Friday, October 16, 2015

आब जल्दीसँ दर्शन भवानी दियौ

नेनपने सँ गामक कीर्तन-गोष्ठी मे सदिखन भाग लैत रहलहुँ. मैथिली गीत सँ प्रायः तहिए सँ आत्मीयता जकाँ भ' गेल, समयान्तर वैह अनुराग हमरा मैथिली साहित्य दिस सेहो खीचि आनलक. एहि क्रम ईशनाथ झाजी, मधुपजी, किरणजी, रविन्द्रजी, बूच बाबू, चंद्रमणि जी, सरस जी, धीरेन्द्र प्रेमर्षी आदि-आदिक गीत सभ पढ़लहुँ-सुनलहुँ आ हिनका सब केँ पढ़लाक उपरांत ताकि-ताकि केँ मैथिली गीत सब पढ़ए लगलहुँ मुदा वर्तमान मे मैथिली गीतक स्थिति ओ नहि अछि जाहि हेतु ई जानल जाइत छल. मैथिली गीतक वर्तमान स्वरूप साहित्य आ संगीत दुहू रूपें बहुत चिंताजनक अछि. औखन मैथिली गीतक नामपर जे प्रायः परोसल जा रहल अछि से कतहुँ सँ नहि उचित अछि आ नहिए ध्यान रखबा योग्य. एहना मे  शिव कुमार झा 'टिल्लू' जी अपन गीत सभक माध्यमे ओहि समस्त गीतकार-गबैया लोकनिक अयना देखयबाक यत्न क' रहल छथि जे निष्ठापूर्वक प्रयास होइक तँ आइयो मैथिली मे नीक साहित्यिक गीतक सृजन आ तकरा संगीतबद्ध कयल जा सकैछ. जे-से; औखन हिनक किछु भगवती गीत प्रस्तुत कयल जा रहल अछि, पढ़ि केँ अपन विचार देल जाउ.


१.  एहने मैया ज्ञान दे !

बखारी भरि भरि धान 
संग मधुर रस पान दे 
 ताम कोरि तोरा भीठ बनबियौ
 एहने मैया ज्ञान दे ! 
एक समांगकेँ नौकरी दिहें
 कैंचा द्रव्यक नहि खगता रहतै 
अपनो मल्हरब जोनो चखतै
 क'र कुटुम दुआरि पलरतै 
सहय ने कियो सहचर संगी
 सुनी व्यथा ओ कान दे !
 पैंजाब गेलहुँ ओत' ठकेलहुँ
 बापक अरजल टका बुड़ेलहुँ
 ठोकर लागल तैयो ने सोचलहुँ 
 मोरंगसँ हाथ डोलबिते एलहुँ
 पांच बिगहामे पंचम गाबी 
 महमह गीतक तान दे !
 तोरे आशे धरती मैया 
आब ने छोड़ब अप्पन मिथिला
 देसिल वयना गाबि गाबि क
परक माटिकेँ कहबै शिथिला 
कहला पर ने पड़ाइन करय
 किओ हे मैथिली संज्ञान दे !
 मालिक नहि किसान रूपमे
 बोनिहारक संग खेती करबै
 जाहि माटिमे पुरुखा मिललथि
 तोहर कोखिक लाज बचबियौ
 एहने सन किछु शान दे !

२.  अन्तर्मनक अराधना

भक्तिक दुर्ग पड़ल संकटमे दुर्गा शक्ति देखबियौ ने
हहरय आर्य्यक माटि सनातन मैया अपने अबियौ ने ....
भखरल ऋद्धि सिद्धि लिखल पट
माता अहाँकेर मोखेसँ
गोरिया माटिक लेब चढ़ेलहुँ
हमहूँ माता धोखेसँ
बिचुकैत बिचुकैत ज्ञान हेरायल किछु नव दर्शन लबियौ ने .......
एकसरि कहबनि की सुनती माँ
होइछ एकातक गुरुवर झूठ
हरियर पोरगर केर खगता तँ
की करतै ओ तरुवर ठूठ
सगुन ब्रह्म केर सकल उपासक दर्शन आशमे गबियौ ने .....
हे जननी चिष्टान्नमे फुफरी
निर्जल द्रव कोना खीर बनत
भोगक राशि अभोग अंशमे
कोना ने भक्त अधीर बनत
खाली आँजुर ठाढ़ उपासक मात्र भावकेँ पबियौ ने .....


३. हे दुर्गे भवबंधन तारिणी !!

हे दुर्गे भवबंधन तारिणी !!
दृष्टि धरू माँ नरक निवारिणी !
नयन विलोपित ज्योति अलोपित
देखब कोना मायक रूप शोभित
भाव सजल मधु छींटू माता
नीक डगरिकेँ बनबू ज्ञाता
सरित शांत पुण्य पाप बिहारिनी !
हे दुर्गे भवबंधन तारिणी !!
करुणाके एहि जगमे खगता
प्रखर सिद्ध भेल हासक अगता
दारुण लेल मात्र सिंह सुहासिनी
द्रवित शरदमे कमलक आसिनी
दया नीर दिअ' शस्त्रक धारिणी !
हे दुर्गे भवबंधन तारिणी !!
कातर कातर प्राण बिखंडित
कोना करब हम महिमा मंडित
बुद्धि भ्रमित भौतिक पिआसमे
भाव फूटय नहि नोर चासमे
चित्त ध' सुनू हे व्यथा उद्धारिणी !
हे दुर्गे भवबंधन तारिणी !!
यद्यपि साकल अर्थ ने साधन
मात्र जलहि संग सुनू माँ वंदन
सकल खलकमे हाहिक क्रंदन
आहि दिअ' हुअए सगरो नंदन
आत्म प्रसून ल' ठाढ़ गोहारिनी !
हे दुर्गे भवबंधन तारिणी !!


४.  दुर्गा वन्दना ( २१.०९.२०१५ )

भवप्रीता एलखिन आशक संगमे मिथिलाक नगरमे
आ'हे मिथिलाक नगरमे जनककेँ नीति डगरमे
पाटल रंग सत्या अंग अनंगमे शिवक सहचरमे
दुर्गा शूलधारिणी रूपे आद्या चित्त धवल अनूपे
भक्तक उर बोरल भक्तिक गंगमे विमला परतरमे
भवप्रीता एलखिन आशक संगमे मिथिलाक नगरमे
चंद्रघंटाक शंखनाद सुनि सुरभित चित्रा गुण धुनिधुनि
साधिका लपटलि बहुला नेहरंगमे श्रद्धाक भंवरमे
भवप्रीता एलखिन आशक संगमे मिथिलाक नगरमे
भव्या नित्या सर्ववाहन आब ने उपहासक उलहन
भक्तक संग ज्ञाना भाव मतंगमे आर्याक घ'र घ'रमे
भवप्रीता एलखिन आशक संगमे मिथिलाक नगरमे
उत्कर्षिणी शाम्भवी चिंता मातंगी क्रिया अनंता
देवी चरणक लग भक्त मलंगमे गाम गाम शहरमे
भवप्रीता एलखिन आशक संगमे मिथिलाक नगरमे

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