Monday, March 13, 2017

डीजेक बास पर भम्ह पड़ैत डंफाक थाप

लोकल सँ ग्लोबल होएबाक क्रम मे हमरा लोकनि अपन जड़ि सँ इतर भ' रहल छी। कोढ़ी सँ भकराड़ होइत ई प्रवृति हमरा सभक लोक संस्कृति केँ ठुट्ठ केने जा रहल अछि आ एकटा अन्हर-जाली पहिर हम सभ एहि बिद्दति केँ अबडेर रहल छी। एहि आयातीत भेड़िया-धसानक क्रमिक परित्याग आवश्यक भ' गेल अछि। किछु एहने खसताएल काल -समय पर मैथिलीक नवतुरिया विचारक 'विकाश वत्सनाभ' खरोसा-पुछारी करैत अपन विचारक मादे एहि व्रणपर तूर साटि रहलाह अछि। अस्तु पढ़ल जाय।

आइ दिल्ली सँ दरिभंगा धरि होली गदमिसान मचौने अछि। सभ अपन-अपन ड्राइंग रूम सँ फेसबुक केँ सेल्फ़ियाइन करबा पर बिर्त भेल छथि। हमरो मोन मे गमैया फगुआक सुरता हलफी मारि रहल अछि। ओ फगुआ जे माघी पंचमी सँ नहु-नहु पनुघैत, तरे-तरे जुआन होइत माघी पूर्णिमाक दिन अपन सम्पूर्ण शौष्ठव मे आबि चैत कृष्ण द्वितीया धरि बलधकेल चलैत भखरि जाइत रहै (फागुन मे हम फगुआ खेलब ,चैत खेलब बलजोरी)। फगुआ भखरि जाइ मुदा मिजाज बहुत दिन धरि ओहने रंगीन बनल रहय। एहि फगुआ मे पुबरिया बाध मे सम्मत जड़ाओल जाइ। गामक सभ तुरक लोक संगोड़ भ' एकहि रंग मे सना जाइ। दलान पर ड्राम मे भाँग घोड़ाइ। कीर्तनिया मण्डली घुमि-घुमि जोगीरा गबै। की नवतुरिया आ की बूढ़।सभ सिनेहक रंग सँ सराबोर। सभक मिजाज मे फगुआ अनघोल करै। लोक कंठ मे एकटा तरन्नुम बैसि जाइ -'भरि फागुन बुढ़बा देवर लागे'।
से की आब ओ फगुआ रहलै ? कहाँ रहलै ओ जोगीरा गबैत पुबारि टोलक कीर्तनिया मंडली,हारमोनियम गनगनबैत व्यास जी आ डंफा पर चोट मारैत बूझो मंडल । कहाँ गेलै बौआ बाबाक ओ भाँगक बोरा । लगैया जेना फगुआ घरघुसना भ' गेलैक अछि। आब तँ बबुआन सभ बहराइतो नहि छथिन । भाँग केँ उपजा सेहो तेरहे बाइस आ उपर सँ सरकारी फरमान। छौंड़ी सभ ब्यूटी-कॉन्शस आ भाउज सभ परदेशिया। फगुआ की हेतैक कपाड़। आब तँ बुझु जे "छल-छल कयलहुँ पूआ पकौलहुँ, सेहो पूआ खाय ने पौलहुँ"
कहियो जमना रहै जे फगुआक एकटा गजबे उत्साह रहल करै लोक मे। से लोके की प्रकृति पर्यन्त बुझाइ जेना एहि उत्सव विशेषक प्रतीक्षा मे अकुलायल अछि। मास भरिक जोगाओल कैंचा सँ जे रंग बेसाही सेहो छुछुआओन पड़य आ तखन अपन संगतुरिया सभ सँ आओर जोगार करी। आब रंग तँ गेल निखत्तर जे दू-चारि पुड़िया अबीर कीनब सेहो नहि खपत। ड्यूड टाइप लड़िका सभ फोटोशॉप सँ होली खेला इंस्टा आ स्नैपचैट मे बीजी आ ताहि पर लव इमोजी लुटएबा मे बेहाल लैड़िकी सभ। जँ रंगक आवेश करबैन तँ कहती - हे यु क्नोव ,माय स्किन इज कलर सेंसेटिव,प्लीज डोंट पुट कलर। तखन तँ आब फगुआक असली टेक ननकिरबूये सभ रखने अछि। मातल रहैत अछि फुँछकारी किनबा मे ,टोपी जोगेबा,एक दोसरक हुलिया बिगारय मे, ओसारा सँ दलान धरि धमगज्जर मचेबा मे। मालपुआ की माउंस लेल घौना पसार मे।
फगुआक यूनिवर्सल भाँग केँ एलिट क्लास आब चिप एल्कोहलक श्रेणी मे रखैत रिजेक्ट केने छथि । हुनका लोकनि केँ इम्पोर्टेड बोडका केँ चुस्की सँ बेसी स्फूर्ति अबैत छनि। गामक जोगीरा ऑफ बिट लगैत छनि आ तखन गाँजा-माजा-बाजा केँ संग बॉब मार्ले आ बोहेमिया केँ सुनैत एग्जोटिक फील करैत छथि। पंडित रविशंकरक आर्ट ऑफ़ लिविंग सँ अपना केँ सॉफिस्टिकेटेड बनबैत छथि आ तखन अपन विद्वताक धाह सँ बेहाल ए.सी हाल मे बैसल भखरैत लोक संस्कृति पर राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस करैत छथि। सभटा गोलमाल भ' जाइत अछि।
'परदेशिया के धोतिया रंगा दे गोरिया' सँ 'गोरिया तूँ रसलीला क'र" धरि केँ जे ई साइकोलॉजिकल शिफिंट भेलैक अछि ताहि मे बहुत किछु शिफ्ट भ' गेलै।लोक संस्कृति खसताएल छैक आ जे किछु बाँचल छैक तकरो बैलएबाक पुख्ता इंतजाम भ' रहल छैक। होलिका जड़ायब बिसरी हम सभ शनै: शनै: अपना भीतर होलिका केँ प्राणप्रतिष्ठा करय लगलहुँ अछि। आब फगुआ नहि रहलै। फगुआक अंत्येष्टि क' हम सभ होली मनाब मे निसभेर भ' गेलहुँ अछि। डीजे के बॉस पर डंफाक थाप अबडेर रहलहुँ अछि। हमरा सभ केँ बैक टू रूट होएबाक प्रवित्ति जगबैत ई मोन राख पड़त जे एहन अकलबेरा मे संक्रांति केँ संस्कृति मे परिवर्तन हमर अहाँक फगुये टा क' सकैत अछि ,आयातित होली नहि। जे माटि-पानि अहाँकेँ एहि अनंत संसार मे पहिचान देलक तकर सांस्कृतिक पहिचानक प्रति कंडेरिओ सहानुभूति नहि..?


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