तिरोहित होइत स्त्रीत्व


प्रियंका मिश्रा केर किछु कविता ::


1). असौकर्य 

अहाँके 
असौकर्य अछि आइ 
हमरा मुँह सँ निकसल छोट सन शब्द सँ 

मुदा हमरा तँ
कनियो असोकर्य, मिसियो भरि ग्लानि 
नहि भेल छल तहिया 
जहिया अहाँ थमओने रही हमरा हाथ मे 
एकटा गुलाबक गुलदस्ता 
आ ओकर बीच मे राखल 
एकटा प्रेम -पत्र 
जे गाबि उठल छल 
मानवताक गीत ओहिदिन 
जकर मोहक धुनपर अनचोक्कहि 
नाचि उठल छल 
अनन्तकाल सँ पेट मे मूड़ी घुसिअओने 
स्तब्ध पड़ल हमर मन - मयूर 

ओहि दिन सेहो 
कहाँ असौकर्य भेल रहय हमरा 
जहिया अहाँ हठात् लगओने रही ग'र 
कान मे नहुएँ सँ कहने रही 
एहि सँ बेसी पैघ मुदा मिठगर शब्द 
आ बरसि गेल रहय 
बिनु मौसमे हमर आँखिक बदरी 
जे तहियो नहि बरसल हएत एना 
जहिया गमओने रहल हएब 
अपन सभ सँ प्रिय वस्तु 
अपितु तकर बाद देखने रही हम 
एकटा नवका उजास 
जाहि मे फरिच्छ भ' लौकय लागल रहय
जिनगीक एकहक मकसद 

हमरा तँ रत्ती भरि असौकर्य नहि भेल 
अहाँक ओहि शब्द सभ सँ 
जे नहुँ - नहुँ जन्म द' रहल छल 
कइएकटा स्वप्न केँ 
रचि रहल छल एकटा मोहक 
आभासी संसार 
जाहि लेल बनत यात्रा-पथपर 
देखाइत रहल 
डेग मिलवैत अहाँक पएर 
बाँहि पुरैत अहाँक हाथ 

मुदा यैह हाथ 
जहिया नाग बनि डँसि लेबाक यत्न मे बढल
अचानके हमर धवल अस्तित्व दिस 
अहाँक निरघिन लिलसाक पएर 
नाँघय चाहैत छल गरिमाक लक्ष्मण रेखा 
पहिलबेर भेल छल असौकर्य हमरो 

बूझि गेल रही हम 
अहाँक नजरि मे 
की होइत छैक स्त्री आ ओकर प्रेम 
बुझा गेल छल हमरा 
ओहि कृत्रिम उजासक साँच 
जे धधरा बनि एखनहुँ लहकि रहल छल 
अहाँक आँखि मे 
जाहि मे खाक भ' रहल छल जरि क' 
हमरे सन कइएकटा 
सपना आ विश्वास 

अपना संग बहुतोक जरैत स्वप्न - संसार केँ देखि 
टूटि चुकल छल हमर धैरजक बान्ह 
फुफकारि उठल छल स्त्रीत्व 
जाहि सँ ध्वनित भ' रहल अछि 
एखनहुँ हमर असौकर्य 

हमर मौन विहित छल अहाँक 
हमर बाजब अछि असहज अहाँ लेल 

मुदा जाहि सँ भ' रहल अछि 
अहाँकेँ असौकर्य 
ओ ( मी टू ) एकटा शब्द मात्र नहि 
शंखनाद थिक एकटा ...!

2). घोषणा

हमर सुन्दरताक प्रशंसा मे
अहाँ गबैत रहल छी
सौन्दर्य-गान बहुतो
रचैत रहल छी
श्रृंगार-काव्य घनेरो
हमर देह-यष्टिक वर्णनलेल
अहाँ रचलहुँ 
मारितेक रास अकासी-असम्भव उपमान
अहाँ कहैत रहलहुँ हमरा
देवि, अप्सरा, चान, फूल नहि जानि की-की
मुदा बुझि नहि सकलहुँ
मनुक्ख कहियो
हृदयक व्यथा केँ 
अदौसँ अपन करेजपर उघैत
हमर उद्विग्न मोन मे 
पजरैत रहल अछि 
कइएक टा भाँगल सपनाक चिनगी
लहकैत रहल अछि 
स्वतंत्र जिजीविषाक आगि
सदिखन
एहि आगिक इजोत मे आब
हम नांघि देमय चाहैत छी 
अँगनाक बाहरक ओ लछुमन-रेखा
जाहि पर चौखड़ी मारने बैसल
लपलपबैत रहलहुँ अछि 
अपन खाधुर जीह अहाँ
काढ़ैत रहलहुँ अछि 
रीति(?) ओ नीति(?)क फेंच
बोकरैत रहलहुँ अछि 
शील ओ परम्पराक जनमारा विक्ख
आब चान सन हम
बिजुरी छिटकबैत अपन आँखि सँ
ठनका खसा
भस्म क' देब' चाहैत छी
अहाँक लिखल सभ संविधान केँ...।

