सम्भावना


कथा :: संभावना : महाप्रकाश

ओ आबिते तपाक सँ पुछलनि- “हाथी देखने छह” अर्थ बूझल छह?
ओ अपन एहि प्रश्नक संग टेबुलपर झुकि आएल रहथि। हुनकर चानि पर उम्र आ अनुभव केर चमक रहनि। गज्जोभायक एहि प्रश्न सँ कनेक अकबका गेल रहथि जयवर्द्दन। हुनक आँखि मे देखैत उतारा देलनि जयवर्धन- हँ हौ... हाथी केँ के पूछय, हम तँ ऐरावत सेहो देखने छी- अर्थ सेहो बूझल अछि।
उत्तर सुनैत गज्जोभायक आँखि जेना फाटि गेलनि। विस्मय आ अविश्वास सँ भरि अयलाह- ऐरावत! कतऽ देखलह?
-किएक बड़द देखऽ लेल अहाँ पशुपतिनाथक ओतऽ जाउ से भऽ सकैत अछि आ हम ऐरावत देखऽ इन्द्रक ओतऽ जाइ से संभव नै!
-इन्द्र तोरा कतऽ भेटलह?
गज्जोभायक अविश्वास अस्वभाविक नै रहनि।
-“इन्द्र तँ अहाँ केँ कत्तहु भेटत... ध्यान सँ देखहक ने... नै भेटतह तँ विष्णु! वि-शिष्ट अणु –वि-शेष अणु-विलक्षण अणु- बिष्णु नै भेटतह- इन्द्र तँ आब जतऽ ततऽ“ - जयवर्द्धनक स्वर मे विश्वास रहनि।
गज्जोभाय जोर सँ हँसलाह- तोँ ज्ञानी लोक छह, आब जँ तोँ इन्द्र केँ चीन्हैत छह तँ राजा केँ चीन्हैत छह, जमीन्दार-सरकार केँ सेहो चीन्हैत छह.. नीक बात..तोहर यएह गुण हमरा विवश करैत अछि जे हम तोरा एकटा कथा सुनाबी.. समय देबहक?
बाहर विकट रौद रहैक। कार्यालय सँ अधिकांश कर्मचारी जा चुकल छल। रौद मे थोड़बे काल चलला सँ जयवर्द्धन केँ पेशाब रुकि जाइत छनि। वीर रहथि। अतएव हुनका कथा सुनबेक छल ।
बजलाह- समय अछि, समय हमरा लेल पोस्ट कार्ड थिक जे जतबा लिखि..।
“बस्स-बस्स भऽ गेलैक”.. गज्जोभाय बजलाह- “राजाक मूल होइत अछि भय आ शंका..बूझल छह? ओ उपरका हो अबैत मोंछ राशि केँ दूअ दिस सँ सम्हारैत हाथ फेरलनि- मुस्टंड गवरू छौंड़ा रोज देखैत छल, जमींदारक हाथी सबार, परोपट्टा मे घुमैत, दर्प सँ धधकैत जमींदार ओकर हाथीक मस्तान चालि....वाम-दहिन मूड़ी आ झारैत। ओ देखय आ मोन मसोसि कए रहि जाए। ओकरा रहि-रहि कए जमींदारक सूनल, देखल-भोगल कथा वृत्तान्त व्यथित करैक...। मुदा एक दिन...
बाहर रौद अखनो प्रचण्ड रहैक आ हवा सेहो उद गेल रहैक, जयवर्द्धन खिड़की सँ बाहर देखलनि। विमछैत बजलाह-“खिस्सा मे मोन नै लागैत छह, ध्यान नै देबहक तँ कहबाक कोन प्रयोजन कोन..
- नै-नै, ....एहेन कोनो बात नै- हबरब नै देखैत छहक.. केना आ कतेक गोंगिया रहल छै.. जयवर्द्धन किंचित म्लान मुख भेलाह।
- धूः बुड़ि- हवाक रुख आकि बिगड़ैत पर्यावरण कें की तोँ बदलि देबहक..की हम बदलि सकै छी समयक गति केँ, अकानैत रहऽ आ बस्स..पे आ भोगैत रहऽ। बस्स..।
जयबर्द्धन के राजनीतिक पर्यावरणक सेहो स्मरण, मुदा आब ओ कथा रस मे व्यतिक्रम नै चाहैत रहथि- आगू कहह...
“मुदा एक दिन ओइ गवरु मुस्टंड केँ नै रहल गेलैक, जहिना ओ हाथी पर सवार दर्प सँ धधकैत जमीदार-सरकार केँ देखलक,... ओकरा छाती मे जेना लहरि उठलैक...ओकर पहिल इच्छा भेलैक जे ओ सीधे जमींदार पर छड़पय आ हौदाक संगे जमीनपर पटकए.. मुदा एतेक ऊँच ओ फानि नै सकैत छल..अथच ओ हाथीक नाङरि पकड़ि अपन पएर जमीनपर अंगद जकाँ रोपि देलक...वाम दहिन, आजू-बाजू देखैत...हाथी पर सवार केँ आघात भेलैक, हाथीक मस्तान चालि मे व्यवधान अयलैक..हाथी चिंघाड़ कयलक ....महावत जोर सँ बमकल...गज लए छौड़ा पर उठल....”
