जिनगीक सब सँ सुन्नर पन्ना


अमित मिश्रक किछु लघुकथा ::

1). सेनूर

रातिक बारह बाजैत छल। गुज-गुज अन्हिया आ डेराउन चुप्पी चारू दिस विराजमान छल। एकाएक मनोजक नीन टूटि गेलै। चेहा कऽ उठल तँ बगल मे पत्नी केँ नै देखलक। मोने मोन शंका ग्रस्त हुअ लागल। घर सँ बाहर आएल तँ आँगन मे दू गोटाक खुसुर-पुसुर सुनाइ देलकै। एकटा पुरूष स्वर आ एकटा नारी स्वर आबैत छल। पुरूष बाजल "देख, आब तूँ प्लानक अंतिम भाग पूरा कर। मनोज लऽग बड सम्पति छै। ओकरा मारि कऽ ओकर मलकाइन तूँ बनि जो। फेर दुनू गोटा वियाह कऽ लेब।"

नारी स्वर तीव्र गति सँ बहराएल "नै, ई हमरा बुते नै हेतौ।"

पुरूष फेर बुझाबऽ लागल "सप्पत नै तोड़। दुनू गोटाक प्रेम एकरा मरलाक बादे सफल हेतौ।"

तामस मे डूबल नारी स्वर फूटल "प्रेम प्रेम प्रेम बड़ भेलौ। आब अपन प्रेम मरि गेलौ। हम तोहर संग देलियौ किए तँ तखन कर्ज मुक्त छलियौ, मुदा... आब हमरा पर सेनूरक कर्ज अछि। मनोज हमरा अनमोल सेनूर देलनि। हम अपन प्राणो दऽ कऽ एकर कर्ज नै चुका सकै छियै, ओकर प्राण लेनाइ दूर के बात छै।"

2). दीप

एकटा बूढ़ कुम्हार शहरक अतिव्यस्त बाट पर ठाढ़ छल। माँथ पर छिट्टा छलै जाहि मे नीक नीक कलाकृति सँ सजल दीप राखल छलै। छिट्टाक बोझ सँ वा उमरक प्रभाव सँ ओकर डाँर झुकि गेल छलै। गाड़ी केँ रुकैत देख ओ झट दऽ ओकरा लऽग पहुँचि जाइ "सरकार, दिवाली लेल सुन्दर-सुन्दर दीप अछि।मात्र दूइये टाका...एक्को टा कीन लिअ...भोर सँ एक्को टा नै बिकाएल ...भुखले छी...छूट देब...एगो कीन लिअ...।"

सब बेर ओ एते बाजै आ सब बेर गाड़ी बला ओकरा फटकारि दै "रै बुड़बक, आज के युग में दीप-बीप नहीं चलता है। अब तो एक-से-एक मरकरी आ गया है। जाओ रश्ता नापो। समय खोटी मत करो।" एते कहि गाड़ी बला फट दऽ गेट बन्द कऽ लै। साँझ मे चोकीदार अपन हिस्सा लेबाक लेल आबि गेलै। ओकरा देख कुम्हार बाजल "बाबू जी। आइ नै दऽ सकब। पिछला चारि दिन सँ किछु आमदनी नै भेल। कने किछु खुआ दिअ हमरा। पता नै अहाँ केँ अझुका हफ्दा दऽ सकब की नै, कारण जे हमरो जीवन तँ बिनु तेलक दीपे सन अछि। जानि नै कते दिन धरि जरि सकत।"

3). फाटल पन्ना

हे अहाँक बारे मे बड सुनि रहल छी। अपन जुआन पत्नी केँ छोड़ि दोसर संग...ई सब नीक नै भेल।" सुनीता अपन पति सुकेश केँ उपराग दैत कहलनि। ई सुनिते सुकेश ताम से लह-लह करऽ लागल "हम कमाइ छी। हम जे करी ओइ सँ अहाँ केँ की ?" बात बिगड़ैत चलि गेल। रिश्ता मे खटास बढ़ैत-बढ़ैत तलाक धरि पहुँचि गेलै। आब सुकेश अपन प्रेमिका संग रहऽ लागल।

"यै मृगनैनी अहाँ एतेक टाका बेकार मे व्यर्थ करैत छी। बुझू तँ काल्हिये हार किनलौं आ फेर आइये... "सुकेश अपन प्रेमिका केँ कने दबारैत कहलक। ई सुनिते प्रेमिका सुकेश पर टूटि पड़ल "एना जुनि बाजल कर। तूँ हमरा आनलें हम अपना मोने थोड़े एलियौ।" झगड़ा बढ़ि गेल। बाता-बातीक बीच मे एक-दू थप्पर सुकेश केँ लागियो गेलै। राति भरि सूति नै सकल। सुकेश केँ लागऽ लागलै जे सुनीता केँ जिनगी सँ दूर भेला सँ ओकर जिनगीक सब सँ सुन्नर पन्ना फाटि गेल छै।

