मकड़ी


कथा :: मकड़ी : प्रदीप बिहारी

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सौंसे बजार मे हल्ला पसरि गेलै जे एकटा मौगी अयलैए। सिलाइ-मशीन चलबैत छै। नव-पुरान कपड़ा सीबैत छै। बड़ सुन्नरि छै। एकसरिए छै। ओकरा संग मे केओ नइं छै आ ओ ककरो दिस तकितो नइं छै।
दारू आ चाहक दोकान वाली मौगी सभ अपन संसद शुरू क’ देने रहै। भागि क’ आएल हेतै। घरबला छोड़ि देने हेतै। चोरनी होएत। छिनारि होएत।
एकटा दोसर मौगी बजलै-जरूरी छै जे अधलाहे हेतै। नीक लोक नइं भ’ सकै छै की ? इहो तँ भ’ सकैत छै जे...
मुदा सत्तारूढ़ मौगी ई कहि ओकरा चुप क’ देलकै जे सतबरती रहितै, तँ दिल कुमारीक घर मे किराया नइं लैतै। दिल कुमारी अपने कतेक घाटक पानि पीने अछि! ओकर किरायादार की सैंतल रहतै?
जे, से। समय बीत’ लगलै। सुनीता नव सँ पुरान होम’ लागल। दिल कुमारी ओकर व्यवसाय आ जीवन मे अनेरे कोनो हस्तक्षेप नइं करै।
दिल कुमारी केँ ओ ‘काकी’ कह’ लागल।
आब किछु स्त्राीगण सेहो ब्लाउज आ साया सियाब’ या भंगठी कराब’ आब’ लगलै। मुदा, बेसी काज जुअनके छौंड़ा सभक ओकरा लग आबै।
ओ अनुभव कएलक जे ओकरा अएलाक बाद जुआन सभक पैन्ट आ अंगा बेसी फाट’ लगलै अछि। सभ ओकरे लग कोनो-ने-कोनो बहन्ने आबि जाए।
मौगी सभक संसद मे प्रस्ताव पारित भ’ गेलै। जँ मीठ नइं छै, तँ चुट्टी किए सोहरै छै?
सुनीता केँ अपन खर्चक योग्य आमदनी भ’ जाइ। आर बेसी ओकरा किए चाही? ओकर के छै? ने आगाँ ने पाछाँ।
एकटा गहिंकी आएल छलै। नगरपालिकाक मेहतर। ओ कहलकै सुनीता केँ-हमर बेटीक बियाह मे किछु कपड़ा सीअएतै। सीबि देबहक बहिन? तोहर सिआइ किछु देबह आ किछु उधार रहि जेतह। अगिला मास देबह।
सुनीता केँ लगलै जे जीवन मे पहिल बेर क्यो ओकरा बहिन कहलकै-ए। ओ द्रवित भ’ गेल-तोरा बेटीक बियाह मे जतेक कपड़ा सीअएतह, हम एक्कहु टाक पाइ नइं लेब’। जाह! जहिया मोन होअ’ द’ जइह’।

जानि नइं सुनीता केँ ओहि राति की भ’ गेलै? निन्ने ने होइत रहै। ओहि गहिंकीक गप्प बेर-बेर मोन पड़ै छलै-हम तँ जानि-बुझि क’ फाटल-पुरान ल’ क’ तोरा लग अबै छी। तोहर रूप हमरा मोहने जाइत अछि। तों एकटा मरद किए ने क’ लै छह। असगरे कते खटबह?
