Tuesday, March 1, 2016

हम कोनो संस्थाक सदस्य किएक बनलहुँ~शरदिन्दु चौधरी

मैथिलीक वरीय पत्रकार शरदिन्दु चौधरी बहुत पूर्वहि सँ अपन बेबाक लेखन लेल ख्यात छथि. हिनक तीन गोट पोथी कहबाक लेल हास्य-व्यंग्य संग्रह छनि मुदा ओहि सभ मे ओ मैथिल, मिथिला आ मैथिलक यथार्थ स्थिति कें अयना जकाँ देखयबाक प्रयत्न कएने छथि. प्रस्तुत रचना हुनक शीघ्र प्रकाश्य पोथी 'हाफ सेन्चूरी'क एकटा दृश्य प्रस्तुत करैत अछि जाहि मे ओ कोनो मैथिल संस्थाक सदस्य नहि बनबाक दर्द प्रस्तुत करैत छथि जे  आखिर किएक लोक अपन संस्था कें अपने हेय बना दैत अछि..

"हम नहि कहि सकैत छी"

हिन्दी मे एकटा मोहबरा छैक - अकेला चना भांड़ नहि फोड़ता' से जनैतो हम मोटा-मोटी यैह प्रयास करैत रहलहुँ जे कोनो संस्थाक सदस्य नहि बनी जे किछु क' सकी से स्वयं करी. आ हम एहि मे सफलो रहलहुँ. जगता बाबू (श्री जगदानन्द झा) बहुत प्रयास कयलनि जे हम चेतना समितिक सदस्य बनि जाइ. हुनक कहब छलनि जे ओ सदस्यता शुल्क द' देथिन, हमरा मात्र आवेदन फार्म पर हस्ताक्षर करबाक अछि. एहने आग्रह डाॅ. वासुकीनाथ झा सेहो कयलनि. मुदा जें हम अडिग रही तें चेतना समितिक सदस्य नहिये बनलहुँ.
 
एहि प्रकारें 'अरिपन'क सदस्य बनबा लेल सेहो हमरा पर बेस जोर देल गेल. आदरणीय मन्त्रेश्वर झा जी आ मधुकान्त झा जी कैक मीटिंगी समय मे लोकक सोझा मे फार्म पर दस्तखत करबा लेल बाध्य कयलनि लेकिन हम कोनहुना ससरि गेलहुँ.

सदस्य नहि बनबाक आर कोनो कारण नहि, मात्र एकेटा छल जे क्यो कोनो बात पर संस्था वा संस्थाक पदाधिकारी कें 'जे-से' कहि दैत छैक से हमरा बर्दास्त नहि होइए. आ खास क' जँ हम कोनो संस्थाक सदस्य रहब तँ ओ बात हमरो सुनय पड़त आ से हमरा सह्य नहि. आखिर एना संस्था करबे किए करत जे क्यो आंगुर देखौतै ! मुदा ईहो बात नहि जे कोनो संस्था सँ हमरा परहेज रहल. चेतना समिति, अरिपन, भंगिमा सभ संस्था सँ हमर नीक सम्बन्ध रहल अछि. हमर जे क्षमता अछि ताहि सँ सहयोग करबा मे हम कहियो पाछां नहि हटल छी से ओहि संस्थाक लोके सभ कहि सकैत छथि आ प्रायः तें सभ संस्थाक क्रियाकलाप मे हमर सक्रिय सहभागिता रहल अछि.