भयाक्रान्त जयवर्द्धनक मुँह खुललनि, एकदम्मे अंतिम  प्रश्न कयलनि- “छौड़ा बजलैक की नै?”
-हँ हौ, जमींदार पढ़ल लिखल लोक रहथि शिक्षित लोक.. हनकर पुरखा सभ सेहो विदेशी विद्यालय आ विश्वविद्यालय सभ मे पढ़ने रहनि...अपनो कैबरिज कि हावर्ड मे पढ़ने रहथि... हुनका भाषाक महिमा आ वाणीक प्रभावक विशेष ज्ञान रहनि। अतएव क्रोध केँ घोंटलनि आ शांत स्वरेँ महावत केँ बरजलनि- “छोड़ह अबूझ छैक..नेदरमति छैक”।
किन्तु हुनक चित्त अशांत रहलनि। किछुए कालक उपरान्त, राज्यक सीमा रेखा केँ दूरे सँ देखैत, चिंतितमना राजमहल मे घूमि अयलाह।
प्रात:काल ओ अपन दीवान सँ पुछलनि –“किनक बालक छल ओ...? दीवान साहेब केँ समग्र कथा बूझल छलनि। बजलाह- “श्रीमन् ओतऽ फल्लामांक बेटा थिक- बजाऊ की?
किछुए कालक उपरान्त फल्लांमा केँ उपस्थित कएल गेल। भयाक्रान्त..थरथर कांपैत..धोती प्रायः तीतल। जमींदार साहेब केँ देखिते मूलुंबित, किंवा शाष्टांग दैत, निहोरा करैत बाजल- “सरकार... अपराध क्षमा कैल जाऊ”।
“नै..नै कोनो अपराध नै... बहुत करेजगर छथि अहाँक बालक... बहादुर... वाह रे वाह संभावना सँ भरल...अपार संभावना अछि अहाँक बालक मे...”, जमींदार साहेब शांत किन्तु गम्भीर स्वर मे बजलाह ।

फल्लांमा केँ किंचित भरोस भेलैक। हाथ जोड़ने ठाढ़ भेल— “छौड़ा उकपाती छैक.. निश्चये कोनो अपराध केने हएत..हम ओइ अबंड सँ तंग छी सरकार.. जे सजा हो हुकुम...ओ धौना खसौने ठाढ़ रहल।
“ नेना सँ कियो तंग हुअए! कोनो अपराध नै कयलक अछि अहाँक बालक, किन्तु आब ओ विहनजोग भेल..ओकर ब्याह कऽ दियौ...ब्याह कऽ देबै तँ घर गृहस्थी मे लागत.. चित्त शान्त रहतैक। शांत किन्तु आदेशात्मक स्वर मे बजलाह जमींदार साहेब।
“सरकार...के करतैक ओइ अबंड सँ ब्याह...की हैतैक ओकर ब्याह करा कऽ...करमे फूटल छैक...”, विलाप कयलक फल्लामां मर-।
“आब अहाँ जाउ, ब्याहक मोन बनाउ..हम देखैत छिऐक-”, जमींदार सरकार आदेश कयलनि।
फल्लांमाक गेलाक उपरान्त जमीन्दार साहेब उपस्थित  दीवान सँ पुछलनि— “ककर बेटी छैक रानी मुखर्जी आ कैटरीना सन, पता करु तँ... ओकरा सँ ऐ छौड़ा केँ ब्याहि देबाक छैक ..।”
जयवर्द्धन केँ अपन हँसी रोकि नै भेलनि... गरीबक बेटी की रानी मुखर्जी आ कैटरीना सन होइत छैक- ओ चकित रहथि ।
“ऐमे हँसबाक कोन बात... जकरा जे बूझल रहतैक से सएह ने बाजत...तोँ रोटी कहबह ओ ब्रेड बाजत... ओना तोँ बिसरि रहलह अछि जे महाराज शान्तनु केँ मल्लाहेक बेटी पसिन्न पड़ल रहनि...।” गज्जो भायक उत्तर सँ जयवर्द्धन निरुत्तर भेलाह।
चिल्लामांक बेटी बड़ सुन्नरि। बड़ दिव्य। पाकल धान सन-ए। अगहनक दुपहरिया सन चमक। कोशीक धार सन चंचल। प्रायः सभ केँ बूझल रहैक। तेँ...
