Monday, February 20, 2017

माय मैथिली छथि आह्वान करैत- नवलश्री

विश्वविख्यात रुसी लेखक मक्सिम गोर्की कहैत छथि कि "साहित्यक लक्ष्य यैह अछि जे ओ अपना-आप कें बुझबा मे लोकक मदति करय, लोकक आत्मविश्वास बढ़बय, समाजक नीक-बजाय देखय-देखाबय, लोकक ह्रदय मे लाज, आक्रोश आ साहसक भावना संचारित करय". अपन इतिहास बतबैत अछि कि आम मैथिल, मिथिला-मैथिली सँ आरंभहि सँ अलग-थलग रहल अछि. अपन हक जनितो सभ दिन सँ सत्ताधारी वर्गक उपेक्षा सहैत रहल अछि. हमरा पीढ़ीक उदीयमान लेखक नवलश्री पंकज प्रत्येक मैथिल कें संबोधित करैत अपन रचनाक मादे किछु ज़रूरी बात सभ कहबाक प्रयत्न केने छथि. सेहो अपन आरम्भिके रचना समय लगभग २०१२-२०१३ सँ. एहि अपेक्षाक संग एकरा आइ एहिठाम प्रस्तुत क' रहलहुँ अछि, जे वर्चुअल स्पेसक एक-एक मैथिल अति सरल ओ सहज भाषा मे लिखल एहि रचना सभ सँ किछु प्रेरणा लेतथि, जाहि सँ मिथिला-मैथिलीक  लेल होम' बला आंदोलन सभ आर बेसी गति सँ आगाँ बढ़ि सकत- बालमुकुन्द. 




दू टा कविता :

(१)

माय मैथिली छथि आह्वान करैत 

बिख घोंटि-घोंटि छथि पीबि रहल
मैथिली छथि हिचकैत जीबि रहल
आकुल भऽ आइ विवशतावश
देखू माय  नै विषपान करथि
माय  मैथिली छथि आह्वान करैत !!
नै कम छी एक्कहु गोट किओ
सभ पैघे छी नै छोट किओ
बेरा - बेरी सभ राज करू
मस्तक पर कीर्तिक ताज धरू
अपनहिमे रहू जुनि ओझरायल
ई मिथ्या मतदान करैत !
माय  मैथिली छथि आह्वान करैत !!
माय  कानथि सुत निश्चिंत पड़ल
 सुधि-बुधि बिसरल अचिंत पड़ल
चलू पोछब माएक नोर कियो
चलू लायब सुख केर भोर कियो
नहि देखि दुर्दशा जननी केर
चलू छाती अपन उतान करैत !
माय  मैथिली छथि आह्वान करैत !!
कते कष्ट सहि माय जनम देलक
बाजू की ममता कम देलक ?
निर्ल्लज बनू नै, कने लाज करू
जुनि स्वयं पर एतबा नाज करू
जुनि करू एना अभिमान अहाँ
अपनहि-अप्पन गुणगान करैत !
 माय मैथिली छथि आह्वान करैत !!
छी मैथिल एहि पर शान करू
अहाँ मैथिलीक सम्मान करू
सभ मिलि मैथिलीक प्रचार करू
मिथिलाक कीर्ति विस्तार करू
सुखद नूतन इतिहास बनत
चलु डेग मिला सहगान करैत !
माय  मैथिली छथि आह्वान करैत !!

(२)

मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ

मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ जुनि मैथिल बूझू अपना के !
कोनो जन्मक पुण्य प्रसाद बूझू, माँ जननी मिथिला सन भेटल
चलु संग-संग कर्मक पथ पर, किछु करबा लेल जीवन भेटल
माँ मैथिली “मिथिला” मांगि रहल, जुनि तोडू मायक सपना के
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ…
ई जाति-जाति के गेंटब छोडू, कियो तऽर कियो उप्पर नै
जाति – धर्म तऽ इन्द्रधनुष थिक, वर्ण – वर्ण मे अंतर नै
जाति-धर्म बनि उगै तरेगन, करए इजोर सभ अंगना के
मिथिला मे जन्म लेला भरिसँ…
सादर पान खुआबै कखनो, स्वागत कखनो खरामसँ
सभ छै कर्मक नाच-तमाशा, किछु नै होए छै नामसँ
नापल-जोखल आखर हितकर, धरु सहेज निज-नपना के
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ…
विश्व-विजय करब छै संभव संस्कार आ ज्ञानसँ
श्रद्धासँ संबंध बनैत छैक भक्तो के भगवानसँ
त्याग-समर्पण के नै जानै, विद्यापति आ उगना के
मिथिलामे जन्म लेला भरि सँ…
दूषित देहसँ द्वेष उचित नै दूषित मोन केर दोष अहितकर
संस्कारके बलि-प्रदान दऽ, अपन-अपन जयघोष अहितकर
माँगि रहल श्रमदान “नवल”, किछु होए असरि ऐ रचना के
मिथिलामे जन्म लेला भरिसँ…

तीन टा गजल :
(१)
आब मिथिलाराज चाही
मैथिलीके ताज चाही
बाढ़ि आ रौदीसँ मारल
मैथिलोके काज चाही
बड़ रहल बेसुर ई नगरी
सुर सजायब साज चाही
गर्जना गुंजित गगन धरि
दम भरल आवाज चाही
संयमित सहलौं उपेक्षा
"नवल" नव अंदाज चाही

(२). 

मिथिलोमे रहल नै बास मैथिलीकें
टूटल जा रहल छै आश मैथिलीकें
कहियो मैथिली नै हिचकि-हिचकि कानल
देखू पलटि सभ इतिहास मैथिलीकें
चन्दा अमर यात्री सदति सभ शरणमे
विद्यापति सनक छल दास मैथिलीकें
सभके ठाम देलौं भेल मान सभके
भेटल अछि किए वनवास मैथिलीकें
बाजब-पढ़ब सदिखन मैथिली लिखब हम
जागत “नवल” पुनि विश्वास मैथिलीकें

(३). 
पकडू रेल चलू दिल्ली
भरबै जेल चलू दिल्ली
नेता लूटि रहल सभके
बुझि बकलेल चलू दिल्ली
बैसल बाट कते जोहब
 सभ लुटि गेल चलू दिल्ली
सभ छै भूखल कुर्सी के
रोकब खेल चलू दिल्ली
पापक कुण्ड भरल सगरो
सभटा हेल चलू दिल्ली
लागल भीड़ पमरियाकें
 सभके ठेल चलू दिल्ली
अपनेमे जुनि झगडू यौ
 राखू मेल चलू दिल्ली
धरना देब करब अनशन
मिथिला लेल चलू दिल्ली
क्रांतिक धार "नवल" बहलै
 लड़बा लेल चलू दिल्ली

संपर्क:
नवलश्री पंकज -9852534709 

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