सुनीता डाँटि क’ भगा देने छल ओहि गहिंकी केँ। ओकर कपड़ा सेहो घुरा देने छल।
मुदा, सुनीता बेर-बेर अएना मे अपन मुँह देखैत छल। साँचे, ओ एखनहुँ सुन्नरि अछि। ओकर बयसे की भेलै अछि। बड़का घरक बेटी रहैत तँ एखन बियाहो नइं भेल रहितै। बीस-एकैस कोनो बयस होइत छै? ई बयस तँ पोखरि मे चुभक’ बला होइ छै... साओनक झूला झूल’ बला होइ छै... कोनो राजकुमारक सपना देख’ बला होइ छै। मुदा, पुरुषक प्रतापें सुनीता केँ एही बयस मे गृहस्थी सम्हार’ पड़ि रहल छै।
ओकरा बियहुआ मोन पड़लै। पहिल बियाह, बियाहे सन भेल रहै। ब’र अएलै, बरियात अएलै। गाजा-बाजा अएलै। खूब धूम-धाम सँ ओकर बियाह कएने रहै ओकर बाप। माइ तँ ओकरा अबोधे मे छोड़ि अनका संग चलि गेल रहै। तैं सभ निमेरा ओकर बाप केलकै।
ओहि समय सुनीताक बयसे कतेक रहै? पनरहम मे छल। ई कोनो बियाहक बयस होइत छै? मुदा, ओकरा बाप केँ अल्प बयसहि मे विकसित ओकर देह अबूह लाग’ लगलै। दोसर आशंका एहि बातक रहै जे माइए जकाँ इहो ने ककरो संग माया-पिरती जोड़ि लिअए आ...। तेसर स्वार्थ प्रायः ई रहै जे बेटी केँ बिदा क’ देने दारू पीब’ लए छुट्टा भ’ जायत। क्यो रोकनिहार नइं रहतै।
आ तैं सुनीता केँ गरदामी पहिरा देलकै ओकर बाप।
मुदा, छओ मास नइं बीतलै कि अनर्थ भ’ गेलै। सुनीताक सीउथ उज्जर भ’ गेलै। चूड़ी फूटि गेलै आ पोते टूटि गेलै। लोक सभ सराप’ लगलै। सालो ने बीतलै कि बियहुआ केँ खा गेल।
सुनीताक चारू कातक संसार सुन्न भ’ गेलै। कतहु किछु नइं। चारू कात अन्हारे अन्हार। कतहु कोनो प्रकाश-पुंज नइं देखाइ छलै ओकरा।
बियहुआक विरासत मे भेटल रहै एकटा देशी गाय, जकर सेवा-सुश्रूषा करए। दूध बेचए आ दिन काटए।
मुदा, बयस केँ बेसी दिन धरि गारि क’ तँ नइं राखल जा सकैत अछि।
किछु गोटें लोभाएल रहै सुनीता पर, आ किछु धपाएल। मुदा, समय सुनीता केँ साकांक्ष बना देने रहै। ओ भावावेश मे ककरो जाल मे फँस’ बाली नइं छल।
किछु छौंड़ा सभ तँ हाथ धो क’ ओकरा पाछाँ पड़ल छल। ओकरा घर पर अएबाक हिम्मति तँ नइं करै, मुदा साँझ खन क’ जखन घास आन’ बाध दिस जाए, तँ छौंड़ा सभ किछु-ने-किछु टोनैत रहै ओकरा।
जखने काली खोला पार क’ चाहक दोकान दिस मुड़ए आ कि हेम बहादुर टहंकार सँ गीत उठबैक-मानै ने छौंड़ी हमर बतिया... फेरै ने एको बेर अँखिया... होऽऽऽ होऽऽऽ।-आ सुनीताक संगी सभ ओकरा खौंझाब’ लगै-एक बेर फेरही नजरि हेमे दिस। छौंड़ा जुआन छै। सुन्नर छै। तरहत्थी पर रखतौ।-आर-आर बहुत रास बात सभ कह’ लगै, मुदा सुनीता लेल धनि सन।
