्रेजीमे 1976 मे राधाकृष्ण चौधरीक तँ 2004मे डाॅ देवकांत झा आधुनिक मैथिली साहित्यक दर्शन करौलनि अछि तँ एहि सभसँ हटिक' देवशंकर नवीन मैथिली साहित्यक परिदृश्य प्रस्तुत कयलनि. की साहित्यक जे विराटता अछि से एहि सभसँ विद्यार्थीक जिज्ञासाकेँ शान्त क' सकत ? कथमपि नहि. विभिन्न विश्वविद्यालयक पाठ्यक्रम एवं प्रतियोगी परीक्षाक पाठ्यक्रमकेँ जँ सोझाँमे राखि सामग्री ताकल जाय तँ ओकरा उपलब्ध करब ओतबे कठिन अछि जतेक जँ ई पूछल जाय जे दस वर्षमे प्रकाशित कथामेसँ नीक पाँच टाक नाम बताउ अथवा नीक कविताक शीर्षक कहू.

एहिठाम हम भाषाक चर्चक संग, साहित्यक इतिहासक संग पांच-दस साहित्यक रचनाक प्रश्न सोद्येश्य उठौलहुँ अछि किएक तँ भाषाक संग साहित्य चलैत अछि फराकसँ नहि. जँ भाषा नहि रहत तँ ओकर साहित्यकेँ पढ़त ! मुदा आजुक साहित्यकार एहि बातकेँ बिसरि जाइत छथि जे भाषा जतेक लोकप्रिय ओ लोकोपयोगी होयत ततवे हुनक मान-दान होयतनि. हुनका ई बुझबाक चाही चाहियनि जे भाषा रूपी शरीरक ओ मस्तिष्क छथि आ हुनक शरीर स्वस्थ रहने मस्तिष्क काज करतनि. दोसर तरहें ईहो कहल जा सकैछ जे मस्तिष्कक ई दायित्व रहैत छैक जे ओ अपन शरीरकेँ स्वस्थ रखबा लेल सक्रिय रहय. खास क' मैथिलीमे देखल ई जा रहल अछि जे मैथिली भाषामे सक्रिय साहित्यकार, प्राध्यापक , शिक्षक, समीक्षक सभ गोटे मस्तिष्केक रूपमे काज करबा लेल उताहुल छथि शरीरक ध्यान रखनिहार क्यो नहि. साहित्य-समीक्षा अथवा इतिहास लेखनकालमे सभ अपने गट्टी भरि रहैत छथि, व्यापकतामे नहि, गुणवत्तामे नहि. परिणाम ई अछि जे निचला खाढ़ीमे मैथिली निप्पता भेल जा रहल अछि आ फुनगीपर मैथिली चतरल अछि - अमरलत्ती जकाँ.

आइ साहित्यिक लेखन आ पाठकक संख्याक बात होइछ तँ कहल जाइछ - 'जतवे लेखक ततवे पाठक'. एकरा जँ प्रत्यक्ष देखबाक होअय तँ कोनो कवि गोष्ठी वा कथा गोष्ठीमे देखल जा सकैछ. जखन की होयबाक ई चाही जेना एकटा विद्यालय-महाविद्यालयमे होइछ- शिक्षक एक-श्रोता अनेक, जेना कोनो प्रवचनमे होइछ- प्रवचनकर्ता एक-श्रोता अनेक. आखिर की कारण अछि जे साहित्यक पाठक कम भ' गेल अछि, दिनानुदिन कमे भेल जा रहल अछि ? एहि विषयपर गंभीर चिंतन होयबाक चाही. हमरा जनैत साहित्यक लोकप्रियताक मूल रूपमे दूटा काज कयल जाय तँ भाषा- अपन मातृभाषाक विकास तँ होयबे करत जे ओकरा संग अनुराग सेहो बढ़त. पहिल, आपसी वार्तालाप मैथिलीमे करी एवं एक-दोसरासँ पत्राचार सेहो मैथिलीमे करी, दोसर प्रत्येक नेनाकेँ छोट वयसमे अंग्रेजी, हिंदीक संग-संग मैथिली सेहो पढ़ाबी आ परिवारमे एवं मित्रमंडलीमे उपहारस्वरूप मैथिली पोथी अवश्य दी.

