Saturday, March 11, 2017

गोरी होरी में हमरा सँ मेल करितंए

"ई-मिथिला" पर आइ युवा गीतकार अमित पाठकक किछु फगुआ गीत आ जोगीड़ा प्रस्तुत कायल जा रहल अछि, पढ़ल जाऊ.


(१). 

रंग अबीर गुलाल उड़इतए भ' गेल मोन मतंग
भांगक शर्बत पीबि लोक सब मचबइए हुड़दंग •••••••
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बहए फागुन के फगुआ बयार
ई मोन जेना कछ-मछ करइए
बिन सजनी के कहियौ की यार
ई मोन जेना कछ-मछ करइए
बहए फागुन...............

लोक के देखै छी मचौने जोगीरा
सारा-रारा गाबै बजाबै मजीड़ा
ह'म करबै की से ने नियार
ई मोन जेना कछ-मछ करइए
बहए फागुन..............

सबके त' सजनी आ हमही कुमारे
होरी हमर सुन्न ओही दुआरे
हमर बाबु के कहतै के यार
ई मोन जेना कछ-मछ करइए
बहए फागुन..............

रहितए जँ सजनी त' हमरो लए फगुआ
साइर सरहोईज संग सारो दुलरुआ
लोक हमरो कहैत बुधियार
ई मोन जेना कछ-मछ करइए
बहए फागुन ..............

भोला बाबा आब तोरे पर आशा
करहक जोगाड़ आब नै दए दिलासा
नै त' फगुआ में तोरे शिकार
ई मोन जेना कछ-मछ करइए
बहए फागुन..............
बिन सजनी.............


(२). 

कन्हैया मोर छोरहु आँचर आज
यमुना तट जुनि छेड़हु मोहे
देखत सकल समाज
कन्हैया मोर छोरह्............

मानल चढ़ल दुहु दिस यौवन
ता पर फागुन मास
तदपि कहल मानहु मनमोहन
देखहु कुल प्रति लाज
कन्हैया मोर छोरहु...........

सभ सखिया जनु व्यंगहि भाखए
प्रवल हमर अभिसार
हे यशुमति सुत नंद दुलारे
करहु ने एहन काज
कन्हैया मोर छोरहु........

धैरज कनेक धरहु मुरलीधर
तोरहु ने धएलहु आश
घुरि आओत अविलंब सुखक दिन
होयत पिरीतक राज
कन्हैया मोर छोरहु..............
यमुना तट जुनि...................


(३).

सखी हे !
चलु बृज नगरीक ओर
रंगहि रंगायल गिरिधर नागर
नगरि-नगरि धरि शोर
सखी हे...............

फागुन चढ़ल सभक तन मन पर
चलय ने निज पर जोर
की राधा की आन सहेलिया
सब उन्मत्त बेजोड़
सखी हे...............

चंचल कुसुम परागक रंग सँ
घोरल प्रीत अमोल
दौड़थि गोपिन दिस मन मोहन
करए वसन तर-बोर
सखी हे................

मातल सकल नगर बृज वासी
निकसि उमंगित बोल
क्यो मिर्दंग बजाबयधुन में
क्यो बजबै अछि ढोल
सखी हे................

धन्य नगरि ई जतय जनम लेल
प्रभु एहि माटिक कोर
भरि जग मानय बृज के होरी
एकर कतउ नहि जोड़
सखी हे..............
रंगहि रंगायल..........


(४).

जनक नगर घर-घर हर्षित अति, सभ सिर नाचए फाग रे चढ़ितहिं फागुन उत्सव पसरल, बान्हल आनंदक ताग रे जनक नगर घर................ मोनक द्वेष-कलेश विलोपित, लोपित चिर् उपराग रे भीजल तन-मन रंगहि रंगायल, पुलकित प्रीत पराग रे जनक नगर घर............... एक दिश केहु मुख होड़ी उठबए, केहू जोगीड़ा राग रे दोसर दिश मद्-मातल केहू, घोंटए रचि-रचि भांग रे जनक नगर घर................ बिहुँषित सकल नगर केर नागरि, पाओल एहेन भाग रे सरस बसंत अनूप ई मासहि, पूरए उर अनुराग रे जनक नगर घर................ चढ़ितहिं फागुन................

(५).

गोरी होरी में हमरा सँ मेल करितंए
रंग-अबिरक बहन्ने ओ खेल करितंए
गोरी होरी में.............

रहितंए संगहि एहि फागुन में सटि क'
संगहि मनइतऊँ ई फगुआ समटि क'
कने रहि-रहि सनेश किछु देल करितंए
कने रंग घोरि...............

बांहि बीच अप्पन हुलसि भरि लीतहुँ
स्नेह के गुलाल गाल तोहर रगड़ितहुँ
अपन प्रेमहि सँ रंगि लाल भेल करितंए
कने रंग घोरि...............

एहि बेर त' होरी झमटगर मचइतहुँ
भ' क' मगन हम सा रा रा रा गइतहुँ
हमर मैना किछु तोता क' लेल करितंए
कने रंग घोरि..............
गोरी होरी में...............


(६).

चढ़ितहिं भांग मगज पर कक्का
धएल जोगीरा तान
जोश जुआनी आइ उतारथि
की काकी की आन

बुढ़बा फगुआ में सबके हरान करइए
बुढ़बा फगुआ में
देखु धोतिया के ढेका दलान खोलइए
बुढ़बा फगुआ में
बुढ़बा फगुआ में सबके..........

डेगो ने उठै छै देख' बोली भसियाइ छै
छौंड़ी-मौगी देखिते लहर उठि जाइ छै
बुढ़बा सा रा रा रा कहि मोछ शान करइए
बुढ़बा फगुआ में............

भांगक मोटरिया छुटय नहि कखनो
पीसि पीसि भोग लगै मन जखनो
बुढ़िया बुढ़बा लए रगड़ि क' भांग पिसइए
बुढ़बा फगुआ में................

भरि गाम घूमय टगैत ई बुढ़बा
रंग आ अबीर उड़बैत ई बुढ़बा
नहि एकरा सन एकहु जुआन करइए
बुढ़बा फगुआ में.................
बुढ़बा फगुआ में सबके........
देखु धोतिया के .................

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[गाम -कोरथू, जिला- दरभंगाक रहनिहार , अमित पाठक सम्प्रति पटना मे रहैत छथि आ जीवनों यापनक लेल मेडिकल सेक्टर मे काज करैत छथि. अमित मूल रूप सं विशुद्ध गीतकार छथि आ एहि बहुविधावादी समय मे गीत विधाक बचेबाक लेल प्रतिबद्ध छथि.]

संपर्क:

अमित पाठक
मोबाइल : 9334243605

1 comment:

  1. अहाँ हँसा गेलो कि कहू फागुन मे नहा देलो,
    भेले भोर चैतावर गवा देलो।

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