3).तिरोहित होइत स्त्रीत्व

बाँझ पड़ल बौद्धिकताक गर्भ सँ
जखन छहिल जाइछ कारी खट्खट्
पुत्र प्राप्तिक मनोरथ 
आ किलोल क' उठैछ कोनो दिव्य
नन्हकिरबी छौंड़ी

डबडबा उठैछ सगरे समाजक आँखि
जाहि मे तिरोहित होइत स्त्रीत्व केँ
परिछैत रहैत अछि अनगणित मशीनक
अगराही लगबैत अखियास
जाहि मे भस्मीभूत होइत रहैछ लाखक लाख स्वप्न 
यथार्थक धरती पर पयर रखबा सँ पूर्वहिँ
बनि ठनि केँ ठाढ रहैत छैक एकटा विशिष्ट सन पतियानी 
जकर एक हाथ मे रहैछ वेदीक खोंचहा बाँस
तँ दोसर हाथ मे लालसा ओ लिप्साक पैघ सन बाकस
जे जँ रहि जाइछ दुर्योगहुँ सँ खाली
तैयार भ' जाइछ एकटा आओर नवका अछिया
जाहि मे सुनगैत रहैत छैक कतोक 
आँखिक कोप 
जाहि सँ पुनि-पुनि दागल जाइछ
स्त्रीत्वक ठेहुन
मधुश्रावणीक टेमी जकाँ

जाहि सँ बढि सकैक कोनो दग्ध पुरुखक
सुदीर्घ जीवन यात्रा
आ ओ स्वयं बनल रहय ओहि यात्राक निदग्ग अनुचरी
कहा सकय ओहि पुरुखक सती सावित्री अर्द्धांगिनी
जकरा लेल बन्न भ' जाइछ सबरीमालाक 
केबाड़ी
छुआ जाइत छैक गहबरक सीरा आगू

महिनाक कोनो चारि दिन
जहिया नहि  देखलक क्यो आइ धरि
मौलाइत 
ओकरा छूबा सँ कोनो तुलसीक गाछ केँ
आकि कोनो पीपरक पात केँ
मुदा मौलाइत रहल अछि सदति
ओकरहि विपरीत लिंगी संतानक अजस्र आभा
ओकर नैसर्गिक स्वतंत्रताक लेल उठाओल गेल
एकहक डेग पर
आ ओ ठमकि केँ ठाढि, प्रतीक्षारत रहल अछि
ओहि आदेशक
जाहिपर अंकित रहैछ रह-रहाँ
छद्म सामाजिक प्रतिष्ठाक ओ सभटा एक भगहा शर्त

जकर गछार मे दुबकलि ओ नहि बनि पबैत अछि कहियो स्त्री सँ मनुक्ख
नहि बुझा पबैत अछि अपन मोन केँ
संविधान मे उल्लिखित समताक अर्थ
जकरा उद्दृत कएल जाइत अछि रहरहाँ
लोकतंत्रक ओहि सभटा महापर्व मे
पाड़ि देल जाइत अछि हाथक तर्जनी पर
समानताक उदग्र चेन्हासी

आ ओ बनल रहि जाइत अछि केवल 
एहि पुरुखवादी व्यवस्थाक एकटा सुन्दर झुनझुना

जकरा बजा-बजा हड़पल जा रहल अछि
ओकर अपनहु अद्धा अस्तित्व 
आ बना देल जाइछ ककरो अर्द्धांगिनी
अर्थात् अपनहि संपूर्णता पर नहि रहि जाइछ ओकर समुच्चा अधिकार

आ तेँ लड़ब जरूरी भ' जाइछ ओकर
हिस्सा मे छोड़ल
ओहि एक तिहाइ अधिकारक लेल
जाहि पर गबदी मारने बैसल रहल अछि अदौसँ समुच्चा पुरुखवादी संसार
ई झुट्ठा सरकार।