हम स्वंय तीन वर्षक वयससँ पटनामे रहैत छी जत' भोजपूरी एवं मगही भाषाक चलन छैक आ सामान्यतया बाहरमे लोक हिन्दीमे बजैत अछि मुदा जेँ कि हमर परिवारमे मैथिलीमे बाजल ओ पत्राचार कयल जाइत अछि तें हमर मैथिली सुरक्षित ओ संरक्षित अछि. बोनसमे पटनामे रहबाक कारणे कखनो काल अवसर विशेषपर मगही-भोजपूरी सेहो बाजि लैत छी. मैथिली-भोजपूरीक समस्यापर साहित्यिक विमर्श लेल वयोवृद्ध भोजपूरी साहित्यकार पाण्डेय कपिल ओ युवा आन्दोलनकर्ता अजय उपाध्याय संग सेहो उठैत-बैसैत छी. कहबाक तात्यपर्य ई जे साहित्य-सृजन ओ भाषाक विकासमे कतहु उपरौंझ ओ कतहु न्यूनताबोध नहि हेबाक चाही. जे जाहि योग्य छी, जत' छी ततहिसँ भाषा ओ साहित्यक सेवा क' सकैत छी.

वर्तमानमे मैथिली साहित्यक हाल ई अछि जे कोनो पोथी जे छपि क' उतिउत्साहमे अबैत अछि से पाठकक अभावमे पड़ले रहि जाइत अछि. तीन सय पोथीक संस्करण सेहो नै बिकाइत अछि. एहन सन जेना अपन भाषाक पोथी पढ़लासँ की होयत. यद्यपि साहित्यिक पोथीक एहने हाल हिन्दी सन समृद्ध ओ लोकप्रिय भाषाक सेहो अछि मुदा मैथिलीक तँ भिन्ने बथान अछि. गत पाँच वर्षमे जतेक पोथी आयल अछि ताहिमे निसंदेह 20-25 टा पोथी एहन अछि जे ज्ञानक दृष्टिसँ अथवा ई कही जे साहित्यिक विशिष्टताक दृष्टिसँ परिपूर्ण अछि तैयो पाठकीय दृष्टिक अभाव अछि. बुकस्टाॅलपर जा पोथी कीनबाक अभ्यास नहि अछि मैथिलीमे.

साहित्यक पोषण, रक्षा ओ प्रतिष्ठा लेल आवश्यक अछि पाठकमे भाषा प्रेम जगायब. आ ई प्रारंभ भ' सकैत अछि प्राइमरी स्तरमे ज्ञान अर्जनक माध्यम मैथिलीकेँ बनौलासँ. ई मिथिलाकक लोकक कर्तव्य तँ छैके जे सरकारक सेहो दायित्व छैक जे ओ मैथिलीक माध्यमसँ पढ़य आ पढ़ाबय. जावत शिक्षा अर्जनक माध्यम मैथिली नहि बनत तावत ओकर साहित्य नहि बढ़ि सकैछ. प्राचीन कालमे संस्कृत साहित्य एहि कारणे लोकप्रिय भेल जे कि संस्कृत माध्यमसँ शिक्षा देल जाइत छल. पढ़ल-लिखल बहुतो बूढ़-बुढ़ानुस जेना आइ संस्कृतक उद्धरण दैत छथि की आजुक लोक द' सकत ! काका कालेलकरक कहब छनि - 'साहित्य की उन्नति जनता की उन्नति के साथ होती है'. अर्थात् जावत जनतामे भाषिक चेतना उत्पन्न नहि कयल जायत तावत समाजक साहित्यिक सौंदर्य विकसित नहि भ' सकत. साहित्यिक विकास लेल, साहित्यिक प्रतिष्ठा अर्जन लेल वर्तमान समयमे सभसँ पहिल काज ई होयबाक चाही जे मैथिलीमे ज्ञान संबंधी पोथी, चाहे ओ इतिहासक हो, भूगोलक हो अथवा विज्ञानक हो निश्चित रूपे अयबाक चाही जकरा पढ़बामे सामान्य भाषा-भाषी रूचि ल' सकय. एकर प्रचार-प्रसार हो जे मैथिलीमे सभ विषयक पोथी उपलब्ध अछि. जखने कोनो व्यक्तिमे ज्ञानक माध्यम मैथिली बनतैक ओकर मनमे साहित्य रसास्वादनक भूख अवश्य जगतैक. ओ साहित्यमे आनंद ल' सकत. सत्य तँ ई अछि जे जाहि भाषामे दुनियाक ज्ञान सम्पदाक परसबाक हेतु प्रचुर भंडार छैक ताहि भाषाक साहित्यो बजारमे अपन मूल्य असूलि लैत अछि. मैथिली साहित्यकेँ सेहो अपन मूल्य असूलबा लेल भाषा-ज्ञान भंडारकेँ समृद्ध क' भाषा-भाषीक बीच जाय पड़तैक.

एहि श्रृंखलाक पहिल भाग पढ़बाक लेल लिंक चटकाओल जा सकैछ-  http://www.emithila.in/2015/02/blog-post_14.html

सम्पर्क:
2A/39, टेक्सट बुक कालोनी
इन्द्रपुरी, पटना -24
मो. 09334102305

(प्रथमसः घर-बाहर मे प्रकाशित)

1 comment:

  1. बहुत निक लेख सर जी
    बधाई

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