आसक बान्ह टूटल नहि अछि


मधुरिमाक किछु कविता ::

1.आस
  
हमर चिट्ठी तोरा लग पहुँचतउ 
आ कि नहि
हमरा नहि पता 
हमर आकुल मन आ 
दर्द सँ व्याकुल तन 
मोन पाड़' चाहैत अछि 
जिनगीक किछु सुखद क्षण 

पता अछि, आब एहि संसार सँ
निपत्ता भ' रहल छी 
तथापि आसक कोनो कोन मे
दग्धल आत्मा केर
एक्कहि टा चाह अछि 
एहि देहक अत्फ़ाल 
सदेह आँखि सँ निहारि ली

सदिखन नोरायल आँखि 
कनेक जुड़ा ली
कांकोड़ गारा मे फंसल अछि 
वर्ष भरि सँ
खा रहल अछि 
नहुएँ-नहुएँ    
एक-एक कौर

जरा जीर्ण-शीर्ण  
चिरंतन प्यास अछि 
कंठ सूखि रहल अछि 
अपना हाथ सँ
दू घोंट निर्मल जल 
कनेक पिआ दितैं...

जेठक ई निछछ रौद 
अपन पूर्ण रौद्र रूप 
धारण केने अछि 
मुदा आसक बान्ह 
टूटल नहि अछि

रसन चौकी एखन धरि
लागलै कि ने ?
शुभक अंतिम ई काज 
हकासल-पिआसल मोनक 
एक्कहि टा आस 
संततिक हाथे दू घोंट जल 

आ तत्पश्चात प्रयाण 
किंसाइत इहो निहोरा 
नहि सुनता ओ अधम 
आ क्रूर विधाता 
ओ जेठे बताह 
जन्म-मरण केर 
ओकरा की पता 

सामर्थ्य धरि सेवा-सुश्रुषा 
छोट कर्तव्यक इतिश्री 
वर्ष धरि पूर्वहि संपन्न 
दोष विधाताक नहि
अपन कर्तव्यक अछि 
आँखिक बीच मे रहैत अछि पुतली 
ओ सभ देखि रहल अछि 

पुतली पथरायब सँ पूर्व 
सदृश पुतली सँ नयन जुराय...
एक अंतिम अभिलाषा 
आसक एही डोर सँ
लीखि रहल मोन
कागत-कलम बिनु 
अपन ई चिट्ठी 

तन्द्रा टूटल
मोनक आस नहि टूटल 
जिह्वा पर अस्फुट 
एक शब्द , बुच्ची... 
जीवन केर माला सँ चूबि 
बिखरि-बिखरि रहल 
सांसक एकहेक मोती 

आत्मा आ कंठ दुनू सूखल 
दू घोंट गंगाजल 
दू घोंट तुलसीदल 
कंठ मे सन्हिया गेल 
अधम देह सँ प्राण 
क्षण मे बिला गेल 

पथरायल आँखिक पुतली 
अतृप्त आसक पल 
दुनू हाथक दू आंगुर सँ
सदा सर्वदा झंपा गेल !!

2. भरोस 
   
सांसक अंतिम डोर सँ
लिखल तोहर चिट्ठी 
टेलीपैथी भेल 
मुदा परवश पराधीन

आत्माक तड़प एहि जगत मे 
आइधरि कियो नहि सुनल
छुच्छ हाथ आ छुच्छ मोन 
अबस मे प्राण 
आकुल ह्रदय, निर्सल जीवन 
छोड़न छाड़न ओढ़न पहिरन 
निछाउर आ अनुकम्पा पर 
कहुना चलैत रहल

हकासल पिआसल
जिनगीक ई चक्का 
भेंटक चाह चाहे रहल 

चाह तँ भेल कतेको बेर 
एकटा चिट्ठी तोहर नामे लिखी 
जाहि मे तोरा बताबी 
गे हमर सुद्धा माँ 
संसारक ज्ञानक वास्ते 
राक्षसक नगरी सँ दूर 
सुरक्षित मचान पर
छाती सँ चिपकल नेन्ना के
अपना सँ कतेक दूर भेज देलै...

