धूमकेतुक 'शीर्षकहीन' आ किछु अन्य कविता



धूमकेतु - एकटा ज्योति रेखा, एकटा शक्तिशाली चमक जे आकाश पृष्ठ पर ढृढ़तापूर्वक साफ-साफ अंडरलाइन क' क' क्षितिज केँ बेधैत पाताल प्रवेश क' जाइछ; एकटा आतंककारी चकचोन्ही जे क्षण मे विलीन भ' गेलो पर बड़ी काल धरि लोक केँ अपन अनुभूति करबैत रहैछ। आधुनिक मैथिली साहित्य मे सेहो एनमेन एहने एकटा रश्मिपुंज 'धूमकेतु' छिटकलै आ कथा -कविताक नीचाँ मोट सन लाइन घीचैत बढ़ि गेलै। मुदा, एहि 'धूमकेतु' कृत रेखा मे चमक तँ छैक, आतंक नहि; ढृढ़ता तँ छैक, कट्टरता नहि; स्थायित्व तँ छैक, गतिरोध नहि : डॉ. भीमनाथ झा।


धूमकेतुक 'शीर्षकहीन' आ किछु अन्य कविता


१. शीर्षकहीन -1

हम अहाँ छी एक वृत्त केर
दूनू विन्दु अनिवार्य
केन्द्र अहाँ छी
हम परिधि पर नाना रूप बना एलौंह अछि
कखनौंह हम धाँगि देल अछि आसेतु हिमांचल
भू-लुंठित क' देल सहस्रो राजमुकुट केँ
जिनगी भरि प्रत्यंचा रहि गेल चढल अहर्निश
दशो दिशा के बान्हि
अहीं के रूपायित करबा मे
कखनहुँ जमुना तट पर रचलहुँ रास
तन सहस्र ध' नचलौं
अहिंक विरह मे बाजल बंशीक नाद
लगले काल अश्व केर पकड़ल राशि
क' देल सर्वश्वान्त
एक अहीँ के फूजल केशक सत्व सम्हारल
अही परिधि पर कखनौंह केलहुँ ताँडव
तँ  डोलल अछि धरती
आ अहिँक लहाश लदने हम
बौएलौंह अछि रने-बने
एहनो भेल अछि         
राति-राति भरि जागि-जागि क'
सुंघि-सुंघि क' पंचमुखी अरहुल
फेकैत गेलौंह अछि
जरा-मरण-दुख-शोक-जिर्णता
जानल नहि
जानल तँ  तत्काल परिधि पर दौड़ गेलौंह अछि
अहीँ सँ ; एकीकृत हेबालए
किन्तु
हमर 'हम'
नञि अपना के क' सकल समर्पित
ने अहिँक 'अहाँ' के

अंगीकृत - आत्मार्पित
केन्द्र, केन्द्र थिक
परिधि थिक आकाश
मुदा हम अहाँ छी
एक वृत्त केर
दूनू विन्दु अनिवार्य
केन्द्रक परिधि आर परिधि केर केन्द्र
एक्के संग उगै अछि
आ एक्के संग डुमै अछि
२. शीर्षकहीन -२

राजाक हाथी मुइलई
'ओकर' खापड़ि फुटलई
वस्तु दुनू कारी
मोल दुनूक छैक
मुदा राजा तऽ
हाथी कतेको कटाकऽ मठोमाठ अछि
आ जे 'ओकरा' कहियो
कने भेलै चूक तऽ...
दुनूटा खापड़ि अमानति छलै
बात राजस थिकै
तञि दम्म साधि ली
से फूट
मुदा एतबा तऽ साफ
जे मरय राजाक हाथी कि
सनकय पाराक प्लाटून
छाड़-भार खापड़िएक
वस्तु तीनू कारी - मोल तीनूक छै
एक मरतै - दोसर मकतै - तेसर फुटबे करतै
मुदा खापड़ि फेर खापड़िये रहतै ने !
३. शीर्षकहीन -३

