दुरपदिया


दुरपदिया
कथा : पुष्य मित्र

गाम भरि मे हल्ला भए गेलै. अरचनिया घुरि के आबि गेल छै. जाए केँ देखहीं कत्ते सुन्नर लागै छै. सिंथेटी सितारा बला नुआ, कंठ मे हार, कान मे कनफूल, नाक मे टोप्स, पौडर-लिपिस्टिक. देखबहीं तँ लागतौ प्रिंका चोपड़ा आबि गेलै. 

अरचनिया अपन अंगना घुसलै आ आधा घंटा के भीतर ओकर अंगना मे छौड़ी सब भरि गेलै. तेरह साल सँ लए के उन्नीस साल तक के सबटा छौड़ी, कुमारि आ बिहलकी सब पहुँचि गेलै. आब उ अपन माय सँ की गप करितइ, छौड़िए सब पूछए लागलै...
कतए रही गे अरचनिया? सासुर बसलहीं तँ गाम के बिसरिए गेलहीं... 
पांच साल मे नै फोन, ने चिट्ठी-पतरी...एहन किए भए गेलहीं गे अरचनिया ! माय के देख ! सदिखन कानिते रहौ, कहौ जे हमर बेटी जिंदा छै कि नै....
की यै काकी, आब कहू, बेटी के नसीब तँ अहीं के छी... देखियौ ने बेटी केँ केहेन गेल रहै, केहेन भए के घुरल !
अरचनिया, सभ के गप सुनै आ किछो नै बाजै...आर कियो बुझै नै बुझै, ओकर माय तँ सब देखिए रहल छलै. 
'हे गे छौड़ी सब... 24 घंटा टिरेन मे बैसि के आएल छै, कनी सुस्ताबै ल' दहीं, देखै नै छहीं थाकल छै... जो, सांझ के आबिहें...' - ढोकबा बाली कहि उठलै...
"अरे माताजी, इनलोगों को ऐसे काहे बिदा कर रही हैं. हम इनके लिए मिठाई लाए हैं. मिठाई तो खिला दो, फिर चली जायेंगी. इनकी बहन इत्ते दिनों के बाद आयी है तो मिठाई का हक तो बनता है, है कि नहीं."
अरचनिया के ब'र ई गप कहैत-कहैत अंगना घुसि गेलै... 
'अर्चना, अरे इन लोगों को मिठाई तो खिलाओ..."
अरचनिया अस्थिर सँ उठलै आ घर सँ मिठाइ के पैकेट निकालि के सब छौड़ी के दियए लागल... 
छौड़ी सब कखनो मिठाय दिस ताकै, कखनौ अरचनिया के हरियाना बला ब'र दिस... लमगर-मोटगर जवान, देखै मे गोर-नार बलिष्ठ. सच्चे, अरचनिया के भाग बड़ तेज छै. ब'रो नीक, घरो नीक, सुखी संपन्न जीवन...एहने ब'र सबके भेटै... मिठाइ लए-लए के सब छौड़ी हंसैत-बाजैत अंगना खाली करए लागलै... 
आब अंगना में रहि गेलै अरचनिया, अरचनियाक बर, ओकर माय ढोकबा बाली आ अरचनियाक छोट बहिन फुलमतिया.
अरचनिया अपन बहिन के कसि के पकड़ि लेलकै आ मूड़ी ओकर छाती मे गोंति देलकै... नै हंसै, नै कानै... ओकर ब'र दुआरि दिस चलि गेलै, जतए ओकरा संग हरियाणा सँ तीन टा आर मनसा आएल रहै...
................
पांच साल पहिनै, एहने तीन टा मनसा ढोकबा बाली के दुआरि पर आएल रहै. धानुख जाति के घरे केहेन होइ छै... नै घर सुतै जोगर, नै दुआरि बैसए जोगर... अरचनियाक बाप तहिया जिंदा रहै... गामे के एकटा छौ़ड़ा संतोसबा जे हरियाणा कमबै लए गेल रहै, वएह एकरा सब के आनले रहै. 
कहै लागलै, छट्ठू कका, सीधा तोरे दुआरि पर एकरा सब के लेले आएल छियौ... एहेन संबंध खोजला सँ नै भेटतौ... हीरा छै लड़का, हरियाणा मे पचास बीघा के जोत... दुआर पर दू-दू टा टेक्टर, कार-जीप, पंपसेट, दस कोठलीक घर छै... एकरे एतए काज करै छियै... हरियाणा मे लड़की कम होइ छै... तेँ एकर बियाह नै भेल छै... 
अरचनियाक बियाह कराय देबहो तँ ओकर जीवन तँ खुशहाल भइए जेतै, तोरो सब समस्या दूर भए जइतौ... बियाहक खरचा ओकर....आ चालीस हजार टका एखन तुरत हाथ मे देतै...आ अरचनिया के संग-संग ढोकबा बाली काकी आ फुलमतिया, सब के गहना जेवर...धनी आदमी छै, नीक जकाँ बियाह करतै... सोचहो नै, तू खाली हां कहो...
तीन साल सँ ब'र खोजैत-खोजैत पस्तहाल छट्ठू मंडल ई गप सुनि के अबाक रहि गेलै... इहो छौड़ा संतोसबो के बाप लग गेल रहै छट्ठू, एकर बाप सायकिल आ गाय के फरमाइश केलै रहै. जतए जाय दस हजार सँ कम के फरमाइश नै होइ. एत्ते पैसा छट्ठू कतए सँ आनितै... गरीब मजदूर, नै जमीन, नै रोजगार...नै ककरो बटेदार... एक धूर जमीन पर झोपड़ी रहै... उहो जमीन के कागज नै... दुनू-बर कनिया जे मजूरी करै ओकरा सँ घर चलै... कहियो खाना के इंतजाम होइ, कहियो भूखले रहै...कतए सँ आनितै, दस हजार.