दरबार मे चिल्लामां केँ बजाओल गेल। अपराध बोघक बोझ सँ ठाढ़ नै रहि पाबैत छल। हवोढेकार कानैत बाजल— “से बिनु मायक बेटी छैक... जरुरे कोनो अपराध कएने हएत, लोकक झाड़ी फानब ओकर आदति भऽ गेलैक अछि.. अवस्से कोनो दिन कएने हएत... हम सरकारेक सोझाँ मे ओकरा दोखरि देबैक..चिल्लामांक नोरक कोनो छोर नै रहैक।
सरकार ओकरा अपन पाँज मे भरि कऽ उठौलनि। बजलाह- “कोनो बात नै छैक... पहिने नोर पोछह चित्त शांत करऽ, बात किछु नै छैक... हम सुनलहुँ जे तोहर बेटी आब वियाह जोग छह, फल्लांमाक बेटा पट्ठा जवान...कहलक क्यो जे नीक जोड़ी हेतै, तँ से नीक बात... तोँ ब्याह लेल तैयार हुअ तेँ खरचाक कोनो चिन्ता नै...हम सभ देखबैक... हम छी..सभटा मददि करबह..।
चिल्लामां किछु बाजऽ चाहलक। मुदा, बाजि नै भेलैक। कदाचित जमींदार सरकारक उदारता आ दान सभक स्मरण सँ ओकर कंठनली अवरुद्ध भऽ गेल रहैक। 
गज्जोभाय आगाँ कहलनि— “भेल... फल्लामांक आ चिल्लामांक बेटीक ब्याह सभहिक सहज सहमति सँ भेल। सरकार—जमींदार ओकरा सभहिक समाजिक स्थिति अनुकुल खैयाल रखलनि। समाज कतोक बर्ख धरि हुनकर ऐ कथा-व्यवहारक सोहर गाबैत रहल। क्यो जमीन्दारक सवारी रोकबाक कोनो हिम्मति नै कयलक। लोक तँ आइयो सरकार जमींदार सँ बहुत रास आस राखैत अछि। संभावनाक आस आ कि आसक संभावना मे समाप्त नै होइत छैक.. किछु कुकुर भुकैत अछि, मुदा किछुए.., अधिकांशक गर मे पट्टा लागि गेलैक अछि... कतोक केँ गरदनि मे तँ सोनाक जिंजीर छैक, किछु भुकैत मारलो गेल... जानि नै कतेक...”
“ अंय हौ भाय ....ओइ छौड़ा आ छउड़ीक की भेलैक? जयवर्द्धन जिज्ञासा कयलनि ।
गज्जोभाय एतबा सुनिते क्रुद्ध भऽ गेलाह..? यएह छियह तोहर पाखण्डी रुप.. तोरा की नै बूझल छह।”
“हमरा किए बूझल रहत... कथा तोहर..कहलऽ तोँ आ बूझल रहत हमरा?” जयवर्द्धन गज्जोभाय केँ लपेटलनि। “हेतैक की ..दुहू छौड़ा छउड़ीक एक आश्रम भेलैक- आगाँ कालक लीला— बिसरा गेल रंग रभस, बिसरा गेल छउड़ी.. तीन चीज यादि रहल, नोन-तेल लकड़ी, से दुनू नोन तेल मे लागल रहल.. बाजार मे व्योपार ये, चौअन्नी-अठन्नी केँ के पूछय...टाका पचटकही धरि प्रमुख भऽ गेलैक... समय एकदम्मे बदलि गेलैक..देश-काल। मन मोहनी छतरी तर आबि गेलैक... टोपी पर टोपी.... टोपी टोपी... लोक टोपीक रंगे देख कऽ नेहाल, किछु दिनक उपरान्त सुनल जे छौड़ा रोजी रोटीक खोज मे दिल्ली कि हरियाणा कि कुरुक्षेत्र चलि गेलैक, आइ धरि नै घूमलैक-ए।”
“कतेक बर्ख भेलैक?”, जयवर्द्धनक स्वर म्लान रहनि।
“किएक... हम बड़ बकलेल जे जिनगीक कैलेंडर राखी? तोरे सन मूर्ख जिनगीक कैलैंडर राखैत अछि”, गज्जोभाय किंचित उत्तेजित आ खिन्न भेलाह”
“एम्हर फल्लामां आ चिल्लामां बान्ह जे टुटलैक ओही बाढ़ि मे कतहु बहि गेल... आब छउड़ीक दिन पहाड़ भेलैक आ राति प्रेतग्रस्त। हेमनि मे सूनल अछि जे छउड़ी, प्रतिदिन राष्ट्रीय राजमार्ग १९४७ पर जाइत छैक- जतऽ दुनियां जहानक बस-ट्रक आबि कऽ रुकैत छैक छउड़ी जाइत छैक, एहि आस आ सम्भावना मे जे ओ छौड़ा औतैक.. कोनो दिन, कोनो दिशा सँ औतेक ..”
गज्जोभाय अन्ततः मौन भेलाह। जयवर्द्धन केँ कोनो प्रश्न नै फुरलनि।
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महाप्रकाश मैथिलीक समादृत कवि-कथाकार छथि।  कविता संभवा आ संग समय केँ शीर्षक सँ दू गोट काव्य-संकलन प्रकाशित। एकर अतिरिक्त मैथिली आ हिन्दीक विभिन्न पत्र-पत्रिकादि मे कविता, कथा, निबंध, रिपोर्ताज आदि प्रकाशित-प्रशंसित। 
सम्भावना सम्भावना Reviewed by e-Mithila on November 06, 2019 Rating: 5

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