पन्द्रह अगस्त सन्तानबे


तारानन्द वियोगीक कथा
पन्द्रह अगस्त सन्तानबे

-तों हमरा बहुत तंग करै छह हीरा! देखहक जे आइ फेर लेट भ’ गेलै। एना काज चलतह? तहन तँ लगाए दहक धीया-पुताक मुँह मे जाबी-हीरा महतो अपने केँ अपना कहलनि।
-हम करिऐ तँ की करिऐ? मोने सक्क मे नइं रहैए। सब कहैए जे बेकार के चिन्ता मे पड़ल छह, लेकिन हमरा कहाँ लगैए जे बेकार के चिन्ता छिऐ-हीरा महतो सोचलनि।
चारू कात रौद पसरि गेल रहै। महिसबार सभ महीस चरा क’ घुरि आएल रहए। हराठ गेनिहार सभक प्रायः अन्तिम दल बाध दिस प्रस्थान करै छल। कोढ़ियाठे हरबाह सभ आब बचल होअए तँ होअए। ऐती जैती तीन टा मैक्सी एखन धरि चैक पर सँ विदा भ’ चुकल रहै। भोरुका बेर मे चैक पर चाह पिनहार लोक सभ आबि क’ घुरि गेल रहै। मास्टर लोकनि साइकिल पर सवार अपन-अपन स्कूल लेल विदा होअए लागल रहथि। चैक मेन्टेन केनिहार गामक बेरोजगार जुबक लोकनि अपन-अपन स्थान ग्रहण क’ नेने रहथि।
हीरा महतो केँ आइ फेर देरी भ’ गेल रहनि।
उत्साहहीन आ लयहीन पैरेँ चलैत हीरा महतो अपन दोकान लग पहुँलाह। तीन-चारि गोटे मचान पर बैसल रहथि। सहरसा दिस जाइबला अनगौआं मोसाफिर लोकनि छलाह।
हीरा महतो कठघरा खोललनि। सर-समान बहार कएलनि। पानि भरि क’ अनलनि, बरतन-बासन धोलथि-पोछलथि आ स्टोव जरा क’ पानि चढ़ा देलखिन। औंटल दूध जे संग अनने छला तकरा दुधौंटा मे ध’ देलखिन। ई सभ काज मुदा बड़ा असथिर-असथिर भेल। लागै छल जेना हीरा भीतरे-भीतर कोनो भारी गुनधुन मे पड़ल खौंत सहि रहल होथि आ ई सभटा काज जेना अपने, सहज गति मे मशीनी ढंग सँ पूरा भ’ गेल हो।
-सएह, ई हालति भ’ गेलै समाजक? बसुदेवा हमरा एहन बात कहि देलक? बसुदेवा कहलक? हें...-हीरा महतो अपने केँ अपना कहलनि आ एक बेर उदास हँसी हँसलाह।
पहिल खेपक चाह तैयार भ’ गेल छलै। मोसाफिर सभ जे बैसल छलाह से लोकनि चाह मँगलनि। हीरा हुनका सभ केँ चाह देलखिन आ एक गिलास मे निकालि क’ अपनहुँ पीब’ लगलाह।
-की हीरा? खुलि गेलौ दोकान?-हीरा देखलनि पं. भोलानाथ मिसर छलाह। पुरान गांधीवादी। हीरा सँ हुनका खूब अपेक्षितारए छलै, आ ओ एहि दोकानक नियमित गँहिकी छलाह।
-हँ कका, अबियौ। बैसियौ। -हीरा बजलाह आ पण्डिज जी लेल चाह बहार करए लगलाह।
पण्डित जी मचानक एक कोन पर बैसि गेलाह। ओ प्रायः जलाश्रय दिस सँ घुरल छलाह। हुनका धोतीक निचला भाग मे मारिते रास चिड़चिड़ी लागल रहनि।
पण्डित जी केँ पाबि हीरा कने उत्साहित भ’ गेल छलाह। ओ अप्पन लोक-सन लागैत रहलखिन हें। ई बात भिन्न जे हीरा जहिया कहियो कोनो मुद्दा पर सीधा संघर्ष मे फानलाह अछि, सभ दिन पण्डित जी केँ अपना संग अएबाक अनुरोध केलखिन, मुदा ताहि सँ कहियो पण्डित जी सीधा संघर्ष मे नइं उतरलाह। निष्कर्ष पर पहुँचलाह जे सीधा संघर्षे टा एक मात्रा रस्ता नइं छिऐक, पण्डित जीक जे बाट छनि सेहो अपना जगह पर ठीक छनि।
हीराक नजरि पण्डित जीक धोती मे लागल चिड़चिड़ी पर पड़ल। ओ मुस्कियाइत बजलाह-सएह, एकरा देखियौ कका, चिड़चिड़ी सनक नाचीज वस्तु! की औकाति छै? लेकिन मनुक्ख सन बलशाली आदमी जँ एकरा धलक तँ तकरो नइं छोड़लक। भरि जानें बकुटि लेलक। की?
पण्डित जी हँस’ लगलाह। कहलखिन-गांधी जी देशवासी केँ सभ सँ पैघ बात इएह ने कहलखिन हौ! ओ कहलखिन जे जे जतहि छह, निर्भय बनह। बड़ पैघ बात ई भेलै की ने? देखहक हीरा, शोषक कतबो बलशाली होअए, लोक जँ ओकरा सँ डेराएब छोड़ि दिअए, तँ प्रश्ने नइं छै जे ओ जीतत। भगवान जे ई दुनिया बनेलखिन, तँ सभ केँ उचित-उचित हथियार देलखिन, जे अपन-अपन रक्षा करह। से सब केँ छै। मुदा, लोक भयभीत अछि, तँ अपने हथियार ओकरा अपने नइं देखार पड़ै छै! की?
-हँ कका, ठीके।-हीरा बजलाह-आब ई बात दोसर जे हथियार भगवान देलखिन आ कि लोक केँ अपने सँ तकर विकास करबाक छै!
