Thursday, June 9, 2016

रूपेश त्योंथ केर किछु शीर्षकविहीन कविता

रूपेश त्योंथ' केर पत्रकारिता सं अपना सभ गोटे परिचित छी. हिनक दू टा पोथी सेहो प्रकाशित अछि. एक कविता संग्रह तं दोसर व्यंग्य संग्रह. मुदा हिनक पहिल क्रश आरम्भे सं कविते रहल अछि , सेहो स्कूलिए टाइम सं. एम्हर हिनक किछु शीर्षकविहीन कविता पढ़बाक भेंटल. जे कि हमरा बेस प्रभावित केलक अछि. शेयर क' रहल छी, अहां सेहो पढ़ू- मॉडरेटर

         (१)

ई दुनिया 
बुन्न-बुन्न शोणितक 
हिसाब मंगै छै 
आ जखन सुखाइ छै शोणित 
तं फेर डाहि दै छै 
खोचाडि-खोचाडि 

       (२)

जकर चिंता मे 
टटाइत रहलहुं 
जकरा लेल 
करैत रहलहुं कबुला 
तकरा 
सांझ सं विहान धरि 
खेत सं दलान  धरि 
तकैत रहलहुं 
आ ओ भेटल 
बसबन्नी मे 
बनबैत फरकी 
हमर अंतिम यात्राक 

     (३)

बात अहांक होइत छल 
ता ठीक सब किछु 
बात हम्मर उठिते 
ओकासी आबि गेल 
आ अहांक पेट रिक्त 
भभाइत छल व्यंजन 
कौर हमर उठल 
भात बासी आबि गेल !

 बात छल ने किछु 
बात बढ़िते गेल 
बिन बाते भाला 
गरासी आबि गेल 
आ जिनगी हमर 
ढूसि सदिखन लेलहुं 
मुइल देखिते किए कानन 
भोकसि आबि गेल. 

        (४)

जिनगी मे जखन किछु भेटै छै 
ठीक तखनहि किछु छुटै छै 
भेटबाक हर्ष मे 
भने छुटबाक दुख 
दबि जाइ छै 
मुदा ओ दुःख 
संजोगल  रहैत छै हिरदय मे 
बेर पर ओ फनफनाइत  छै, दुखाइत छै 
एकर कोनो दबाइ नै छै 
ओ घाओ सुखाइ नै छै 
बस दुखाइ छै 
चिरकाल धरि 








3 comments:

  1. नीक कविता सब !

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  2. घावक सुखाइत खैटी के छोड़बैत कविता सब !!

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  3. ओ भेटल बँसबन्नीमे ………………… कलियुगक यथार्थ ।

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