बहुत दिनुका बाद
एक बेर फेर
सरिपहुँ जुड़ायल आँखि
सरिपहुँ उमड़ि आयल हृदय में
पाकड़िक ठुठ्ठ गाछ
(कहितो होइत अछि संकोच
वयसे छोट अछि तथापि... )
कन्हेठने हरियरीक अम्बार
शीतल, सघन छतनार
विशाल चतार
जनारण्यक बीच
तप्त धरती में धँसौने
अतलतलक वीर्य
ठाढ अछि निश्शंक
पुरबा - पछबाक लपट सं' निरपेक्ष
पोआ मनुक्खक चतुर्दिक
अकारण अपस्याँत, सहसह
आदतन फुफकार मारैत
आदतन छोड़ैत गरमागरम जहरक फुहारा
मुदा गामक सिमान पर
ठाढ अछि अखनो निश्शंक
जमौने पैर, तनने देह
उठौने शीतल, सघन
हरियरीक अम्बार
४. शीर्षकहीन -४

गंडकीक तीर पर
वा वागमतीक कछेर मे
अधिक काल
एकटा पीयर कपीस
मानुषी छाह
बाटे-घाटे अभरैत रहल अछि
- 'भाई'
आइयो
हमरा होइत अछि
कहीं वएह तँ  ने छी
संघर्षक एकपेरिया पर
तरुआरि नेने निरंतर
बढैत रहल जे
कालक गरदा झाड़ैत रहल जे
विद्रोहक मेघडम्मर नेने
शांतिक छाहरि हेरि रहल जे
बोहिया गेल कतहु
जनारण्यक ठेहुड़ी मे
कखनो अलगल देखि
सुखैल पातक दोग मे बिरड़ो
हमरा होइत अछि
कहीं वैह तँ  ने छी
जे कतेको पाग बला कें काछि
ध' आयल कथी दन तँ र
जे भालाक नोंक सँ ;
लिखि गेल कोसीक बालु पर
अप्पन इतिहास
जे भोगि गेल
बरगाही भाईक देल उच्छन्नर
मुदा किनको सँ ; भेलनि कि
किदनि टेढ कएल
कखनो निन्न मे
पैरक धप्प सुनै छियै
हमरा होइत अछि
कहीं वैह तँ  ने छी
५. शीर्षकहीन -५

एक ठोर अकाश
एक ठोर पताल केने
ठाढ़ अछि काल हुजूर
आब कहियौ
की कहबै
इतिहास संग बलात्कार केँ
आब कतँ  मोहलति
कहाँ पाबी जमानति आब
दाखिल कय हलफी कृत्ति -वृत्ति केँ
आब उष्णताक संग
कयल दगाबाजीक
गंभीर आरोप अछि  
की - की कहलियैक आ
सोंचू की क' गेलियैक  
बुढ़बा जे रोपलकै
कनिञेंटा बोधिवृक्ष  
तकरा कोना काटि-कूटि  
कुर्सी बना लेलियैक
अधिक काल तैयो एहन तँ  भेल अछि
बुढ़ियाक कारूण क्रंदन
हमरा हिला गेल अछि
आ  ई गाछ हमरा
जौंक पोसबाही खत्ता  नांहित लागल अछि
ओहि अरण्य मे
निमिस मात्र भक्क द'
होइत छैक इजोत
आ दूर जाइत धूमिल सनक
हमर प्रान
अकाश मे पसरि जाइत अछि
५.नन्दन पहाड़ पर
१ .