कोनो संस्थाक सदस्य नहि बनब से निश्चय छल मुदा कोन दुरमतिया घेरलक जे मैथिली लेखक संघक सदस्य बनि गेलहुँ. भेल एना जे हम, विनोद कुमार झा, अजित आजादक निर्णय भेल लेखक-साहित्यकार कें कतहु मान-सम्मान नहि भेटैत छैक तें एकटा एहन संस्था बनाओल जाय जाहि माध्यम सँ साहित्यकारक हक एवं सम्मानार्थ स्वर उठयबाक एवं काज होएबाक मार्ग प्रशस्त होअय. एही निमित्त हम आ विनोद कुमार झा निर्णय करय लगलहुँ जे कोना की करी. आपस मे निर्णय भेल जे हम सचिव बनब आ अध्यक्ष पद लेल मन्त्रेश्वर झा जी सँ आग्रह कयल जाय. विचारोपरान्त हम आ विनोद जी श्री मन्त्रेश्वर जी ओतय गेलहुँ. ओतय जाइते ओ अपन विचार प्रकट कयलनि जे शरदिन्दुजी कें बड़ काज रहैत छनि तें विनोदेजी सचिव बनथि. हमरा लेल धनि सन, संस्था चलओ. विनोद जी सचिव बनबा लेल तुरत तैयार भ' गेलाह. पुनः सभ गोटेक विचारें नरेन्द्र झा जी कें कोषाध्यक्ष बनयबा पर सहमति भेल.

आब संस्था कें अमली जामा पहिरयबा लेल एकटा सभा बजाओल गेल जाहि मे पटना स्थित प्रायः सभ साहित्यकार उपस्थित छलाह. जेना कि पूर्व निर्णय छल तहिना सभा मे मन्त्रेश्वरजी कें अध्यक्ष आ विनोदजी कें सचिव बना पूर्ण अधिकार देल गेलनि जे ओ संस्था कें निबन्धित कराबथि आ कार्यकारिणीक गठन करथि. यद्यपि एहि निर्णय पर अशोकजी (कथाकार-साहित्यकार), भारद्वाजजी आर कैक गोटे विरोध करैत कहलनि जे निर्णय कयले छल तं आमसभा किएक बजौलहुँ ? तथापि पुनः सर्वसम्मति सँ श्री नरेन्द्र झा कें कोषाध्यक्ष बनबैत संस्थाक 'बाइलाज' बनयबाक भार देल गेलनि. आब प्रश्न छल जे पहिने एगारहो सदस्य बनथि तखन ने 'बाइलाज' बना आवेदन देल जाय. एहि क्रम मे एगारह सय टाका ल' सदस्य बनयबाक अभियान चलल जाहि मे सर्वश्री मधुकान्त झा, डाॅ सत्यनारायण मेहता, अग्निपुष्प, कुणाल, डाॅ इन्द्रकान्त झा, शशिबोध मिश्र 'शशि' आदिक नाम शामिल कयल गेल आ पंजीयन लेल आवेदन देल गेल. लगभग साल भरि मे संस्थाक पंजीयन भेल सेहो ल'द' क' मुदा एकर जँ श्रेय अछि तं मात्र विनोदेजी कें बांकी सदस्य लोकनि बबुआने बनल रहलाह.

