Wednesday, August 3, 2016

निक्की प्रियदर्शिनी केर तीन गोट कविता

'ई-मिथिला' पर आइ युवा लेखिका निक्की प्रियदर्शिनी केर तीन गोट कविता देल जा रहल अछि. संस्कृत-निर्मली गाम,जिला सुपौलक रहनिहार निक्कीक एकटा समीक्षात्मक निबंध संग्रह 'देखल जा सकैछ' प्रकाशित छनि. सम्प्रति मैथिली द्विमासिक मिथिला दर्शन एवं शोध पत्रिका 'शोधार्थी' मे सहयोगी संपादक, एकर अतिरिक्त विभिन्न पत्र-पत्रिका मे कतिपय आलेख, कवितादि प्रकाशित-प्रशंशित छनि. तत्काल हिनक शीघ्र प्रकाश्य कविता संग्रह सं तीन टा कविता अहाँ समस्त ऑनलाइन पाठक लेल प्रस्तुत कयल जा रहल अछि.  (मॉडरेटर)

निक्की प्रियदर्शिनी 
(१). हम छी त'

बिनु वेग नहि उठैत अछि संवेग मन मे
जौं भरि ली हुंकार,संग त्रेण मन मे
बदलि सकैत छी नभ आओर धरा कें, विश्वक मानचित्र मे
हम छी त' युग अछि आओर इतिहास जग मे

हम करैत छी आह्वान सभ सं कल्पनाक संग मे
विश्वक एक कोटि एक जाति एक रूप मे
हमर इच्छा ई सदिखन हो समर्पित जीवन मे
हम छी त' युग अछि आओर इतिहास जग मे

नव चेतना, नव जागरण सं उद्वेलित धरा मे
रस भाव सं भरल पूरित समाज मे
कि सुंनब अहाँक राग आ द्वेष कंठ मे
हम छी त' युग अछि आओर इतिहास जग मे

किएक देखैत छी भरिकए भोगक ज्वाला आँखि मे
हमहुँ क' सकैत छी, विरोध आ प्रतिरोध जग मे
गर्जन क' सकैत छी,जेना बिजुलि हो गगन मे
हम छी त' युग अछि आओर इतिहास जग मे

(२). अहाँ अहीं सन 

अहाँ अहीं सन
छोट, कोमल आ शांत ह्रदय सन
सुन्दर आ सौम्यता सं प्रस्फुटित पुष्प सन
अमावस्याक घोर अन्हार गुज्ज राति सन
दुख आ विवशता सं भरल घैल सन

अहाँ अहीं सन
क्रोध आ निर्दयताक अग्नि मे जरैत काठ सन
सजीव रहितो निर्जीव वस्तु सन
जानकी, मंदोदरी आ उर्मिलाक त्याग सन
माँ, बेटी, बहिन, पत्नी आ प्रेमिकाक स्वाभाव सन

अहाँ अहीं सन
आधुनिकता आ पौराणिकताक धुरी वा लटकैत पिंड सन
कुल आ मर्यादाक कहार सन
नदीक दू किनार सन
बढ़ैत आ घटैत गंगाक धार सन

अहाँ अहीं सन
मनोरथक लेल बलिदानक निरीह छागर सन
जीवन आ मृत्युक अनुभव करैत संसार सन
ह्रदय, करुणा आ प्रेमक महासागर सन
सम्पूर्ण जगतक मातृत्वक भण्डार सन
अहाँ अहीं सन

(३).  दर्द आँखि मे नहि मन मे

आँखि संबोधक अछि त' मन विचारक
आँखि प्रश्न अछि त' मन उत्तर
आँखि मे आशा अछि त' मन मे संवेदना

  दर्द आँखि मे नहि मन मे होइत अछि
दर्द कें देखि आँखि त' बंद भ' जाइत अछि
मुदा मन मे ओ अविस्मरणीय जकाँ समा जाइत अछि
आँखिक सीमा सीमित अछि
मुदा मनक सीमा नहि जानि कतेक

परंपरा आ आधुनिकता एक दोसराक पूरक अछि
आधुनिकताक देखि आँखि
ओकरा मे समाहित भ' जाइत अछि
मुदा मन परम्पराक विचार करैत  रहैत अछि

मन चंचल अछि आ आँखि अति चपल
तें आवश्यकता अछि प्रेम करुणा आ सौहार्दक
ताकि मन विचलित नहि होए
आ आँखि स्थिर नहि












3 comments:

  1. औखन पहिलुक बेर हिनक कविता पढ़ल ! कविता मे बिंब आ शिल्प दुहू बेस प्रभावित केलक अछि ! अतुकांत कविता रहितो कविता सबमे एकटा अनुखन प्रवाहक उपस्थिति हिनका सहजहि फराक करैत छनि ! कहवाक बृहद कैनवास अओर शब्दक अपन विशिष्ट कोश हिनक कविता सबकें बहुयामी आवृति दैत अछि जाहि मे मात्र स्त्री समाजक चित्रण नहि अपितु एकटा समग्र परिवेशक अजस्र धार निकसैत अछि ! संग्रह कें प्रतीक्षा करैत हिनका अनेकानेक शुभकामना !!

    ReplyDelete
  2. निक्की जीके कबिता बड्ड निक लागल ओना साहित्यके बिद्यार्थी के नातास कह लेल मोंन आतुर अछि की उनका साहित्यके प्रगति लेल अनेक अनेक सुभकामना अछि तीनो कबिताक बिम्ब संग प्रस्तुती सैली एकदम प्र्खर्ताक त निखार संन देखा रहल अछि

    ReplyDelete