'जँ अहाँ देखि सकितहुँ'


प्रवीण झाक किछु कविता ::


1). जँ अहाँ देखि सकितहुँ 

हे! जँ अहाँ देखि सकितहुँ
हमर आँखि मे,
बाढ़ि मे दहाइत नेन्नाक पीड़ा;
तँ नहि टोकितो ओहि राति ,
जहिया अहाँक आँखि मे,
प्रेमक बाढ़ि देखि
फेर नेने रही करोट।
मुदा अहीँ कहू 
कोन करोटे सूती
जे नहि भीजए आँखिक सूत,
अपरोजक शासकक जीह सँ
टघरैत लालचक पानि सँ।

प्रिय! हम जनैत छी जे
प्रश्न पुछिनाइ 
द्रोहक पर्यायवाची अछि एखन,  मुदा! पुछैत छी एकटा प्रश्न,
कोना रखैत छी अहाँ धैर्य?
एखुनक विकट समय मे! 
जखन कि 
हम भ' जाइत छी व्याकुल,अधीर।
कोना सम्हारि लैत छी 
स्वयं के?
रहैत छी सदिखन हँसैत!
अहाँक हँसी, अहाँक धैर्य
हसोथि बनब' चाहैत छी
एकटा ताबीज़!
आ पहिरा देब' चाहैत छी 
प्रत्येक माय केँ
जकर बेटा
सत्ता-प्रपंचक शोणित सँ
रांगल तिरंगा मे
नुरिआयल आबि रहल अछि घ'र,
जितियाक बादो।

मोन अछि प्रिय! ओहि राति!!
इजोरिया सूप मे तरेगन फटकैत
जखन सटने रही चान
अहाँक माथ पर!
से एखन धरि सटल अछि                 
स्मृतिक भीत पर।
कतेक शीतल अछि ई चान
अनमन अहाँक हँसी सन,
मेटा दैत अछि सभटा कष्ट-क्लेश।
हँसैत चान दिस तकैत कहने रही अहांँ,
हम, चान दिस तकैत सोचैत रही
की सत्ते! एतेक शीतल होइत अछि चान!
की मेटा सकत संतापक धाह!
कोना उगि सकत ओहि मायक आंचर मे
जकर कोखि, अछैते औरदे , उजड़ैत रहल अछि, इलाजक बेतरे,
'चमकी' बोखारक धाह सँ।

सुशासनक विद्रुप हँसी, आ
कालक ठहक्काक जुगलबंदी सुनैत,
सत्ताक आश्वासनक सारा पर
ठाढ़ भेल हम,
चानक माथ पर सोहरैत
चिंताक डरीर सोझरा रहल छी,
जे भेल अछि इजोरिया मे
किछु आओर गँहीर।

2). चौमासा

टूटि गेल हमरा अहाँक मध्य 
कमला बलानक पूल
जे एकमात्र साधन छल संवादक
आब नहि भ' पायत भेंटघांट, विचारक
बन्न भ' जायत वेदना-संवेदनाक अबरजात
कोना देब आब हाक आकि हकार
सोखरक सोगाइत कोना सांठब आब.......

आयल अछि, छहोछित छहरक दूनूकात,
व्यथाक बाढ़ि
पसरल अछि संबंधक घोंकल पानि, 
मोनक खेत खरिहान धरि
कोना फुलायत ठोरक चौमास मे सेहन्ताक चौमासा(?)

3). माय हमर

कतेको कारी सियाह राति बीतल, 
मुदा ओ अप्पन हाथ मे 
उमेदक सुइया आ सेहन्ताक ताग ओरियेने, 
सीबैत रहल 
हमर भूतकालक फाटल लत्ता पर 
वर्तमानक चेफड़ी 
आ ताहि पर 
भविष्यक सूत सँ
काढ़ि रहल अछि 
रंगबिरही लिलसाक फूल,

बेगरताक फूटल चूल्हिक पाछू
स'खक भाँगल लाबनि पर 
जरैत अछि ओकर आसक टिमटिमाइत डिबिया, 
आ जरैत अछि ओ, आ ओकर मनोरथ
जे भोरे काजरि बनि 
पसरि जायत गत्र-गत्र मे,

धानक ढे़री सँ खखरी जकाँ
फटकि दैत अछि 
हमर सभटा कष्ट - क्लेश 
कियैक तँ
ओकरा बुझल छैक 
जे भविष्यक अगता खरिहान मे 
जखन ओसाओल जेतैक
तँ हमही झरब सूप सँ 
बासमतीक मोती सन दाना बनि।

4). स्मृति शेष

गैर मजरुआ उस्सर जमीन मे
अनेरुआ जजात सन उपजल हमर मोन
बान्हि लेब' चाहैत अछि स्मृतिक सीस
जकरा छोपबा लेल बिर्त भेल रहैछ 
अगरजित्त गिरहत सन समय

निसभेर राति मे अन्हारक करेज पर
करैत सन ससरैत हमर मोन
नापि लेब' चाहैत अछि मनोरथक परिधि
जकर केंद्र पर ठाढ़ अछि
सेहन्ताक मोख धेने अहाँक धूआ