ओ डरायल आँखि
आँचर सँ नोर पोछैत
काठक करेज आ विदाक घड़ी
नाचि उठल कतेको बेर 

तोहर दुःख मे इजाफा ने होउ
नहि लिखल गेल चिट्ठी 
बिछोहक ओ पल 
दहोबहो बहैत छल 
साँझक आँचर मे
जखन सूरज डूमय 
आ अन्हारक आँचर पसरय 
ओही मे नुका जाय 
गे हमर सुनरी माँ !

हम तखनो तोरा 
चिट्ठी नहि द' सकलियौ 
जखन हमर किशोर वय 
क्षत विक्षत भ' गेल 
लाख पहराक अछैत 
हज़ार बंदिशक तह मे
तहियायल हमर बचपन 
बालूक ढूह जकाँ ढहि गेल

एकटा अओर बाढ़िक धसना 
तोहर करेजा पर 
नहि धसि जाउ
नहि लिखल गेल 
तोहर नामे एगो पाती...
गे हमर खुशदिल माँ ! 

जिनगीक कोनो 
डरायल सहमल पल 
साझा नहि क' सकल ई मोन 
मुदा मोनक हर कोन मे 
समायल रहल तोहर छवि 
तोहर सिनेहक बाती

जे हरदम तोहर आत्मा मे 
जरैत छलहुँ 
ओकरे धाह सँ
एखन धरि जीबैत छी ...
मूनल पथरायल आँखि 
कतहु फूजैत छै कि?

चिर निद्रा मे सूतल तोहर काया 
राति भरि सिरमा मे बैसि  
निहारैत रहल सजल नयन
लग रहबाक चाह 
एना पूरा केलनि विधाता !!

विधिनाक ई विधि 
आब अमान्य अछि 
अपन विधान स्वयं निर्धराब 
प्राणहीन तोहर कृष कायाक शपथ 
अपटी खेत मे उज्जर नुआ पहिर 

तोरा जकाँ हम विदा नहि होयब 
हम पराधीन नहि रहब 
चिर प्रतीक्षित तोहर ख्वाहिश 
अवश्य साकार करब 
हर दम, हर पल, हर क्षण 
चिरंतन मोन केर स्थायी भाव 

एक अंतिम भेंटक प्रतीक्षारत आत्मा
घोर पशाताप मे जरि रहल अछि 
हे निर्जरा, हमर अपराध 
क्षेमब जोग तँ एकदम नहि 
तथापि 
कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति ।।

पुनश्च : एहि संसारक ई दू गोट पाती 
       बिना पता ठेकान केर 
अपन स्थायी पता पर अवश्य पहुँचत  
आशा अछि, विश्वासक पता नहि...        

3. अनुत्तरित प्रश्न 
    
उड़इत उड़इत मेघक ओ श्याम पिंड 
अन्हार रातिक नीरवता मे 
खिडकीक टूटल पाट सँ
हमर चौकी पर चलि आयल 
नहि जानि अपन मोटरी मे
ओ की बन्हने छल 
ओ फुसफुसाइत कहलक 
हवा केर संगे बड्ड भारी युद्ध भेल 
कतेको संगी साथी मेघ 
आघात सहि नहि सकला 
सन्हिया गेला टुकड़ी मे
धरती आ पहाड़क कोन मे
यत्र तत्र सर्वत्र 
बहुत रास मेघ 
अखनो बइलगाइल गेल 
नोरक बाढ़ि पसरल अछि 
धरा पर चंहुओर
हम कारी आ कठोर छी 
पहुँच सकलहुँ तोरा लग 
बड्ड कठिनाइ सँ
एहि टूटल खिड़की सँ
अकास मे की तकैत छह? 
सुध बुध हेरा क'
की हेरइत छह ?? 
कथमपि हुनका, 
जिनक अपटी खेत मे
हेरा गेलैन प्राण ?
ओहि काल मे खसैत 
तोहर नोरक बुन्न-बुन्न 
अपन एहि मोटरी मे 
सहेज क' समटने छी
देख' मोटरी मे बन्न
पसिझल आँखिक ई बुन्न 
मेघक ढेरीक ई घौंद 
खालिस तोहर छह ई 
हमर तोहर भेंटक भेंट सँ
किंसाइत खेत लहलहा जाय
संभवतः दिवस फेरा जाय...

आबक एहि बेकाल समय मे 
कोनो खेतिहरक दिन बदललै की ??? 
मात्र हमर एक प्रश्न 
गहींर सोच मे डुबा देल 
एहि अनुत्तरित प्रश्नक आघात 
ओ कारी आ कठोर मेघ 
सहि नहि सकल 
ओ तत्क्षण चौकी सँ ढुलकि 
निचा अईंठार मे समा गेल ...!