पण्डित जी मुस्किएलाह-हँ, हमरा-तोरा विचार मे एतबा तँ अन्तर रहले ताकए।
हीराक दोकानक बामाकात गोलम्बर छै। पाखरिक विशाल गाछक चैबगली जवाहरलालक रोजगार योजनाक अन्तर्गत गोल चबूतरा बना देल गेलैए। चारि बरख बनना भेलैए। एहि बीच मे, एक खेप तँ निर्माण भेल, आ दू-दू खेप मरम्मती भ’ चुकल अछि। ओ चबूतरा ताड़ीबाज, दारूबाज, गँजेरी, जुआरी सभक अतिरिक्त गामक बेरोजगार जुबक सभक आश्रय स्थल सेहो थिक।
ओहि गोलम्बर पर एखनहुँ गोट दसेक नौजबान सभक मजलिस लागल रहै। ताहि मजलिस मे एकाएक बड़ जोर हल्ला भेलै। हल्ला सूनि पण्डित जी उठि क’ ठाढ़ भेलाह आ पाँच डेग आगाँ बढ़ि देख’ लगलाह जे की बात अछि! कोनो बात नइं रहै। नौजबान सभ गाँजा पीबि रहल छल, निशांक आवेग मे थोड़े हँसी-मजाक भेल रहै। पण्डित जी आगाँ बढ़ि क’ नौजबान सभ केँ देखलनि तँ ओहो सभ पण्डित जी केँ देखि लेलक। नौजबान सभ पण्डित जी केँ देखलक तँ पूरा शक्ति लगा क’ मन्त्रा उचारलक-
बम भटक, चिलम पटक
दम मारए पुबारि टोल
गांड़ि फाटए पछबारि टोल
हर हर महादे... व...

पण्डित जी चुपचाप घुरि अएलाह। चिलम-पार्टीक नौजबान सभ पुबारि टोलक छल आ पण्डित जीक घर पछबारि टोल पड़ैत छलनि, कहब आवश्यक नइं।


पण्डित जी चुपचाप घुरि अएलाह। हीरा सभ टा बात सुनिए रहल छलाह। हुनका लेल ई कोनो नब बात नइं रहनि। चैकक इएह संस्कृति छलै, इएह सभ्यता। हीरा अनेक बेर एकर विश्लेषणो कएने रहथि आ निर्णय कएने रहथि जे वस्तुतः चैक सम्पूर्ण गामक सभ्यताक एक अइना मात्रा छल। ओ एकाध बेर एहि प्रकारक नौजबान सभ सँ भिड़न्तो कएने रहथि। मुदा, हीराक हथियार बहुत पुरान छल। दुनाली बन्दूक सँ ए. के. 47 केँ मातु नइं देल जा सकैत छल। हीरा ओकरा सभ केँ कहने रहथिन-की यौ विद्यार्थी सब! इएह होइ? एखन जीवन निर्माणक समय अछि? माइ-बाप आस लगेने बैसल छथि। भारत माता कते सेहन्ता सँ अहाँ सब केँ देखि रहल छथि। इएह होइ?
हीरा अन्दाज कएने रहथि जे एतबा कहलाक बाद नौजबान सभ तर्क करत। चिलम पिबाक पक्ष मे अपन विचार देत। कहत जे ई नेता सब आ ई लोकतंत्रा नौजबान पीढ़ी केँ श्मशान-घाट पहुँचा देलकै-आब जीवन निर्माणक कोन सवाल? हीरा सोचने छलाह जे जुबक सभ एतबा बात कहत तँ हमहूँअपन बात कहबै जे रे भाइ, निराश भेने तँ काज नइं चलतहु। अन्हरिया जँ बड़ जड़िआएल छै तँ इजोतक ओरियान करी, तखन ने मर्द? हीरा अन्दाज कएने रहथि जे अन्ततः एहि जुबक सभ केँ जीवन दिस आ निर्माण दिस आकृष्ट कइए लेबनि!
मुदा, हीरा केँ खूब नीक जकाँ मोन छै। ओ नौजबान सभ कोनो तर्क, कोनो विचार नइं रखने रहए। ओ सभ गप-सपक भाषा गद्य मे कोनो उच्चारणे नइं कएने रहए, ओ सभ जबाब देने रहए कोरस-मय संगीतबद्ध पद्य मे-
बम भटक, चिलम पटक
दम मारए ब्राह्मण-पुत्रा
गांड़ि फाटए राड़-पुत्रा
हर हर महादे...व..

पण्डित जी चुपचाप घुरि अएलाह आ मचान पर बैसि रहलाह।


गँहिकी सभ पाइ द’ द’ क’ ससरि गेल रहए। सहरसा दिस जेबा लेल एकटा गाड़ी आबि गेल रहै। पाँच-छह गोटे जल्दी सँ चाह मांगलकै। ओकरो सभ केँ इएह गाड़ी पकड़बाक रहै। हीरा बिनु एक शब्द बजने गँहिकी सभ केँ चाह पियौलक आ पाइ लेलक। दोकान तखन खाली भ’ गेलै।
पण्डित जी पुछलखिन-हीरा, आइ-काल्हि तोरा बड़ उदासीन देखै छियह...
हीरा गिलास साफ करैत रहथि। बजलाह-हँ कका, हे इएह, बारहो बरनक अइंठ धोइ छी, अहिना धोइत रहब। एना मे के उदासीन नइं हैत?