जुआन होइत बसातक गंध सँ मातल
तूरक फाहा सन उधियाइत हमर मोन
बकुटि लेब' चाहैत अछि सभटा राग द्वेष
जकर ठेहि सँ असोथकित भेल स्पर्श
पसरि जाइत अछि गत्र-गत्र मे

पुरना घरारीक गुमसैत घरक
असघनी पर टाँगल चेथड़ी सन हमर मोन 
हँसोथि लेब' चाहैत अछि सभटा स्वेद गंध 
जे हमर अहाँक मध्य रंग रभसक साक्षी छल  

मुदा स्मृतिक बाट पर छिड़ियायल 
टिकुली, काजर, पायल, स्पर्श, गंध आ अहाँक धूआ
पसिझैत इजोत सन आलोपित भ' जाइछ 
आ हम
सुन्न अकास मे तकैत रहैत छी
स्मृतिक बाट पर अहाँक बाट

5). गड़ैत अछि स्मृति 

सुखायल पात सन पिपनी,
जखन बन्न करैछ 
पथरायल आंखिक द्वार,
तँ ओहि पार देखार होइछ,
सगरो पसरल इजोरिया मे
दग्धल मोनक चूल्हि मे पजरल अन्हरिया।

सांसक खुहरी आ मोनक गदौस सँ,
सुनगा रहल छी जिनगीक चिनगी,
बर्फ सन ठरल असोथकित देहक बासन मे,
रान्हि रहल छी सेहन्ताक अरगासन।

चनोसल राति मे,
मनोरथक ताग सँ बान्हल तरेगन,
क' रहल अछि ओगरबाहि
हमर सभटा बेथा के ,
जे जाकल अछि हृदयक बन्न गुम्हसायल कोठरी मे।

फूटल काच सन काँच स्वप्न,
छिड़िआयल अछि यथार्थक बाट पर,
खेरही सन चनकल हृदय मे आब
कोनो वेदना कहाँ थमकि पबैत अछि,
ससरि जाइत अछि बाउल जकाँ
नूरिआयल स्मृतिक गफ्फा सँ।

सुखायल पात सन पिपनी,
जखन बन्न करैछ
नोरायल आंखिक द्वार
तँ गड़ैत अछि सभटा स्मृति
राहरिक खुट्टी सन।

6). अखबार

भोरक भुरूकबा मे तिलकोर सँ पैंच ल' 
सूरुज जेखन सेनुरिया अजान देलक 
लाल टुह टुह पानि सँ कुरुर करैत भोर 
जखन आंजुर मे सेहन्ता बन्हलक 
पछबा बसातक कपार पर शोणितायल भस्म 
जखन औरदाक हिस्सा बोनि लेलक 
पुरना घरारीक बेतरेक पाड़ल चाड़ पर 
कुचरैत कौआ जखन बसिया रोटी खोंटलक 
तखन घटना - दुर्घटनाक ओजन जोखैत 
समयक घंटी टुनटुनबैत गाम पर अखबार आयल 
भोरक पनपियाइ मे परसल गेल - हत्या, लूट, बलात्कार 
आ थारी मे पसरल अछि हमर दग्ध मोन 
आ हेरि रहल छी आंकर 
जे किंसाइत दांत त'र नहि पड़ि जाय 
आ मोन हमर कचकच नहि भ' जाय। 
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प्रवीण झा मैथिली काव्य-संसारक युवा पीढ़ी सँ सम्बद्ध कवि छथि तथा बेस कम अवधि मे अपन काव्य-प्रतिभा आ सक्रियता सँ अपन एकटा परिचिति स्थापित कयलनि अछि। वैश्विक दर्शन आ साहित्य मे नीक पकड़ रखनिहार प्रवीण झा संगीत मे सेहो विशिष्ट जनतब रखैत छथि आ तबला बजयबा मे निपुण छथि। तमोरिया निवासी प्रवीण सम्प्रति पाठशाला, दरभंगा (कोचिंग संस्थान) मे भौतिकी विज्ञानक शिक्षक छथि। अपन कविताक कथ्यक संग-संग कहबाक विभिष्ट शिल्प-शैली आ बिम्ब प्रयोगक लेल प्रवीण झा फराक सँ चिन्हल जा सकैत छथि। 'ई-मिथिला' पर प्रकाशनक एहि प्राथमिक अवसर पर एहि सम्भावनाशील कवि प्रवीण झा केँ बहुत-बहुत बधाइ आ शुभकामना संगहि ई उमेद-भरोस जे अपन काव्य-प्रतिभा सँ मैथिली काव्य-संसार मे ओ अपन एकटा विशिष्ट अध्याय जोड़बा मे सक्षम होयताह। हिनका सँ jhapraveenphysics@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि। 

'जँ अहाँ देखि सकितहुँ' 'जँ अहाँ देखि सकितहुँ' Reviewed by e-Mithila on November 15, 2019 Rating: 5

2 comments:

  1. बहुत-बहुत शुभकामना बहुत निक कविता बहुत नेक प्रयास हिना आगा लिखी हमर कामना

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