Tuesday, May 16, 2017

चिन्तित करैछ रंग-चिन्ता : विभूति आनंद

मनुक्खक भीतर जहिया संस्कृतिक बीजारोपण भेल होएत, निश्चित रूप सँ एहि मे ओ सभटा अभिक्रियाक समाविष्टि भेल हेतैक, जकरा हमरा सभ रंगकर्मक संज्ञा दैत छी। रंगकर्म लोकक भीतर संवेदनाक दीप प्रजव्वलित करैत छैक। ओकरा हृदयस्थलक मध्य उपस्थित मानवताक कोढ़ी केँ भकरार कऽ पुष्पक स्वरूप प्रदान करैत छैक। फेर मैथिली रंगमंच कोना  एही सँ फराक भऽ सकैत अछि ।  औखन  मैथिली रंगमंचक वर्तमान स्थिति सँ  वरिष्ठ कवी-कथाकार ओ शिक्षाविद विभूति आनंद अप्पन चिंतनक मादे हमरालोकनिक  साक्षात्कार करबा रहलनि अछि।  पढ़ल जाय। 


 "पृथ्वीपुत्र"क एक दृश्य मे पूनमश्रीक संग विभूति आनंद 


नाटक थिक पाँचम वेद। रंगमर्च पर आबि ई क्रिया मे अबैए। एहि माध्यम सँ नाटक केँ ओहन लोक लग लऽ जयबाक चेष्टा करै छी, जकरा लग अक्षर ज्ञान नै रहै छै। मुदा आइ स्थिति साफ उलट अछि। आब नाटक करब भऽ गेल अछि- नाट्य कर्म ! एहि कर्मक माध्यम सँ भरिसक ई बुझयबाक चेष्टा करै छी, जेना बुझू जे हम कतेक बूझै छी।

तेँ प्रायः आइ हम हरिमोहन झा, आकि राजकमल चौधरीक नारी पात्र केँ लऽ कऽ रंगमंच पर अबै छी। एहि माध्यमे दशको पुरान सामाजिक स्थिति केँ मंच पर देखबै छी। एकर की प्रयोजन ? एकर कोन तुक ? अपन लेर लागल मुँह देखयबाक की आवश्यकता ? जँ जरूरी अछि तँ ओहि लेर केँ साफ कऽ कऽ प्रस्तुत करू, जेना 'तित्तिरदाइ' (मूल कथा - हरिमोहन झा) मे ई पंक्ति- लेखक कयलनि !

तहिना, यात्रीक 'पारो' एक स्थिति रहै। आब बारह नै, बाइसो वर्ष मे बेटीक निरीह बियाह उचित नै बूझल जाइ छै। तेँ 'विलाप' लऽ कऽ हम समाज केँ की संदेश दऽ रहल छियै ? आइ 'रूक्मणी हरण' देखि कऽ दर्शक अपन जीवन-निर्माण मे की ग्रहण करैए ? हँ, ई सभ महाविद्यालय-विश्वविद्यालय मे पढ़ऽ-पढ़ाबऽ लेल एक नीक विषय भऽ सकैए। समय-संदर्भ लऽ कऽ एहि सभ विषय पर शोध कएल जा सकैए। ओ एक ढ़ग होइतय। एखन तँ 'रूक्मणी-हरण' सँ बेसी जरूरी अछि अन्तर्जातीय विवाह पर प्रकाश देब, ओकर लाभ-हानि देखब, ताहि पर नाटकक माध्यमे विमर्श करब। ओहन संबंध मे सभ अधलाहे छै, सेहो नै छै। तहिना सभ नीके छै सम्पूर्णतः सेहो नै कहल जा सकैए। एहि सभ नजरि सँ नाट्य-लेखन होइतय, तँ एक बात बनितय !

