Sunday, September 13, 2015

गणेश मैथिल केर नाटक 'जागू'

आइ ई-मिथिला पर अबारी,मधुबनी निवासी गणेश मैथिल केर नाटक 'जागू'क दू टा दृश्य देल जा रहल अछि.  एम कॉम गणेश मैथिल एखन गुवाहाटी, असम मे रहि अध्ययन-अध्ययापन सँ जीवकोपार्जन करैत छथि आ मिथिला-मैथिलीक सेवा मे लागल छथि. हिनक नाटक 'जागू ' तेहन समय मे आयल अछि जखन युवा रचनाकार सभ एहि विधा सँ विमुख भेल जा रहल छथि, पढ़ि केँ कहू - मॉडरेटर. 

पात्र परिचय :

१. नारायण :  गृहस्थ , उम्र ४५ वर्ष
२. लक्ष्मी: नारायणक  पत्नी , उम्र ४० वर्ष
३.लाल काकी: नारायणक  माए, उम्र ६५ वर्ष
४. विष्णुदेव: एगो  समाज सेवक , उम्र ४० वर्ष
५.अकबर:एगो  साधारण बुद्धिजीवी  व्यक्ति , उम्र ३५ वर्ष
६.गीता : नारायण के ज्येष्ठ कन्या,उम्र १५ वर्ष
७.बिल्टू: बी.ए.पास एगो  बेरोजगार युवक ,उम्र २३ वर्ष
८. नन्हकू काका: एक बुजुर्ग ,उम्र ६० वर्ष
९. रहीम: १५ वर्षक अनपढ़ बालक
१०.सोहन:१३ वर्षक अनपढ़ बालक
११.मोहित: १६ वर्षक अनपढ़
 प्रथम दृश्य:

समय: राइत
(दलानक दृश्य , अषाड़क अन्हरिया राइत, लालटेन जरैत, दलान पर चिंतित मुद्रा मे नारायण टहलैत| नेपथ्य मे प्रसूति पीड़ा सँ लक्ष्मी कराहैत , थोड़े देर बाद बच्चाक जन्म आ कनबाक ध्वनि )

लाल काकी : (रुदन करैत प्रवेश ) रे नारायनमा ! रे नारायनमा !!
नारायण : की भेलई माए? की भेलई ??
लाल काकी: तोहर कर्म फुटि गेलौ रौ ! ई कुलक्षणी नामक लक्ष्मी चारीम बेटी कें जन्म देलकौए  रौ ! अरे देव रौ देव !! कौ न मुखे एकर पाएर हमर घर मे पड़ल रौ देव ! बेटी के बाहिड़ लगा देलकौ रौ देव !!
कोना क' चारिटा बेटी के विआहबाए रौ नारायणमा  ? देहो बिकीन लेबा' तइयो नै पार लगतौ रौ ! तोड़ा कहने छलिऔ दोसर विआह क' ले' --एहि मौगिया सँ तोड़ा बेटा नै हेतौ , मुदा , तू नै मानलें  हमर बात ! आब वंश कौना चलतौ रौ नारायणमा ?(जोड़ जोड़ सँ छाती पिटैत)
नारायण :(माए के बुझबैत ) माए! माए!! ई अहाँ किदौन कहाँ दून कियाक बजैत छी ?--एहि मे लक्ष्मी कें कोन दोष थिक ? ई त' भगवतिक कृपा ! एखन लक्ष्मी प्रसूति पीड़ा मे छथि , हुनका ऊपर एहन असहनीय  दुर्वचनक बाण नै चलाऊ !!
लाल काकी:(खौझा' क बजैत ) त' तोहर की मोन ? फूल-पान ल' आरती उतारीयनि!!
नारायण: हँ माए हँ ! लक्ष्मी आई फेर एक लक्ष्मी कें जन्म देलिहए | माए! अहाँ जनैत छी --कन्यादान सभ सँ पैघ यज्ञ थिक | सौभाग्यवश: भगवतिक कृपा सँ हमरा चारिटा यज्ञक फल भेटबाक अवसर भेटलए | अहाँ जुनि व्यर्थ चिंतित हौ |