पण्डित जी केँ ओ समुच्चा प्रसंग मोन पड़ि गेलनि। तीन दिन पहिनेक ओ प्रसंग। ओही दिन साँझ मे हीरा हुनका सुनौने रहथिन। हीरा ओहि दिन बहुत दुखी रहथि। हीराक मुँहेठ पर दुखक गहनता देखि क’ ओहि दिन पण्डित जी हिसाब कर’ लागल रहथि जे देसक आजादी दिन गांधी जीक मुँहेठ पर प्रायः एहने पीड़ा रहल हेतनि। ओ हीरा केँ सम्हारबाक बहुत कोसिस कएने रहथि। हनुमान केँ जेना जामवन्त आत्मनिरीक्षण करबौने रहथिन, प्रायः सएह चेष्टा ओहि दिन पण्डित जी कएने रहथि। मुदा सभ व्यर्थ गेल जेना। हीरा आइयो दुखी छथि आ उदासीन छथि।
-कका, ओ खिस्सा अहाँ केँ मोन अछि? सन सतहत्तरि मे जे हमर दोकान जरौने रहए! अहाँ तँ ओहि समय मे गाम मे नइं रहैत रही। ओही साल हम लखनउ सँ घूरल रही। लखनउ युनिवर्सिटी मे सुनल-देखल बात सब अतमा मे हिलकोर लैत रहए। देखनहि रहिऐ जे इमरजेन्सी मे जनता केँ कते सताएल गेल रहै। भारत माता केँ कोना निखत्तर पहुँचाए देने रहै। हमर बाप ओही साल मुइल छलाह। माइ कहलक जे गामे आबि क’ दोकान-दौरी करह। अइ गाम केँ ताधरि हम चिन्हैत नइं रहिऐ कका! ओहि साल एलेक्सन जे भेल रहै, के ठाढ़ भेल रहथि अइ ठाँ सँ?
-हँ, नन्दकिशोर पाठक ठाढ़ भेल रहथि।-पण्डित जी कहलखिन।
-आ, से नन्दकिशोर पाठक ने हगबा जोग ने मुतबा जोग।
-हँ, ठीक कहलिऐ कका! आ ओएह अइ ठाँ सँ जीतल रहै। किऐ यौ बाबू, तँ ब्राह्मण छी। वाह रे जाति। समुच्चा ब्राह्मण समाज काँग्रेस दिस। आ पचपनिया जे रहै से तँ बुझियौ जे ब्राह्मणक पैर तरक खढ़ रहै। सबटा भोंट छापि लेलकै।
-तहिया बुझितो नइं रहै लोक आ हिम्मतो नइं रहै।-पण्डित जी कहलखिन।
-से बात असली नइं रहै कका। असली बात रहै जे लोक भिखमंगा रहै। उचित मजदूरी भेटै नइं तँ पेट नइं भरै। तखन तँ ब्राह्मणम् शरणम्। दिल्ली-पंजाब जहिया सँ लोक देखलक, तहिया सँ मुँह मे बोल होअए लगलै, माथमे दिमाग... हँ तँ से खैर! हमर मोन नइं मानलक। हम लखनउ यूनिवर्सिटीक हालति देखने छी कका! जान दै ले लोक तैयार रहए। उचित बात लोक तते चिकरि क’ बाजए जे अपकारी सब कोन दाबि दै। सब मामिला मे देस चलि आबैक। ई बात जे हैत से देसक हित मे की नइं? देशक कल्याण लेल जे उचित थिक, सएह टा एहि राज्य मे, कि एहि जिला मे होना चाही। आ से बुझबै? द्वारिका मिसर मुख्यमंत्री नइं बनथि, तकर चेष्टा लेल जँ पचीस-पचास क्रान्तिकारी जुबक केँ गोली खाए पड़नि तँ तकरा लेल तैयार लोक भेटै छल। कैक टा केँ तँ हम पुलिसक गोली सँ मरैत देखलिऐ यूनिवर्सिटी गेट पर। हम तँ चाह-दोकानक नोकर रही, हमर की औकाति? लेकिन कका, पाँच-छह टा शहीद सभक जुलूस मे हम घाट तक गेल छी। छिनरी भाइ मलिकबा, तै लए हमरा आठ चैरिक मारि मारए...
हीरा महतो कने थम्हलाह, आ तुरंते पहुँचल दू टा गँहिकी लेल चाहक पानि चढ़ा देलनि। स्टोभ पर दूध चढ़ल रहै, तकरा उतारि देलनि।
हीराक गप्पक आवेग उतर’ लागल छल, मुदा विधिवत समापन करब हुनका जरूरी बुझना गेलनि। ओ बजलाह-सएह कहलहुँ कका, ताहू दिन मे अइ गाँमे हम ठाढ़ भ’ गेल रहिऐ। ब्राह्मण लोकनि तँ हमर बात नइं सुनलनि, लेकिन सौंसे गामक पचपनिया केँ हम होश मे आनि देलिऐ।-हीरा फेर चुप भेलाह।
-हँ, ठीके होश मे आनि देलहक-पण्डित जी बजलाह।
-हँ, अपना दिमाग सँ आदमी सोचए लागए, सएह ने होश भेलै।-हीरा केँ लगलनि जे पण्डित जी केँ भाव पकड़ै मे किछु दिक्कति भ’ रहलनि अछि, ओ स्पष्ट कएलनि।
ससपेन मे चीनी आ चाह पत्ती खसबैत हीरा फेर बजलाह-आ तै गाम मे आइ हम भगौआ-पड़ौआ भ’ गेलहुँ। ओ लुच्चा बसुदेबा कहलक जे लबर-लबर नइं करह, बारहो बरनक अइंठ धोइत जीवन गेलह हें, अहिना अपन चुपचाप करैत रहह। इएह होअए कका, इएह होअए?
हीरा महतो चुप भ’ गेलाह। मुदा, हुनक मुँहेंठ एकदम विकृत आ ललौन रहनि। बड़का बिहाड़ि-पानि भीतर चलि रहल छलनि, जकर झाँट बाहर मुखाकृति पर साफ खसैत देखार पड़ैत छल। ओ एकदम अशान्त छला। हुनक मौन एकदम भ्रामक मौन छलनि। ओ भीतर सँ एकदम मुखर छलाह। बाहर जँ मौन आबि क’ व्याप्त भ’ गेल छल तँ से एही टा कारण कि ओ गहन निस्संगताक पीड़ा सँ दुखी रहथि।
-बाजब तँ, मुदा सुनत के? आ जँ क्यो सुनबे नइं करत तँ बाजब कथी लए-भीतरे-भीतर मुदा जड़ैत-धधकैत रहब, खौलैत-खदकैत रहब-एहि पीड़ाक अनुभव कहियो अहाँ केँ अछि?
