Tuesday, March 28, 2017

हरेकृष्ण झा जीक किछु कविता



मैथिलीक समकालीन कविता आ हरेकृष्ण झा दुनू एक-दोसराक पर्याय छथि. ई अप्पन कविताक खांटीपन आ औदार्यक लेल एकटा विशेष तरहक कवि जकाँ ठाढ़ देखा पड़ैत छथि. हिनक कविता आ व्यक्तित्व मे एकटा खास तरहक जिजीविषा आ स्नेह भेटत अहाँ केँ. जे स्नेह कैक अर्थ मे मुखरित होइत अछि. मैथिली कविताक ई सौभाग्य अछि जे ओकरा लग एकटा एहन इमानदार आ चुप्पा कवि छथि. अंग्रेजीक घनघोर विद्वान आ 'वाल्ट विटमैन' आ 'नेरुदा' के अप्पन फेवरेट कवि माननिहार बला हरेकृष्ण झा सम्प्रति पटना मे अप्पन बीमारी सँ लड़ि आ जीति क' अप्पन जिबटपनक संग जीवनयापन क' रहलनि अछि. कोइलख गाम निवासी हरेकृष्ण झा मूलतः मैथिलीक प्रकृति एवं जीवनक तादात्मय बोधक अग्रणी कवि मानल जाइत छथि. औखन धरि 'एना त' नहि जे' शीर्षक सँ एकमात्र कविता संग्रह प्रकाशित छनि. तुरत-तुरत मे वाल्ट विटमैनक कविता सभक मैथिली अनूदित संग्रह सेहो बहरौलनि अछि. ई थिक जीवन नाम सँ. आइ हिनक जन्मदिन छनि. ई-मिथिला दिस सँ एहि विराट कवि हरेकृष्ण झा जी केँ जन्मदिवसक अनंत शुभकामना. औखन हिनक किछु कविता ससम्मान एहिठाम प्रकाशित कयल जा रहल अछि. जरूर पढ़ी- मॉडरेटर. 

(१). 

किएक मुदा एहिना 

माइक कोखि त’ कोनो बेर बदलल नहि हेतनि !
खूनमे ममताक सोह
एके रंग चलल हेतनि -
मोनमे सपनाक लहरि सेहो एके रंग !!

तरेगन सभक संग तालमेल क’ क’
ओगरने हेताह अहाँकें ओहिना
चन्द्रमा ओ सूर्य
जेना अहाँक आन कोनो भाइकें-;
जीव नेहसँ चपचप करैत सत्त भुवनक
रचने होएत सभ गोटएकें
एके तरहक गाढ़ अनुरागसँ;
झहरल होतए अन्तरिक्षमे सोहर
सभक बेरमे एक रागभासमे !!

एके गोसाउनसँ मँगैत छी
सहज सुमतिक वरदान-
एके बीजी पुरूखसँ पबैत छी नाम-गाम-ठाम;
एके माटिपानिमे करैत छी
अपन-अपन जीबाक ओरिआओन !!
जखन ई भुवन होइत रहैत अछि लहालोट
बिलहैत सौंदर्यक शुभंकर सनेस-
कोना लगैत अछि पसाही सभक नस-नसमे
एक दोसराक लेल-
चमकैत अछि भालाक नोक कोना
सभक एकेकटा धड़कनमे-?
-अरे होइत एलैक’छि भैयारीमे एहिना अदौसँ
कहैत छथि पकठोस बुधियार सभ गामे-गाम-
पूछि क’ देखिऔ त’ एको बेर अहाँ
पूछि क’ देखिऔ त’ एको बेर
अपन आलाक निविड़ एकान्तमे-
किएक मुदा एहिना ?

(२). 

भीठ पर


साबिकेसँ बहराइत अछि
ई बानी
सारंगीक तारसँ
ओएह टा बनि सकत
पुंकेसर थलकमलक,
जे जुटियो क’ सभ किछुसँ
हहाइत आबेसक संग,
कनेक फराक भेल रहत;
ओएह टा डगमग करैत रहत अर्थसँ
ताड़क अजोह कोआ जकाँ, 
जे सहटल रहत
अर्थक अनर्थसँ;
ओएह टा पबैत रहत मोक्ष,
हाथ जकर
आकाशक डीह भेल रहत।
कतएसँ अबैत अछि ई बानी
सारंगीक तारमे ?
आम किंवा लीचीक मज्जरसँ,
जाहि पर फागुनक महुआएल रौद
खूब चपकारि क’
औंसल रहैत छैक !

जिनगीक पेनी छनैत अछि
ई बानीः
निस्संग लागिक भीठ पर
भकरार होइत अछि जीवन।


(३). 

बान्ह-छान्ह 


उषा विभोर होइत छथि सेबमे
धरतीक चम्पइ रससँ अभीभूत:
कतेक विभोर होइत छी हमरा लोकनि ?

सेब खएबा काल
कतेक छिटकैत अछि
ओकर कांति
शोणितमें ?

दुखित पड़ैत छी
त कनेक टुटैत छैक
ओकर बान्ह छेक
हमरा सभक लेल,
वा कोनो पाबनि-तिहार
अएला पर।

मुँह चलैत अछि,
आँत धरि पहुँचैत अछि
ओकर रस,
मुदा आत्माकें औंसवासँ पहिनहि
छेक लेल जाइत अछि।
बहुत नमहर छेक छैक
एहि बान्ह छान्हक,
जे बहुतोक लेल 
कहिओ नहि टुटैत छैक।

छिटकल रहि जाइत अछि जीवनसँ
धरतीक लेल आकाशक ओ अनुराग
जे रूप धरैत अछि सेबमे
निरसल रहि जाइत छैक ओकर ललक
हमरा लोकनिक अंतरंग होएबाक।

(४).  

फार सँ छिटकत आब बेलीक फूल 


फार सँ छिटकैत अछि
कनखा इजोतक,
भक टूटि जाइत अछि ।
सोझाँ अबैत अछि
अर्घासनक कोहा
चर्बी सँ उमसाम,
एकटा कुंजी
चकरी मारने बीचोबीच ।
बामा हाथ रखैत छी
हरीस पर
हरबाहक बाम हाथक संग,
दहिना हाथ सँ धरैत छी लागनि,
ताव लैत छी
खपटी पेट सँ,
मारैत छी जोर
हरक नास पर
ठीकोठीक कुंजीक सीक मे ।
फार सँ छिटकत आब
बेलीक फूल हरबाहक माथ पर
हट्ठा सँ घुरैत काल,
पिजा गेल अछि माटिक
प्राण-शक्ति सँ ।

(५). कनोजरि 

अक्षत आ फूल
बहराइत अछि वर्णमाला सं
खलसैत अछि कपूरक लौ भीतर मे
इजोतक कनोजरि फूटैत अछि
एहि मुसहर नेना सबहक आंखिमे
फूटैत अछि कुहेस
कनेक कनेक कटैत अछि पाप
एकरा सबके नित्तह
ककहारा सिखबैत काल
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नोट: 'ई-मिथिला' लेल ई पोस्ट मूलतः मैथिली कविता एफबी पेज सँ उड़ाओल गेल अछि. तकरा अपना हिसाबेँ ठोकल-बजाओल गेल अछि. ताहि मे आर कविता सभ समाविष्टि कयल गेल अछि. 

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