आदिकाल सँ कंपित स्वर मे विद्रुप होइत रहल अछि स्त्रीक देह



 रोमिशा मैथिली कविताक प्रतिनिधि स्त्री स्वरक रूप मे स्थापित भए रहलीह अछि। सम्बन्ध आ समजाक द्वन्द मे स्त्रीक चिर्रीचोथ होइत अस्तित्वक तसदीक करैत हिनक कविता स्त्रीक अव्यक्त मनोभावक सार्थक चित्रण प्रस्तुत करैत अछि। प्रतिकारक सामर्थ्य आ वस्तु-विषयक महीन विश्लेषण एहि कविता सभक 'ट्रेडमार्क'अछि आ अपन टोन मे लाउड रहितहुँ सम्प्रेषण सामर्थ्य सँ कविता कथ्यक निजता केँ स्थापित करैत अछि। प्रेम आ वासनाक मध्य चुल्हिक आगि सँ सीधैत स्त्री जीवनक धुकधुकी हियासैत रोमिशा अपन कविता सँ स्त्री विमर्शक नव दृष्टिकोण ठाढ़ करैत छथि।


रोमिशाक पाँच गोट कविता 




प्रेम आ वासनाक मध्य ठाढ़ स्त्री 

ओना तँ ई सब दोग सान्हि  मे होइते रहैत छल
कोनो उद्यान, गलियारा, सिनमाघर, मैक.डी, 
सी.सी.डी, के.एफ.सी या कोनो आन ठाम
कखनो -कखनो गाम घरक कोनो कोठीक दोग मे
कल पर, आमक गाछी मे, मेला -ठेला सगरो
बहुत बेर आदिकाल सँ तँ 
कंपित स्वर मे विद्रुप होइत रहल अछि स्त्रीक देह...

आब जखन स्वतंत्रताक महायात्रा पर 
निकलल अछि स्त्री 
तँ कतेक स्वतंत्रता देतनि 
ई समाज हुनका 
प्रेम लेल ?

दम तोड़ैत दामपत्यक 
कामुकताक लिप्सा मे लटपटायल
सेक्स नामक भूखक स्टार्टर भए कए रहि जेतीह स्त्री 
मेन कोर्स सदिखन 
पुरुख लेल घर मे बैसल स्त्री होइत छथि...

आ जे स्त्री वा कि पुरुख वास्तव मे दुखी छथि  
से भक्ष्य बनल छथि दांपत्यक असफलताक 
हुनका ढालि देल गेल अछि
एकटा सामाजिक एहन खाँच मे
जाहि सँ मुक्ति बड्ड कठिन 
किएक तँ खुँटेसल रहै छथि ओ सब 
दिन सँ राति धरि
गृहस्थीक एहन खूँटा मे
जे सदिखन मुँह मे आंगुर कोंचि - कोंचि 
वमन करबबैत अछि संस्कारक 
मोन मे घुरियबैत रहैत अछि अनन्त प्रश्न 
कपार उघैत रहैत अछि मर्यादाक बोझ
लत्तम जुत्ती कन्नारोहट कए 
पुन: व्याकुल भए  जाइत छथि  
अप्पन नेनाक आँखि मे उतरि आएल 
लड़खड़ाइत-थरथराइत 
जीवनक दुःस्वप्न देखि 
ओ फेर सँ समेट लैत छथि अपना केँ  
आ पुनः झोंका जाइ छथि गृहस्थीक भट्टी मे .....

फेर ई न्यायालयक निर्णय ककर हित मे? 
पाश्चात्य गलियाराक संस्कृति पसारि 
वासनाक क्रेता-विक्रेता बनि जाएत समाज
कामाकुल आर्थिक संपन्न लोक 
उजाड़ि देत कतेको घर-गृहस्थी 
अनायासहि सब भए जाएत परित्यक्त वा परित्यक्ता
समाज मे बनबैत एकटा ब्लैक होल
जाहि मे असीम वेग सँ भसिया हेरा जायब हम सब.