हीरा जाहि प्रश्न सँ अपन बात समाप्त कएने रहए, तकर कोनो जवाब बूढ़ आ रिटायर्ड गांधीवादी, हाइस्कूलक मास्टर पण्डित भोलानाथ मिसर लग नइं रहनि। एहि प्रश्नक उत्तर एहि गाम मे, एहि परोपट्टा मे, एहि राज्य आ एहि देश मे ककरो लग नइं रहै...
पण्डित जी चुपचाप मूड़ी निहुरा लेलनि आ प्रकृतिस्थ हेबाक चेष्टा कर’ लगलाह। हीरा हुनको उद्विग्न क’ देने रहनि। ओ बजलाह-चलै छियह हीरा, आब! फेर सँझुकी पहर भेंट हेतै।
-बड़ बेस।-हीरा उत्तर देलकनि।
ता, दुसधटोली के आठ-दस टा जुबक सभ दोकान पर पहुँचलै। सभ क्यो बेरा-बेरी कहलकै-गोड़ लागै छियह हीरा कका!-हीरा सभक अभिवादन स्वीकार कएलनि।
ओकरा सभक मेठ रहै पितम्बर पासवान। ओ कहलकै जे जुबक सभ दिल्ली दिस चलै गेल अछि। की करतै? गाँमे कोनो काज-रोजगार नइं छै। बी. डी. ओ. जा धरि जेल नइं गेल रहै, ता धरि कोनो-ने-कोनो स्कीम चलैत रहै। मजूरी भेटि जाइक। मुदा, बी. डी. ओ. जेलो नइं जइतए तँ सेहो तँ नइं उचित। साला तिन-तिन हजार लोकक बुढ़बा पेंशन असगरे खा जाइ? जखन बड़का-बड़का नेता जेल जा सकै छथि तखन तँ बी. डी. ओ.केँ जेबाके चाही...
एकरा सभक दिल्ली गेनाइ हीरा केँ नीक नइं लगलै। ओ बजलाह-मियांक दौड़ मस्जिदे तक सब दिन रहतै पितम्बर?
पितम्बर बाजल-उपाय की कका?
-दिल्ली-पंजाब तँ पूँजी छिऐ ने हौ? ओएह जे कहबहक जे हमरा सभक जीवन छी, से त नइं ने छिऐ? ओतए सँ कमा क’ आनलह तँ आब अपन मातृभूमि केँ रोशन करह। जेना देखहक तूँ जे दस टा जुबक छह, दसो मिलि क’ सौंसे फटोरिया बाध मनहुंडा पर ल’ लैह। दसो मिलि क’ ओतहि डेरा खसबह आ सौंसे बाधक सामूहिक खेती करह। बोरिंग दहक। टैक्टर लगाबह। जेना ओतए खटै छह, तेना एतए खटह। दिल्ली-पंजाब फीका भ’ जेतौ पितम्बर!
हीरा कहलखिन आ प्रेरित-सम्मोहित करै लेल जेना थोड़े काल धरि पितम्बरक आँखि मे आँखि मिला क’ तकैत रहलाह।
-चाह दहक हीरा कका, आठ-दस गो।-पितम्बर बात बदलि देलक।
हीरा मुदा रौ मे छलाह, ओ बजलाह-नब्बे के एलेक्सन तोरा मोन छौ, पितम्बर? कोना दस-दस दिन हम सब घुरि कए घर नइं आबी! कोनो टोल कोनो घर नइं छोड़ने रहिऐ! अवधारि नेने रहथि ब्राह्मण सब जे जादब केँ जीतए नइं देना छै। लेकिन देखलहक रहए, सबटा दछिनाहा पहलमान सब कोने दाबने रहि गेलै! एक्को टा बूथ कैप्चर क’ भेलै? आ, ओ जे गौरी झा हमरा पर बम फेंकने रहए पितम्बर, मननपुर चैक पर; मोन छौ ने, ओकरा पकड़ि क’ तूँ सब कते मारि मारने रहक!
पितम्बर सेहो आब अतीतक झलक पाबए लागल रहए। ओ बाजल-हँ कका, एह ओ तँ समैये जुलुम रहै!
-सभक जड़िमे छै मर्दानगी! अपन मातृभूमि पर जै शान सँ रहबहक, दिल्ली-पंजाब मे से शान चलतौ?-हीरा असली बात पर आबि गेलाह।
-अपन-अपन सोचै के बात छै!-पितम्बर फेर कनछी काटि गेल।
-ई बात किऐ कहलहक? हम की कोनो नजायज बात कहै छिअ’?-हीरा विचार-विनिमय के मूड मे छलाह।
पितम्बर एहि बेर सक्कत भ’ गेल। ओ बाजल-हीरा कका, एकटा बात पुछियह? खराबो लागतह?
-नइं भाइ, खराब किऐ लागत?
-तूँ तँ गोली-बम खा क’ जिता देलहक जादब जी केँ। सरकारो बनि गेलह। लेकिन बाजह, दुसधटोली मे एकटा इन्दिरा आवास बिना घूस के दिआए भेलह? धनुकटोली मे ककरो एकटा बोरिंग भेटलै? तोरा टोल मे रोड बनलह? उचित बात जँ कहियो कहलहक तँ मेाजर देलकह जादब जी? नेता भेल के तँ असरफी दास आ बसुदेबा! तूँ ही ने कहैत रहह हीरा कका जे बसुदेबा पहिने मुंगेर लाइन मे पकेटमारी करैत रहए। आइ ओकर रुतबा देखहक। मुखमंत्री एतै तँ ककरा दरबज्जा पर सरबत पीतै? तोरा दरबज्जा पर? छह मुखमंत्री जोगर दरबज्जा? सेहो बसुदेबे केँ छै ने हौ? मर्दानगी के गप की कहै छहक हीरा कका! भगवान जखन पेट देलखिन हें तँ कहुना लोक ओकरा भरै के जोगाड़ मे लागत। अइ मे मर्दानगी के कोन बात छै?-एक्के दम मे पितम्बर बहुत रास बात कहि गेलै। मुदा, तुरन्त ओकरा लागलै जे कदाचित ओ किछु बेसिए रुक्ख भ’ गेल। ओ बाजल-माफ करिह’ हीरा कका! तूँ हमरा सबहक माथ के मुकुट छियह। लेकिन, उचित बात जँ बाजबहक तँ उचित बात सुनैयो ने पड़तह?