4). जिनगीक बाट मे गाम

सगर राति अनेरे बहैत रहल नोर 
आ ताहि नोर मे नुकायल छल भोरक प्रतीक्षा
ओहि दिन 
टिशन सँ बहराइत काल
अपन जिनगीक अंकुरी समेटैत
अपन अस्तित्व केँ मुट्ठी मे कसने
अपन प्रियाक अलसायल आँखि सँ दूर
अपन गाम छोड़ैत 
ओकर करेज फाँक भेल छलैक
मुदा जिनगीक  सत्य केँ आत्मसात करैत 
जठराग्नि सँ जरैत सम्पूर्ण देह 
से आब संहिया गेल छलैक माथ मे 
ओकर बूढ़ माय जिनगीक सांझ बनल ठाढ़ भेल छैक
आ कुनु चौबटिया पर अबैत ब्लूका कपड़ा मे साइकिल पर सबार छैक धान सन बढ़ैत बेटी
आ पथरायल आँखिये निःशब्द तकैत ठाढ़ ओकर पत्नी 
मुदा ओ जा रहल छैक
अपना मे अँगेजने कतेको जद्दोजहन
किछु चिंतन मे घटाटोप डूबल
सभ गली-घर मे ठोकर खाइत
कोनो दिल्ली /कोनो कलकत्ता 
वा कोनो आन शहरक कोण मे
एहिलेल जे कमा लैत सय पचास टाका
आ भोगैत रहतैक जिनगीक संताप
मौला गेलै ओकर स्मृतिक उपवन  
जकरा ओ पटौने छल बूंद -बूंद क' 
आब ओकरा अस्तित्वहीन लगैत छैक जिनगी 
अतीतक खुट्टा मे खूंटेसल करैत अछि
एकगोट प्रतीक्षा 
निरीह आ निरासक्त भेल
जिनगीक बाट मे गामक प्रतीक्षा 

5). सिसकि

धरा गगन पताल सभ सिसकि रहल स्व हालपर
तरंगिनी बसात मृद प्रदूषणक अछि गाल‌तर

विध्वंश केर पीठ पर लिखा रहल विकास छै
ओजोन केर भूर सँ बेपर्द सन अकास छै

पघिल रहल  ग्लेशियर डूबा रहल छै सिंधु तट
बैगनी परा किरण सँ कर्क रोग सन्निकट

विखाह भेल छै हवा धुआँ-धुआँ नगर-नगर
उगलि रहल होअ वाहिनी जहर जेना डगर-डगर

उजरि रहल छै जिन्नगी ग्रहण लगल छै श्वास पर
कुहरि रहल पर्यावरण आसन्न निज विनाश पर

रसायन विक्ख सँ भरल बना रहल तरनि गरल
पथार जीव-जन्तु केर ज'ल मे मरल पड़ल

पारितंत्र संतुलन बिगड़ि रहल खने खने
सृष्टि काल गाल मे समा रहल शनै- शनै

हाकरोस क' रहल धरनि ध्वनि तरंग सँ
स्याह छै मनुक्ख मुँह अवसादक रंग सँ

मिसकैरेज बीपी बहीर होएब आम छै
बहुसंख्यक लोक केर उतरल सन चाम छै

पृथ्वीकेर पेट मे पाॅलीथिनक भरमार छै
उस्सर जमीन खेत गिरहत लाचार छै

कामना अनंत अंत अवनि नहि होअ अभीष्ठ
प्रगतिक प्रकृति नहि किंचित होअ निज अनिष्ट

संयम अनुशासन सँ बान्हल जाइ प्रगति पंथ
संतुलन बनल रहय सृष्टिक दिग- दिगन्त

चेत जाउ हे मनुक्ख भागू जुनि आँखि मूनि
थम्हू कनेक लिय' पतनक सनेश सुनि

चाहय छी सम्यक उत्थान जँ मानवता केर
सोचू विचारि रूकि भेलय बहुत अबेर
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प्रियंका मिश्रा मैथिली कविताक नव्यतम पीढ़ी सँ सम्बद्ध कवियित्री छथि। हिनक गिनती ओहि स्त्री स्वर सभ मे कएल जाइत छनि, जनिका मे मैथिली कविता केँ आगाँ बढयबाक सम्भावना देखल जा रहल अछि। सम्भावना केँ एकटा नम्हर बाटक दूरी तय करए पड़ैत छैक; ई बाट बहुत धैर्य आ परिश्रमक मांग करैत छैक। हिनका आजुक एहि सोशल मीडियाक युग मे, बहुत सस्त मे देल जा रहल उपहार किंवा अपमान दुनू सँ स्वयं केर कविक रक्षा करैत आगाँक यात्रा तय करबाक चाहियनि। 
प्रियंका छात्र यूनियन एम.एस. यू. सँ जुड़ल रहलीह अछि आ विभिन्न आंदोलन, धरना प्रदर्शन आदि मे सहभागी सेहो बनैत रहलीह अछि। चेतना समिति द्वारा निबंध-लेखन केर क्षेत्र मे देल जाए बला 'महेश्वरी सिंह महेश निबंध पुरस्कार-२०१९' सँ सम्मानित प्रियंका सम्प्रति पटना विवि मे मैथिली विषय सँ स्नातकोत्तर कए रहलीह अछि। हिनक सँ priyankamishra26595@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। 
तिरोहित होइत स्त्रीत्व तिरोहित होइत स्त्रीत्व Reviewed by e-Mithila on December 05, 2019 Rating: 5

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