ओहि दिन सुनीता काली खोला दिस नइं गेल। सतीघट्टा बगान दिस चलि गेल एकसरिए। जानि नइं किए बाट भरि हेम बहादुर ओकर मानस पटल पर जगजियार होइत रहलै। आइ ओ छौंड़ा काली खोला लग एकर बाट तकिते रहि जएतै। मुँहक गीत मुँहें मे रहि जएतै छौंड़ाक।
सतीघट्टा बगान मे निश्चिन्त सँ घास कटैत छल सुनीता। कने कालक बाद एकटा गीत सुनाइ पड़लै माया को बाड़ी ना पिरती को फूल, संभाली राख’ है कुसुमे रुमाल...।
सुनीता चैंकि गेल। ई तँ हेमेक स्वर छिऐ। एम्हरो चलि अएलै छौंड़ा। ई तँ दिक् क’ देलक।-ओ सोचलक’। आइ जे ने झड़ान झाड़त जे...।
पुनः दोसर मोन कहलकै। छौंड़ा, कोनो बेजाए तँ नइं छै। इएह ने कने अहदी छै। एसगरुआ छै छौंड़ा, तैं ने जेना-तेना रहै छै। दोसराति भेटतै, तँ सम्हरि जेतै। ओकरो तँ एकटा पुरुष चाही। दुनू मिलि क’ कमाएत-खटाएत। समय बीतैत रहतै।
मुदा, ओ हेम बहादुर केँ बोर्डर पर दू-नम्मरी धन्धा नइं कर’ देत। बहुत रास दोसर-तेसर काज छै। नीको काज सँ पेट भरैत छै...।
सुनीताक गफ्फा घा’सँ भरि गेल छलै। गफ्फा दुखएलै तखन अखियास भेलै।-ओह...। ओ की सोच’ लागल छल। धुर जो...।-ओ स्वयं मुस्कियाइत छल।-ई की भ’ रहल छै ओकरा?
आ कि तखने हेम बहादुर जुमि गेल। बाजल-आखिर कहिया धरि अपन कोमल हाथ सँ हँसुआ धरैत रहबही, सुनीता?
सुनीता बाजल-देख हेम! बरोबरि जे हमरा पछुअबैत रहै छें, से नीक बात नइं। तोरा मोन मे की छौ? तो अपन बाट किए ने बदलै छें?
हेम बहादुर छक्का मारलक-हमरा मोन मे ओएह बात अछि, जे तोरो मोन मे छौ। हम तोरा चाहैत छियौ। हम तोरा सँ बियाह कर’ चाहैत छी। हम चाहैत छी जे अपना दुनू गोटें...।
सुनीता बिच्चहि मे रोकलक-अपन मुँह देखलेहें। इह! हमरा सँ बियाह करताह। तोरा सँ के बियाह करतौ? जकर सभ साँझ कान्छीक दारूक दोकान मे बीतै छै, तकरा बुतें बहु की डेबल हेतै?
मुदा, हेम बहादुर मान’बला नइं छल। ओ बाजल-हम तँ सदिखन तोरे मुँह देखैत रहै छियौ, अपन मुँह की देखिऐ?-कने थम्हैत पुनः बाजल-तों जनिते छें। हमरा माइ-बाप क्यो नइं अछि। एकटा खोपड़ी अछि, ओही मे रहै छी। ओही मे तोरो राखबौ। राखबौ मुदा माया-पिरतीक संग। आ जहिया हम आ तों एक मोन-एक परान भ’ जाएब, तहिया सँ कान्छीक होटल जाएब बन्न भ’ जेतै।
सुनीताक देह झुनझुना गेलै। रोइयाँ ठाढ़ भ’ गेलै। करेज धरक’ लगलै आ ठोंठ सुखाए लगलै।
ओ प्रश्न दृष्टि एँ हेम बहादुर दिस तकलक।
-सत्ते कहै छियौ सुनीता।
ओ तकैत रहल।
-एकदम सत्त। जे किरिया खुआ ले।
ओ तकिते रहल।
-विद्या नाश।
सुनीता केँ हँसी लागि गेलै। ओ बड़ी जोर सँ हँसल।
-हँसिते बाजल सुनीता-तों पढ़ले-लिखल कतेक छें जे विद्या नाश बला किरिया लगतौ।