4.आघात 

हमरा गामक छल शनिचरा... 
चोरा क' अनलक एल्ड्रिन 
चाहलक सभ के पिआ दी 
पुनः सोचक अगिनबान धंसलय  
फेर मोने मोन उचरलय 
ओकर मृत्यु उपरांत 
किंसाइत द' जाय कोय 
ओकरा घर मे मरकौर 
ओकर भूखल परिवार 
नहियो नहियो तँ
एक्को साँझ पेट भरि 
भोजन पाबि लेत...!!
गाम मे कहब छैक सबहक 
शनिचरा एल्ड्रिन पी गेल 
धारक काते मे गुजरि गेल
तइयो नहि एलै ओकर घर मे
कोनो समाजी आ सरकारी मरकौर...!!
आ गाम मे जे छल ओ बेचनी... 
बेचनी सेहो तँ
प्रेम पंथ अपनेने छल 
किछु सोहनगर क्षणक सेहन्ता 
ओकर जिनगीक भ' गेल हन्ता 
रसूखदार सबहक घर मे
छतक नीचाँ छाँह कहाँ 
गरदनि लटकाब' वास्ते 
खाली सीलिंग मे 
मात्र लटकैत छैक पंखा...!!
आ, ओ जे छल ललमुनिया... 
ओ कोन एहन गुनाह केने छल 
मात्र इज्जैतक जीवन खातिर 
स्वयं के बचाब' तँ चाहैत छल 
गाछ सँ लटकाओल भेटल
कियैक ओकर गन्हायल लाश...!!
एहन कतेको घटना नित घटैत अछि
हमरा गाम सँ ल' क'
अहाँ सभक शहर मे सेहो 
यैह अछि एहि विकासशील देशक
घोर विडंबना 
जकरा गान्ही बाबाक 
खंती सँ खोधि क'
भोरक टट्टी जकाँ 
सदा सर्वदा लेल 
खेत मे ढकि देल जाइछ 
मुंह पर ताला लगा 
नाक आँखि मुनने 
निशब्द चलैत छी 
निरंतर हम सभ 
नहि पता कतय 
आ कियैक ? 

5.अंतर

कोसी कछेर केर कासक उज्जर फूल
सुन्दर सुशोभित मनोहर स्वरूप
नहुँए नहुँए
निरंतर 
हाथ फेरब 
चलैत रहैत छल
कांपि लागैत छल कास सँ
चुह चुहा क' जमि जाइत छल
एक आध बूँद शोणित आंगुर मे...
तथापि
आनंदक सीमा अनंत 
अवांतर मे, बिला गेल
नहि रहल अछाह जलप्रांतर
जाहि जल मे निरंतर विचरण
मोनक आनंदक धार 
आओर छल
जिनगीक शगल…
पानिक संगे संगे
कोसी आनैत छल
बाउल, माटि आ धसना
एक नम्मर केर खेलक्कड़ी 
अल्हड़ आ मदमस्त
सदिखन अपन धार
आ कूल बदलै वाली
रने बने छिछियाइ वाली
खेत खरिहानक रूप ल' क'
बदलि लेलक अपन स्वरुप
फेर तँ, जिनगीक हिस्सा
धरतीक हिस्सा बखरा
एकरा...  ओकरा...
नहि जानि ककरा ककरा
युग पर युग बीतल
कोसिक छिच्छा नहि मेटल
हहायल फुफायल फेर आयल
खेत पथारक संगे संगे
कोठा-सोफा जान-माल
दहा बहा ल' गेल
जिनगीक धार धारे रहि गेल
ने कोनो कूल ने कुल 

कालांतर स्थिति...
कांपि लगैत अछि
एखनहुँ
मुदा
कागदक धार सँ...!
झक झक उज्जर कागद
कखन आंगुर केर चीर
शोणित बाहर छलका दैत अछि
बुझबा मे नहि अबैत अछि
चटख लाल टिकुली सन
पन्ना पर दाग देख
होइत अछि ज्ञात
अपन अल्लहड़पन
भान होइत अछि
अपन मदमस्ती...
कोसिकन्हाक आंगुर मे
कास सँ कांपि लागब
शाश्वत अछि
जेना माटिक करेजा पर
कोसिक हिलोर
जिनगीक लेल शाश्वत अछि
ओहिना जेना
एहि पंचतत्व क अधम मे   
शोणितक बहाव शाश्वत अछि...