नन्दन पहाड़ पर
गाड़ीक पाछू मे बान्हल
झमाड़ल, हिआओ हाड़ल तेसर बड़द जकाँ
भविष्यक भार सँ सर्वथा निरपेक्ष
भूतक निघेंस पर बैसल
वर्तमान पाउज करैत छी
एक कप चाहक लालसा सँ
डमहायल एकटा पूर्वी बालिका
अंगेठीमोड़ करैत छथि
एफ़. ओ. पी. क भाफ सँ विभोर भ
मुसकी मारैत छथि
आँखि मे बलातू विनिमय केर भाव अनैत छथि
अति विभत्स करुणा आ अत्यन्त दीन लालसा
मन मे अमतीक काँट जकाँ गड़ैत अछि
गाड़ीक पाछू मे बान्हलि
झमारलि, उसरग्गा बाछी जकाँ
पूर्वी बाला सदल-बल चलि गेलीह
स्वातीक एक बुन्न बाहर सीप सँ टघरि गेलैक
पएर लागि पाथरक ढ़ेपा गुड़कि गेलैक
जसीडीह टीसन सँ मेल कोनो सड़कि गेलैक
एक क्षण एक दाओ फेर क्यो हारि गेल
जीवन केर एक दिन निरर्थक खिया गेल
२.
नन्दन पहाड़ पर साँझ झिसियाइत छैक
(एकसरि मे उदासी एखन मन मे झहरैत होयत)
पच्छिम केर गाल केर लाली बिका गेलैक
(क्षणिक मधुर कल्पना भरिसक कोना कयलहुँ अछि)
​एक फाँक चनरमा कचिया जकाँ फेकल छैक ​
(साँझ भरली कोन हाथक संखा चूड़ी फूटि गेल?)
ओढ़ि लेलक डिगिरिया स्वप्निल इजोरियाक तौनी
(स्वप्न आशा मे आब अहूँ आँखि मुनने होयब)
दूर कोनो चिमनी सँ
औँठिया आ कारीभोर धूआँ बहराइत छैक
(आह ! मने केश खोलि आई अहाँ मोनि मे नेहयलहुँ अछि)
६. प्रवंचना
चानी केर सारी पहिरि
इजोरिया छमकै अछि
मुग्धा जनु सासुर बसिक'
नैहर आयलि हो
भइयाक पाँज सँ छूटलि
नबकी भौजी सन लचकैत
हवा केर सिहकी कौखन अबै छै
प्रकृत-पिया केर देह
अनावृत सिमसिम सन
अलसाएल मूक निमंत्रण
व्यापति दिगदिगन्त हिलकोर चलै छै
अति रहस्यमय अनुभूतिक
मदमातल चेतन भसिआयल जाइत अछि
मन-देह-प्राण से समा रहल अछि
चिरपरिचित अज्ञात अर्ध-कुसुमित
पुष्पक मादक सुगन्धि
अवचेतन मे उत्ताप लहरि मारय रहि-रहि
आलिंगन चिर अतृप्त हमर पियासल अछि
चानी केर सारी पहिरि
इजोरिया छमकै अछि
मुग्धा जनु सासुर बसि
नैहर आयलि हो
भइयाक पाँज सँ टुटलि
नवकी भौजी सन लचकैत
हवा केर सिहकी कोखन अबै छै
अंतिम अभाव केँ चक्कू सँ
कियो रेति रहल अछि
सुप्त अचेतनक खोइँठी
ओदर' लागल
इन्द्रियक दासोटा खिड़की पर
कुंठा-कुहेस उमड़' लागल
अस्तित्वक मूलाधार
इमारल, थाकल सनक होम' लागल
प्रायः ऐ देहक
रुधिर मांस हड्डी चमड़ी
अपने सन किछु सत्य
असल मंड़यै छै
बिनु जकर
रिक्त कातर अनाथ अन्तस्तल मे
अज्ञात तप्त किछु
मारि अहुरिया घुमड़ै छै
अन्तर्वासिनी ! ई सत्य
चतुर्दिक तोहरे माया पसरल छह
किन्तु न होयब
रूप - गंध - रस युक्त जखन धरि
किछु दोसर बनि
एकाकार ने होयब जा धरि
ता धरि मानव मर्त्य रहत
एकसरे प्रवंचित ।
७. एकटा बरखी-साँझ : दूटा कविता

