Tuesday, October 20, 2015

अदलाह काजसँ अरजल नाम कोन काजक:

                      
मैथिली लोकगीतकेँ भोजपूरी बनयबाक लेल आतुर मिथिलाक गीतकार-गबैया लोकनिक कहब छनि जे ओ बेस प्रसृद्धि प्राप्तिक लेल एहि तरहक दुअर्थी गीत लिखैत छथि. मैथिली गीतकेँ जन-जन धरि पहुँचयबाक लेल एखन एहि तरहक एलबम बनाएब बेसी आवश्यक अछि. मिथिलाक लोककेँ भोजपूरी गीत सुनबाक हिस्सक लागि गेल छनि जकरा छोड़ेबाक लेल एखन यैह एकटा विकल्प अछि.

भाइ, मिथिलाक गीतकार-गबैया लोकनि अपने सभक ई कहब कोनों तरहें पचायब संभव नहि भ' रहल अछि. नाम तँ एकटा वेश्या सेहो कमा लैत अछि ओहि क्षेत्रमे, परंतु कि ओकर प्रतिष्ठा सेहो भ' जायत अछि आ जौं एहने होइतै तखन तँ सभकियो अपना घरमे रंडीखाने खोलिकेँ बैसि रहितै, उपार्जनक संग-संग नाम-प्रतिष्ठा सभ भेट जैतै !

कनेक मिथिलाक संगीतिक परंपराक सम्बन्धमे सेहो सोचियौक. कि अपना सभक एहने परंपरा रहल अछि ? भाइ मिथिला भले सबदिनसँ सत्ताधारी लोकनिक द्वारा उपेक्षित रहल होय किंतु मिथिला संगीतक एकटा महत्वपूर्ण क्षेत्र सबदिनेसँ रहल अछि. गानक एकटा विशेष परम्परा एतय रहल अछि. मिथिलाक पनिचोभ , अमता, मधुबनी , पचगछिया संगीत घरानाक ख्याति सम्पूर्ण भारतभरिमे व्याप्त अछि. देशभरिकेँ लोक हिनका सभकेँ संगीतक क्षेत्रमे महत्वपूर्ण योगदान देनिहारमे नाम लैत छथि. ओतबे नहि कोकिल कवि विद्यापति, चन्दा झा, लालदास, किरणजी, ईशनाथ झा, मधूपजी, रवीन्द्र-महेन्द्र, चन्द्रमणि झा, सरसजी, धीरेन्द्र प्रेमर्शी जीक गीतसब सेहो सौंसे प्रसिद्ध छनि आ अहाँकेँ ई जानिकेँ आश्चर्य होयत जे हिनका सभक नाम मैथिली गीतक पर्याय से बनि चुकल अछि. लोक हिनक गीत सुनि-सुनि खूब आनन्दित से होयत अछि. अहाँ सबकेँ हिनका लोकनिसँ सीखबाक आवश्यकता अछि जे कोना हिनक गीतसब बिना कोनो तरहक अश्लीलता परोसने बिनु लोकप्रिय भ' गेल.

अहाँसबमे टैलेंट अछि एकर सकारात्मक उपयोग करबाक खगता अछि. तेँ अपन ऊर्जा नीक गीत लिखबामे खर्च करू. नीक काज करब तँ अपने नाम भ' जायत, ओहुना अदलाह काजसँ अरजल नाम कोनो काजक नहि रहैछ.

~बाल मुकुंद पाठक.

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