"नसबंदी"क एक दृश्य
 मे मंजू चौधरी आ विभूति आनंद 


सभ बात सभ केँ नै बूझल रहै छै। कारण सभ सर्वज्ञानी नै होइए। जँ समाज मे घटित भऽ रहल घटना सभ केँ मंचक माध्यमे प्रदर्शित कएल जाए, तँ ओ ताहि सँ लाभान्वित भऽ समाज-सरोकारक दिशा मे बढ़ि सकैए। रंगमंच ओ नाटकक मूल दृष्टियो सएह छलै। एखनो शेष छै, जँ तकरा पकड़ि समेटि सकी। मुदा से भऽ नै रहल अछि।

आइ रंगमंच तकनीकी स्तर पर अधिक सक्रिय अछि। नव-नव शिल्प पर चिन्तन चलि रहल अछि। ताहि चिन्तन पर प्रयोग भऽ रहल अछि। आ ताहि प्रयोग केँ मंच पर आनि प्रदर्शित कएल जा रहल अछि। कुणालक एक नाटक अछि- 'बिदापत'। एकर मंचन मे एक संग अनेक शिल्पक प्रयोग कएल गेल। किर्तनिया, बिदेसिया, लोरिक आदि-आदि। एहि 'मिक्स-भेज' शिल्पक माध्यमे हम की कहऽ चाहि रहल छी ? उत्तर सोझ रूप मे इएह ने जे हम एतेक प्रकारक शिल्पक जनतब रखै छी ! रंगमंच केँ काॅकटेल बनयबाक हमरा कोनो औचित्य नै बुझाइए। फेर कहब, जे एहि सभ पर तँ सेमिनार आयोजित कऽ कऽ विमर्श कएल जा सकैए। जेना 'दशरूपक आ रंग-विधान', 'दशरूपक आ वर्तमान समय मे एकर औचित्य' आदि-आदि।

आजुक एहि बहुप्रयोगी नाटक लऽ कऽ गामक रंगमंच पर चढ़ू तँ घाम चूबऽ लागत ! कारण जे सभ ठाम कुणाल, कि किशोर, प्रकाश, कि मुकेश नै रहताह। तखन ? आइ ग्रामीण रंगमंच बहुत तेजी सँ विलुप्त भऽ रहल अछि जकर समर्थ कारण इहो अछि। तथापि ग्रामीण कलाकार चेष्टा करऽ मे नै चूकैए। मुदा परिणाम दुखदे पबैए। दर्शक धीरे-धीरे ससरऽ लगैए। नाटक हुर्र भऽ जाइए। आ कलाकारक मेहनतिक सभ गुड़, गोबर सनक स्थिति केँ प्राप्त कऽ जाइए। कने अधिक आक्रामक भऽ कऽ कही तँ आजुक शहरी रंगमंच एक निश्चित कार्य-योजनाक अन्तर्गत ग्रामीण रंगमंच केँ ग्रास करऽ मे लागल अछि !

असल मे, हालक नाटक सिनेमा-सीरियल जकाँ ततेक ने ग्लैमराइज्ड कऽ देल गेल अछि, जे ओकर सहजता आ निजता समाप्त भेल जा रहल छै। तेँ आइ नाटकक स्वरूप बदलऽ लेल आतुर अछि रंगमंच। एहि प्रसंग एकरत्ती, पाछू लऽ जाय चाहब। एखन रामकथा टीवी पर 'हाॅटकेक' जकाँ बनल अछि। मुदा एकर उत्स निहित छलै रामलीला-मंचन मे। आ जे आइ मुइल सनक स्थिति मे अछि। किएक ? किएक तँ जे ओहि मे ग्लैमर नै छै। आ तेँ रामलीलाक मंचन ओकर मौलिक शिल्प मे नै होएत। होएत, मुदा से लेखन ओ मंचन-स्तर पर, तकनीकी विकास ओ सुधार करैत, आ तकर नाम देल जाएत- 'सुनू जानकी' !
हमरा तँ लगैए, आजुक रंगमंच आजुक कविता सन भेल जाइए, जाहिमे अत्यधिक प्रयोगक कारणे ओ बहुसंख्यक सँ कटि रहल अछि। तेँ प्रायः एखन मैथिलीए नै, समस्त भारतीय रंगमंच प्रयोग-रोग सँ ग्रस्त अछि। किछु समय पूर्व दरभंगा मे 'सामा-चकेबा' मंचित भेल। मंचक अग्रभाग मे किछु बहीन सभ सामा खेलि रहल छलि, आ ठीक ओकर पाछू किछु बहीन गुजराती नृत्य 'डांडिया' करैत तकरा ग्लैमराइज्ड कऽ रहल छलि। देखऽ मे तँ बहुत नीक। अद्भूत। मुदा ई कहू जे नवतूरक प्रेक्षक, वा पुराने, की लऽ कऽ अपन डेरा वा घर घूरल होएत ! अथवा ओकरा अगिला पीढ़ी की बूझि पैघ होएत जे एहने होइ छै मिथिलाक 'सामा-चकेबा' मे नाच ? पहिल गप तँ ई जे सामा-चकेबा कोनो नाच आइटम नै अछि। तेँ ओकर जँ नाट्य-रूप करै छी तँ मौलिकताक संरक्षण करब तँ पहिल कर्तव्य बनैछ। ई प्रयोग तँ बुझू ओहने, जेहन म्यूजिकक संग समदाउनक प्रस्तुति !