6.सिनेह वत्सल     

हमरा थाकल चेहरा सँ बड्ड सिनेह अछि
एहि चेहरा मे हमरा नित दिन 
हर बहबैत फेकना
धनरोपनी करैत रौदियाक कनिया
कुट्टी काटैत बेचनी
आ भैंस चरबैत शनिचरा देखाइत अछि
भरि दिनक मशक्कत केर बाद
ई सभ गोटे जखन एकट्ठे
आंगनक ओसार पर
अपन अपन रोटी, नोन आ प्याज ल' क'
जलखै लेल बैसैत अछि
तखन सभ सँ बेसी थाकल
एगो चेहरा
खिलखिलाइत सामने अबैत अछि
ओ अपन हाथ सँ बनाओल
गरमागरम स्वादिष्ट तरकारी परसैत
बाजि उठैत छथि---
"रौ, छुच्छे रोटी कियैक खेबें
ले तरकारी सँगे खो...!

ओ थाकल चेहरा थिक
हमर सभक बड़की माँ केर--

हँ, सत्ते ओ एहि गामक
बड़की माँ छथि...
तेरहम बरिख मे
एहि गामक पुतोहु बनि
लाल पटोर मे सजि धजि औलन्हि
तेइसम तक तीन सन्तान
आ चौबीसम तक पतिविहीन...

एकर उपरान्तो
ओ एहि धरतीक माटि सँ
बड्ड प्रेम करैत छथि
हुनक कहब जे
सभ छोड़ि जायत
ई धरती तँ संगे जायत...

खैर ...
बड़की माँ थकलाक बादो
एहि धरती के जोति कोरि
ॠतु अनुरूप तरकारी उपजा क'
अपना थाकल ठेहियायल
बेस्वाद जीवन मे
जोन बोनिहार आ सर्वहारा केँ
स्वाद परसैत रहैत छथि
तैं हमरा थाकल चेहरा सँ
बड्ड सिनेह अछि
ओ सर्वहारा होइतो
सभ सँ जीतल छथि।

7. बारूद 

सुटुकपिल्ली एतनी टा ई काठी
बारूदक लिपिस्टिक लगौने 
कनेक रगर सँ फनफना उठैत अछि
मोन होए तँ ओहि सँ चूल्हा जलाबी
किंवा दुनिया केर...

तत्काल ओ चूल्हे जलौलक..!!

बियान केँ पंद्रह दिन बाद
आइ शुद्ध भेल गाय
आँच कम क' दूध चढौलक ओ
शनैः शनैः आँच गर्म भेल
आ दूध सुसुम भेल...

उफान कनेक काल मे आओत
आ दूध खउल जायत
कनेक कालक गहींर मुसकी
ओकर चम्पइ चाम पर खेल गेल
फेर तुरंते छाउरक दाबल लुत्ती संगे
ओ छवि लुत्तीपतंग भ'  
क्षितज मे विलुप्त भ' गेल

ओ आँच मद्धिम केलक
एक टा बड़का फर्क छैक
ओकरा आ इसाक मे
ओ बुझनुक अछि...

चूल्हाक आँच तँ
ओकर हाथे मे अछि
मुदा इसाक केँ नहि पता
दूध औंटब लेल आँच
कनेक मद्धम राखब टा नीक
ओ बुझैत नहि अछि
कि बूझ' चाहैत नहि अछि
एकर असमंजस अछि

हाथक एक टा झटका सँ
सहजहिं आगि धधैक उठल
दूधओउंटा सँ खसि क'
भनसारि मे फइल गेल
किछु आगि मे जरि गेल

अन्ततोगत्वा ... 
(बुझू जे भरि संसार मे फइल गेल)

वस्तुतः आगिक चम्पइ भीड़
ओकर दूधिया अक्स कें
क्षणहि मे लील गेल
आइ ओकरा देखा गेल
सरिपहुँ भीड़क लीला...

संदेह नहि, ओ समझदार नहि
सुद्धपन तँ कोनो गुणे नहि
ओ जरैत रहत सदिखन
अहिना एक टा काठी सँ...