संस्था बनल, मीटिंग-सीटिंग भेल मुदा ई अपन लक्ष्य सँ भटकि गेल. एकाध टा नीको काज भेल मुदा दुइए वर्ष मे ई उर्ध्वशांस लेब' लागल. पुनः दू वर्ष पर चुनावक बेर आयल तँ मन्त्रेश्वर झा जी हमरा विवश क' देलनि जे अहाँ सचिव लेल ठाढ़ होउ, विनोदजी कें रिप्लेश करू. एहिठाम हमरा सँ चूक भेल आ हम राजनीतिशास्त्र पढ़ियो क' राजनीति नहि बूझि सकलहुँ आ मन्त्रेश्वर जी राजनीति पढ़ि प्रशासक बनि सफल भेलाह, तहिना लेखक संघ कें तोड़बा मे सफल भ' गेलाह. हमर ई डेग विनोद जी कें अप्रिय लगलनि. हमहूं ठाढ़ भेलहुँ आ विनोद जी चुनाव पदाधिकारी होइतो सचिव पद लेल ठाढ़ भ' गेलाह. ओ पूरा चुनावी तिकड़मक संग मीटिंग मे (अपन पूरा ताकतिक संग) अयलाह. हम सामान्य रूपें उपस्थित भेलहुँ. यद्यपि ओहि मीटिंग मे जहिया चुनाव निर्धारित छल तहिया अनेक आरोप सँ ओहो (मन्त्रेश्वरजी) महिमा मंडित भेलाह अध्यक्षता करैत मुदा हमरा से सह्य नहि भेल. आपस मे हम सभ दू गोल भ' गेलहुँ से देखि बड़ कचोट भेल. लेखक साहित्यकार संवेदनहीन भ' गेल छल से ओतहि देखबा मे आयल. महिलागण बुद्धिजीवी कहयबाक लौल मे एखनो मूर्तिये टा छथि (दुर्गा, काली, सरस्वती नहि), सीता जकां विवश, सेहो ओतहि देखल- प्रेमलता मिश्र 'प्रेम', इन्दिरा झा आ पन्ना झाक रूप मे. अजितक ललकारा भेटल चुनाव लड़बाक लेल, हमरा स्मरण भ' आयल-युद्धक विरोध मे बुद्धक प्रतिहिंसा. एहन स्थिति मे चुनाव लड़ब हिंसा होयत. विचारक हिंसा, आचारक हिंसा, मानवीय संवेदनाक हिंसा. हम चुनाव नहि लड़ब से निर्णय करैत ओत' सँ निकलि जाइत छी. हमर चुनाव लड़ब राजनीति होइत से हमरा सह्य नहि छल, आइयो नहि अछि. लेखक संघक राजनीति चलैत अछि, चलि रहल अछि. आइ निबंधित लेखक संघ (चारि बेरक चुनाव कें टारैत) स्थायी अध्यक्ष, स्थायी सचिवक संग जीवि रहल अछि आ प्रंशसा लोढ़निहार व्यक्ति सभ जे हमरा सँ सहमत भ' दूरी बनौने रहथि से पुनः मैथिली लेखक संघ दिस टहल' लगलाह अछि.

आइ हमहूँ छी, ओहो सभ छथि, संपूर्ण साहित्यकार-लेखक वर्ग छथि मुदा 'संघ' कत' अछि से सभ ताकि रहल अछि. हम सदस्य किएक बनलहुँ से सोचि रहल छी, सदस्य बनियो क' असफल किएक भ' गेलहुँ से सोचि रहल छी- अपन जीवनक अनेक असफलता मे एहू विषय कें सूचीबद्ध क' आहत भ' रहल छी.

मोन पड़ैत अछि विनोदजी (सरकार)क ई वाक्य- अहाँ कें उचितवक्ता बनबाक कोन काज अछि'. मोन पड़ैत अछि श्री नरेन्द्र झा जीक परामर्श- अहाँ मैथिली पोथीक दोकान खोललहुँ अछि, राजनीति मे नहि पड़ू , चुनाव नहि लड़ू'. मोन पड़ैत अछि अपन दोकान मे बैसल डाॅ विद्यानाथ झा 'विदित'क आग्रह- 'हमरा अहाँक सक्रिय सहयोग चाही'. मोन पड़ैत अछि अपन व्यक्तव्य- लेखक संघक माध्यम सँ हम सभ मीलि लेखकक प्रति संस्था सभ मे जे दुर्भावना व्याप्त अछि तकरा दूर करब.'

ई हमर दुर्भाग्य जे आब हम ककरो ई नहि कहि सकैत छिऐक जे हम कोनो संस्थाक सदस्य नहि बनलहुँ मुदा हम एक दिन ई सुनि चौंकि उठैत छी जे डाॅ रमानन्द झा रमण बजलाह अछि जे नीक कयलनि पंडित गोविन्द झा आ शरदिन्दु चौधरी जे कोनो संस्थाक सदस्य नहि बनलाह.

संपर्क :-
शरदिन्दु चौधरी

2A/39, टेक्स्ट बुक काॅलोनी
इन्द्रपुरी, पटना- 24
मो. :- 0933410235

3 comments:

  1. मैथिलीक विकासमे वर्चस्वक लडाइ पैघ समस्या अछि

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  2. मैथिलीक विकासमे वर्चस्वक लडाइ पैघ समस्या अछि

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  3. Kono sansthaak sadasya nahi banab , eho apna aap me ekta sansthe chai.

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