दुखी जन लेल अहीं छी इजोत बापू



रेखाचित्र : केशव


कविता : रमण कुमार सिंह

1.
बापू
हम इतिहासक एहन मोड़ पर ठाढ़ छी
जतय अहाँ के अस्वीकार करब असंभव सन अछि
आ स्वीकार करब महाग कठिन
एना कियै भेलै जे
मजबूरीक नाम बनि गेल अछि महात्मा गांधी
जखन कि हमरा सबहक सपना लेल
होयबाक चाही छल सब सँ जरूरी?

2.

बात तँ सब करैत अछि
ओहि अंतिम जन केर
जकरा प्राथमिकता मे रखबाक कहने छलहुँ अहाँ
मुदा एखनो ओ अंतिम जन पाछुए ठाढ़ अछि पांत मे
ओकर हिस्साक सबटा रोटी 
बिच्चे मे लूझि लैत अछि कौआ सभ
ओ एखनो ओतबे उपेक्षित अछि
ओतबे भ्रमित
जतबा छोड़ि गेल रही अहाँ
हे अहिंसा पुरुष
एना कियै भेल जे
एहि देश मे
रोज लड़य पड़ैत छैक ओकरा
नव-नव यातना आ हिंसा सँ?

3.

बापू
जाहि स्वतंत्रता लेल 
लड़ल छलहुँ अहाँ जिनगी भरि अहर्निश
ओ मात्र एगो शब्द बनि केँ रहि गेल अछि
ओकर अनुभूतियो मात्र नहि होइत छैक
ओहि अंतिम जन कें
जकरा आंखि मे रोपने छलहुँ
अहाँ सुराजक सपना
वैह निर्बल-निस्सहाय लोक केर
होइत छैक हत्या
आ ओकर सपना छीन लेल जाइत छैक
मात्र कुछेक लोकक तिजौरी मे
बन्न रहैत अछि ओकर सपना
अपना दुख मे आपादमस्तक डूबल ओ
एखनो जीब' चाहैत अछि
आ अपने सन असंख्य वंचितक संग
ओ एखनो लड़य चाहैत अछि
ओहि शब्दक असली अर्थ बूझय लेल
जकरा कहल जाइत अछि सुराज
ओ आइयो लड़य जनैत अछि 
मुदा के देखाओत ओकरा बाट
के करत ओकर नेतृत्व?
कियै गुलामीक जिनगी जीबैत अछि लोक-
यैह प्रश्न कयने छल ने अहाँ केँ विचलित
देखियौ, राजनीतिक स्वतंत्रता भेटलाक बादो
गुलामीक जिनगी जीबैत अछि लोक
मुदा कहाँ बिलखैत अछि ककरो आत्मा
जेना बिलखि उठल रही अहाँ!

4.
बापू
ई ठीक छै, जे एक गाल पर थापड़ खाय
दोसर गाल आगू नहि केलहुँ, मुदा
अहींक बताओल बाट पर चलैत रहलहुं हम
नहि उठाओल अपन दुश्मन पर हाथ
दुखी जन कें देखि उमड़ैत रहल करुणा
आगू बढ़वा लेल छीनल नहि ककरो हक
नहि कयल केकरो सँ छल-प्रपंच
मुदा लोक हमरा बूझैत रहल मजबूर
आ हंसैत रहल हमर अहिंसक व्यवहार पर
मुदा देखियौ, जे हमर मनुक्खता
हमरा धिक्कारबो नहि केलक
अपितु दैत रहल संतोष
जे आर किछु नहि भ' सकलहुँ तेँ की
मनुक्ख तँ बनल रहलहुँ।

5.

ई केहन लीला अछि बापू
जे रोज प्रातः करैत अछि गोडसे केँ वंदना
वैह क' रहल अछि आइ अहाँ केर अभ्यर्थना
अहाँक नाम जपनिहार बहुत रास लोक
जहिया बैस गेल कुर्सी पर
तहिये सँ ओकर संवेदना आ करुणा कठुआ गेलैक
की अहाँक बूझल छल कुर्सीक लीला
जे अहाँ नहि स्वीकार कयलहुँ कोनहु कुर्सी
सत्ता सुख मे मांतल लोक भने बिसरा दियअ अहाँ केँ
मुदा शोषित आ दुखी जन लेल
अहीं छी एकटा इजोत
आइयो दुनिया भरिक लोक
अपन समस्याक समाधान लेल
तकैत अछि अहींक दिस उम्मीद मे
अखरैत अछि अहाँक कमी
मुदा आइ जौं रहितहुँ अहाँ
ते हुअय दितियै अहाँके बास
अनचिन्हार सन लगैत एहि देस मे
कोना रहि सकतहुँ अहाँ!


★★★

रमण कुमार सिंह सुचर्चित कवि छथि एवं मैथिली आ हिंदी दुनू भाषा मे काव्य-लेखनक क्षेत्र मे विगत एकटा पैघ समयावधि सँ निरन्तर सक्रिय छथि। एखन धरि हिनक मैथिली मे दू गोट काव्य-संग्रह 'फेर सँ हरियर' आ 'दुःस्वप्नक बाद' शीर्षक सँ तथा 'बाघ दुहने का कौशल' शीर्षक सँ एकटा काव्य-संग्रह हिंदी मे प्रकाशित छनि। एकरा अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिका मे निरन्तर रचना सभ प्रकाशित-प्रशंसित। एखन दिल्ली मे 'अमर-उजाला' दैनिक मे सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रमुख उपसंपादकक रूप मे कार्यरत रमण कुमार सिंह सँ kumarramansingh@gmail.com पर सम्पर्कक सम्भावना। 
दुखी जन लेल अहीं छी इजोत बापू दुखी जन लेल अहीं छी इजोत बापू Reviewed by e-Mithila on October 02, 2019 Rating: 5

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