हीरा भकोभन्न चुप्पी मे बन्न भ’ गेलाह। खिस्सा फेर ओही ठाम आबि क’ ठमकि गेल रहए-ओही बसुदेबा लग मे।
जुबक सभ लए चाह बनि गेल रहै। ओ सभ चाह पिबिते रहए ता धरि मैक्सी स्टार्ट होअए लगलै। हबर-हबर सभ क्यो चाह खतम केलक। पितम्बर पैसा देलकै आ हीरा केँ पैर छूबि प्रणाम केलक। सभ जुबक बेरा-बेरी हीरा केँ प्रणाम केलक। पितम्बर कहलकै-चलै छियह हीरा कका, धीया-पुता केँ देखिहक।
हीरा महतो कननमुँह भ’ गेल छलाह। गाड़ी खुलि गेलै। पितम्बरक अन्तिम वाक्य जेना वायुमण्डलमे गूँजैत रहलैक-धीया-पुता केँ देखिहक। धीया-पुता केँ देखिहक।
-हें हें...-हीरा महतो मूड़ी डोलबैत एकान्ती हँसी हँसलाह आ अपने केँ अपना कहलखिन-इएह होइ छै। लोक बड़ा जतन सँ घर ठाढ़ करैए। मुदा, पाँच बरस दस बरस मे घर ढहि जाइ छै! ठीक बात छिऐ। सभक एकटा औरदा होइ छै। मुदा अकाल मिर्त किऐ होइछै? अकाल मिर्त?
एही चिन्ता-विचार मे हीरा महतो पड़ल रहलाह। एक्का-दुक्का गँहिकी आबए, तकरा ओ चाह पिया देथि, पाइ ल’ लेथि, मुदा हृदय सँ आ मस्तिष्क सँ ओ कतहु आन ठाम छलाह। पछिला बीस बर्खक इतिहास मे ओ बौआ रहल छलाह। इतिहास जे छलै पछिला बीस बर्खक, जे घनघोर जंगल बनि गेल छलै। ओहि दिन मे जतन सँ रोपल पौध सभ आब बेतरतीब झाँखड़ बनि गेल रहए। औषधीय वनस्पति सभ सूखि क’ काठ भ’ गेल रहए आ ब’र-पीपर-पाखड़ि सन वृक्ष सभ धरतीक सभटा उर्वरता सोखि ल’ रहल छलै। हीरा महतो देखलनि जे छोटहन लता-गुल्म सभ कि तँ सुखा गेल छल, अथवा पीयर-कपीस भेल सुखा जेबाक क्षण मे प्रवेश क’ रहल छल। विशाल वृक्ष सभ अपन-अपन छाड़निक रद्दी सँ सौंसे इतिहास केँ कबाड़खाना बना देने रहए। आ ताहि पर सँ, सभटा रस चूसि गेल, तैयो सन्तोख नइं-हीरा पौलनि जे एकहक टा विशाल वृक्ष दस-दस टा जड़ि नमरा क’ धरती केँ सोंखि लेबाक आकुलता मे अछि। छोटहन सँ जे विशाल बनि रहल छल, सेहो सभ नहुएँ-नहुएँ एही अभियान मे जुटि गेल छल। आ रे बहिं, ई हमर देस थिक आ कि कोनो जंगल?-हीरा अपने केँ अपना कहलनि।
-ओहि बेर जे बड़का बाढ़ि एलै रहए हीरा-हीरा महतो अपनेकेँ अपना कहैत रहलाह-आ रे बा, एहन बिपत्ति काल नइं देखलौंहें। इन्दिरे गांधी के राज रहै ने? जते छाँटल शैतान सभ रहै, सबटा आन-आन काज छोड़ि क’ ब्लौक ध’ नेने रहै। बी. डी. ओ.केँ कहै जाइ हग, तँ हगए, मूत तँ मूतए। मिनिस्टर जे रहए चैधरी जी, से तँ लागए जेना एकरे सभक बल पर मिनिस्टर अछि। पचपनियाँ सभक सभटा रिलीफ साला इएह सभ खा जाइ? आ तों जे ठाढ़ भेलहक रहए हीरा, पचपनियाँ दिस सँ, अन्हड़-बिहाड़ि आबि गेल रहै। नइं? आ ओ जे छिनरी भाइ दू जूता मारलकौ रहए तोरा, से तँ आरो कमाल क’ गेलै। सौंसे परोपट्टा के पचपनियाँ तहिया एक भ’ गेल रहै। गुलामी के ओ अन्तिम दिन रहै। नइं? आइ कोइ कहतै जे ओहो समय अही गाम मे बीति चुकलैए?
-आ ओ जे रहथि हीरा, गजेन्दर मंडल पचगछिया बला, ओहो खूब मदति केने रहथि। हफ्ते-हफ्ते मीटिंग बैसए पचपनियाँ के, सौंसे परोपट्टा मे चेतना पसरि गेल रहै। पचपनियाँ के डीलर अलग, विभाग अलग, कोन लुच्चाक मजाल रहै जे एकटा बेहूसल बात कहि देतै? बात-बात पर कलक्टर-एस. पी.केँ उतरए पड़ैक, बी. डी. ओ. के कोन मानि? सभ कहौ तोरा नेताजी। नइं? लेकिन, नेता तों भेलहक कहिया? सभ दिन चाहक दोकान करैत रहलह, बारहो बरनक अइँठ धोइत रहलह!