-विश्वास नइं होउ, तँ आर दोसर जे किरिया खुआ ले, मुदा...।-हेम बहादुर सुनीताक मनःस्थिति बुझि चुकल छल। ओ सुनीताक हाथ पकड़ि लेलक-संसारक पैघ सँ पैघ किरिया खा सकैत छी हम। खुआ ले।
सुनीता केँ मात्रा एतबे बाजल भेलै-आब तकर बेगरता नइं छै।
बहुत दूर पच्छिम दिस मेघ हड़हड़ा उठलै। बिजुली चमकि उठलै। लगलै जेना ओत’ दू गोटा नइं, एक्कहि गोटा ठाढ़ होअए।
हेम बहादुरक बाहुपाश मे सुनीता केँ सुखक अनुभूति भेलै।
मोन्हारि साँझ भ’ गेलै। दुनू बिदा भेल। सुनीता निर्णय नइं क’ पाबि रहल छल जे ओ हारल छल आ कि जीतल।
दुनू दाम्पत्य बन्हन मे बन्हा गेल। टोल-पड़ोस मे फदका होम’ लगलै। नहूँ-नहूँ सभ किछु सामान्य भ’ गेलै।
बियाहक बादो सुनीता अपन घर आ गायक सेवा नइं छोड़लक। हेम बहादुर अपन खोपड़ी, अपन संगी दीपक सुब्बाक हाथें बेचि देलकै।
दुनू कमाए-खाए लागल आ रह’ लागल। घास काट’ लए सुनीता नइं, हेम बहादुर जाए।
समय पर समयक पथार लाग’ लगलै।
मुदा, बहुत दिन धरि एहि तरहें नइं रहि सकल ओ सभ। हेम बहादुरक बहसल मोन छान-पगहा तोड़’ लगलै। ओकर लुत्तुक अकास चढ़’ लगलै। सुनीता अपना मे कमी ताक’ लागल। आखिर ओकर हेम पुनः किए बहकि रहल छै।
हेम बहादुर दारू पीबि क’ आब’ लागल आ सभ राति दुनू प्राणी मे झगड़ा होम’ लगलै।
दरुपीबा पुरुष सुनीता केँ किन्नहुँ पसिन नइं छलै।
नहूँ-नहूँ हेम बहादुरक आन-आन बानि सभ सेहो सुनीता केँ बुझबा मे अएलै। ओ हेम बहादुरकेँ समझाब’ बुझाब’ लागल, मुदा ओकर सभ प्रयास व्यर्थ भ’ गेलै।
स्थिति एत’ धरि पहुँच गेलै जे हेम बहादुर आठ-आठ दिन घर सँ बाहर रह’ लागल। ओकरा लेल सुनीता सँ बेसी महत्वपूर्ण भ’ गेल छलै कान्छी दोकानक दारू... तिनपतिया... पपलू... फलास...।
सुनीता सभ किछु सहैत रहल।
सुनीता केँ सभ सँ बेसी दुःख ओहि दिन भेल रहै जहिया ओकर गाय बिका गेलै। हेम बहादुर दुखित होम’ लागल रहए। ओकरे दबाइ-बीरो लेल सुनीता केँ गाय बेच’ पड़लै।
सुनीताक गाय दीपक सुब्बा कीनने छल। हेम बहादुरक दोस।
एते दिन सभ किछु बर्दासि कएलक सुनीता। मुदा ओहि दिन हेम बहादुर साफे कहि देने रहै-आब तोरा सँ मोन ओंगठि गेल।-ई गप्प सुनीता केँ सहरजमीन पर आनि देलकै। ओकरा पराजय-बोध भेलै। लगलै जे ओकरा जीवन मे हारिए-हारि छै।
गाय बेचलाक बाद जे टाका भेटलै, ताहि सँ थोड़ेक हेम बहादुरक दबाइ लए खर्च कएलक आ एकटा सेकेण्ड हैण्ड सिलाइ मशीन किनलक। ओएह सिलाइ मशीन ओकरा जीवनक आबलम्ब भ’ गेल रहै।
हेम बहादुर अपन बानि नइं छोड़ि सकल। ओकर रोग बढ़िते गेलै। आब ओ घर आएब सेहो बन्न क’ देने रहए। दीपक सुब्बा कहने रहै सुनीता केँ-भौजी! दोसक रोग ठीक होम’ बला नइं छौ। सम्पूर्ण विश्व एहि रोगक इलाज लेल अपस्यांत अछि। हम-तों की छी?