8.  आतंक 

महज़ एक रोटिक खातिर 
जखन निरीह नागरिकक
लहू सँ रक्तिम भ' गेल 
धरतीक ई धूसर माटि
आ जखन ओ माँ
(जे बना रहल छल)
ओहि बेटीक लेल रोटी
जे पसारैत छल कपड़ा 
ओहि पारक गोला बारूद सँ
ओ सरपहि ढहि गेल
कतहुँ कोनो महजरो नहि...

महज़ एक रोटीक खातिर
एहि धरतीक कतेको वीर
एतेक गोली खाइत अछि
आ बिना किछु केने धेने
खाली एगो कुर्सिक खातिर
बारूदक महल उगलैत अछि
एहि धरतीक सफेदपोश... 
ताल ठोकैत सफेदपोश 
वाकयुद्ध करैत सफेदपोश 
सीमा आ मर्यादाक 
बारम्बार उल्लंघन 
तथापि सरहद रक्षार्थ  
सीमा पर कतेको जवान
न्योछावर क' देल प्राण  
सर आ हद सभ शहीद
कतहुँ कोनो महजरो नहि...

9. ध्वंश

हरसिंगारक नवल धवल पल्लव
आ ओहि पर अठखेली करैत
ओ कारी, भुल्ली फुलचुस्सी

नमका नमका लोल बाली
एहि डारि सँ ओहि डारि 
भोरे भोर फुदकैत फुदकैत

छोट छीन कचबचिया…
क्षण मे बना लेलक खोंता
परिश्रम आ कलाकारिक
मिसाल ओकर खोता…

मनुक्खक एक छवि 
हरकत ओ हस्तक्षेप...
जाने अनजाने सेंध लगाक' 
ओकर प्रेम निशान देखब 

फूलक रस सँ स्नान 
फूलक रस ओकर भोजन 
अस्पृश्य मनुखक नजरि सँ 
ओकर नव संतति छुति गेल 

फूल चूसनिहार ई जीव
करेजा पर पाथर राखि 
विध्वंश क' देलक 
सहजहिं अपन सृजन

खोंता सँ निरसल प्रेम देखि...
आत्मा क्षुब्ध अछि
आँखि सिक्त अछि
आ मोन तिक्त अछि।

10. भय

आब हम कानैत नहि छी
आ नहि गाबैत छी
खाली हँसैत छी
बस अपना आप पर
ओही तरहें जेना कि
मोहल्लाक लाउडस्पीकर
भेमियायित रहैत अछि सदिखन
अस्पष्ट शब्द मे...
कखनो अल्लाह हो अकबर
कखनो श्री राम जय राम जय जय राम
कखनो वाहेगुरु वाहेगुरु सतनाम
चहुँदिसा मे उत्सवक आयाम
बहुआयामी लोकक बीच
हँसनाइ अत्यंत आवश्यक
नहि तँ कोनो द्रोहक दंश
कखनो विध्वंस क' सकैछ.


★★★


मधुरिमा (जन्म – 9 मार्च, 1971) विगत एकटा पैघ समयावधि सँ काव्य-लेखनक क्षेत्र मे सक्रिय छथि तथा हिन्दी एवं मैथिली मे समान रूप सँ लिखैत छथि। हिनक 'धरती ही सहती है' शीर्षक सँ एकटा हिंदी कविता-संग्रह दृश्य मे छनि आ एकर अतिरिक्त विभिन्न हिंदी-मैथिली पत्र-पत्रिका सभ मे कविता-लेख प्रकाशित-प्रशंसित। पटना रहनिहारि मधुरिमा हिंदी सँ स्नातकोत्तर छथि एवं बाल-भवन, बिहारक बाल पत्रिकाक संकलन-सम्पादन आ लेखन-प्रशिक्षण कार्य सँ सम्बद्ध छथि। 'ई-मिथिला' पर प्रकाशनक हिनक एहि प्राथमिक अवसर पर मधुरिमा केँ बहुत बधाइ आ शुभकामना संगहि ई उमेद-भरोस जे अपन सक्रियता व काव्य-कृति सभ सँ मैथिली साहित्य मे ओ अपन एकटा फराक पहिचान स्थापित क' सकतीह। 

आसक बान्ह टूटल नहि अछि आसक बान्ह टूटल नहि अछि Reviewed by e-Mithila on September 26, 2019 Rating: 5

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