...तू बैस बाबू, हम अंगना सँ पूछि के आबै छियौ...
छट्ठू बुझै रहै, सब बात ठीक, लेकिन ढोकबा बाली अरचनिया के ओत्ते दूर जाय लए नै देतै... अंगना जाय के उ ढोकबा बाली के परतारए लागलै... पाछू-पाछू संतोसबो आबि गेलै... 
हे गे काकी, साल मे दू बेर बेटी घर एतौ, ई हमर गारंटी.... सुख-समृद्धिक तँ कोनो कहने नै... रानी बनि के रहतौ. हमर मलकिन बनतौ... सोचहीं, हमर जेहन लड़का जकरा ओतए नौकरी खटै छै, उ घर पलिबार केहन हेतै... 
...........
गरीब के घर के कारोबार एहने चलै छै...भात तँ दालि नै, दालि तँ तीमन-तरकारी नै... तरकारी तँ दाल नै बनै छै... छट्ठू, ओकर कनिया आ अरचनिया... तीनू तैयार भए गेलै... खुशी-खुशी बियाहो भए गेलै... 
लेकिन छौ महीना बाद जखन नै फोन, नै चिट्ठी, नै कोनो खोज-खबर लागलै तँ ढोकबा बाली परेसान भए गेलै... जकरा कहै, वएह कहै, फोन नंबर नै छौ बेटी के ? बियाह केलहीं तँ जमाइ से फोन नंबर कियै नै लेलहीं ?

ढोकबा बाली तहिया मोबाइलो नै देखने रहै... उ कि बुझितै फोन आ मोबाइल ककरा कहै छै... एक दिन संतोसबा के घर चलि गेलै...ओकर माइ कहलकै, हम की कहि सकै छी ढोकबा बाली... संतोसबा कत्ते दिन सँ घर नै आएल छै... उ एतै तँ वएह कहत...
आब ढोकबा बाली संतोसबे के आबै के रस्ता देखए लागलै... रोजीना एकबेर टोह लै... संतोसबा एलै कि नै एलै... 
बियाह के बाद संतोसबो ओकरे सब के संग गेल रहै... घुरि के दस महीना बाद एलै... 
ढोकबा बाली पूछलकै तँ संतोसबा कहलकै, हम उ गामे छोड़ि देलियै...आब दोसर जगह काज करै छियै... पैंजाब मे... तैं हम किछुओ नै कहि सकै छियौ... ओना अरचनिया ठीक्के हेतौ.... तोहर फोनो नंबर नै छो तँ कोना तोरा सँ गप करतौ...
लेकिन बेटा संतोस, तू तँ कहलै रहीं कि उ साल मे दू बेर घर एतै... साल पूरा हुए लागलै, एक्को बेर नै एलै रे...
कोनो दिक्कत हेतै काकी, एबे करतौ, तू निचिंत रह...
लेकिन ढोकबा बाली निचिंत नै भए सकलै...
साल पुरलै, दू साल, तीन साल, पांच साल...कोनो खबरि नै... 
लोक सब एकटा नया गप कहै लागलै, हरयाना-ऊपी के जे लड़का बियाह करै लए आबै छै ओकरा ओतए बेटी खुस नै रहै छै. कए टा लड़की गायब भए गेलै...
ढोकबा बाली के लागै, अरचनियो के कियो मारि देलकै.
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पुष्य मित्र सुचर्चित पत्रकार छथि। सुन्नैर नैका, रेडियो कोसी, चम्पारण 1917 आ भूतखेला टाइम्स शीर्षक सँ एखन धरि हिनक चारि गोट संग्रह दृश्य मे छनि। धमदाहा, पूर्णिया निवासी पुष्य मित्र विगत समय मे विभिन्न पत्र-पत्रिकाक माध्यम सँ पत्रकारिता करैत रहलनि अछि। एकर अतिरिक्त कइएक ऑनलाइन पोर्टल सभक लेल सेहो समय-समय पर लिखैत रहलनि अछि। एखन स्वतंत्र लेखन आ समाज सेवाक क्षेत्र मे निरन्तर सक्रिय छथि। नॉदर्न आ इस्टर्न रीजन द्वारा ‘लाडली मीडिया अवार्ड’ सँ सम्मानित पुष्य मित्र सँ pushymitr@gmail.com पर सम्पर्क कएल जा सकैत अछि।  
दुरपदिया दुरपदिया Reviewed by e-Mithila on October 08, 2019 Rating: 5

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