अन्ततः हेम बहादुरक जीवन-लीला समाप्त भ’ गेलै। मेचीक कात मे मुइल पड़ल देखलकै लोक सभ। सुनीता केँ कहलकै। ओ पाथर भ’ गेल। देखहु लेल नइं गेल हेम बहादुरक लहास केँ।
हेम बहादुरक सेवा मे ओ स्वयं केँ एहि तरहें समर्पित क’ देने छल जे ओकरा इहो सोह नइं रहलै जे मज्जर कहिया टिकुला भ’ गेलै। सुनीताक हाथ-पैर भारी होम’ लगलै। अन्न-पानि सँ अरुचि होम’ लगलै। देह पीयर भेल जाइत छलै... आदि आदि। आइ जखन हेम बहादुर नइं छै, तखन ओकरा सोह भ’ रहल छै जो ओ माइ बन’ बाली अछि।
दीपक सुब्बाक अबरजात बढ़ि गेलै। मुदा, सुनीता ओकरा अपन उद्देश्य मे सफल नइं होम’ देलकै।
सातम मास मे सुनीता केँ बच्चा भेलै। बेटा रहै। मुदा छौंड़ा बचलै नइं। जनमि क’ मरि गेलै। दीपक दबाइ-बीरो करौने रहै ओकर।

सुनीताक देह मे सक्क लाग’ लगलै। ओ मशीन चलाब’ लागल छल। दीपक आबै। घंटाक घंटा बैसै आ प्रणय निवेदन क’ चल जाइ।
सुनीताक मोन कोनादन कर’ लगलै। लगै जेना कोनो आवा मे जड़ल जाइत होअए... अथाह पानि मे डूबल जाइत होअए... कोनो सड़ल-गन्हाएल डबरा मे उबडुब करैत होअए।
सभ पुरुषक आकृति मे हेम बहादुरक छवि देखए सुनीता, आ ओकर मोन तुरूछि जाइ।
ओ सोचलक। दीपक सुब्बा घर-परिवार बला लोक अछि। ओकरा मात्र सुनीताक घर आ देहसँ मतलब छै। ओ सुनीताक भ’ क’ नइं रहि सकैछ।
ओ नियारलक-आब बेसी दिन धरि अपन चेतना केँ ठकि क’ नइं राखि सकैछ। ओकरा की चाही? ओकरा नइं चाही सिन्नुर आ ने कोनो इलबाइस। ओकरा किछु नइं चाही। मात्रा जीबाक लेल चाही पाँच हाथ वस्त्रा आ पाँच क’र अन्न। से ओ मशीन चला क’ उगाहि लेत। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नइं चाही। ई घर नइं चाही। ई घर ओकरा काटि क’ खा जेतै। एत’ भरि घर हेमे बहादुर देखाइत छै ओकरा।
आ एक दिन सुनीता अपन मशीन आ मोटा-चोटा उठौलक आ आबि गेल बजार। दिल कुमारीक घर मे किराया मे रह’ लागल।

दिल कुमारी केबाड़ पीटलकै, तखन तंद्रा भंग भेलै सुनीताक। ओ हड़बड़ायल। उठल। राति भरि जागबाक उझकी रहै। अंगैठी-मोर कएलक। मोन भेलै जे आइ काज नइं करए। दिन भरि अरामे करए।
मुदा से भ’ नइं सकलै। नगरपालिकाक मेहतर अपन बेटीक बियाह बला कपड़ा आ नाप सभ द’ गेलै। संगहि एकटा समाद सेहो कहने रहै-बहिन गे! प्रधान पंच तोरा बजलकौए। आइए दू बजे। ऑफिसमे।
सुनीता अचरज मे पड़ि गेल। प्रधान पंच ओकरा किऐ बजौतै? ओकरा सँ कोनो अपराध तँ ने भ’ गेलै अछि।
एत’ अएलाक बाद कतोक आँखिक प्रहार सहलक अछि सुनीता। बहुतो लोक हुलकी-बुलकी देलकै। एक दिन दीपक सुब्बा सेहो आएल रहै, मुदा ओ ओकरो मुँह दुसि देलकै। ओ अपरतीव भ’ क’ चल गेल। सुनीता अपन निर्णय पर दृढ़ अछि। ओकरा कोनो पुरुषक आबलम्ब नइं चाही।
पुनः एकटा प्रश्न ओकरा मोन केँ हौंड़ि दैक। प्रधान पंच किए बजौलकैए?