आ एहि सभक जड़ि मे छथि नाटककार। मुदा ओ लोकनि की कऽ रहल छथि, से नै बूझि रहल छी। नाटक लिखल नै जा रहल अछि। तेँ ग्रामीण रंगमंच हकर पेलि रहल अछि। घूमि फीरिकऽ वएह भफाइत चाहक जिनगी तँ ओकरा आंगनक बारहमासा ! काठक लोक, तँ वाह रे हम आ वाह रे हमर नाटक ! सर्वाधिक मिस्टर नीलो काका, लौंगिया मिरचाइ, बड़का साहेब। स्पष्ट अछि जे नाटक लिखल नै जा रहल अछि। मुदा से ई स्थिति गामे नै, शहरोक अछि। 
एकर कारण की ?

नाटक "अंतिम प्रणाम"क एक दृश्य मे  विभूति आनंद 

तँ हमरा जनैत एकर एकमात्र कारण अछि नाटककारक वैकल्य। आजुक समय मे ओकर महत्वक क्षरण भेल अछि। भऽ रहल अछि। बहुत तेजी सँ। सुधांशु शेखर चौधरी ता जिनगी एकर प्रमुखता लेल लड़ैत रहि गेलाह। मुदा, स्थिति बिगड़ैत चल गेल। हमरा लगैए, आइ रंगमंच अपन माटि छोड़ि रहल अछि। नाटककार गौण भऽ गेल अछि। निर्देशक ओकरो अधिकार क्षेत्र मे प्रवेश कऽ गेल छै। ओ सिनेमा सीरियल सँ ढूसि लड़ैत ओकरे ग्लैमर मे स्वयं केँ समौने जा रहल अछि- बुद्धिवाद सँ दीपित होइत।

तेँ हमरा बेर-बेर होइत रहैए जे आखिर हम कतऽ जा रहल छी ? एक दिस प्रयोग तँ दोसर दिस ओकर अस्तित्व संकट। एक दिस नाट्य-लेखनक दारिद्रय, तँ दोसर दिस नाटककारक महत्वहीनता। आजुक समय मे नाटककार रंगमंचक प्रमुख अंग नै भऽ कऽ उपांग सनक स्थिति मे आबि गेल अछि। तेँ ई धर्मसंकटक स्थिति बनि आयल अछि ओकरा (नाटककार) लेल, जे अहाँ आत्मसमर्पण करै छी निर्देशकक समक्ष, तँ ठीक नै तँ लिखि-लिखि ढ़ेर करैत रहू ! एहि प्रसंग हम पुनः 'रूक्मणि हरण' (गोविन्द झा)क संग-संग 'देह पर कोठी खसा दिअ' (महेन्द्र मलंगिया)क चर्च करऽ चाहब, जकर मुद्रित रूप उपलब्ध अछि। मुदा मंचित-रूप से नै रहि गेल अछि। किएक ? तँ तकर कारकक बेर-बेर उल्लेख करब पुनरिक्ति दोष भऽ जायत। अस्तु ।