      (विष्णुदेवक प्रवेश )
विष्णुदेव :लाल काकी , एना कियाक खौंझाएल छी ?
लाल काकी: ई लक्ष्मी रानी फेर बेटी बिएलिहाए !!
विष्णुदेव: ई त' हर्षक गप थिक ! बेटी के जन्म --बुझू साक्षात् लक्ष्मी के जन्म !! एहि मे एतेक खौंझेबाक कोन .....
लाल काकी:(बीचे मे टोकैत) हाँ ...हाँ ...., 'दोसरक घर जरैत छै त' तमाशा देखबा मे बड्ड नीक लगैत छै ...मुदा ,जखन अपन घर जरैत छै त' आगिक दाह बुझि पड़ैत छै |' अपना बेटी नै अछि ने , दूटा बेटे अछि --ताँए एहन गप निकलैया...
.
नारायण: माए....! अहाँ चुप रहब की नै ? (विष्णुदेव के)-- भाई , क्षमा करब ! माएक गप के जुनि .....
विष्णुदेव: .....भाई ! ई की करै छी ? अहाँक माए हमरो माए | हम काकी कें दुःख बुझि सकैत छियनि ! मुदा मनुष्य की क' सकैत अछि .....??
(लाल काकी के बुझबैत ) काकी जुनि खौंझाऊ ! कने सोचू !  पहिल- जे अहूँ  त' बेटी छी ! जौं बेटी नै  हेती त' बेटा-बेटी के जन्म के देत ?? दोसर स्त्री भ' स्त्री के प्रति दुर्यव्यव्हार , इ उचित नै थिक !
तेसर- बेटा-बेटी कें जन्म स्त्री द्वारा निर्धारित नै होइत अछि | विज्ञानं बतबैया कि बेटी-बेटा कें निर्धारण पुरुष दवारा होइत अछि |--ताँए जँ  नारायण भाई कें चारिटा बेटी भेलनि त' एहि मे लक्ष्मी भौजी कें कोनो दोष नै | ...ओ त' साक्षात् लक्ष्मी छथि |.....काकी !अहाँ के त' पाँच टा पुतौहु छथि --काएटा  लग मे रहि सेवा करै छथि ? एक लक्ष्मी भौजी छथि जेँ तन-मन-धन सँ अहाँक सेवा मे समर्पित रहैत छथि |....चलु ,एहि समय हुनका अहाँक जरुरत छन्हि | सास आ माए मे कोनो अन्तर नै होइत छै |
(लाल काकी अन्दर जाईत छथि )
    पर्दा खसैत अछि ......प्रथम दृश्य के समाप्ति |||


दोसर दृश्य 

(सोइरिक दृश्य )
(नारायणक प्रवेश )
नारायण:: (लक्ष्मी सँ )...नीके छी ने ? (बच्चा कें कोरा मे उठा लैत छथि )....लक्ष्मी , ई त' बिल्कुल अहींक दोसर रूप बुझि पड़ैत अछि !
लक्ष्मी:: गीता के बाबू , हम बड्ड अभागिन छी ! हम अहाँ कें बेटा नै द' सकलौं ! माए ठीके कहै छली , अहाँ दोसर विआह क' लियह....
नारायण:: (बीचे मे )....लक्ष्मी !!...ई अहाँ की कहैत छी ? दोसर विआह ! ओ हम!! कदापि नै !!! हमरा बेटा नै भेल त' एहि मे अहाँक कोन दोष ? जँ  हमरा भाग्य मे बेटा नै होएत त' चारियोटा विआह केने कोनो लाभ नै ...
लक्ष्मी::..मुदा, अहाँक वंश...
नारायण:: ....की बेटी बापक अंश नै होइत अछि ? बेटीए सँ वंश चलत | देखिलियौ, नेहरूजी कें वंश इंदिरा गाँधी सँ चलि रहल छन्हि |
लक्ष्मी::..हम अहाँक भावना कें बुझैत छी , मुदा, ई समाज नै बुझत ! हमरा सब दिन निपुत्री होएबाक उलाहना सुनै पड़त |
नारायण:: त' की समाजक डर सँ हम अपन जिनगी नरक बना लीअ? की हम दोसर विआह करू ? वा बेटा के इंतजार मे एक सोरहि धिया-पुता जन्माऊ ?...लक्ष्मी , समाज एहिना कहैत रहत ...भुगतअ त' अपना सभ कें पड़त | हम कहैत छी ---आब ऑपरेशन करा' लीअ | आजुक युग मे एक -स -दू धिया -पुता बड्ड भेलहि, चाहे बेटा हुए वा बेटी ...
लक्ष्मी::..हम कहिया मना केलहूँवाँ ! हम त' दोसरे बेटी के बाद ऑपरेशन कराबअ लेल माइर केने रही, मुदा, माए जिद्द करए लगली...
नारायण::...नै, आब किनको जिद्द नै नै चलतैन ! अहाँ सोइरी सँ निकलू , तखन ऑपरेशन भ' जाएत |
        (नारायण...नारायण ...नेपथ्य सँ नारायण के केओ सो पाडैत)...याह एलौ ...
नारायणक प्रस्थान ....(पर्दा खसैत अछि )
  दोसर दृश्यक: समाप्ति

शेष दृश्य सेहो जल्दिए

संपर्क:
गणेश मैथिल 
ईमेल -bawra.g@gmail .com 
मोबाइल -09864406875

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