मानू ई बात जे ई स्वतंत्रता प्रेम लेल नहि अछि 
प्रेम लेल कोनो स्वतंत्रताक खगता नहि
देह सँ इतर होइत अछि प्रेम
एहि दुनियाँ सँ  ओहि दुनिया धरिक  
यात्रा कए सकैत अछि प्रेम 
बिना कोनो स्पर्शक आ आत्मग्लानि केँ 

आहुति 

चुल्हाक आगि सँ लुत्ती उड़ए लागल अछि
पछबाक साँय-साँय कोन दिस लए जाएत लुत्ती, की पता
कोनो चार जरत आ कि गोहाली आ कि  
गामक-गाम जरि जाएत से नहि पता मुदा 
लुत्ती  उड़ल अछि तँ  किछु तँ जड़त 
कियैक तँ चुल्हि मे झोंकि देने छथि ओ
एक संग कतेक रास चेड़ा
हुनका इच्छा छनि चुल्हि  पजाड़ि के 
पूर्णाहूति देबाक मिथिलाक शिथिलताक नाम
जतए  बेचए  छथि बेटाक माय अप्पन कोखि
आ पाग पहिरने द्वार  लागैत अछि अनगिन बरियाती 
मौसक बुट्टी पर भुखायल मांसाहारी पशु सन
ओ देमए चाहैत छथि एकटा पूर्णाहूति ओहि मिथिलाक
जकर 'मैथिली' अपार कष्ट सहैत धरती तर चलि गेली
इच्छा  हुनको होइ छनि करबाक जयगान
पान,, मखान, मिश्री, अरिपन, पानि - पीढी 
चानन-टिक्का, धोती-कुरता आ दोपटाक 
मुदा ओ सोचए लगै छथि  कि पाग
 पहिरए आ पहिराबए बला गणमान्य सब नहि देखैत छथि
आइ हर घर मँ सीताक रुद्र वीणा बजबैत
 आ गुहाइर लगबैत कि हे धरती अहाँ हमरो लेल फाटू
फाटू ओइ सँ पहिने जखन हमरा सीबय पड़त
अपन फाटल करेजा कें कोनो बिकायल राम लेल 

हे मैथिल अहाँ  भाषा बचबै सँ पहिने बचाउ
भाषा सिखबैवाली  कें 
जकर गर्भ  पुरुष लेल बलि चढायल जा रहल अछि
अहाँ बचबू सुखिया,  मुनिया, रितिया सन 
कतेक सरिसोंक फूल जकाँ फुलाएल 
दुसधटोली, चमरटोलिक बेटी केँ 
जकर देह गहुँमक कटाइ होइते पेरा जायत
मात्र पिय्यर देह बनि कए 
कोसिक धार बहत उनटा, सतलुज दिस 
जतय ई सब फुलायल फूल मात्र कोखि  धरि बनि जाएत
आ जकर नोर मिथिला पर कानैत समुद्र मे बिला जाएत

उच्छ्वास 

दूर ठाढ़ नीम गाछक कान्ह पर 
जे चान उतरल अछि
अपसियाँत भेल तकैत कोनो आँगन
जाहि ठाम उतरि ओ थाहि लिअए कि
धरती एखनो धरि सौरमंडलक संतान छियै...

ठीक ओहने काल मे जमीन पर पसरल  दूभि पर
लिखल जा रहल अछि देहक जाति 
तखने दूर ठाढ़ पहाड़ ताकि रहल अछि 
कोनो हताश घर जे फकसियारि करैत हुअए 
सूरजक प्रकाश  लेल
आर ओहिने समय मे तेज कयल  जा रहल अछि 
अप्पन -अप्पन जीहक धार 
जाहि सँ निकलल शब्द रोकि देतए फेर सँ
मनुष्यताक बाटक इजोत जाहि सं
बचल रहै  कोनो  टूटल मंदिर, छुतायल इनार
दरकैत आरक्षित चहारदीवारी 
प्रतीक्षा मे  मनुष्यक, मनुष्यताक शृखंला मे
खुलि कए  उच्छवास लैत देखबाक इच्छा मे ठाढ़.......