पहिल

सूर्ज डूमि गेलैक
गोधूलिक ट्वाइलाइट भरमा नहि सकैत अछि
हम जनैत छी आब हेतैक एक पक्कड़ राति
अन्हारक बादूर पाँखि पसारने जाइत छैक
दूर, आर दूर
एहनमे रोज पुरबा सिहकैत छैक
आ एकटा असोथकित स्वास
देह के सिहरा सिहरा जाइत अछि
आ खिड़की बन्न भए  जाइत छैक-निमुआन

तँ  कतहु कोनो कुण्डलिनीक केंद्र मे
भगजोगिनी भुकभुकाइत छैक
मुदा अन्हारक परिधि पर किरिणक क्षीण ताग
टूटि-टूटि जाइत छैक
आ घमि-घमिक' एकटा स्वेद गंध
पाँजकेँ भिजा-भिजा जाइत अछि
हम अपन नेनपन केँ चिन्हैत छी
मुदा नेन्ना कहियो रही से मोन नहि अछि
यौवन मुक्त अछि कि नहि से बोध नहि अछि
पाछू घूमबाक कि देखबाक प्रश्न नहि
...ओइ डू नॉट होप टू टर्न एगेन...
...बिकौज आइ डू नॉट होप टू टर्न ...
सभ किछु अन्हारमे डूमि गेलैक अछि
मुदा अगिला उद्भासित भए  उठलैक अछि
साँझ - किरिणक उमड़ैत अनंत विस्तारमे
आ हम छी जे
आगाँ हेतैक एक तोड़ राति
आ तुरक फाहा सनक हल्लुक , निर्गन्ध ,सर्दबर्फ
यूकिलिप्टसक ठहुरीकेँ झुका देतैक

दोसर

एना होइत तँ  नहि छैक
आ-जे यदि कदाच् भए  जइतैक
तँ  - एक भ्रम सँ दोसर भ्रम दूर करबाक
अहाँक भ्रम दूर भए  जइतए
पानियो पर लीखल गीत
मेटौने ने मेटाइत छैक
जखन चकभाउर दैत प्रवाह
हठात जमि जाइत छैक
पुबरिया खिड़की बाटे
फुफकार कटिते छैक बसात
दाडिम फलाइते छैक
भकरार भए  क' लाले लाल
बरेड़ी परक खौंता मे बगड़बी फेर

अंडा पारलकैक अछि
आ हमरा अहाँक कहल शीत-बसंतक खिस्सा
निरंतर रेतैत रहिते अछि
आङन मे ओहिना इजोरिया उधियाइत छैके
हमरा बोहियाइक मोन होइते अछि (सत्ते)
मुदा एना होइते ने छैक
होइतैक तँ  अहाँ देखितिऐक
जे कोना रस्ताक कात मे
पजेबाक सोङर पर अटकल बस
आस्ते- आस्ते झहरैत छैक, भहरैत छैक
सभ किछु ओहिना छैक
ओहिना सभ खाइत अछि
पीबैत अछि,सुतैत अछि
जगैत अछि,हँसैत अछि
कनैत अछि, घृणा करैत अछि
प्रेम करैत अछि आ एहिना मे
बेराबेरी जमल समय सँ
मासो सभ चुबिते छैक-फागुनो-सओनो-कातिको
ओहिना एकदम ओहिना जेना सभ किछु
ठहरि गेलैक अछि, जड़ भए  गेलैक अछि
हम जनैत छी एना नहि होइत छैक
मुदा एकबेर होइतैक तँ  फेरो ओना नहि होइतैक
कारण एक भ्रम सँ दोसर भ्रम दूर करबाक
अहाँक भ्रम दूर भए  जइतए
आ एना मे तँ  दुनू भ्रमे थीक
इहो आ ओहो

***


धूमकेतुक 'शीर्षकहीन' आ किछु अन्य कविता धूमकेतुक 'शीर्षकहीन' आ किछु अन्य कविता Reviewed by e-Mithila on November 11, 2018 Rating: 5

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