फेर हीरा ओतहि पहुँचि गेलाह आ फेर उदासीनता गछाड़ि लेलकनि। मोन कचकि उठलनि।
कचकले मोन सँ हीरा धरती पर उतरलाह तँ यादि पड़लनि जे दूधबला केँ आबैक बेर भ’ गेलैए। ओ दुधौंटा खाली केलनि आ ससपेन-डेकची-दुधौंटा केँ कल पर ल’ जा क’ माँज’ लगलाह। आब बड़ी काल धरि कोनो गाड़ी केँ आना-जाना नइं छै, चैक खाली भ’ गेल अछि।


कोनो छोट छीन क्रिया अपन समानताक बहन्ना सँ पैघ-पैघ घटना सभ केँ स्मृति मे जगा दैत छै। हीरा बासन माँज’ लगलाह तँ अनेरो एकान्ती मुस्की मुस्कियाब’ लगलाह। अपनहि केँ अपना सम्बोधित कर’ लगलाह। जेना एहि बासन केँ ओ माँजि रहलाहें, तहिना एक दिन भीलो-तिरबेनी केँ, नागेसर-टुनमा केँ, सीतो आ बसन्त केँ, धुर कते कही, सौंसे पचपनिये केँ माँजने रहथि। वाह जी नेताजी, खूब केलह, माँजैत-माँजैत गतर-गतर के मैल छोड़ा देलहक-ओ अपने केँ अपना कहैत छथि। मुदा, सब चलि गेल। सबहक सब चलि गेल। मैदान एकदम्म खाली। हीरा केँ फेर मोन पड़लनि-जाइत काल पितम्बर कहने रहए-चलै छियह हीरा कका, धीया-पुता केँ देखिहक।

-ठीके तँ बात छिऐ भाइ, हमहीं ने एकटा बचल छिऐ-अपने केँ अपना हीरा कहैत छथि-एक माने मे अगर सोचहक तँ बसुदेबा कोनो अनुचित बात नइं कहने रहए। हमहूँ तँ ओकरा बड़ भारी बात कहने रहिऐ! हँ उचित कहने रहिऐ से अलग बात, लेकिन रहै तँ भारिए!
परसू साँझ खन हीराक दोकान पर नेता सभक रेठान लागल रहै। बजरंग दल के पाठक जी, आ कॉंग्रेसक ठाकुर जी मे टक्कर सुरू भेल रहए। विषय रहए-हवाला कांड। तुरन्त चर्चा चारा-घोटाला धरि पहुँचि गेल रहै। तखन एहि मे वि. पी. पाक सुनील झा आ राजद के बासुदेब भगत सेहो संग भ’ गेलाह। भाजपाक रामचन्द्र झा आ समताक धनुषधारी सिंह केँ चैक पहुँचबा मे आइ थोड़े बिलम्ब भेल रहनि जरूर, मुदा चारा-घोटाला सुरू होइत-होइत, ओहो लोकनि जुमि गेल छलाह। धुरझार चल’ लागल, धुआँधार। कखनो-कखनो तँ एहन होइ जे एक्के बेर पँच-पँच टा बीर अपन बहुमूल्य सिद्धान्त-वाक्य दाग’ लगै छलाह। ओ क्षण आसमान केँ फाड़ि दैबला क्षण होइ छलै। चैक मुदा अभ्यस्त छल। चैक लेल धनि सन। जनता-जनार्दन सभ अपन-अपन काज-रोजगार मे, अपन-अपन अमल मे लागल रहै छलाह।
चर्चा चलि रहल छल घमासान, हरेक नेता अधिक सँ अधिक अभिव्यक्त हेबाक अफरातफरी मे छलाह। मुदा, सभ क्यो एतबा समय निकालि लेल करथि जे बीच मे एक बेर हीरा केँ पूछि लेल करथिन-की हीरा, ठीक कहै छिऐ ने? ...की हीरा भाइ, तोहर की विचार? ...हीरा कका, तूँही कहक जे ई बात छिऐ कि नइं?-हीरा एक तरहें विचार-गोष्ठीक केन्द्र मे छलाह, यद्यपि ककरो कहियो ओ मंगनी चाह नइं पियाबैत रहथिन।
लागए जेना मण्डन-दल आ शंकराचार्य-दल मे तुमुल शास्त्रार्थ चलि रहल अछि आ निर्णायक छथिन भारतीक अवतार हीरा महतो। ताहि तरहक प्रतिष्ठा हुनका देल जाइनि!
प्रतिष्ठा हुनका बड़ भारी देल जाइनि, तकर कारण ई नइं जे चर्चाक अन्त मे ओ विजेता केँ माला पहिरा क’ श्रेष्ठ घोषित करै छलखिन, तकर कारण ई जे ओ लगातार चुप्प रहए छलाह, एकदम्म गुम्म आ बड़ जरूरी भेल तँ ‘हाँ हूँ’ करैत।
चर्चा चलल छल ओहि दिन जबर्दस्त, मुदा, पण्डित लोकनिक कहल छनि जे दुनिया मे जतेक तरहक बल अछि, ओहि मे टाकाक बल सभ सँ जब्बर होइए। जितलाह अन्ततः बासुदेब भगत। सौंसे इलाका मे अनघोल छै जे बासुदेब भगत पछिला पाँच साल मे पचास लाख टाका कमेलक अछि। ओ सभ केँ निरुत्तर क’ देलखिन। एक तरहें बुझू जे सभ क्यो गछि लेलनि जे चारा घोटाला जे छल से, बहुतो कारण सँ उचित बात छल। आ ई जे भेल अछि से कोनो गलत नइं भेल अछि।
बस, इएह क्षण छल जखन हीराक देह मे आगि लागि गेल रहै। आगि मात्रा मुहावरे टा मे लागल होइ, से बात नइं, हीरा एकदम होश मे अनुभव कएने रहथि जे हुनका देह मे आगि लागि गेल अछि आ ओ धू-धू क’ जरि रहलाह अछि।
भयावह प्रतिहिंसाक आवेग मे ओ बुमकारा छोड़ने रहथि-रे बसुदेबाऽऽऽ-एतबे बाजि क’ ओ रेघा देने रहथि। विस्फारित आँखि रहनि-आगि मे धह-धह करैत आँखि, एकाग्र बासुदेब भगत पर टिकल। निचला ठोर समुच्चा ओ दाँत तर मे दाबने रहथि आ दाँत किचने छलाह। सभ क्यो चकित रहि गेल रहथि। बासुदेब भगत केँ सेहो आश्चर्य लागल रहए जे ई हीरा कका तँ हुनका ओइ दिन मे बासुदेव छोड़ि क’ बसुदेबा नइं कहियो कहने रहथि, जाहि दिन मे ई हुनकर चेला छलखिन।
प्रतिहिंसाक आगि मे जरैत हीरा महतो बाजल छलाह-रे निर्लज्जा, एतबो सरम कर! जे कुकर्म करै छें से अपन करैत रह, लेकिन एना समाज मे नइं कहिऐ जे कुकर्मे करब ठीक छिऐ। एतबो रहम कर बहिं...
