मधुप जीक तीन टा कामर गीत



मिथिलांचल सहित सम्पूर्ण भारतवर्ष मे आइ महाशिवरात्री पर्व हर्षोउल्लास सं मनाओल जा रहल अछि. एहि अवसर पर एखन अपनेक समक्ष अपन प्रिय गीतकार/कवि काशीकान्त मिश्र 'मधुप' जीक तीन टा कामर गीत साझा क' रहल छी, पढल जाऊ- मॉडरेटर. 
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(१)

शिवदानी ! कत्ते हम कानी, कनियो दी नहि ध्यान रे 
कोन कसूरे निरमोहिया... 

कोन भमर मे उब-डुब भोला ! जीर्ण-शीर्ण ई नैया 
विकट बिहाड़ि बिना करुआरिक कम्पित गात खेबैया 
ने जानी पथक निशानी आकुल कछमछ प्राण रे।  कोन ...... 

गोहि नकार सोसि सं सकुल परम भयानक धार 
लुक झुक सुरुज, पास नहि पाथे, करत कि मधुप बेचारा 
जैं मानी, गहु मम पानी , क्यों न शरण अछि आन रे।    कोन ...... 

(२) 

कांटे कुशे भंगिया लै कै कामरु भार केँ 
ने पाबी रे, राखै जे की माथ गंगाधर केँ 

धार दुख, मन हार सुख, पथ बीहड़ धार पहाड़क भय 
नाग फुफुकर काटै, पैर भै बेकार फाटै 
तैयो नै देखै छी शंभु उदार केँ। ने पाबी रे ...... 

नीर झरै, मन मोर डरै, फुफरी सं सौंसे ठोर भरै 
ठोकै टा ई फूटल कपार केँ। ने पाबी रे ...... 

(३)

घर आँगन के छोरी कै, चललहुँ प्रभु दरबार 
पैर फूली फगुआक पू तैयो पंथ पहाड़

भांग खाय भकुआ कै भोला भूतक संग मसान मे
कमरथुआक कान्ह कामरू सं फूटल एहि दौरान मे
अपटी खेत कत' नहि पंथक पाकड़ि ऐ वीरान मे

ठेसि ठेसि रोड़ा पाथर सं पैरक आंगुर कानै
कांट कूश सं तरबा चालनि चलक बात नहि मानै
गरजि गरजि जंगल मे सदिखन बाघ भालु गज फानै

पानि पहाड़ी कैलक कारी प्राणो भेल झमाने
मधुप बेदरदी दानी अपने, हम पटपट मैदान मे...

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