4). नवतुरिया

एक बेर फूल आ फूलक गाछ मे बकझक भऽ गेलै। फूल आन्दोलन ठाढ़ कऽ देलक "नै...आब जुलुम नै सहबौ। आब हम नै मौलेबौ।"

गाछ शान्त करैत बाजल "एना किए बाजै छें। तोरा कोन दिक्कत होइ छौ ? तूँ तँ हमर अंग छें। तोरा तँ प्रेम सँ मौलेबाक चाही।"

"अरे वाह रे वाह ! हम हिनक अंग छी! हमरे सुगंधक कारण लोक तोरा पूछै छौ आ तूँ हमरे मौलाइ लेल कहैत छें।" फूल आक्रोशित होइत बाजल।
गाछ ओकरा बुझबैत बाजल "देख दुनियाँ परिवर्तनक पर्याय छैक। जाधरि तूँ नै मौलेबें ता धरि नव फूलक जनम नै हेतै।"
फूल क्रोधे थरथराए लागल "तै सँ हमरा कोनो मतलब नै। नवतुरिया केँ हम कोनो रोकने छियै, आबौ ने...मुदा हम रहबे करबै।"

"एतेक जिद जुनि कर। समाज मे देखै नै छहीं बुढ़बा-बुढ़िया केँ कतेक गंजन होइत छैक। पुरनका सब सबटा अधिकार अपने लऽग राखऽ चाहै छै आ नवतुरिया अपना लऽग चाहै छें। बूढ़-पुरान केँ किछु बरदाश्त नै होइ छैक आ नवकाक खूनक गरमी लऽग हारि कऽ मारि खाइ छैक। एहि सँ बढ़ियाँ जे अपन इज्जत बचा कऽ नवतुरिया लेल स्थान खाली कऽ दी।"
गाछक बात सूनि फूल सब बात समझि गेल आ दोसरे दिन मौला कऽ गाछ सँ खसि पड़ल।

5). कोहबर

हम हवा छी। हमरा अहाँ नै देखब मुदा हम सब केँ देखैत छी। एखन हम एकटा भावी कोहबर घर मे छी। बिधकरी आ दाइ-माइ सब देबालपर शुभ चित्र पाड़ैक ओरियान कऽ रहल छथि। "गै सोनियाँ बाँस आ पुरनि पातक फोटो बना ने"

"यै बलहा बाली कोहबरक गीत उठाबू ने यै... कने लाल रंग लगाउ।"

"यै काकी, हमरा गीत सब नै आबैत अछि आ फोटो-ओटो तँ कहिया ने बिसरि गेलियै ।"
"हँ यै मैयाँ, आजुक रिमिक्सक जमाना मे ककरा ई सब गीत याद छै?"
भरल घर माँछक हाट बनि गेल छल तखने शहरी सोनियाँ कहलनि "सुनै जाउ ।एकटा उपाय अछि। कोनो कैसेट बजा कऽ गीतक काज चलाओल जाए आ बजार मे सब तरहक फोटो भेटै छै। तकरे साटि देल जाए।"
सगरो कोहबर कृत्रिम अरिपन आ कृत्रिम गीत सँ चमकऽ-गुंजऽ लागल। हम एकात मे ठाढ़ नव जोड़ी केँ देख रहल छी। हमरा कृत्रिम कोहबर मे दुनूक बीच कृत्रिम प्रेमक आभास भऽ रहल अछि।

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अमित मिश्र मैथिलीक युवा पीढ़ी सँ सम्बद्ध रचनाकार छथि। एक संग विविध विधा मे लिखैत छथि - कथा, लघुकथा, कविता, गजल, गीत, नाटक, एकांकी आदि-आदि।  विभिन्न पत्र-पत्रिका मे रचना प्रकाशित एवं कइएक एलबम लेल गीत लेखन। सम्प्रति मध्य विद्यालय करियन, समस्तीपुर मे सहायक शिक्षक। हिनका सँ amit11193@gmail.com पर सम्पर्क कयल जा सकैत अछि। 

जिनगीक सब सँ सुन्नर पन्ना जिनगीक सब सँ सुन्नर पन्ना Reviewed by बालमुकुन्द on April 18, 2015 Rating: 5

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