ई तँ बड़ भारी बात भेलै! करोड़पति आ एम. एल. ए. होइ लेल अग्रसर बासुदेब भगत केँ फूकि देने रहए। आऽऽऽ रे राम, एना तँ कोइ एस. पी. कलक्टरो ओकरा नइं कहि सकै छै। ओ क्रोध मे उठि क’ ठाढ़ भ’ गेल रहए। आ हीरा महतोक मुँह लग हाथ ल’ जा क’ कहने रहए-ऐ हीरा कका, जबान सम्हारि क’ बात करह! कोन बेटीचोद के कोठीक चाउर हम निकालि क’ ल’ आनलिऐ हें हौ? कहि त’ दिअए अइ गामक कोइ आदमी? बिना परमान के बात नइं बाजल करह।
-परमान? हँ रे बाबू, परमान तँ तोरे टा हिरदय जानैत हेतौ।-हीरा महतो आस्ते सँ बजलाह।
बासुदेब भगत मुदा, जेना हीराक बाते नइं सुनने होथि, घृणा आ क्रोधक पूर्ववत आवेग मे ओ बजलाह-आदमी केँ अपन औकात देखि क’ बात करना चाही। खाइ लए बार नइं, बोल बड़ भारी हौ? बारहो बरनक अइँठ धोइ छह, अहिना धोइत जिनगी बिततह।
एही सभ तरहक दू-चारि टा आरो सूक्ति आ लोकोक्तिक प्रयोग ओ प्रायः कएने हेताह, से तकर स्मरण सोगक कारण हीरा केँ नइं छै, आ क्रोधक कारण बासुदेबो केँ नइं।
-एक माने मे अगर देखहक तँ बसुदेबा कोनो खराबो बात नइं कहने रहए!-हीरा महतो अपने केँ अपना कहलनि-तोंही ओकरा कम भारी बात कहि देलहक?-दोख तोरे छौ हीरा, कोइ दोसर दोखी नइं अछि। जादब जी जखन मिनिस्टर भेलाह तँ ओहो तँ तोरा कहने रहथुन-हीरा छोड़ह ई धन्धा, ठीकेदारी लाइन मे आबह।-तोंही नइं गेलहक।
बरतन-बासन माँजि क’ हीरा घुरलाह, तखन, हुनका मोन पड़लनि जे दूधबला केँ तँ आइ ओ मना क’ देलखिन अछि। साँझ मे तँ आइ दोकान बन्द रहतै।
हीराक नस मे उत्साहक सुरसुरी पसरि गेलनि। ओ दोकान बन्न क’ आँगन जाएब उचित बुझलनि। धीया-पुता फुच्ची-शीशी जमा क’ सकतै की नइं! दू टा केराक गाछ सेहो काटबाक अछि, गेटो बनाए देबै। दीप जरए आइ भारत माता के नाम पर। वन्दे मातरम्। हीरा अपने केँ अपना कहलनि-नइं रे भैया, नइं! हारि तँ हम नहिएँ मानबहु।
काल्हि सँझुकी पहर जिला जन सम्पर्क विभागक गाड़ी चैक पर एलै रहए। जीप सँ प्रचार होइत रहए जे अइ साल ‘आजादी के पचासम वर्षगांठ’ छिऐ। स्वर्ण जयन्ती। से, अइ दिन सब क्यो अपना-अपना घर मे ‘दिवाली’ मनाउ। हीरा सुनने छलाह, अझक्के-सन। कान-बात नइं देलखिन। एहिना बहुत तरहक प्रचार होइत रहै छै। मुदा, गाड़ी चैक पर आबि क’ रुकि गेलै आ रुकि क’ प्रचार करए लगलै। गोलम्बर पर ओहि कालमे ‘एलेवन स्टार’ के नौजबान सभ गाँजा पिबैत रहए। ओहि नौजबान सभक कान मे झ’र पड़लै आ दिक भेलै। ओ सभ चहटि क’ जीप बला लग आएल छल आ प्रचार बन्द करबा लेल कहने छल। तकरा बाद ‘एलेवन स्टार’ क बाॅस प्रचार बला केँ कहने रहै-आप किसके तरफ से परचार करने आए हैं?
-बिहार सरकार के तरफ से।
-ओ...। बिहार सरकार हमको कहता है दिवाली मनाने के लिए, हम तेल कहाँ से लाएँगे? बिहार सरकार हमको तेल का पैसा देगा? साला घोटाला करेगा वो सब, और दिवाली मनाएगा पब्लिक? इतना बेकूफ समझते हैं पब्लिक को? बोलिए, जवाब दीजिए।
प्रचार बला गुम भ’ गेल रहए। बाँकी नौजबान सभ हिहिया देने रहए।
एहि क्रममे जखन हल्ला भेलै, तखन हीरा महतो अकानने छलाह आ बातकेँ बुझने रहथिन। प्रचार बला अपन जीप ल’ क’ आन-आन टोल प्रचार करए चलि गेल रहै। हीरा महतो केँ एलेवन स्टारक मन्तव्य बड़ स्पर्श कएने रहनि। ओ बड़ी काल एहि विषय मे विचार कएने रहथि। आ तखन अपने केँ अपना कहने रहथिन-रस्ता लेकिन ई ठीक नइं भेलै हीरा! नइं? की इएह होअए जे हम सभ किछु नइं करी? हमर कोनो फर्ज नइं?