माय आ भगवती 

नौ दुर्गाक, पहिल पूजा सँ
नवम दिन धरि
रोज साँझुक पहर सँ पहिने 
तीन कमराक एकटा बन्द फ्लैटक 
तीन फिटिया बालकोनी मे बैसि
माय रोज आधा घंटा लगा 
बनबय छथिन माटिक दीप
ओ जीवनक संग्राम मे 
लहूलुहान भेलाक बादो 
भगवती लेल बचेने छथिन अप्पन स्नेह
एकदम सुच्चा ओहि रूप मे 
जाहि मे हुनका भेल छलनि पहिल दीपक संग्यान
एहि दीप बनेबाक एखन तक केर यात्रा मे
कतेक मनोभाव ढहि गेल
कतेक अन्हार पसरि  गेल
कतेक शब्द भए गेल अलोपित शब्दकोश सँ
जीवनक कतेक ऊष्मा 
बिला गेल धुआँ बनि हवा संग 
लुप्त भए गेल मोनक सुन्दरता 
नष्ट भए गेल सब कविता 
मुदा माय केने रहल 
अहर्निश अभियान जारी 
आत्मा सँ अन्धकारक 
असंख्य स्मृति चिन्ह मेटबैत 
जोगबैत सब संबन्ध लेल स्नेह 
रोपने रहल अप्पन मोन मे 
स्नेहक हरशृंगारक गाछ 
जीवनक भोरक उजास भरैत अपना मे
ओ बचेने रहलीह प्रेम भगवतियोक लेल ओहिना 
  
मुदा की ओ कहिओ बुझि सकथिन
जे ई दीप जे भगवती लेल बनय छै 
कतेक काँच आ तन्नुक होइत अछि 
ओहि माटि मे स्त्रीक 
दम तोड़ैत असोथकित विश्वासक कतेक 
अस्फुट्ट प्रश्न सना जाइत अछि 
भरि साल लेल छोड़ैत हुनका लग 
व्यर्थक धीरज जे भगवती 
स्त्रीक जीवन मे प्रकाश जरूर आनथिन 
आ अहि विश्वास सँ बचल रहैत छनि हुनकर 
घर -गृहस्थी , पति संतान आ अरिजन -परिजन 
सब संग आसक्ति 
ओहिना जेना 
हरसिंगारक गाछ पर 
पसरल रहै छै भूअा 
छितरायल रहै छै 
जमीन पर डारि सँ अलग फूल 
आ गाछ नितान्त एकाकीपन मे डोलैत 
भोगैत रहै छथि वएह पीड़ा जे भोगए छथिन भगवती 

सृजनक दूभि

अहाँ बंद कमराक पाँछा की करए छी 
ई हम्मर हिस्साक प्रश्न नहि 
अहाँक सिगरेटक धुआँ
कमराक हवा संग उड़िया जाएत 
किछु ढेंगरायल खलिया बोतल 
कबाड़ी बला लए जाएत 
ओछाइनक सिलवट अहाँ स्वंय सोझ कए लेब
ई सब हम्मर मतलबक प्रश्न नहि अछि
मुदा जखन अहाँक प्रेमक आगि
कोनो देह कें जरा के 
संस्कृति कें छाउर करत 
आ ओइ छाउरक गर्भ मे
नव जान करवट लेबय लागत 
तखन हम सोचए लगैत छी 
आ सोचनाय आवश्यक अछि 
किएक तँ ई नहि तँ सिगरेटक धुआँ अछि
नहि खलिया बोतल
नहि चादरक सिलवट 
ई तँ संस्कृतिक सारा पर उगि आएल 
सृजनक हरियर दूभि अछि 
जकरा कोन ईश्वरक 
आशीर्वादक 
साक्षी मानल जाए 
ई ककरो नहि पता ...

एकरा तँ अहाँ मात्र लिवइन रिलेशनशिपक
एकटा मिसटेकक नाम पर 
इरेज कए देबै 
देह आ स्मृतिक परिधि सँ  बाहर...

***

[ रोमिशा एखन सम्प्रति दिल्ली मे रहि रहलीह अछि। हिनका सँ romishajha@gmail.com संपर्क कएल जाए सकैत अछि. प्रयुक्त सभटा रेखाचित्र : अनुप्रिया.]
आदिकाल सँ कंपित स्वर मे विद्रुप होइत रहल अछि स्त्रीक देह आदिकाल सँ कंपित स्वर मे विद्रुप होइत रहल अछि स्त्रीक देह Reviewed by e-Mithila on December 02, 2018 Rating: 5

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