मैथिली कथा : अंतर्व्यथा


दुनू कात छोट-बड़ घरक देबाल सँ घेरायल बेस दू हाथ चौड़गर गली सँ ओ आदमी जोर-जोर सँ हंफैत पूरा जी-जान लगौने भागल जा रहल छैक. पाछाँ सँ भरि जांघक एकटा बताह करिया कुकुर ओकरा खेहारने जा रहल छैक. ओ बेर-बेर पाछाँ घूमि क' तकैत छैक. कुकुर एकदम सँ ओकरा लग आबि गेल छैक, जेना आब झपटि लेतैक ओकरा... आ अगिले पल मुँह फोलने ओ करिया कुकुर ओकरा देह पर छरपि जाइत छैक...

भक्क सँ ओकर नीन्न फूजैत छैक. देह थर-थरा रहल छैक... अंग-अंग पसेना सँ भीजल छैक... सौंसे देहक रोइयां ठाढ़ भ' गेल छैक... प्यासे कण्ठ सूखि रहल छैक. ओकर ध्यान पलंगक दोसर कात सूतल अपन पत्नी पर जाइत छैक, जे कि आस्ते- आस्ते फोंफ काटि रहल छैक. बाप रौ बाप... तँ ई सपना रहैक, भगवती ककरो संग एना नहि करथुन...ओ सोचैत छैक. आंगुर पर गानि-गानि केँ गायत्री मंत्र पढ़ैत छैक.
ओकर माथ से भारी भ' गेल छैक. ओ उठैत छैक, टेबुल पर राखल जग मे सँ गिलास मे पानि ढ़ाढ़ि पानि पीबैत छैक. तखन ओ खिड़की फोलि लैत अछि आ ओहि ठाम ठाढ़ भ' खिड़की सँ बाहर ताक' लागैत छैक.

बाहर गुज्ज अन्हार रहैक. ओहि अन्हरिया मे ओकरा गाछ- बिरीछक डेराउन आकृति आ टिनही एसबेस्ट सँ छारल मालक घर देखेलैक. माल घरक उपरूका पिरछौन अकास केँ करिया मेघ झंपने जा रहल छैक. चहुँदिस चुप्पी पसरल रहैक, सब किछु अन्हरिया मे डूबल रहैक. बीच-बीच मे कखनो-काल कुकुर भूंकबाक स्वर अबैत रहै, जाहि स्वर केँ सुनि डरे ओकर देह भूलकि जाइत रहै.

ओ बिछाओन पर चलि जाइत छैक. ओकरा नीन्न नहि होइत छैक. ओ करौट-पर-करौट फेरैत छैक... खन पीठ बले तँ खन पेट बले सुतबाक उपक्रम करैत छैक...ओकरा नीन्न तैयो नहि होइत छैक, जेना ओकरा सँ नीन्न रूसि गेल होय.
ओ उठि केँ बत्ती जरबैत छैक. कोनो पोथी उनटा ओकरा पढ़बाक प्रयास करैत छैक. थोड़े काल धरि पढ़बो करैत छैक फेर ओकर मोन उचटि जाइत छैक. ओ पोथी सिरमा त'र राखि क', आँखि मूनि पड़ि रहैत छैक.

मुदा ओकरा नीन्न कथी लए हेतैक. ओ आँखि फोलि देबाल पर टांगल घड़ी दिस तकैत छैक, रतुका तीन बाजि रहल छैक. ओ पलंगक दराज मे सँ गोल्डफ्लैक सिकरेट निकालि क', लेस लैत छैक. तकरा बाद अपन स्मार्टफोनक डेटा ऑन क', फेसबुक खोलैत छैक...नोटिफिकेशन चेक करैत छैक...स्टेटस अपडेट करैत छैक -

"तलफै बिन बालम मोर जिया ।
दिन नहि चैन रात नहि निंदिया,
तलफ तलफ के भोर किया ।"

ओ फेर सँ सुतबाक उपक्रम करैत छैक. नीन्न अहू बेर नहि होइत छैक. ओ पलंगक दोसर कात सूतल पत्नी केँ जगबैत छैक, आ ओकरा अपन नीन्न नहि होयबाक सम्पूर्ण वृतान्त सुनबैत छैक. पत्नी फोन मे टाइम देखि क', हांफी करैत अलसायल भावे ओकरा बाहर सँ घूमि अयबाक लेल कहैत छैक. ओ घ रसँ बाहर चलि जाइत छैक आ ता धरि पार्क मे एम्ह रसँ ओम्हर आ ओम्हर सँ एम्हर करैत रहैत छैक जा धरि ओकर टांग नहि जवाब दैत छैक.

ओ आपस घर आबि जाइत छैक. बाथरूम मे पैसि क' हाथ-मुँह धोइत छैक. अयना मे मुँह देखैत छैक. सौंसे मुँह कारी-स्याह भ' गेल रहैक. ओ अपने मुँह देखि अपने डेरा जाइत छैक... देहक रोइयां रोइयां ठाढ़ भ' जाइत छैक.
भिनसरूका छः बाजि गेल रहैक. ओ अपन बेडरूम जाइत छैक. बत्ती जरा दैत छैक, फेर पलंग दिस बढ़ि जाइत छैक आ भारी  आश्चर्य मे पड़ि जाइत छैक ! पलंगक एक कात देबाल दिस मुँह केने ओकर पत्नी सूतल रहैक आ दोसर कात ओ अपने...

~ बालमुकुन्द 

मूलतः दैनिक भास्कर मे प्रकाशित 
मैथिली कथा : अंतर्व्यथा  मैथिली कथा : अंतर्व्यथा Reviewed by बालमुकुन्द on May 18, 2016 Rating: 5

1 comment:

  1. पढलहुँ,नीक कथा। मनुखक स्मृति सँ बहरा क'कोनो करिया कूकुर एहिना ओकर नीन्न उजारि दैत छैक।

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