ओ कार्यालय पहुँचल। प्रधान पंच सँ बजएबाक कारण पुछलक। प्रधान पंच पुछलकै-तों एकसरिए रहै छें?
-हँ।
-आर क्यो?
-क्यो नइं।
-एकटा काज क’ सकैत छें?
सुनीता केँ डर भेलै। ओ डेरायल बाजल-कोन काज?
-कोनो खराप काज कर’ नइं कहैत छियौ।-प्रधान पंच एकटा अबोध बच्चा दिस संकेत करैत बाजल-देख! ई अबोध अनाथ छै। तोरो क्यो नइं छौ। एकरा पोस। धर्मो हेतौ। पाछाँ जा क’ ई बुढ़ारीक सहारा हेतौ। नगरपालिका सँ एकर खर्च सेहो भेटतौ, एक सए टाका मास।
सुनीता ओहि छौंड़ा दिस तकलक। देखनुक रहै छौंड़ा। तीन-चारि बर्खक रहल हेतै। ओ सकपका गेल। बाजल-विचारि क’ कहब।
-ककरा सँ?
-अपन मोनसँ... काकी सँ।
ताबत ओ अबोध आबि क’ सुनीताक आँचर पकड़ि लेलक। सुनीता पुनः ओहि छौंड़ा केँ देखलक। ओकर मात्सर्य उमड़ि गेलै। ओकर मोन पिघलि क’ आँखि बाटें बहार होम’ लगलै।
क्षणहिं ओ नोर पोछलक। नइं, ओ एक सए टाका मे एकटा घेघ नइं लेत। स्वयं केँ कोनो सम्बन्ध मे नइं बान्हत। कोनो सम्बन्ध नइं... कोनो सरोकार नइं...।
छौंड़ा आँचर पकड़नहिं छल।
दोसर मोन कहलकै। ई घेघ नइं। कंठी-माला छौ-राम नामा। ई नइं ठकतौ। ई धोखा नइं देतौ। कतहु पड़ा क’ नइं जेतौ।
सुनीताक मोन सकपक कर’ लगलै। ओकर करेज जोर-जोर सँ काँप’ लगलै। ओ किछु निर्णय नइं क’ पाबि रहल छल। लोक सभ देखैत रहलै। करुणा आ ममताक विचित्रा दृश्य उपस्थित भ’ गेलै।
सुनीता केँ लगलै जेना क्षणहि मे माया, मोह, स्नेह, भूख, प्यास आ ओकर सम्पूर्ण संवेदना जागि उठल हो। ओकरा सकपंज क’ नेने हो। ओकरा हरलै ने फुरलै, ओहि नेना दिस तकलक आ ओकरा कोरा मे उठा क’ चुम्मा लेब’ लागल।
मातृत्वक सजीव मूर्ति बनि गेल सुनीता।
सुनीता कागज बनौलक। नगरपालिका दिस सँ तीन मासक अग्रिम भेटलै आ छौंड़ा केँ ल’ क’ डेरा आएल।
सुनीताक निर्णय दिल कुमारी केँ सेहो नीक लागल रहै।
छौंड़ा बौक छलै। छौंड़ाक बौक होएब, सुनीता केँ कने झूस बना देने रहै। ओ छौंड़ा केँ बजएबाक प्रयास कर’ लागल।
ओहि राति लागल रहै सुनीता केँ, जेना खूब सुख सँ सूतल होअए। बौका केँ करेज मे साटि क’ सूतल छल। अपन जनमल नइं भेलै ताहि सँ की? ओकर मातृत्व सजग भ’ गेलै। मातृत्वक सम्पूर्णताक बोध भेल रहै ओहि राति।
छौंड़ा बौके नइं, अखलाह सेहो रहै। मुदा सुनीताक लेल ओ सोन सन रहै। आब सुनीता ओकरा अपना संग, काज बट्टम बला काज मे सेहो लगाब’ लगलै।