अपन एहि रंग चिन्तनक उपसंहार लिखैत दू गोट घटनाक उल्लेख करऽ चाहब। एक बेर मोन पड़ैए, जहिया पटनाक अपन रंगमंच 'भंगिमा' मे सक्रिय रही, ललितक 'पृथ्वीपुत्र' उपन्यास केँ रंगमंच पर आनबाक इच्छा जागल। कथाकार अशोक तकर नाट्य रूपान्तरण कएलनि। कुणाल मुदा एकर निर्देशन करबा सँ मुकरि गेलाह। कहलनि, एहि मे सँ बिजली आ कलपू मिसरक प्रेम-प्रसंग केँ हटा कऽ मंचन करब। हम कहलियनि- ई प्रसंग एहि कथानकक आत्मा छियै। मुदा ओ नै मानलनि। अपन तर्क देलनि। आ नाटक असफल होएबाक संभावना देखौलनि। मुदा पृथ्वीपुत्रक मंचन निर्देनक पैंच लऽ कऽ भेल आ सफल रहल। अशोकक नाट्य रूपक अनुरूप। मुदा परिणाम दूरगामी की भेल ! कुणाल तँ निर्देशक (आब तँ चर्चित) बनले रहि गेलाह, एकटा जन्म लैत नाटककारक भूर्ण हत्या भऽ गेल।

नाटक "ओकरा आंगनक बारहमासा"क एक दृश्य मे मंजू चौधरी आ  विभूति आनंद 


नाटक पर निर्देशकीय वर्चस्वक एक दोसर घटना अछि 'मैलोरंग' दिल्लीक एक नाटक सँ संबंधित। ओकर एक नाटक 'मैथिल नारि : चारि रंग' मधुबनीक मिथिला रंग महोत्सव मे देखने रही। ओहि मे प्रतीक रूप मे हरियरकी ओढ़नी केँ गोल-गोल कऽ कऽ 'ललका पाग' (राजकमलक कथा) रूप मे नायिका द्वारा नायकक माथ पर धऽ देल गेलै। नाटक देखैत महेन्द्र मलंगिया केँ कहलियनि- 'भाइ, एतऽ कलाकार सँ एक पैघ गलती भऽ गेलै ! ओकरा हरियर नै लाल ओढ़नीक पाग बनयबाक चाहै छलै !'
मुदा ओ तकर तुरंत प्रतिवाद कएलनि- 'नै ऐ मे कलाकारक सही छै। ओकर कोनो गलती नै छै' !

- 'किए ?' हम प्रतिप्रश्न कएलियनि। कहलनि- 'तों नै बुझबहक ! तों रंगमंच सँ कटि गेल छऽ।'

-'माने ?' हम पुनः प्रश्न कएलियनि।

-'एकर निर्देशन देशक एक पैघ निर्देशक कएने छथि।'

- केँ ?

-'देवेन्द्रराज अंकुर !'

तकर बाद हमरा किछु नै कहबाक छल। एखनो किछु कहबाक स्थिति मे नै छी। बस, एक्केटा चिन्ता खएने जा रहल अछि जे जेना-जेना ई समय वैश्विक भेल जा रहल अछि, स्वपरिचितिक खतरा तहिना-तहिना बढ़ल जा रहल अछि। मनुखक सोच आ स्वभाव मे परिवर्तन तेँ, बहुत तेजी सँ भऽ रहल अछि। आ जे कतौ ने कतौ सही नै भऽ रहल अछि।

[ नाटककार ओ कलाकार शैलेन्द्र आनंद तथा हीरेन्द्र कुमार झाक संग विमर्शोपरान्त तैयार आलेख]
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विभूति आनंद मैथिलीक प्रख्यात कवी-कथाकार छथि।  कथासंग्रह 'काठ' लेल साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त ।   छात्र जीवनमे आंदोलन। कतिपय  पत्र-पत्रिकाक संपादन।  अभिनय। कथा , कविता , नाटक , उपन्यास , आलोचना , बाल कविता , लप्रेक, चरिपतिया आ अन्य-अन्य विधा मे लेखन।  दर्जनो भरि सँ बेसी पुस्तकक प्रकाशन आ लम- सम ततबे अप्रकाशित सेहो।  9472234496 पर सम्पर्कक सम्भावना।  

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