आ, हीरा तखनहि निर्णय कएने छलाह जे आइ दिवाली मनौताह। दूधबला केँ रोकि देने रहथिन। तेलक इन्तिजाम केने रहथि। आँगन जा क’ कनियाँ आ धीया-पुता केँ निर्देशो द’ देलखिन। मुदा, जुलुम देखियौ जे आइ भरि दिन बिसरल रहलाह।
हीरा आँगन घुरलाह। फुच्ची-शीशी ताकल गेल। बाती बनल। तेल पड़ल। केराक थम्ह काटल गेल। गेट सजल। बाँसक बत्ती जहाँ-तहाँ बान्हल गेल आ ताहि पर डिबिया जराओल गेल। धीया-पुता आनन्द मे छल। सौंसे टोलक नेना-भुटका जुमि गेलै। मुक्त आलाप पसरए लागल। हीरा परम प्रसन्न छलाह। हुनकर मोनक उदासीनता जेना झरकि-झरकि धरती पर खस’ लागल-एनमेन फतिंगा जकाँ।
ताही काल मे पं. भोलानाथ मिसर हीराक ओहि ठाम पहुँचलाह। देखलनि जे सौंसे गामक भकोभन्न अन्हरियाक बीच हीरा महतोक दलान जगमगा रहलनि अछि। पुछलखिन-की हीरा, ई की हौ?
-आइ स्वर्ण जयन्ती दिवस छिऐ कका।
-हँ हौ, प्रचार हमहूँ सुनने रहिऐ। इच्छो भेल रहए जे दीप जराएल जाए। मुदा, बिसरि गेलिऐ। तोहूँ हमरा नइं कहलह!
-उचित बात कोइ थोड़े बिसरै छै कका!-बहुत आस्ते सँ हीरा कहलखिन, जेना ओ पण्डित जी केँ नइं, अपने केँ अपना कहि रहल होथि!!
पण्डित जी आगाँ बढ़ि दरबज्जा पर जा क’ चैकी पर बैसि रहला। ओहू ठाम जगमग करै छलै। बजलाह-आबह हीरा, बैसल जाए कनी काल।
-हे इएह अबै छी कका-कहैत हीरा आँगन गेलाह आ ओम्हर सँ भरि चँगेरी पेड़ा नेने घुरलाह। सौंसे टोलक नेना-भुटका केँ पेड़ा बिलहि क’ ओ पंडी जी लग पहुँचलाह। पण्डित जी एकटा पेड़ा लेलनि, एकटा हीरा अपनहुँ लेलनि।
इजोतक जगमगी आ पेड़ाक मिठास सँ प्रसन्न होइत पण्डित जी बजलाह-वाह हीरा, वाह, असल मर्द तों छह जे भारतमाताक पर्व मनेलह। ओम्हर देखहक जे सौंसे गाम अन्हार मे बिलाएल छै।
बाल-गोपालक संग हँसी-खेल करैत हीरा एखन चंचल बनल छलाह। पण्डित जीक गप हुनका अचानक गम्भीर बना देलकनि। बजलाह-दुनू बात तँ अहीं करै छिऐ कका! सौंसे गाम जखन अन्हरिया मे बिलाएल छैहे, तखन हम असल मर्द कोना भेलहुँ?
-हँ, बात तँ ठीक हौ; मुदा ई ककर सक?-पण्डित जी बजलाह।
-हें... हें... हें हें...-हीरा हँस’ लगलाह। बजलाह-अइ गामक पचपनियाँ केँ देखियौ कका! आ, अइ गाम केँ की, सौंसे देशे केँ देखि लियौ। लोक गुलाम रहए। क्यो एकटा मर्द आदमी एलै, जुगुत बतेलकै, लोक जतन केलक आ आजाद भेल। थोड़ बरस बितलै कि फेर गुलाम भ’ गेल। आजादी केँ सम्हारि क’ राखब जँ पार नइं लागए तँ एकरा की कहबै?
ताधरि, बहार मे बच्चा-पार्टी मे घोल-घमासान होअए लागलै। हीरा बहार निकललाह। ओ देखलनि जे ऊँचका बत्ती परहक एकटा डिबिया मिझा गेलैए, जकरा फेर सँ जरेबाक लेल बच्चा सभ मे अफरा-तफरी मचल छै। सभ सँ बेसी परेशान अछि बबलू, पितम्बर पासवानक बेटा। हीरा महतो केँ ई दृश्य बड़ नीक लगलनि। ओ पण्डित जी केँ बजौलनि। कहलखिन-कका, एखने अहाँ पुछने रही ने जे ई ककर सक? हे इएह देखियौ! मिझाएल डिबिया केँ जरेबाक लेल कते बेचैनी छै!
पण्डित जी बबलू केँ पीठ ठोकलखिन। हीरा ओकरा कोरा मे उठौलनि। बबलू मिझाएल डिबिया उतारलक। डिबिया मे तेल छलैहे, ओ बसातक झोंक मे मिझा गेल छल। बबलुए हाथें फेर डिबिया जरबाओल गेल। सभ बच्चा थपड़ी पाड़ए लागल।


 ★★★

तारानन्द वियोगी मैथिलीक सुप्रतिष्ठित साहित्यकार छथि। सृजनात्मक आ आलोचनात्मक दुनू तरहक लेखन मे प्रायः समान रुचि आ गति, किन्तु मूलतः कवि छथि। उग्रतारा पीठ महिषी (सहरसा) निवासी वियोगी संस्कृत सँ साहित्याचार्य छथि एवं मैथिली साहित्यिक जगत मे दलित साहित्यक प्रवक्ताक रूप मे जानल जाइत छथि। यात्री-नागार्जुन आ राजकमल चौधरीक सानिध्य मे रहबाक हिनका सौभाग्य प्राप्त छनि एवं दुहूक स्मृति केंद्रित संस्मरण पुस्तक सेहो लिखलनि अछि। 'ई भेटल तँ की भेटल' पुस्तक लेल हिनका बाल साहित्य मे साहित्य अकादमिक बाल साहित्य पुरस्कार प्राप्त छनि। प्रस्तुत कथा सन्धान(सम्पादक-अशोक) सँ एतए साभार प्रस्तुत अछि। वियोगी सँ tara.viyogi@gmail.com पर सम्पर्क सम्भव। 



पन्द्रह अगस्त सन्तानबे पन्द्रह अगस्त सन्तानबे Reviewed by e-Mithila on September 10, 2019 Rating: 5

No comments:

Powered by Blogger.