शुरुह मे छौंड़ा बड़ तंग करै ओकरा। काज दिस बट्टम लगा दै आ बट्टम दिस काज बना दै। नहूँ-नहूँ सुनीता ओकरा सीखाब’ लागल। छौंड़ा सीखि लेलक।
मुदा छौंड़ाक एकटा बानि एखनो छै। एखनो ओ सुनीताक करेजे मे सटि क’ सुतैत अछि। एक हाथ सुनीताक देह पर, दोसर... आ टाँग सुनीताक दुनू टाँगक बीच घोसिया क’...। निर्विकार भावें सूति रहै बौका। सुनीताक मातृत्व छलकि जाइ। ओहो ओकरा पजिया क’ सूति रहए।
ओना दिल कुमारी एक दिन मना कएने रहै-बौकाक ई आदति नीक नइं छै। एखन ने नेना छौ! आ नेना की? आब तँ सियान भेल जाइत छौ। ओकर एहि आदति केँ छोड़ायब जरूरी।
सुनीता बाजि उठल-काकी। तोरो मोन मे पापे उठैत छौ। धुर जो...।
समय बीत’ लगलै। सुनीताक मशीनक चक्का चल’ लगलै। बौका काज-बट्टम कर’ लागल।
समयक संग महगी बढ़लै। मजूरी, दरमाहा बढ़लै। बढ़लै कपड़ाक सिआइ। बाट बढ़लै। पीच रोड बढ़लै। मोटर गाड़ी बढ़लै। उड़ीस-मच्छर बढ़ि गेलै। लबरै-लुचपनी बढ़लै। दू-नमरी धन्धा आकास छूब’ लगलै।
घरक किराया बढ़ि गेलै। सुनीताक दोकान आ सुतबाक कोठरी फराक भ’ गेलै। नगरपालिका सँ भेट’ बला टका बन्न भ’ गेलै।
दिल कुमारीक बयस बढ़ि गेलै।
बौका सेहो जुआन होम’ लागल। सुनीता प्रौढ़ा होम’ लागल।
समय बदललै। राति-दिन मास मे बदलि गेलै। मास बर्ख मे। बर्ख युग मे। पंचायती व्यवस्था बदललै। प्रधान पंच बदलि गेलै। मेयर भ’ गेलै। जनमत संग्रह भेलै। आम चुनाव भेलै। प्रजातांत्रिक व्यवस्था भेलै। संविधान बदललै।
मुदा, बौकाक बानि नइं बदललै।
सुनीता केँ लगै जे ओ डोलि ने जाए। ओ बौकाक ओछाओन फराक क’ देने छल। मुदा बौका राति-राति भरि जागि क’ बिता दै। प्रात भेने जखन काज-बट्टम करै तँ निसभेर भेल बुझाइ, आँगुर मे सुइया भोंकि लै। सुनीताक ममता जागि जाइ।
एते दिन तँ नइं मुदा आब बौका सुनीताक गराक घेघ बनि गेल छै। सुनीता विचित्रा उहापोह मे फँसल छल। बौका ओकरा गरदनिक ढोल बनि गेल छै, ने बजौनहिं कल्याण आ ने हटौनहि शान्ति। कत’ जेतै छौंड़ा?
माघक पाला पड़ैत छलै। बौका केँ दोकान बला कोठरी मे ओछाओन क’ देने रहै सुनीता। मुदा छौंड़ा नइं मानलकै। अन्ततः सुनीता अपन कोठरी बन्न क’ लेलक। बौका दोकान बला कोठरी मे ठिठुरैत रहल।
सुनीता केँ सेहो निन्न नइं भेल रहै। एकटा आशंका जगौने रहै। बौका सुतलै, आ कि जगले छै?
ओ केबाड़ खोललक। बौका केँ ठिठुरैत देखि ममता जागि उठलै। ओकरा पुनः अपने लग बजा लेलक। बौका गेल आ सुनीता लग अपन बानिक अनुसारेँ निर्विकार भावें सूति रहल-एकटा हाथ सुनीताक देह पर... दोसर... आ टाँग...। ओ निन्न पड़ि गेल।
ई क्रम पुनः चल’ लगलै। एही क्रम मे एक राति डोलि गेल सुनीता। कोन सीमा धरि संयमित रहितै? ओकर संयम टूटि गेलै। सीमा पार क’ गेल। ओकर चेतना मरि गेलै। ओ, घिना गेल।
मुदा, बौकाक लेल धनि सन। ओकरा ने हर्षे होइ, ने विषादे।
प्रात भेने सभ किछु सामान्य रहै। असामान्य मात्रा एतबे रहै जे सुनीता भरि मोन बौका केँ देखि नइं पाबए। ओकरा ग्लानि होइ। मोन होइ जे एहि घिनाएल जिनगी सँ मुक्तिए उचित। मुदा बौका? ओकरा बाद बौका केँ के देखतै?
आ सुनीता किछु नइं क’ पाबए।
अपन सभटा असमर्थता एक दिन दिल कुमारी केँ कहने रहै सुनीता। दिल कुमारी सभ किछु सुनि नेने छल आ अन्त मे बड़ निर्दयी भ’ बाजल छल-जाहि दिन एहि छौंड़ा के जिम्मा लेलही, तहिया नइं बुझलही जे नमहर भ’ क’ इहो पुरुषे हेतै।
-मुदा बौकाक की दोष छै, काकी? ओकर कोनो दोष नइं छै। हमहीं...।
एक दिन साँझ खन बौका बजार दिस बहार भेलै, से घुरि क’ नइं अएलै। चारू कात ताका-हेरी मे लागि गेल सुनीता। राति बीति गेलै, मुदा बौका नइं अएलै।
पाँच दिन बीति गेलै। सुनीता कात करोटक सभ शहर-बजार आ गाम घर छानि लेलक, मुदा बौका ने भेटलै आ ने अएलै।
सुनीता हारि क’ बैसि रहल। ओकर मोन हदमदाए लागल रहै। देह मे कोनो सक्के नइं लगै।
दिल कुमारी ओकरा सम्बल देलकै ओहि दिन। ओ सुनीताक माथ अपन जाँघ पर राखि नेने रहै आ ओकर केश पर हाथ फेर’ लगलै। सुनीता केँ जीवन मे पहिल बेर माइक छाँह सन लगलै दिल कुमारीक स्नेहिल हाथ।
कने कालक बाद दिल कुमारी बाजलि-उठ! आब बौका नइं औतौ। चल अस्पताल। खसबा दैत छियौ।
सुनीता टुकुर-टुकुर दिल कुमारी दिस ताक’ लागल। ओ कोनो निर्णय नइं क’ पाबि रहलि छल। दिल कुमारी बाजल-जा धरि मरैत नइं छें, मशीन चलाबहि पड़तौ। लोकक फाटल-पुरान सीबहि पड़तौ।
सुनीताक सिलाइ मशीन एखनहुँ चलिते छै। कपड़ा सीबि लेलाक बाद ओ एक बेर विराट शून्य मे तकैत अछि... तकैत रहैछ, मुदा तखनहि दिल कुमारी ओकर तंद्रा भंग क’ दैछ-ला! काज-बट्टम क’ दैत छियौ!
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प्रदीप बिहारी (05 मार्च 1963) मैथिलीक सुचर्चित कथाकार-उपन्यासकार-रंगकर्मी छथि। गुमकी आ बिहाड़ि, विसूवयस, शेष, जड़ि (उपन्यास), औतीह कमला जएतीह कमला, मकड़ी, सरोकार, पोखरि मे दहाइत काठ (कथासंग्रह) , खण्ड-खण्ड जिनगी (लघुकथा संग्रह) सहित कइएक अनुदित आ सम्पादित पोथी प्रकाशित। एकरा अतिरिक्त किछु टेली फिल्मक निर्देशन। कथा-संग्रह सरोकार लेल साहित्य अकादमी पुरस्कार सँ सम्मानित। 

मकड़ी मकड़ी Reviewed by e-Mithila on December 01, 2019 Rating: 5

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